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स्वाधीनता संग्राम के खलनायकों को महानायक बनाने की तैयारी

एक तरफ नफरत से उपजे हिंदुत्व की प्रयोगशाला में तब्दील हो चुकी गांधी की जन्मस्थली गुजरात में नौवीं कक्षा की आंतरिक परीक्षा में सवाल पूछा जाता है कि महात्मा गांधी ने आत्महत्या कैसे की थी। इसके बाद दूसरी ओर महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा अपने घोषणा पत्र में ऐलान करती है कि अगर वह फिर से सत्ता में आई तो विनायक दामोदर सावरकर को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजेगी।

सरसरी तौर पर देखें तो दोनों खबरों का आपस में कोई संबंध नजर नहीं आता, लेकिन हकीकत यह है कि दोनों ही खबरों का आपस में गहरा अंतरसंबंध है…और यह अंतरसंबंध एक बड़ी सुनियोजित और बहुआयामी साजिश का हिस्सा है। यह साजिश है राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को लांछित-अपमानित करने की। यह साजिश है गांधी के हत्यारों और हत्या की साजिश के सूत्रधारों को स्वाधीनता संग्राम के नायक और राष्ट्र निर्माता के रूप में स्थापित करने की। यह साजिश है अपने राजनीतिक पुरखों के माथे पर लगे स्वाधीनता संग्राम के साथ भितरघात करने के कलंक को धोने की।

यह घिनौनी साजिश वैसे तो पांच साल पहले केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद से ही अलग-अलग स्तर पर जारी है, लेकिन भाजपा के दोबारा सत्तारूढ़ होने के बाद इस साजिश पर तेजी से काम शुरू हो गया है। पहले यह काम मुख्य रूप से सिर्फ सोशल मीडिया पर हो रहा था लेकिन अब सोशल मीडिया के साथ-साथ उससे इतर भी शुरू हो गया है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह तथा भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी सक्रिय भागीदारी कर रहे हैं।

कुछ समय पहले मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में उस नाथूराम गोडसे का मंदिर बनाने का उपक्रम भी हुआ था, जिसने महात्मा गांधी की हत्या की थी। उस समय मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार थी। उसी मध्य प्रदेश में भाजपा ने आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त रही कथित साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को भोपाल से लोकसभा उम्मीदवार बनाया, जिसने चुनाव प्रचार के दौरान ही गोडसे को देशभक्त और अपना आदर्श बताया था। बाद में इसके लिए जब भाजपा नेतृत्व की व्यापक आलोचना हुई तो पार्टी ने उसके बयान से पल्ला झाड़ लिया तथा प्रज्ञा पर कार्रवाई करने की बात भी कही।

प्रज्ञा ठाकुर चुनाव जीतकर सांसद हो गईं और उस पर पार्टी ने क्या कार्रवाई की, आज तक किसी को नहीं मालूम। अब उसी कड़ी में भाजपा शासित गुजरात में ही स्कूली छात्रों से पूछा जा रहा है कि महात्मा गांधी ने आत्महत्या कैसे की थी। इस आपराधिक हरकत को प्रश्न पत्र तैयार करने वाले शिक्षक की भूल या अज्ञान कह कर खारिज नहीं किया जा सकता। यह निश्चित तौर पर एक सोची-समझी शरारत है, जो गांधी के बारे में नई पीढ़ी को विकृत जानकारी परोसने के एक व्यापक अभियान का हिस्सा है।

अभी इसी महीने जब पूरी दुनिया महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मना रही थी, तब सोशल मीडिया पर गांधी को कोसने और गोडसे को सराहने का अभियान चल रहा था। गोडसे को ‘महात्मा’ और ‘हुतात्मा’ बताकर उसके अमर रहने का घोष किया जा रहा था। ऐसा करने वाले लोग किस विचारधारा, संगठन और राजनीतिक दल से जुड़े हैं और किस नेता के भक्त हैं, यह बताना आवश्यक नहीं। गांधी जयंती के दिन ‘गोडसे अमर रहें’ को ट्विटर पर ट्रेंड कराने वालों के प्रोफाइल आसानी से बता देंगे कि ऐसे तमाम लोग रात-दिन किस राजनीतिक महाप्रभु की आराधना में लीन रहते हैं।

इनमें से ज्यादातर के प्रोफाइल पर सावरकर, हेडगेवार, गोलवलकर, गोडसे, मोहन भागवत या नरेंद्र मोदी की तस्वीरें, संघ का भगवा ध्वज, भारतमाता का काल्पनिक चित्र या ‘अखंड भारत’ का नक्शा मिलेगा। यही वे लोग हैं जो मनगढ़ंत किस्सों के जरिए जवाहरलाल नेहरू से लेकर राहुल गांधी और विपक्ष के तमाम नेताओं तक का सोशल मीडिया में तरह-तरह से चरित्र हनन करते रहते हैं। सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों को अश्लील गालियां और धमकियां देते हैं। ऐसा करने वाले कई ‘राष्ट्रभक्तों’ को खुद प्रधानमंत्री मोदी सोशल मीडिया में फॉलो करते हैं।

इस तरह एक तरफ गांधी को खलनायक और गोडसे को नायक के तौर पर प्रचारित करने का अभियान तो अबाध रूप से चल ही रहा है और अब अपने एजेंडे याकि साजिश के अगले चरण के तौर पर सावरकर को महानायक बताने का अभियान तेज हो गया है। उन सावरकर को स्वाधीनता संग्राम के महानायक के तौर पर पेश किया जा रहा है, जिन्होंने एक नहीं कई-कई माफीनामे ब्रिटिश हुकूमत को लिखकर दिए और अंतत: माफी भी पाई और स्वाधीनता संग्राम से खुद को अलग करने के पुरस्कार स्वरूप मासिक पेंशन भी। प्रधानमंत्री मोदी खुद इस अभियान के अगुआ हो गए हैं। वे महाराष्ट्र में अपनी चुनावी रैलियों में खुलेआम कह रहे हैं कि हिंदुत्व विचारक सावरकर के संस्कार ही राष्ट्र निर्माण का आधार हैं। वे उन सावरकर को प्रेरणास्रोत बता रहे हैं, जिन्हें नाथूराम गोडसे अपना गुरू मानता था और जिन्हें गांधी-हत्याकांड की जांच करने वाले जस्टिस जीवनलाल कपूर की अध्यक्षता वाले आयोग ने अपनी रिपोर्ट में साजिश का सूत्रधार माना है।

सवाल है कि सावरकर अगर वाकई इतने ही महान थे, जितना प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी के अन्य नेता बता रहे हैं और उन्हें भारत रत्न देने की पैरवी कर रहे हैं, तो फिर पांच साल तक उनकी याद क्यों नहीं आई? पिछले पांच वर्षों के दौरान मोदी सरकार ने चार राजनेताओं- मदन मोहन मालवीय, अटल बिहारी वाजपेयी, चंडिकादास उर्फ नानाजी देशमुख और आजीवन कांग्रेसी तथा कॉरपोरेट घरानों के चहेते रहे प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न से सम्मानित किया है। सवाल है कि भाजपा क्या इन चारों को सावरकर से भी ज्यादा महान मानती है, जो उन्हें पहले ही भारत रत्न दे दिया और अब सावरकर को देने की बात कही जा रही है?

वैसे यह पहला मौका नहीं है जब सावरकर को भारत रत्न देने की बात हो रही है। इससे पहले वर्ष 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय भी उन्हें भारत रत्न देने की कोशिश की गई थी। इस सिलसिले में बाकायदा प्रधानमंत्री की ओर से एक प्रस्ताव तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन के पास भेजा गया था। उनके नाम के साथ ही मशहूर शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को भी भारत रत्न देने की सिफारिश की गई थी। कहा जाता है कि वाजपेयी खुद नहीं चाहते थे कि सावरकर का नाम भारत रत्न के लिए प्रस्तावित किया जाए लेकिन लालकृष्ण आडवाणी और संघ नेतृत्व के दबाव में उन्हें सावरकर का नाम प्रस्तावित करना पड़ा था।

चूंकि सावरकर के बारे में नारायणन सब कुछ जानते थे, लिहाजा उन्होंने बिस्मिल्लाह खां के नाम को तो मंजूरी दे दी थी, लेकिन सावरकर के प्रस्ताव वाली फाइल अपने पास ही रख ली थी। बाद में किसी अवसर पर जब वाजपेयी से उनकी मुलाकात हुई तो उन्होंने सावरकर की फाइल रोकने की वजह से वाजपेयी को अवगत कराया। यद्यपि वाजपेयी की वैचारिक पृष्ठभूमि भी संघ से जुड़ी हुई थी, लेकिन वे स्वाधीनता संग्राम और महात्मा गांधी की हत्या में सावरकर की भूमिका को भी भलीभांति जानते-समझते थे, लिहाजा उन्होंने नारायणन की दलीलों को न सिर्फ शालीनता के साथ सुना बल्कि स्वीकार भी किया। इस तरह उस समय सावरकर को भारत रत्न दिलाए जाने का प्रयास सफल नहीं हो सका।

वाजपेयी तीन मर्तबा प्रधानमंत्री बने और कुल छह वर्ष तक इस पद रहे लेकिन उन छह वर्षों के दौरान उन्होंने अपनी सरकार की एक भी योजना का नामकरण सावरकर तो ठीक हेडगेवार और गोलवलकर के नाम पर भी नहीं किया। खुद नरेंद्र मोदी पांच वर्ष से अधिक समय से प्रधानमंत्री हैं और इससे पहले तेरह वर्ष तक वे गुजरात के मुख्यमंत्री रहे लेकिन न तो उन्होंने गुजरात में और न केंद्र सरकार के स्तर पर किसी योजना की शुरुआत सावरकर के नाम से की। अन्य कई राज्यों में भी भाजपा की सरकारें हैं लेकिन वहां भी सावरकर के नाम पर कोई योजना संचालित नहीं की जा रही है तो इसकी एकमात्र वजह सावरकर की भूमिका को लेकर भाजपा का अपराधबोध ही रहा है।

अब चूंकि भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में है। राष्ट्रपति भी उसके अनुकूल है। सारी संवैधानिक संस्थाएं सरकार की दासी बनी हुई हैं। विपक्ष बेहद कमजोर और डरा हुआ है। मीडिया पूरी तरह सरकार के ढिंढोरची की भूमिका है। इसीलिए अब वह खुलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडे पर अमल कर रही है। इसीलिए उसके नेताओं को लगता है कि यही बेहद उपयुक्त समय है जब वह वैचारिक पुरखों को नायक और राष्ट्र निर्माता के तौर पर स्थापित कर सकती है। सावरकर को भारत रत्न देने के प्रस्ताव में उसके इसी इरादे की झलक मिलती है।

भाजपा की महाराष्ट्र इकाई के प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की ओर से जिस तरह की प्रतिक्रिया आई उसे देखते हुए कोई ताज्जुब की बात नहीं होगी कि सावरकर को अगले कुछ महीनों में भारत रत्न दे दिया जाए। यह शुरुआत होगी उन लोगों को संवैधानिक तौर पर महिमामंडित करने की, जिन्होंने भारत के स्वाधीनता संग्राम से विमुख होकर ब्रिटिश हुकूमत के प्रति वफादारी निभाई थी। अगर भाजपा अगले पांच-दस साल और सत्ता में रह गई तो तय मानिए कि हेडगेवार, गोलवलकर, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय आदि को भी भारत रत्न दे दिया जाएगा, जो स्वाधीनता संग्राम से दूरी बनाकर ब्रिटिश हुकूमत के फरमाबरदार बने हुए थे। इसी कड़ी में ‘महात्मा’ नाथूराम गोडसे को भी भारत रत्न दे दिया जाए तो कोई आश्चर्य नहीं।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on October 19, 2019 10:11 am

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