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देश के आईने पर बाबरी मस्जिद की लकीर!

अयोध्या पर आए सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की भनक उसी समय लग गयी थी जब संघ ने चोला बदलकर लोगों से शांति और सद्भाव बनाए रखने की अपील शुरू कर दी थी। और केंद्र ने शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए सभी राज्य सरकारों को कड़े निर्देश जारी कर दिए थे। और जगह-जगह जिलाधिकारियों के नेतृत्व में होने वाली शांति कमेटियों की बैठकों में मुस्लिम चेहरों को खासा तवज्जो दिया जा रहा था। ऐसा कैसे संभव था कि एक संगठन जो आस्था के सवाल को कानून और संविधान से ऊपर बता रहा था। वह एकाएक कोर्ट के फैसले को लोगों से मानने की अपील करनी शुरू कर दे।

सियार रंगा था यह बात अब स्पष्ट हो गयी है। लेकिन इसके साथ ही यह बात भी साफ हो गयी है कि संघ और सरकार दोनों को अयोध्या के फैसले की पहले से जानकारी थी। और अगर ऐसा था तो यह बात खुद ही कोर्ट की पवित्रता पर सवाल खड़ा कर देती है। एक पक्ष को अंधेरे में रखकर दूसरे को फैसले की जानकारी देना न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है।

ऊपर से जो फैसला आया है वह न्याय से ज्यादा समझौता दिखता है। और तमाम किस्म के अंतरविरोधों से भरा पड़ा है। मसलन कोर्ट खुद कहता है कि फैसले का आधार आस्था और विश्वास नहीं बल्कि कानून और संविधान है। लेकिन उसके साथ ही यह भी कहता है कि हिंदुओं की राम में आस्था और उनके अयोध्या में पैदा होने की बात निर्विवाद है। इसके साथ ही कोर्ट का पहले यह कहना कि बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना अपराध है। लेकिन उसके दोषियों को सजा देने और उस गलती को दुरुस्त करने की जगह उस मस्जिद को ही दर-बदर कर दिया जाता है। यह बात तर्क की किस कसौटी पर खरी उतर सकती है।

कोर्ट ने कहा कि बाबर के निर्देश पर मीर बाकी ने मस्जिद बनवायी थी। यहां उसने एएसआई के हवाले से जो बातें कहने की कोशिश की है वह भी अंतरविरोधी है। कोर्ट ने कहा कि मस्जिद खाली स्थान पर नहीं बनी थी। बल्कि उसके नीचे कोई ढांचा था। इसके साथ ही उसने यह भी कहा कि वह ढांचा इस्लामिक नहीं था। इस्लामिक न होने का मतलब यह तो नहीं होता है कि वह हिंदुओं का हो गया। वह ढांचा बौद्धों का भी हो सकता है। या फिर जैनों का हो सकता है। या फिर कुछ और।  हालांकि एएसआई के तमाम दूसरे बड़े पुरातत्वविदों ने मस्जिद के नीचे किसी मंदिर के होने की बात को खारिज किया है।

और इसी के बाद कोर्ट की नजर में बाबरी मस्जिद एकाएक विवादित ढांचे में तब्दील हो जाती है। और 1949 में साजिश के तहत रखी गयी मूर्ति रामलला विराजमान हो जाते हैं। और कोर्ट उसको मुख्य पक्षकार का दर्जा दे देता है। अगर कोई तथ्यात्मक रूप से भी बात करे तो सच्चाई यह है कि बाबरी मस्जिद का वजूद पहले था और मूर्ति उसके निर्माण के 400 साल बाद रखी गयी और वैसे भी इतने सालों तक किसी स्ट्रक्चर के खड़े रहने पर उसे पुरातत्व के लिहाज से महत्वपूर्ण मान लिया जाता है। और वह एक एंटीक का दर्जा हासिल कर लेता है। लेकिन यहां उसे ही स्थायी वनवास दे दिया जाता है।

मामला यहीं शांत नहीं हुआ मुस्लिमों को जमीन से बेदखल करने के बाद भी कोर्ट का पलड़ा हिंदुओं के पक्ष में ही झुका दिखा। जब उसने सरकार को बाकायदा ट्रस्ट बनवाकर मंदिर निर्माण करवाने का आदेश दिया। तथा मस्जिद के लिए पांच एकड़ जमीन देकर वक्फ बोर्ड को रुखसत कर दिया। जबकि गिरी मस्जिद थी और अगर उसका कोई निर्माण भी होना था तो यह जिम्मेदारी सरकार की थी। हालांकि इस फैसले के बाद मुसलमानों का एक मत बेहद मजबूती से उभर कर सामने आ रहा है कि अल्पसंख्यक समुदाय को उसे लेने से ही इंकार कर देना चाहिए।

इस फैसले के साथ ही संघ की सत्ता और व्यवस्था पर पकड़ एक दूसरे चरण में पहुंच गयी है। जिसमें अपनी मांग को पूरा करवाने के लिए अब उसे किसी आंदोलन की जरूरत नहीं है। सरकार और संस्थाओं के जरिये ही वह अपनी चीजें लागू करवाने में सक्षम है। यानी बहुसंख्यकों के वर्चस्व का नया दौर शुरू हो गया है। इस मामले में अभी तक उसकी गिरफ्त केवल विधायिका और कार्यपालिका तक सीमित थी। न्यायपालिका के इस नये रुख के बाद अब उसके सामने महज संविधान बदलने की ही चुनौती शेष है। और उसके पूरा होने के साथ ही हिदू राष्ट्र के निर्माण का उसका सपना भी पूरा हो जाएगा।

हालांकि कहने को यह रामराज्य होगा। लेकिन उसमें घोषित रूप से समाज के एक तबके को दोयम दर्जे का जीवन हासिल होगा। जो किसी भी रूप में राम के बुनियादी स्वभाव से मेल नहीं खाता है। अयोध्या में आया फैसला उसकी सांकेतिक शुरुआत भर है। जिसमें मस्जिद को पहले ध्वस्त किया गया और फिर उसे रौंदा गया और आखिर में किनारे लगा दिया गया। और अब जबकि व्यवस्था के पंजों के जरिये अल्पसंख्यकों को अपने चंगुल में ले लिया गया है तो उनके कराहने पर भी रोक लगा दी गयी है।

लेकिन इस फैसले के साथ ही अल्पसंख्यकों का देश और उसकी व्यवस्था से अलगाव का सिलसिला भी अपने अंजाम तक पहुंच गया है। शीशे पर बनी बाबरी मस्जिद की यह लकीर अब कभी नहीं मिटेगी। यह फैसला सिर्फ मुसलमानों पर ही नहीं बल्कि देश के दूसरे समुदायों पर भी असर डालेगा। और आने वाले दिनों में इसके नतीजे बेहद खतरनाक हो सकते हैं।

क्या विडंबना है। इस्लामिक देश पाकिस्तान जब सिखों को गुरुद्वारा बनाकर भेंट कर रहा है। ठीक उसी समय हमारे सेकुलर राष्ट्र ने मस्जिद के ध्वंसावशेषों पर मंदिर निर्माण का फैसला लिया है।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संस्थापक संपादक हैं।)

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This post was last modified on November 9, 2019 6:51 pm

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