Friday, January 27, 2023

पीके-कांग्रेस जुदा-जुदा: तू भी खुश मैं भी, पर बीजेपी क्यों ज्यादा खुश?

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कांग्रेस खुश है कि पीके ने उसके ऑफर को ठुकरा दिया। यह खुशी कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला के ट्वीट में नज़र आती है जिसमें वे पीके का आभार भी जताते हैं और यह भी बताते हैं कि ईएजी में उन्हें सीमित जिम्मेदारी के साथ जगह दी जा रही थी जिसके लिए उन्होंने मना कर दिया। पीके से पहले ट्वीट कर देने की तत्परता में भी यह ख़ुशी नज़र आती है।

पीके दो ट्वीट करते हैं। पहले और दूसरे ट्वीट में फर्क यह होता है कि दूसरे में ‘उदार’ शब्द लगाकर ऑफर मिलने और उसे ठुकरा देने का एलान होता है। वे विनम्रतापूर्वक यह राय भी प्रकट करते हैं कि कांग्रेस को पीके से ज्यादा नेतृत्व और सामूहिक विवेक की जरूरत है ताकि गहरे जड़ों वाली संरचनात्मक समस्याओं को परिवर्तनकारी सुधारों के जरिए ठीक कर सके। पीके ने खुद अपनी राह चुनी है और जिस अंदाज में चुनी है उसे देखकर लगता है कि वे भी काफी खुश हैं।

बीजेपी और गोदी मीडिया की हमेशा की तरह समान भाषा है। इन दोनों ने इस घटना की व्याख्या कांग्रेस पर गांधी परिवार के वर्चस्व की जिद से जोड़ते हुए की है। एक तरह से पीके का कांग्रेस से दूर जाने की वजह वे यह बता रहे हैं कि सोनिया-राहुल-प्रियंका के अलावा किसी के लिए कांग्रेस के अध्यक्ष, प्रधानमंत्री उम्मीदवार और यूपीए चेयरपर्सन जैसे पद नहीं हैं। उनकी व्याख्या जी-23 जैसे असंतोष को हवा देती भी नज़र आती है। जाहिर है यह अवसर बीजेपी और गोदी मीडिया के लिए भी खुश होने का अवसर है।

तीन राजनीतिक रूप से प्रबुद्ध खेमों में खुशियों के मायने अलग-अलग हैं। लेकिन, सवाल है कि

  • बीजेपी का विकल्प देने वाली शक्तियां इस घटना को किस रूप में देखने वाली हैं?
  • ममता बनर्जी, शरद पवार जैसे पूर्व कांग्रेसी जिन्हें यूपीए का नेतृत्वकारी के तौर पर पीके अपने प्रेजेन्टेशन में पेश कर रहे थे, उनकी क्या प्रतिक्रिया रहने वाली है?
  • स्वयं कांग्रेस के भीतर पीके को लेकर जो वैचारिक द्वंद्व चल रहा था उसमें उत्साह का फैक्टर घटेगा या बढ़ेगा?
  • 2024  के नजरिए से इस घटना का क्या असर पड़ेगा?- क्या कांग्रेस अकेले चलेगी? अगर कांग्रेस क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर चलना चाहे तो क्या क्षेत्रीय दलों में ऐसा करने के लिए कोई चुम्बकत्व नज़र आता है?

पीके हो या कांग्रेस दोनों को थी एक-दूजे की जरूरत

पीके हों या कांग्रेस- दोनों को एक-दूसरे की जरूरत थी। दोनों ने एक-दूसरे को परखा और फिर अपने-अपने कदम पीछे कर लिए। इसका मतलब यह है कि दोनों को ही एक-दूसरे से फायदा कम, नुकसान ज्यादा नज़र आया। यह पहेली क्या है? क्या यह पहेली आम कांग्रेसी या आम जनता समान नजरिए से समझ पाएंगे?

कांग्रेस खेमे से ख़बर है कि कांग्रेस पीके को महासचिव बनाने तक को तैयार थी। उन्हें राजनीतिक मामलों की प्लानिंग और एक्जीक्यूशन तक का पावर देने पर सहमति थी। पीके भी महासचिव के तौर पर प्रियंका गांधी को रिपोर्ट करने तक को राजी थे। मगर, पीके अपने समकक्ष महासचिवों को विश्वास में लेने या फिर उनसे सलाह-मशविरा करने को तैयार नहीं थे। कांग्रेस में इस वक्त 13 महासचिव हैं और अगर पीके को जोड़ें तो संख्या 14 हो जाती।

तरीका यह निकाला गया कि पीके को एम्पावर्ड एक्शन ग्रुप में रखा जाए जिनमें मल्लिकार्जुन खड़गे, पी चिदंबरम, दिग्विजय सिंह, जयराम रमेश, भूपिंदर सिंह हुड्डा, मुकुल वासनिक, अंबिका सोनी, रणदीप सुरजेवाला जैसे नेता हैं। यहां भी पीके को राजनीतिक रणनीति और योजना बनाने की जिम्मेदारी देने को कांग्रेस तैयार थी। मगर, सीनियर नेता सामूहिक नेतृत्व और सलाह मशविरा करने को जरूरी बता रहे थे। एक तरह से पीके को फ्री हैंड देने के विरोध में थे।

प्रशान्त किशोर को कांग्रेस अपने साथ रखना चाहती थी लेकिन सीमित जिम्मेदारी देते हुए। जब कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने उदयपुर में होने वाले नव चिन्तन शिविर और उससे पहले ईएएम का एलान किया तो पीके से जुड़े सवालों पर उनकी प्रतिक्रिया भी बहुत कुछ कह गयी थी। संक्षेप में कहा जाए तो पीके को कांग्रेस के नेता स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। ऐसे में पीके के लिए बहुत मुश्किल था कि वे सीमित जिम्मेदारी की शर्त पर कांग्रेस के साथ जुड़ते और अपनी रणनीति पर अमल कर दिखाते।

पीके-कांग्रेस की सोच में फर्क भी दिखा

पीके और कांग्रेस की सोच में भी फर्क दिखा। दोनों का साझा लक्ष्य वर्तमान बीजेपी सरकार का विकल्प तैयार करना था। मगर, कांग्रेस की चिन्ता इस लक्ष्य को हासिल करते हुए अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए कदम बढ़ाने की थी। वहीं, पीके कांग्रेस की इस चिन्ता को प्राथमिकता पर रखते नज़र नहीं आए।

पीके ने जो दो विकल्प सुझाए, उनमें एक में यूपीए का नेतृत्व किसी पूर्व कांग्रेसी को सौंपना था। ऐसे नेताओं में ममता बनर्जी या शरद पवार हो सकते थे। पीके के प्लान में विपक्ष के व्यापक गठजोड़ के लिए यह जरूरी हो सकता है मगर कांग्रेस को ऐसा करना प्राथमिकता नहीं लगी।

पीके के सुझाए दोनों विकल्पों में पांच प्रमुख पद सामने आए जिनमें यूपीए चेयरपर्सन, कांग्रेस अध्यक्ष, कांग्रेस उपाध्यक्ष, संसदीय बोर्ड के नेता या प्रधानमंत्री का चेहरा और कांग्रेस महासचिव हैं। इन पांच पदों में तीन पदों पर खुद पीके के सुझाव के मुताबिक सोनिया, राहुल और प्रियंका किसी न किसी रूप में जरूर रहें।

पहला विकल्प : अगर यूपीए चेयरपर्सन कोई पूर्व कांग्रेसी हो तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी रहें, मगर उपाध्यक्ष गैर गांधी हो। राहुल गांधी संसदीय बोर्ड के नेता रहें तो प्रियंका महासचिव।

दूसरा विकल्प : अगर सोनिया गांधी यूपीए चेयरपर्सन रहें तो कांग्रेस अध्यक्ष गैर गांधी हो। कोई उपाध्यक्ष ना हो। राहुल संसदीय दल के नेता रहें और महासचिव प्रियंका गांधी रहें।

पीके के प्रजेन्टेशन पर अमल करेगी कांग्रेस?

कांग्रेस मोटे तौर पर पीके के प्रजेन्टेशन से खुश थी और सार्वजनिक रूप से भी पार्टी नेताओं ने स्वीकार किया है कि पीके के सुझाव के आधार पर कई कदम उठाए गये हैं और उठाए जा रहे हैं। इसका मतलब यह है कि प्रशान्त किशोर से कांग्रेस ने कुछ ग्रहण किया है और इसका फायदा पार्टी को होगा। अगर बात सिर्फ इतनी है कि प्रशान्त किशोर को फ्री हैंड दिया जाना संभव नहीं हो सका, तो यह भी मान कर चलना चाहिए कि पीके ने जो दो विकल्प सुझाए हैं उस पर भी कांग्रेस नेतृत्व समझदारी से फैसला करने का मन बना चुका है।

अगर कांग्रेस पीके के बिना भी उनकी सलाह मानते हुए यूपीए का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी किसी और दल या नेता को दे, तो यह ठीक उसी तरह से संभव है जैसे कभी एनडीए का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी बीजेपी ने अपने सहयोगी समता पार्टी के नेता जॉर्ज फर्नांडीज को दी या फिर बाद में एनचंद्र बाबू नायडू को। अब सबकी नज़र मई में उदयपुर में होने वाले नव चिन्तन शिविर पर टिक गयी है। 2024 के लिए कांग्रेस की आगे की रणनीति वहीं दिखेगी।

बीजेपी की खुशी इसलिए है क्योंकि प्रशांत किशोर जिस पार्टी से जुड़ते हैं उसमें हलचल पैदा कर देते हैं। पार्टी में ऊपर से नीचे तक कुछ-कुछ होने लगता है। अगर कांग्रेस हरकत में आ जाती तो बीजेपी के लिए एक ख़तरा तैयार होने लग जाता। वैकल्पिक सियासत की धुरी कांग्रेस न बन जाए, इस आशंका से बीजेपी डरी हुई दिखी। यही वजह है कि पीके-कांग्रेस में दूरी से बीजेपी सबसे ज्यादा खुश नज़र आयी।

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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