Sunday, October 17, 2021

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कोरोना मरीजों को अपराधी की तरह देखना गलत : पीएम मोदी ने मान ली गलती? माफी भी मांगेंगे?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में महत्वपूर्ण बात कही है- अपराधियों की तरह नहीं देखे जाने चाहिए कोरोना के मरीज। मगर, यही महत्वपूर्ण बात बीते एक महीने से क्यों नहीं कही गयी? क्यों तबलीगी जमात से जुड़े मरीजों को ‘मोस्ट वान्टेड’ की तरह खोजा गया? क्यों ऐसा कहा गया कि कोरोना ‘छिपाने’ वालों पर एनएसए लगेगा? क्या इसलिए कि कोरोना वायरस का सांप्रदायीकरण राजनीतिक फायदे के लिए जरूरी था? 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह भी कहा है कि जिस क्षेत्र में कोरोना के मरीज होंगे, उनके साथ भी खराब व्यवहार नहीं होना चाहिए। यह बिल्कुल वाजिब टिप्पणी है। मगर, क्या खुद सरकार ने अपनी इस बात पर अमल किया? जब तक चीन की आपत्ति नहीं आ गयी अमेरिका की ही तर्ज पर भारत ने भी कोरोना वायरस को ‘चीनी वायरस’ बताया। अगर हमारे प्रधानमंत्री यह कहना चाहते हों कि देश से बाहर के लिए उनके मानदंड अलग हैं और देश के भीतर अलग, तब भी देश में ‘जमाती वायरस’ का भरपूर प्रचार-प्रसार हुआ। 

बीजेपी के बड़े नेता, मंत्री, आईटी सेल से जुड़े लोग, प्रधानमंत्री को फॉलो करने वाले लोगों ने ट्विटर पर जो हैशटैग चलाए और फैलाए, उन पर गौर कीजिए- #तबलीगीजमातवायरस, #निजामुद्दीनइडियट्स, #इस्लामिककोरोनावायरजिहाद, #कोरोनाजिहाद, #मुस्लिम_मतलब_आतंकवादी, #कोरोनाबम, #जाहिलजमाती…वगैरह-वगैरह। टीवी चैनलों का भरपूर इस्तेमाल अपने मकसद के प्रचार-प्रसार के लिए हुआ। अब ज्यादातर लोग इस गलत को ही सच मान बैठे हैं कि देश में कोरोना वायरस जमाती लेकर आए। नतीजे के तौर पर देशभर में मुसलमानों के बायकाट की घटनाएं हुईं। उनसे फल, सब्जी, दूध, मीट लेना बंद कर देने जैसी कोशिशें की गयीं।

मुसलमानों को लगा कि कोरोना के नाम पर उन्हें निशाने पर लिया जा रहा है। क्वॉरंटाइन करने के नाम पर उन्हें सताया जा रहा है। उन्हें लगा कि भूखा रखते हुए दवा रहित क्वारंटाइन की स्थिति में बीमार मुसलमानों की हालत और बदतर हो रही है। ऐसे में क्वॉरंटाइन होने और कोरोना मरीज के तौर पर पहचाने जाने से वे स्वाभाविक रूप से डरने लगे। उस वक्त भी सरकार को समझाइश से काम लेने की जरूरत थी। मगर, ऐसे लोगों के साथ बुरा बर्ताव हुआ। निस्संदेह इस दौर में अचानक ऐसी घटनाएं घटने लगीं जिसमें कोरोना वॉरियर्स पर हमले हुए। मगर, यह भी सच है कि जितनी मात्रा में घटनाएं घटीं, उससे ज्यादा और गलत तरीके से फर्जी वीडियो के नाम पर भी दुष्प्रचार हुए।

जो मामले जमातियों को बदनाम करने के सामने आए, जो वीडियो गलत पाए गये, जो सांप्रदायिक हैशटैग चलाए गये- क्या इनमें से किसी एक मामले में भी सजा दी गयी? वहीं, जमाती के तौर पर पहचान ही जुल्म का अवसर बन गया। प्रयागराज में जिस प्रोफेसर को जमाती बताकर और जमातियों को पनाह देने की तोहमत लगाकर कार्रवाई की गयी, वे प्रोफेसर कोरोना टेस्ट में निगेटिव आ चुके थे। मरकज से वे 12 मार्च की ही रात प्रयागराज पहुंच चुके थे, परीक्षाएं ले चुके थे और तब न क्वॉरंटाइन का प्रचलन था और न इसकी जरूरत। वे उन जमातियों का हिस्सा नहीं थे जो वहां राज्यों की सीमाएं सील करने और लॉकडाउन होने के कारण फंसे हुए थे। फिर भी उन्हें ‘इंसानियत के दुश्मन’ की तरह देश की मीडिया ने दिखलाया। 

बात सिर्फ जमाती की नहीं है। उद्योगपतियों को भी डराने से पीछे नहीं रही है सरकार। कहा गया कि उद्योगपति लॉकडाउन के दौरान फैक्ट्रियां खोल सकते हैं, वे अपने कैम्पस में ही मजदूरों को रखें। मगर, एक भी मजदूर कोरोना मरीज मिला, तो फैक्ट्री मालिक को जेल भेज दिया जाएगा। क्या यह नियम कोरोना मरीज के प्रति नफरत को बढ़ावा देने वाला नहीं है? क्या यह मरीज को अपराधी की तरह देखने वाला नजरिया नहीं है? 

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से लगातार कोरोना की स्टेटस रिपोर्ट बताते वक्त ‘जमाती के आंकड़े’ बताए जाते रहे। कहा गया कि जमाती न होते, तो ऐसा होता कि वैसा होता। यही काम अरविंद केजरीवाल की सरकार ने भी किया। कोरोना के मरीजों को अपराधी की तरह देखने का चश्मा किसने तैयार किया? क्यों तैयार किया गया? 

निजामुद्दीन मरकज में जमाती सरकार की अनुमति से इकट्ठा हुए। उन्हें कोरोना का संक्रमण उन विदेशियों से हुआ लगता है जो मरकज में शामिल हुए। ये विदेशी हवाई अड्डों से स्क्रीनिंग के बाद पहुंचे होंगे। मरकज 10 से 13 मार्च तक चला। क्या तब स्क्रीनिंग या क्वॉरंटाइन करने के मामले में सरकार सख्त नहीं थी? नहीं थी तो दोष किसका हुआ? सेल्फ क्वॉरन्टीन या सरकार को सहयोग की बात करें तो दिल्ली सरकार ने 16 मार्च को धार्मिक जमावड़े पर रोक लगाया। उससे पहले तक यह आयोजन अवैध भी नहीं था। 

17 मार्च से देशभर में स्थिति अलग हो गयी। राज्यों की सीमाएं सील हो गयीं। 19 मार्च को ताली-थाली का आह्वान हुआ। 22 मार्च को ताली-थाली के बाद 24 मार्च को लॉकडाउन हो गया। जमातियों के लिए 17 मार्च के बाद कहीं जाने का अवसर ही नहीं था। फंसे हुए जमातियों में जब कोरोना फैलना शुरू हुआ। इन्होंने मदद मांगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के लोग पहुंचे। तब जाकर इनका रेस्क्यू हुआ। यह सारा विवरण केंद्र और दिल्ली सरकार की नाकामयाबी को बयां करता है।

अपनी नाकामी छिपाने के लिए जमाती को कोरोना का सोर्स बताकर नैरेटिव गढ़े गये। कोरोना का सोर्स हिन्दुस्तान में कैसे हो सकता है अगर यह बीमारी विदेशियों से आ रही हो? लेकिन इस रूप में कहानी गढ़ी गयी कि अगर मरकज न होता, तो देश में कोरोना नहीं होता। बीजेपी ने बहुत बड़ा अपराध किया है सरकार के स्तर पर भी और सत्ताधारी दल के रूप में भी। आम आदमी पार्टी ने भी अपनी नाकामी छिपाने के लिए बीजेपी के राजनीतिक मकसद में उसका साथ दिया और वही अपराध किए।

यह बात अच्छी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना मरीजों को अपराधी नहीं मानने का आग्रह किया है। मगर, अब तक उनकी सरकार और पार्टी इसी मान्यता के साथ चलती रही है। अब जबकि सोच बदली है तो क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोरोना मरीजों को अपराधी मानने वाले नजरिए के लिए सरकार की ओर से और अपनी पार्टी की ओर से माफी मांगेंगे? यह बड़ा सवाल है जिसका उत्तर लम्बे समय तक मांगा जाता रहेगा।

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इन्हें विभिन्न न्यूज़ चैनलों के पैनल में बहस में करते देखा जा सकता है।) 

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