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गोडसे के मुकाबिल आवाम की रूह में जिंदा हो गए हैं गाँधी

सूर्यास्त के बाद शाम के धुंधलके में शाहीन बाग़ के मंच से गांधी का पसंदीदा भजन गाया जाता है- रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीताराम, ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान………….। गांधी कीर्तन के बाद मंच से अपील की जाती है धरने पर बैठे सभी लोग अपने मन और वाणी की शुद्धता का ध्यान रखें। मन, वचन और कर्म में अहिंसा को स्थान दें।

ये सिर्फ़ शाहीन बाग़ में नहीं हो रहा देश में चल रहे सैकड़ों अनिश्चितकालीन धरनों में ये आपको देखने सुनने को मिल जाएगा। बहुसंख्यकवादी सरकार और उसकी सांप्रदायिक सरकारी मशीनरी द्वारा जब आवाम के खिलाफ़ बर्बरतापूर्ण दमन की अति हो गई तो दमन के खिलाफ़ संघर्ष करने के लिए लोगों ने गांधी के सत्याग्रह को अपना हथियार बना लिया और शाहीन बाग़ गाँधीवाद की नई प्रयोगशाला बन गयी। एक बार गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धांत पर देश की आवाम का विश्वास जगा तो देश भर में सैकड़ों शाहीन बाग़ पैदा हो गए।

आवाम ने गांधी को अपनाया

संकट की इस विकट घड़ी में जब बुद्धिजीवी और विपक्ष सब फेल हो गए इस देश की आवाम ने गांधी की ओर रुख़ किया। लोग गांधी के जीवन से प्रेरणा लेते हुए उनकी नीतियों और आंदोलनों के मार्ग पर चल पड़े। लोग गांधी को ढूँढ़कर पढ़ने, अपनाने, जीने और आत्मसात करने लगे। यही कारण है कि अपनी जयंती के 150 वें वर्ष में गाँधी और ज़्यादा प्रासंगिक हो उठे हैं। गांधी सिर्फ़ पोस्टरों बैनरों में ही नहीं जीवन और संघर्ष के तौर-तरीकों में उतर आए हैं। गांधी द्वारा भारत छोड़ो आंदोलन के लिए दिया गया ‘करो या मरो’ का नारा आज फिर से कारगर हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा है। आज सैकड़ों जगहों पर सीएए-एनआरसी के खिलाफ़ स्त्रियों का अनिश्चितकालीन धरना गांधीवादी तौर-तरीके से ही चल रहा है, जिसके आगे सत्ता और उसकी मशीनरी लाचार हो गई हैं। उन्हें लोगों पर बल प्रयोग करने का कोई हिंसक बहाना नहीं मिल रहा है।

‘सविनय नागरिक अवज्ञा’ की तर्ज़ पर ‘कागज नहीं दिखाएंगे’ मुहिम

गांधी के सविनय नागरिक अवज्ञा की तर्ज़ पर एनपीआर-एनआरसी के खिलाफ़ ‘हम कागज़ नहीं दिखाएंगे’ कार्यक्रम चलाया जा रहा है। हर आंदोलन में हम कागज़ नहीं दिखाएंगे के नारे गूँज रहे हैं। लोग इस मुहिम में जुड़ रहे हैं। इससे जुड़े गीत और गाने हर गली कूचे में बज रहे हैं। धरना स्थलों पर बैठे लोग बाग ‘हम कागज नहीं दिखाएंगे’ की राग छेड़े हुए हैं। ये आज़ाद भारत का पहला नागरिक अवज्ञा आंदोलन है। इससे सरकार बौखलाई हुई है। कला संगीत, फिल्म जगत की कई हस्तियों ने वीडियो क्लिप बनाकर इस मुहिम को अपना समर्थन देकर आगे बढ़ाया है।

लोगों से अपील किया जा रहा है कि जब नेशनल पोपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) के लिए लोग आएं तो आप उन्हे अच्छे से बैठाइए चाय पानी कराइए और फिर नमस्ते कहते हुए आदरपूर्वक कहिए कि अब आप जाइए– ‘हम आपको कागज़ नहीं दिखाएंगे।’ 

अनिश्चितकालीन धरना

जामिया, एएमयू, जाफराबाद, सीलमपुर, दिल्ली गेट, मेरठ, बुलंदशहर, लखनऊ, कर्नाटक आदि में हुए पुलिसिया बर्बरता के खिलाफ़ शाहीनबाग़ की स्त्रियों ने गांधी की ही तर्ज़ पर अनिश्चितकालीन धरना शुरु किया। सरकार और पुलिस ने पूरी कोशिश पूरी साजिश की, लोग याचिका लेकर सुप्रीम कोर्ट तक गए लेकिन शाहीन बाग़ के धरने को नहीं हटा सके। इसके देखा देखी पूरे देश में स्त्रियों ने जगह जगह पर अनिश्चित कालीन धरना देना शुरु कर दिया है। सीएए-एनआरसी विरोध करने वालों पर पुलिसिया दमन के बावजूद लोगों ने सरकार और पुलिस से डरना छोड़ दिया और देखते ही देखते दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, हरियाणा, राजस्थान, आदि कई राज्यों के कई शहरों में स्त्रियां अपने अपने घरों सें निकलीं और छोटे छोटे बच्चों को लेकर धरने पर बैठ गईं।

अकेले दिल्ली में ही शाहीन बाग, जामिया, इंद्रलोक, खुरेजी, सीलामपुर, करदमपुरी,  चाँदबाग़ मुस्तफ़ाबाद, ब्रजपूरी मुस्तफ़ाबाद, तुर्कमान गेट, खजूरी ख़ास, सुंदरनगरी, ईदगाह कसाबपुरा, हौज़रानी मालवीय नगर, बेरी वाला बाग़ आज़ाद मार्केट, नूर इलाही, मजबूर कॉलोनी मंडावली में स्त्रियां गांधीवादी तरीके से अनिश्चितकालीन धरने पर हैं। इसके अलावा कोलकाता के पार्क सर्कस में, पटना के सब्जी मंडी में, इलाहबाद के मंसूर अली पार्क में, लखनऊ के घंटाघर में, भोपाल के इकबाल मैदान में, कानपुर में अनिश्चितकालीन धरना बेहद शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीके से चल रहा है।

आमरण अनशन

आमरण अनशन गांधी का सबसे अचूक हथियार था। इसका इस्तेमाल गाँधी ने तत्कालीन क्रूर ब्रिटिश सत्ता को झुकाने से लेकर लोगों के बीच सांप्रदायिक सद्भाव और भाईचारा की भावना विकसित करने के लिए कई बार बहुत सफलतापूर्वक किया था। गांधी की ही तरह क्रूर सत्ता के खिलाफ़ शाहीन बाग़ में दो लोग आमरण अनशन पर बैठे हुए हैं। जैनुलअबीदीन तो शाहीन बाग़ आंदोलन शुरु होने के पहले दिन से ही आमरण अनशन पर हैं। इस बीच कई बार उनकी तबियत खरीब होने पर उन्हें अस्पताल में भी भर्ती कराया गया। हालांकि अस्पताल प्रशासन पर भी ऊपर से दबाव था कि वो जैनुलआबीदीन का इलाज न करें। इस दरम्यान उन्हें ढूँढते हुए कुछ हथियार धारी नकाबपोश लोग अस्पताल गए थे।

एक अधेड़ ख्वातून मेहरुनिशां जी भी पिछले एक महीने से शाहीन बाग़ में आमरण अनशन पर बैठी हैं। वो कहती हैं- मोदी जी ने जो लागू किया है वो हमें मंजूर नहीं है। सरकार वापस ले। हम हिंदुस्तानी होने का हमारा हक़ हमसे कोई नहीं छीन सकता। पुलिस वालों ने हमारे बच्चों को मारा है हमें उसका इंसाफ़ चाहिए। हम तो शांतिपूर्ण धरना दे रहे थे। आप जामिया में घुसकर बच्चों पर रात में हमला करते हो। हम यहां पैदा हुए थे और हम यहीं मरकर इसी मिट्टी में दफ़न होंगे। ये हमारी मिट्टी है हमारा मुल्क़ है हमारे बाप-दादाओं ने इस मुल्क़ बनाया है इसे हम यूँ बर्बाद नहीं होने देंगे।   

आत्म शुद्धता और जन कल्याण की भावना के लिए उपवास

सीएए-एनआरसी-एनपीआर के खिलाफ़ होने वाले विरोध प्रदर्शनों और अनिश्चित कालीन धरने में गांधी के सबसे कारगर हथियार ‘उपवास’ का इस्तेमाल भी किया जा रहा है। 13 जनवरी 2020 को गांधी के अंतिम उपवास को याद करते हुए शाहीन बाग़ दिल्ली में और हजरत गंज लखनऊ में कौमी एकता के हक़ में सांप्रदायिक उन्माद व धर्म आधारित नागरिकता संशोधन एक्ट के खिलाफ़ एक दिवसीय उपवास कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसके अलावा नए वर्ष पर भोपाल के इकबाल मैदान के धरनास्थल पर भी एक दिन का उपवास रखा गया। 

नए साल की शुरुआत यानि 1 जनवरी को जेएनयू और जामिया के 5 छात्रों ने जामिया की सड़क पर दिन भर के उपवास पर बैठे। इनमें महमूद अनवर, आसिफ़ तन्हा, मोहम्मद अमनउल्लाह, हसन ख़ान और अब्दुल हासिम शामिल थे। अब्दुल हासिम कहते हैं- “आज नये साल से हम सत्याग्रह आरम्भ कर दिए हैं। पिछले कई दिनों से हम लगातार गांधी के मार्ग पर चलते हुए शांतिपूर्ण प्रतिरोध दर्ज़ कर रहे हैं। जब तक सरकार इस इंसान विरोधी कानून को वापस नहीं लेती है तब तक हम अपना प्रोटेस्ट ख़त्म नहीं करेंगे।”

बता दें कि 13 जनवरी 1948 के बहुसंख्यक कट्टरता के खिलाफ़ गांधी ने अपने जीवन का आखिरी आमरण अनशन शुरु किया था। इससे पहले 12 जनवरी को महात्मा गांधी की प्रार्थना सभा में एक लिखित भाषण पढ़कर सुनाया गया, क्योंकि गांधी ने मौन धारण कर रखा था। इसमें लिखा था-

“कोई भी इंसान जो पवित्र है, अपनी जान से ज्यादा कीमती चीज कुर्बान नहीं कर सकता। मैं आशा करता हूं कि मुझमें उपवास करने लायक पवित्रता हो। उपवास कल सुबह (मंगलवार) पहले खाने के बाद शुरू होगा। उपवास का अरसा अनिश्चित है। नमक या खट्टे नींबू के साथ या इन चीजों के बगैर पानी पीने की छूट मैं रखूंगा। तब मेरा उपवास छूटेगा जब मुझे यकीन हो जाएगा कि सब कौमों के दिल मिल गए हैं और वह बाहर के दबाव के कारण नहीं, बल्कि अपना धर्म समझने के कारण ऐसा कर रहे हैं।”

गांधी साध्य के लिए ‘साधन की शुचिता’ पर बल देते हैं, साधन की वो शुचिता, प्रतिरोध का वो नैतिक बल आत्मबल शाहीन बाग़ की आंदोलनरत स्त्रियों में बखूबी महसूस किया जा सकता है। विरोध कि लिए जिस तरह अपने ईश्वर (सत्य) पर अपना ईमान लाने की बात गांधी कहते हैं वो आपको यहाँ मिलेगा। शाहीन बाग़ की गृहणियां गांधी की तरह बेहद सीधी, ईमानदार, आस्थावान, और सत्य पर अडिग रहने वाली महिलाएं हैं। वो अपने निजी सुख-दुख से ऊपर उठकर ही मुल्क़ और संविधान को बचाने के लिए धरने पर बैठी हैं। वो सत्य की आंच पर अपने ईमान को तपाकर विरोध पर बैठी हैं।

30 जनवरी 1948 में गांधी के बूढ़े शरीर को गोलियों से भूनकर गोडसे और उसके सरपरस्त लहालोट होकर शाखाओं और अपने माँदों में मिठाइयां बांट रहे थे। उन्होंने ये मान लिया था कि गांधी मर गए। लेकिन फिर भी वो गांधी को इस मुल्क के जनमानस से नहीं मिटा सके।

बुद्धिजीवी हुए फेल

गांधी पर जितना हमला संघियों ने किया उतना ही ख़ुद को प्रगतिशील कहने वाले लेफ्टिस्ट ने भी किया और तो और अंबेडकरवादियों ने भी किया। अंबेडकर को खड़ा करने के बहाने खुद को स्थापित करने के लिए किया।

गांधी को लेकर अंबेडकरवादी और वामदलों ने लगातार ये भी आरोप लगाया कि कांग्रेस ने गांधी की ब्रांडिंग करके उन्हें जनमानस में बैठाया है। गांधी को उन्हें जनमानस से मिटाने का काम जो अकेला आरएसएस करता आया था उसके उस मुहिम में लेफ्टिस्ट और अंबेडकराइट भी शामिल हो गए। पिछले ही वर्ष लेफ्ट की फॉयरब्रांड लेखिका अरुंधति रॉय ने तो बाकायदा डॉक्टर बनाम संत किताब लिखकर अंबेडकर की तुलना में गांधी को गिराने का काम किया और तो और उनके तर्क भी कमोवेश आरएसएस वाले ही थे बस उसमें थोड़ा फेमिनिज्म का तड़का लगा दिया गया था।

इस बीच दिल्ली यूनिवर्सिटी में छात्रों द्वारा सीएए-एनआरसी-एनपीआर पर आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए अरुंधति राय ने लोगों को झूठ बोलने के लिए प्रेरित किया और कहा कि हर कोई अपना नाम रंगा या बिल्ला या कुंगफू बताए। लेकिन इस मुल्क की आवाम ने झूठ का सहारा लेने के बजाय गांधी के सत्याग्रह के साथ जाने का फैसला किया।

इसी तरह जहां लोग दिन रात धरने पर बैठे हुए हैं तो वहीं साहित्यकार पुस्तक मेला और साहित्योत्सव के मजे ले रहा है उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि असम में 19 लाख लोगों की नागरिकताएं छीन ली गई हैं और उन्हें डिटेंशन कैम्प में फेंका जा रहा है तथा देश भर में लोगों की नागरिकता छीनने की तैयारी चल रही है।

उसे इस बात की तसल्ली है कि उसके पास अपनी नागरिकता साबित करने के लिए पूरे कागजात हैं। हक़ीक़त तो यही है कि बुद्धिजीवी आज कुछ भी त्याग नहीं करना चाहता। न नौकरी का, न ही अपनी सुख सुविधा का। उनमें कष्ट सहने या संघर्ष करने का नैतिक बल ही नहीं है। आज बुद्धिजीवी खुद डरे हुए हैं। उन्हें कुछ छिन जाने का डर है। वो संघर्ष के रास्ते पर चलकर सुधा भारद्वाज, हनी बाबू, वरवरा राव, गौतम नवलखा, आनंद तेलतुंबड़े, फादर स्टेन स्वामी के हश्र को नहीं प्राप्त करना चाहते।

गोडसे और सावरकर की पुनर्स्थापना का प्रतिफल है सीएए-एनआरसी

आरएसएस के पोलिटिकल विंग भाजपा के 2014 में पूर्ण बहुमत से आने के बाद गांधी के हत्यारे गोडसे की संस्था हिंदू महासभा फिर से सक्रिय हो उठी। पिछले साल 30 जनवरी 2019 को अखिल भारतीय हिंदू महासभा की राष्ट्रीय महासचिव पूजा शकुन पांडेय ने गांधी के पुतले को गोली मारकर हत्यारे गोडसे का शहीदी दिवस मनाया खुशियां मनाई और गांधी की हत्या पर मिठाई बांटी। इससे पहले सितंबर 2018 में यूपी के चित्रकूट के राजापुर थाने के सगवारा गांव में सनातन संस्था द्वारा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की प्रतिमा स्थापित की गई थी।

मई 2019 में हिंदू महसभा द्वारा गोडसे मध्यप्रदेश के ग्वालियर और यूपी के मेरठ और अलीगढ़ में गोडसे का जन्मदिन मनाया गया था और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से राजघाट तुड़वाने की मांग की गई थी।

हद तो तब हो गई जब 2019 में लोकसभा चुनाव में भोपाल से भाजपा सांसद चुनी गईं भगवा आतंकवाद का आधार स्तम्भ प्रज्ञा ठाकुर ने सदन के भीतर हत्यारे नाथूराम गोडसे को राष्ट्रभक्त कहा। इसके बाद ही भाजपा विधायक ऊषा ठाकुर ने भी हत्यारे नाथूराम गोडसे को राष्ट्रभक्त बताया था। जबकि खुद भाजपा ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के अपने संकल्प पत्र में गांधी की हत्या में शामिल रहे, और हिंदू राष्ट्र का कांसेप्ट देने वाले दामोदर दास सावरकर को भारत रत्न देने का वादा किया था।

और तो और भाजपा सावरकार के हिंदूराष्ट्र के सिद्धांत (यही आरएसएस सरगना गोलवलकर का भी मंसूबा था) को पूरा करने के लिए पहले नागरिकता कानून में संशोधन करके केवल गैरमुस्लिमों को नागरिकता देने का कानून (सीएए) बनाया फिर वर्ष 2024 तक पूरे देश में एनआरसी कराने का ऐलान कर चुकी है और तो और एनपीआर के जरिए सूचनाएं इकट्ठा करने का सर्कुलर भी जारी किया जा चुका है।

पुलिस पहले दौर के आंदोलनकारियों को ‘जय श्री राम’ और क़ब्रिस्तान या पाकिस्तान कहकर लाठियां गोलियाँ चटका चुकी है। लेकिन इस सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन में गांधी की एंट्री के बाद से आंदोलन का चरित्र ही पूरी तरह से बदल गया। और एक स्थिति के बाद सरकार और पुलिस प्रदर्शनकारियों के सामने लाचार नज़र आ रही है।

धरनास्थलों पर गांधी पर कार्यक्रम

आज 30 जनवरी को दिल्ली से लेकर भारत के तमाम धरनास्थलों पर शाम 5 बजकर 17 मिनट पर गांधी की स्मृति में देश भर के धरनास्थलों पर 2 मिनट का मौन रखा जाएगा। बता दें कि आज से ठीक 72 वर्ष पूर्व 30 जनवरी 1948 की शाम 5 बजकर 17 मिनट पर हत्यारे नाथूराम गोडसे ने तीन गोलियां मारकर गांधी की हत्या कर दी थी। गांधी उस वक़्त प्रार्थना के लिए जा रहे थे।

गांधी शांति प्रतिष्ठान नई दिल्ली के हॉल की दीवार पर गाँधी का एक वॉल पोस्टर लगा है। गांधी अपनी क़ब्र के ऊपर ध्यान मुद्रा में बैठे हैं। मानो वो वहीं बैठे बैठे गोडसे और सावरकर को चुनौती दे रहे हों कि देखो तुमने 72 साल पहले एक हांड़ मांस के गांधी की हत्या की थी। आज वो गांधी विचार बनकर, विरोध बनकर मुल्क़ की आवाम में वापस लौट आया है। मैं आजकल देश भर में जहां जिस प्रदर्शन स्थल पर जाता हूँ मुझे वहीं गांधी दिखाई देते हैं। जो एनआरसी रूपी गोडसे और सीएए रूपी सावरकर के खिलाफ़ धरने पर बैठे हैं।

(सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on January 30, 2020 3:51 pm

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