Saturday, October 16, 2021

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7 जून, 1893: गांधी ने नस्लभेद के विरुद्ध आंदोलन की नींव रखी थी

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इतिहास में कुछ तारीखें इतिहास और मानव चिंतन की धाराएं बदल कर रख देती हैं। ऐसी ही तारीखों में आज 7 जून की तारीख भी है, जब दक्षिण अफ्रीका के एक अज्ञात रेलवे स्टेशन, पीटरमारिट्जबर्ग, पर 7 जून 1893 को गांधी जी को धक्का देकर ट्रेन से जबरन उतार दिया गया था। उनका सामान प्लेटफार्म पर फेंक दिया गया था। 7 जून 1893 के दिन,  स्टेशन के प्लेटफार्म से उठ कर गांधी जी ने पूरी कड़कड़ाती ठंडी रात वेटिंग रूम में बिताई और वहीं से सत्याग्रह के मंत्र का उद्घोष हुआ। उनका सामान फेंकने और उनको धक्का देकर उतारने वाले अंग्रेज टीटीई के गुमान में भी, कभी यह नहीं रहा होगा कि, एक साधारण सा काला, गुलाम देश का बैरिस्टर, ब्रिटिश साम्राज्य को भी ऐसे ही, किसी दिन झटक कर फेंक देगा और  बर्तानिया राज में कभी न डूबने वाला सूरज इंग्लिश चैनल पर ही अस्त होने लगेगा।

गांधी तब गुजरात के राजकोट में वकालत करते थे। उन्हें दक्षिण अफ्रीका से सेठ अब्दुल्ला नामक एक भारतीय ने, अपना मुकदमा लड़ने के लिए दक्षिण अफ्रीका बुलाया था। तब दक्षिण अफ्रीका भी ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत था। पर वहां के नागरिकों की स्थिति भारत के नागरिकों की तुलना में बेहद खराब थी। रंगभेद चरम पर था और यह व्याधि, हाल तक वहां रही। दादा अब्दुल्ला का मुकदमा लड़ने के लिये, गांधी जी, पानी के जहाज से दक्षिण अफ्रीका के डरबन पहुंचे थे। वहां से वे मुक़दमे के सिलसिले में, प्रिटोरिया जाने के लिये, 7 जून 1893 को ट्रेन पकड़ी थी।

गांधी जी जिस ट्रेन से सफर कर रहे थे, उसी ट्रेन का, उनके पास, फर्स्ट क्लास का टिकट भी था। वे निश्चिंतता से जाकर अपने कूपे में निर्धारित जगह पर बैठ गए। डरबन से ट्रेन चली। ट्रेन फिर पीटरमैरिट्जबर्ग स्टेशन पहुंची। तब टीटी आया और उन्हें, उसी ट्रेन के थर्ड क्लास डिब्बे में जाने के लिए कहा। इस स्टेशन पर एक गोरा यात्री चढ़ा था, जिसने एक अश्वेत व्यक्ति को कूपे में बैठे देख कर आपत्ति की थी। बात टिकट की थी ही नहीं। बात थी कि एक अश्वेत व्यक्ति कैसे एक गोरे व्यक्ति के साथ फर्स्ट क्लास में सफर कर सकता है। रंगभेद के श्रेष्ठतावाद का यह घृणित रूप था। 

गांधीजी ने टिकट का हवाला दिया और अपने बारे में बताया। यह भी बताया कि उन्होंने लंदन से बैरिस्टरी पास की है और यहां एक मुक़दमे के सिलसिले में आये हैं और उसी सिलसिले में प्रिटोरिया जा रहे हैं। पर टीटीई ने उनकी एक न सुनी। उसने, गांधी जी को, उतर जाने को कहा। गांधी ने उतरने से इनकार कर दिया। इस पर, उन्हें धक्का देकर नीचे उतार दिया गया और उनका सामान प्लेटफार्म पर फेंक दिया गया। ट्रेन चली गयी। अपमानित गांधी, कड़कड़ाती ठंड में, प्लेटफार्म पर ही पड़े रहे। जून का महीना, दक्षिण अफ्रीका में ठंड का महीना होता है। उठ कर वह, स्टेशन के वेटिंग रूम में पहुंचे।

उस रात वे पूरी तरह से जगे रहे। रात भर वे चिंतामग्न रहे। तरह तरह की बातें दिमाग मे आती रहीं। गांधी जी ने उक्त घटना के बारे में लिखा है कि, “एक बार ख्याल आया कि वे बिना कोई प्रतिक्रिया दिए भारत वापस लौट जाएं। लेकिन दूसरे ही पहल सोचा कि क्यों न उन्हें अब अपने देश में भारतीयों के खिलाफ हो रहे जुल्म के खिलाफ लड़ना चाहिए।”

गांधी अहिंसक थे, पर पलायनवादी नहीं थे। उन्होंने दूसरा विकल्प चुना। वे दक्षिण अफ्रीका में रुके और फिर भारतीयों के वैधानिक अधिकार के लिये एक योजनाबद्ध तरह से लड़ाई लड़ी। अहिंसक और सिविल नाफरमानी की ताक़त दुनिया ने देखी। हिंसक दमन के खिलाफ अहिंसक दृढ़ इच्छाशक्ति अधिक कारगर हुयी।

रंगभेद और नस्लभेद पर गांधी का यह पहला प्रहार था। अंग्रेज यह समझ ही नहीं पाते थे कि उनका किस तरह की शख्सियत से पाला पड़ा है। यह मोहनदास करमचंद गांधी से महात्मा और राष्ट्रपिता गांधी बनने की ओर की पहली घटना थी। उसी रात दक्षिण अफ्रीका के पीटरमारिट्जबर्ग में गांधी के सत्याग्रह की नींव पड़ चुकी थी पर तब उन्हें शायद ही यह अंदाजा रहा हो कि, सविनय अवज्ञा आंदोलन की यह अजीबोगरीब शुरुआत, एक दिन, अंग्रेजी सत्ता की चूलें हिला कर रख देगी। इतिहास ऐसे ही अनजान सी एक घटना से बदलने लगता है।

ट्रेन की यह घटना उनके लिये रंगभेदी अनुभव की पहली घटना नहीं थी। बल्कि, दक्षिण अफ्रीका में ही, गांधी जी को एक बार घोड़ागाड़ी में अंग्रेज यात्री के लिए सीट नहीं छोड़ने पर पायदान पर बैठकर यात्रा करनी पड़ी थी। यही नहीं, घोड़ागाड़ी हांकने वाले ने उन्हें मारा पीटा भी था। दक्षिण अफ्रीका के कई होटलों में रंग के आधार पर उनका प्रवेश वर्जित किया गया। उस ज़ुल्मत भरी रात, उन्हें यह सब नस्लभेदी ज़ुल्म याद आते रहे। मन इनका समाधान ढूंढता रहा। गीता पर अगाध आस्था रखने वाले गांधी को समाधान भी गीता से ही मिला। न च दैन्यम न पलायनम। उन्होंने न दीनता दिखाई और न ही वहां से भागे। यहीं से उन्होंने आंदोलन के बीज बो दिए।

उस दिन के बाद से 1915 तक, जब तक गांधी जी भारत नहीं लौटे तब तक, दक्षिण अफ्रीका में, ब्रिटिश हुक़ूमत के खिलाफ नागरिक अधिकारों के लिये वे लड़ते रहे। यह आंदोलन राजनीतिक तो था ही, साथ ही सामाजिक भी था। टॉलस्टॉय से प्रभावित गांधी ने टॉलस्टॉय फार्म की स्थापना 1910 में की। गांधी 1884 में प्रकाशित टॉलस्टॉय की किताब, द किंगडम ऑफ गॉड इज विदिन यू, जो मानव के अहिंसक मूल्यों पर आधारित है से बहुत ही प्रभावित थे। इसी की तर्ज पर गांधी जी ने साबरमती आश्रम की स्थापना की जो आगे चल कर स्वाधीनता संग्राम का मुख्य तीर्थ बन गया।

गांधी जी की विचारधारा और आज़ादी पाने के उनके तौर तरीकों की आलोचना, न केवल उनके जीवन काल में होती थी, बल्कि अब भी होती है। अक्सर यह भी कहा जाता है कि चरखे से आज़ादी नहीं आयी। यह वाक्य वे लोग अधिक कहते हैं जो भगत सिंह के धुर वैचारिक विरोधी खेमे के हैं और जिनका स्वाधीनता संग्राम में योगदान ढूंढे नहीं मिलता है। पर वे यह भूल जाते हैं कि गांधी का स्वाधीनता संग्राम में सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने साम्राज्य और श्रेष्ठतावाद का भय जो सत्ता अक्सर जनता के बीच बोती रहती है, को जन गण मन के बीच से निकाल कर फेंक दिया। निहत्थे लोगों ने साम्राज्य की ताकत से डरना छोड़ दिया। जनता को निर्भीकता से खड़े होने की प्रेरणा गांधी के अहिंसक और सत्याग्रह आंदोलन से मिली है। इसे यूरोपीय फासिस्ट राष्ट्रवाद के चश्मे से देखेंगे तो कभी समझ नहीं पाएंगे।

जनरल स्मट्स जो दक्षिण अफ्रीका का गवर्नर था से, गांधी जब दक्षिण अफ्रीका छोड़ कर भारत आने के पहले मिलने जाते हैं तो उस रोचक मुलाकात का जो विवरण मिलता है उसके अनुसार, गांधी जी ने स्मट्स से उन असुविधाओं के लिये अफसोस जताया जो स्मट्स को गांधी जी के आंदोलनों के काऱण झेलना पड़ा था। गांधी की इस निर्मल सदाशयता ने जनरल स्मट्स को अवाक कर दिया। अपनी प्रतिद्वंद्विता में दोनों एक-दूसरे के दबे-छिपे प्रशंसक भी बन गए थे। जब गांधीजी सन 1915 में भारत लौटे, तो स्मट्स ने एक मित्र को लिखा कि
“संत हमारे देश से चले गए हैं और मुझे उम्मीद है कि वह लौटकर नहीं आएंगे।”

गांधी का देश की जनता पर जादुई प्रभाव था। यह प्रभाव उनके जीवनकाल में कभी भी कम नहीं हुआ और आज भी गांधी का करिश्मा कायम है। इस जादुई प्रभाव और मानव मन में गांधी जी की इस अनोखी पैठ का किसी इतिहासकार को मनोवैज्ञानिक अध्ययन करना चाहिए। यह एक दिलचस्प अध्ययन होगा। गांधी को स्वीकार करें या अस्वीकार पर गांधी को जब जब भी अप्रासंगिक बनाने की कवायद की जाती है तो वह अपनी दुगुनी शक्ति से अवतरित हो जाते हैं।

अपने अधिकार के प्रति सजग और सचेत रहना, अन्याय का सतत विरोध और निर्भीकता जैसे उच्च मानवीय गुणों को बनाये रख कर ही हम किसी भी अहंकारी और तानाशाही ताक़त का मुकाबला कर सकते हैं। गांधी के जीवन से हम यह मंत्र सीख सकते हैं।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं आप आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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