Sunday, May 29, 2022

बीजापुर स्पेशल: आदिवासियों के शांतिपूर्ण आंदोलन पर पुलिस का हमला, जलाए कैंप

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बीजापुर। जल-जंगल-जमीन बचाने की जो लड़ाई बस्तर के बीजापुर जिले के सिलगेर ग्राम से शुरू हुई थी अब उसकी चिंगारी पूरे बस्तर संभाग के सभी जिलों में फैल चुकी है। बुरजी, पूसनार, गंगालूर, गोमपाड़, बेचापाल, बेचाघाट, छोटे डोंगर, एमपुरम आदि समेत 17 स्थानों पर सैकड़ों गांव के ग्रामीण लाखों की संख्या में प्रतिदिन शांतिपूर्ण धरने पर बैठे हुए हैं। इसमें से सिलगेर आंदोलन को तो अब 11 महीने पूरे हो चुके हैं मगर सरकार के कान में जूं नहीं रेंग रही है।

दिल्ली में चले किसान आंदोलन को लेकर प्रदेश की कांग्रेस सरकार जरूर चिंतित दिखी मगर बस्तर के आदिवासी किसानों को लेकर न केवल उपेक्षा बरत रही है बल्कि इस खबर को बाहर आने से रोकने के लिए भी सरकार ने पूरा दम लगा दिया है। ऊपर से आदिवासी किसानों के आंदोलन को माओवादी प्रेरित बताकर जगह-जगह इनके धरने के कैंप जला दिए जा रहे हैं या फिर उन्हें उखाड़ दिया जा रहा है। और रोजाना आंदोलनकारियों पर डंडे बरसाए जा रहे हैं। शिविर में तो पिछले साल अप्रैल में ही 4 आदिवासियों को गोली से मार दिया गया था।

बुरजी में उजाड़ा गया कैंप

ताजा मामला बीजापुर जिले के गंगालूरथाना क्षेत्र के बूरजी का है, जहां अपनी विभिन्न मांगों को लेकर ग्रामीण पिछले डेढ़ सौ दिनों से आंदोलनरत हैं। 7 अक्टूबर से ग्रामीण पुल, पुलिया, सड़क और कैंप के खिलाफ सिर्फ बुरजी ही नहीं बल्कि जिले के अलग-अलग इलाकों में लगातार आंदोलन कर रहे हैं,  इसी आंदोलन के बीच बुरजी में आंदोलनरत ग्रामीणों ने गश्त पर निकले जवानों पर आंदोलन के दौरान मारपीट और आंदोलन परिसर में तोड़फोड़ का बड़ा और गंभीर आरोप लगाया है।

ग्रामीणों का आरोप है कि जवान जब गश्त से लौट रहे थे उसी दौरान बुरजी में आंदोलनरत ग्रामीणों के साथ मारपीट की गई और आंदोलन के लिए बनायी गयी झोपड़ियों को भी तहस-नहस कर उनमें मौजूद रसद सामग्री और अन्य सामग्रियों को बाहर फेंक दिया गया। आंदोलनरत ग्रामीणों का यह आरोप है कि दंतेवाड़ा के डीआरजी के जवानों ने ग्रामीणों के साथ मारपीट के साथ-साथ दुर्व्यवहार और गाली गलौज भी की है।

बुरजी आंदोलन के लिए बनाए गए मूलवासी बचाओ मंच की अध्यक्ष सोनी पुनेम ने बताया कि शनिवार की देर शाम जवान पूसनार की ओर से गंगालूर की तरफ लौट रहे थे इसी दौरान जवानों ने बुरजी में आंदोलन के लिए बनाए गए अस्थाई कैंप में स्थित आंदोलनकारियों की झोपड़ियों में तोड़फोड़ करने के साथ-साथ कुछ युवाओं के साथ मारपीट की और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार भी किया। सोनी पुनेम ने यह भी बताया कि वहां मौजूद कुछ महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और छेड़खानी भी की गई और जवान खुद को दंतेवाड़ा डीआरजी के जवान बता रहे थे। साथ ही तत्काल आंदोलन छोड़कर गांव लौटने की धमकी भी जवानों द्वारा दी गई। ग्रामीण युवकों ने यह भी बताया की गश्त से लौट रही पुलिस ने पूछना गांव में राकेट लांचर भी दागे और उन्होंने पत्रकारों को  राकेट लांचर भी दिखाया।

मंच की अध्यक्ष सोनी पुनेम ने बताया कि पिछले डेढ़ सौ दिनों से हजारों ग्रामीण शांतिपूर्वक अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। इस आंदोलन के दौरान ना तो कभी हिंसा हुई ना ही किसी शासकीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई बल्कि जल-जंगल-जमीन और मूलवासी बचाओ के नारे के साथ शांतिपूर्वक आंदोलन किया जा रहा है। जिसके लिए कलेक्टर बीजापुर से भी विधिवत अनुमति ली गई है। उसके बावजूद जवानों द्वारा इस तरह आंदोलन में आकर आंदोलनकारियों के साथ मारपीट और उनके अस्थाई आवासों की तोड़फोड़ करना निंदनीय है। आंदोलनकारी भोगाम धनु ने बताया कि पुलिस से उनकी कोई दुश्मनी नहीं है और ना ही शासन प्रशासन से उनकी दुश्मनी है पुलिस अपना काम करें उनकी लड़ाई नक्सलियों से है वे नक्सलियों से लड़े परंतु शांतिपूर्वक आंदोलन कर रहे आंदोलनकारियों और निर्दोष ग्रामीणों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश ना करें।

पुलिस द्वारा इस्तेमाल किया गया हथियार

इस पूरे मामले में आंदोलनकारी भोगाम धनु,ताती हिड़मा, लेकाम राजू, कारम शंकर, पूनेम सागर और पूनेम छोटू ने बताया कि डीआरजी के जवानों द्वारा गस्त से वापसी के दौरान आंदोलन प्रांगण में उनके साथ मारपीट की गई है। साथ ही आंदोलन प्रांगण में रखे गए टेबलेट, सिरिंज निडिल, दवाई टेंट और खाद्य सामग्री को भी टेंट से निकाल कर बाहर फेंक दिया गया। इतना ही नहीं चावल, दाल, मंच सजावट सामग्री को भी आग लगाने की कोशिश की गई। इसके अलावा यह भी धमकी दी गई कि गांव में कैंप लगने के बाद मूल बचाओ मंच के सभी साथियों को मार गिराया जाएगा। आंदोलनकारियों ने डीआरजी के जवान फागू कारम, राजू कारम और बदरू पोटाम का नाम लेते हुए आरोप लगाया कि उनके द्वारा ही सबसे ज्यादा आंदोलनकारियों को परेशान किया गया।

ग्राामीणों की शिकायत

इस मामले को लेकर बस्तर की प्रसिद्ध आदिवासी नेत्री सोनी सोरी ने काफी आक्रोश व्यक्त किया है। सोनी सोरी का कहना है कि जब आदिवासी शांतिपूर्ण ढंग से अपने जंगल व गांव में लोकतांत्रिक अधिकार का पालन कर रहे हैं तब उन पर लाठी और डंडे चलाकर सरकार क्या साबित करना चाहती है। वह करें तो करें क्या? शांतिपूर्ण बैठे हैं तो आप उन्हें माओवादी बताकर मार रहे हैं या जेल भेज रहे हैं। वह कौन सा रास्ता अपनाएं कि अपनी बात सरकार तक पहुंचा सकें? सरकार खुद उन्हें मजबूर कर रही है कि वे हथियार का रास्ता अपनाएं और माओवादियों के साथ चले जाएं। सोनी के अनुसार अब सरकार ही बताए कि आदिवासी लड़ें तो लड़ें कैसे ?

आदिवासियों की नेता सोनी सोरी ने जताया रोष

प्रसिद्ध समाजसेवी हिमांशु कुमार ने जनचौक संवाददाता से बातचीत करते हुए कहा है कि लगभग 2 वर्षों से आदिवासी शांतिपूर्ण रास्ता अपनाकर अपने हक और अधिकार तथा जंगल बचाने के लिए गांधीवादी तरीका अपनाए हुए हैं तो उन्हें अगर आप माओवादी प्रेरित मानते भी हैं तो गांधीवादी तौर तरीके का तो लोकतांत्रिक सरकार को स्वागत करना चाहिए, न कि उनके साथ हिंसा करके उन्हें इस बात का एहसास दिलाना चाहिए कि वे इस देश के नागरिक नहीं है।

हिमांशु कुमार।
गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार

बस्तर में लंबे समय तक पत्रकारिता कर चुके और वर्तमान में नई दुनिया अखबार के संपादक वरिष्ठ पत्रकार अनिल मिश्रा का मानना है की नक्सलियों ने रणनीति बदली है और लगातार पुलिस का दबाव बढ़ता जा रहा है जिसके कारण से उनके पास अब गांव वालों को सामने रखने के अलावा कोई चारा नहीं है। मगर ग्रामीण जनता अगर आंदोलन के रास्ते पर शांतिपूर्ण बैठी हुई है तो सरकार को दमन नहीं बल्कि उनका स्वागत करना चाहिए। लोकतंत्र का यह फर्ज बनता है कि आप ग्रामीणों को आंदोलन करने दीजिए और उनकी मांगें सुनिए उन्हें दुश्मन मत बनाइए।

नई दुनिया के संपादक अनिल मिश्रा

इस मामले को लेकर जनचौक की बात बस्तर से प्रकाशित होने वाले दैनिक बस्तर इंपैक्ट के संपादक से भी हुई, संपादक सुरेश महापात्र ने साफ-साफ कहा कि सिलगेर में जो मौतें हुईं उनके लिए पूरी तरह से सरकार को जवाबदारी लेनी होगी और कोई भी सभ्य समाज नहीं चाहता कि निर्दोष और निहत्थे लोगों पर कोई भी पक्ष गोली चलाए। दूसरा प्रताड़ित पक्ष को पूरी तरह से वैसे ही न्याय मिलना चाहिए जैसे हम किसी भी अन्य के लिए अपेक्षा करते हैं।

इंपैक्ट के संपादक सुरेश महापात्रा

सभी आरोप बेबुनियाद, नक्सलियों ने दागे थे लॉन्चर: एसपी

इस पूरे मामले में बीजापुर एसपी कमलोचन कश्यप ने आंदोलनकारियों द्वारा लगाए गए आरोपों का खंडन करते हुए बताया कि गस्त से जब जवान वापस लौट रहे थे तब बुरजी में आंदोलनकारियों द्वारा महिला कमांडो के साथ लौट रहे जवानों को रोककर उन पर पत्थर मारने की कोशिश की गई। बावजूद इसके जवानों द्वारा कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई।

बीजापुर एसपी कमल लोचन कश्यप

वहीं दूसरी ओर एसपी ने पूसनार में रॉकेट लांचर दागे जाने वाले मामले को लेकर बताया कि जब जवान ऑपरेशन से लौट रहे थे तभी पूसनार के पास नक्सलियों द्वारा एंबुश लगाकर जवानों पर हमला किया गया। काफी देर तक चले फायरिंग के बाद नक्सलियों द्वारा ही गांव में लॉन्चर दागे गए और जो लांचर ग्रामीणों द्वारा बरामद किया गया वह लांचर जवानों के द्वारा नहीं बल्कि नक्सली द्वारा दागा गया था।

(बीजापुर से वरिष्ठ पत्रकार कमल शुक्ला की रिपोर्ट।)

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