सुप्रीम कोर्ट को भी दिख गए सड़कों पर पैदल चलते मजदूर, स्वत: संज्ञान लेकर सरकारों से मांगा स्टेटस

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नई दिल्ली। अंततोगत्वा, जब प्रवासी कामगारों की अंतहीन व्यथा पर, खूब शोर मचा और सोशल मीडिया, अखबारों में, सरकार की काफी भद्द पिटी, तब जाकर, सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी भी टूटी। इस मामले में चुप्पी के लिये न्यायपालिका की भी आलोचना हो रही थी। आखिरकार,  सुप्रीम कोर्ट ने आज प्रवासी मज़दूरों की व्यथा का स्वतः संज्ञान लिया और 28 मई की तारीख इस बात के लिये तय की है कि उस दिन, राज्य सरकारें अपने अपने स्टैंडिंग काउंसिल के द्वारा और केंद्र सरकार अपने सॉलिसीटर जनरल के द्वारा अदालत को बताए कि केंद और राज्य सरकार ने उनकी व्यथा को दूर करने के लिये क्या क्या उपाय किये हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद सरकार और राज्य सरकारों को अपना पक्ष रखने के लिये नोटिस जारी की है। अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि “हम उन प्रवासी मज़दूरों की समस्याओं और व्यथाओं पर, जो देश के विभिन्न क्षेत्रों में फंसे हुए हैं, स्वतः संज्ञान लेते हैं। अखबारों और मीडिया रिपोर्ट्स इन मज़दूरों की तमाम तकलीफों को जो लंबी दूरी से पैदल या साइकिल से जा रहे हैं, लगातार दिखा रहे हैं”। 

“वे यह भी शिकायत कर रहे हैं कि, उन्हें जहां वे फंसे हुए हैं या राजमार्गों पर जहां से वे, पैदल, साइकिल या अन्य किसी भी साधन से जा रहे हैं, तो प्रशासन, न तो उन्हें भोजन दे रहा है और न ही पीने का पानी उपलब्ध करा रहा है। देशव्यापी तालाबंदी के इस कठिन समय में समाज के इस वर्ग को सरकार की सहायता चाहिए, विशेषकर राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों का यह दायित्व है कि वह इस कठिन समय मे इन प्रवासी मज़दूरों की सहायता के लिये हाथ बढ़ाये।

इस अदालत को, समाज के विभिन्न वर्गों से, इन प्रवासी मज़दूरों की व्यथा के संदर्भ में बहुत से शिकायती पत्र और रिप्रेजेंटेशन मिले हैं”।

उसने आगे कहा कि “प्रवासी मज़दूरों का यह संकट आज भी जारी है, क्योंकि भारी संख्या में लोग सड़कों, हाइवे, रेलवे स्टेशन और राज्यों की सीमाओं पर फंसे पड़े हैं। पर्याप्त संख्या में भोजन, पानी, परिवहन और आश्रय की निःशुल्क व्यवस्था राज्य सरकारों द्वारा की जानी चाहिए”।

कोर्ट ने कहा कि “हालांकि भारत सरकार और राज्य सरकारों ने इन कदमों को उठाया है। फिर भी उसमें कुछ गलतियां और कमियां रह गयी हैं। हम यह विचार करते हैं कि, एक सुनियोजित प्रयास इन समस्याओं के समाधान के लिये किया जाना चाहिए। अतः हम यह नोटिस भारत सरकार, समस्त राज्य सरकारों और केंद्र शासित राज्यों की सरकारों को जारी करते हैं, कि, वे इस मामले को अर्जेंट समझते हुए अपना पक्ष प्रस्तुत करें”।

जो पीठ सुनवाई कर रही है उसके जज, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस संजय कृष्ण कौल, जस्टिस एमआर शाह है। यह आदेश आज 26 मई 2020 का है। अगली तारीख 28 मई 2020 को लगी है।

यह खबर पढ़ कर दुष्यंत कुमार की यह पंक्तियां याद आ गयीं। 


कौन कहता है कि आसमां में सुराख हो नहीं सकता,
एक पत्थर तो ज़रा तबियत से उछालो यारों !!

लेकिन, आज से ठीक दस दिन पहले 16 मई 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने प्रवासी मजदूरों के लिए दायर किये गए एक आवेदन को खारिज कर दिया था, जिसमें यह मांग की गई थी कि, देश के सभी जिला मजिस्ट्रेटों को तुरंत यह निर्देश दिया जाए कि वे पैदल चल रहे, लोगों की पहचान कर उन्हें उनके घरों तक सुरक्षित तरीके से पहुंचाने में मदद करें।

वह याचिका, महाराष्ट्र के औरंगाबाद में ट्रेन से कटकर 16 प्रवासी मजदूरों की दर्दनाक मौत के बाद  सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गयी थी।  जस्टिस एल. नागेश्वर राव, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने तब कहा था कि, अदालत के लिए संभव नहीं है कि वह इस स्थिति को मॉनिटर कर सके। तब पीठ ने यह भी कहा कि यह राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इस संबंध में उचित कदम उठाएं। सुप्रीम कोर्ट के उक्त पीठ की अगुवाई कर रहे जस्टिस एल. नागेश्वर राव ने कहा, ‘हम उन्हें पैदल चलने से कैसे रोक सकते हैं। कोर्ट के लिए यह मॉनिटर करना असंभव है कि कौन पैदल चल रहा है और कौन नहीं चल रहा है। ’

लीगल वेबसाइट लाइव लॉ के अनुसार, तब भी जस्टिस कौल ही उस पीठ में थे, जिन्होंने कहा था कि, ‘हर वकील अचानक कुछ पढ़ता है और फिर आप चाहते हैं कि हम अखबारों के आपके ज्ञान के आधार पर भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत मुद्दों का फैसला करें? क्या आप जाकर सरकार के निर्देशों को लागू करेंगे? हम आपको एक विशेष पास देंगे और आप जाकर जांच करेंगे?’

विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर अलख आलोक श्रीवास्तव द्वारा दायर उक्त आवेदन में कहा गया था कि कोरोना संकट के समय लगातार हो रही दर्दनाक दुर्घटनाओं को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय के तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

सरकार की ओर से पेश सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि,
” सरकार पहले से ही लोगों को यातायात की सुविधा दे रही है और लोगों को एक राज्य से दूसरे राज्य में पहुंचाया जा रहा है। “
इसी आधार पर कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया था, और किसी भी तरह का हस्तक्षेप करने से मना कर दिया।

इसी आवेदन में याचिकाकर्ता ने सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता के उस गुमराह करने वाले बयान का भी जिक्र किया गया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि कोई भी व्यक्ति अपने घर पहुंचने के लिए रोड पर पैदल नहीं चल रहा है।

सरकार हो या संसद या अदालत, यह सब संस्थाएं केवल जनहित के लिये हैं, बिना डरे बिना झुके, अपनी बात कहते रहिये।

( रिटायर्ड आईपीएस अफसर विजय शंकर सिंह की रिपोर्ट। )

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