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आठ राजनीतिक दलों के नेताओं ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर राजनीतिक बंदियों और कार्यकर्ताओं की रिहाई की माँग की

नई दिल्ली। आठ राष्ट्रीय दलों के नेताओं ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर जेलों में बंद राजनैतिक बंदियों, मानवाधिकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं की तत्काल रिहाई की माँग की है। इसके साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार की बदले की कार्रवाई पर रोक लगाने की भी उनसे अपील की है।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविद को लिखे गए इस पत्र में कहा गया है कि यह एक ऐसा समय है जबकि न केवल देश बल्कि पूरी दुनिया के लोग भय और अनिश्चितता के माहौल में जी रहे हैं। इसके साथ ही वे ख़ुद और अपने स्वजनों की सुरक्षा और उनकी बेहतरी को लेकर परेशान है। ऐसे समय में सरकार की एक मात्र प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि कैसे लोगों की ज़रूरतों को पूरा करते हुए वह अपनी पूरी ताक़त कोविड महामारी के ख़िलाफ़ केंद्रित करे। उन्होंने पत्र में बिल्कुल साफ-साफ कहा है कि “आपके सरकार की प्राथमिकता करोड़ों लोगों के जीवन और आजीविका को प्रभावित करने वाली समस्याओं को हल करने पर केंद्रित होनी चाहिए।

जैसा कि प्रवासी मज़दूरों की बदहाली में दिखा। इसमें बहुत सारे लोग भूख से तड़प-तड़प कर मर गए और बहुत सारे लोगों ने कई किमी पैदल चलने के बाद घरों के रास्ते में हरारत और थकान से अपनी जान गँवा दी। इस तरह के लोगों को राशन और दूसरी सहायता पहुँचाने में केंद्र सरकार बेहद नाकाम साबित रही है।”

पत्र लिखने वाले दलों और उनके नेताओं में सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी, सीपीआई महासचिव, डी राजा, सीपीआई (एमएल) महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य, आल इंडिया फारवर्ड ब्लॉक के महासचिव देबब्रत विश्वास, आरएसपी के महासचिव मनोज भट्टाचार्य, एलजेडी के महासचिव शरद यादव, आरजेडी के सांसद मनोज झा और वीसीके के अध्यक्ष और सांसद थोक थिरुमवालवम शामिल हैं। 

उनका कहना है कि जेलों में कोविड का फैलाव न हो इसके लिए बहुत सारे देशों ने अपने यहाँ क़ैदियों की रिहाई की है। भारत में भी सुप्रीम कोर्ट ने इसी आशय का निर्देश दिया था जिसमें उसने जेलों में भीड़ को कम करने के लिहाज़ से क़ैदियों को ज़मानत या फिर पैरोल पर छोड़ने की बात की थी। पत्र में कहा गया है कि मुंबई स्थित आर्थर रोड जेल इस तरह की ख़तरनाक स्थितियों के लिहाज़ से बेहद सटीक उदाहरण है। यहाँ तक कि डॉ. जीएन साई बाबा समेत दूसरे अन्य शारीरिक तौर पर विकलांग लोगों जिन्हें गंभीर मेडिकल स्थितियों के लिए जाना जाता है, को पर्याप्त इलाज कराने तक की इजाज़त नहीं दी गयी।

पत्र में राजधानी में दिल्ली पुलिस द्वारा लगातार सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को परेशान करने और उनकी गिरफ़्तारी किए जाने पर भी कड़ा एतराज़ ज़ाहिर किया गया है। इसमें कहा गया है कि ऐसी महिलाएँ जो शांतिपूर्ण सीएए आंदोलन में शामिल थीं उनको भी यूएपीए जैसे काले क़ानून के तहत गिरफ्तार किया जा रहा है। दिलचस्प बात ये है कि उनके ख़िलाफ़ लगाए गए सारे आरोप मनगढ़ंत हैं।

इसके साथ ही सैकड़ों छात्रों को स्पेशल ब्रांच आफिस में पूछताछ के लिए बुलाया जा रहा है और उन्हें धमकी दी जा रही है। विडंबना यह है कि जेएनयू हिंसा के पीड़ितों को निशाना बनाया जा रहा है जबकि बाहर से गए हमलावर और छात्रों तथा अध्यापकों को निशाना बनाने वाले गुंडों में से अभी तक किसी एक की भी गिरफ़्तारी नहीं की गयी। इसके अलावा एक ख़ास समुदाय को निशाना बनाकर उसके लोगों को परेशान किया जा रहा है जबकि सांप्रदायिक हिंसा को भड़काने वाले मामलों में शामिल लोग जिसमें कई महत्वपूर्ण नेताओं की रिकार्डिंग है और वो सत्तारूढ़ दल से जुड़े हुए हैं, खुलेआम घूम रहे हैं।

सुधा भारद्वाज और दूसरे लोगों को हिरासत में रखने के बाद आनंद तेलतुंबडे और गौतम नवलखा की भीमा कोरेगाँव में बग़ैर किसी प्रमाण के गिरफ़्तारी एक और परेशान करने वाला उदाहरण है। और यह बताता है कि देश में नागरिक अधिकारों को किस तरह से कुचला जा रहा है।

कश्मीर में पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती समेत दूसरे लोगों की हिरासत निंदनीय है। इसके साथ ही देश की विभिन्न जेलों में बंद कश्मीरियों का मामला भी उतनी ही निंदा के योग्य है।

लगातार स्वास्थ्य में गिरावट के बावजूद लालू प्रसाद यादव को जेल में रखना सरकार के बदले की भावना को दर्शाता है।

अंत में सभी नेताओं ने राष्ट्रपति से इस पूरे घटनाक्रम को उलटी दिशा में ले जाकर जेलों में बंद सभी राजनीतिक बंदियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को रिहा करने के लिए सरकार को निर्देशित करने की अपील की है।

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This post was last modified on May 11, 2020 11:55 pm

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