जब औरतें न्याय मांगती हैं तो क्यों देश का नाम बदनाम होने लगता है?

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पिछले तीन महीनों में यह दूसरी दफा है कि भारत की चोटी की ओलम्पिक विजेता महिला पहलवान दिल्‍ली के जंतर-मंतर में धरनारत हैं। ये महिला पहलवान भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह जो सत्तासीन भाजपा का लोकसभा सासंद है, के विरुद्ध धरना दे रही हैं। इन महिला पहलवानों के अनुसार उनका शारीरिक शोषण हुआ है और सरकार ने उनकी शिकायत को नजरअंदाज किया है।

धरने पर बैठी महिला पहलवानों ने आपबीती ओर आंसुओं के सैलाब के दौरान अपने खेल कैरियर के दौर में झेली त्रासदी का वर्णन किया है। ये कहानी विवेकशून्यता से उपजे शारीरिक शोषण और हिंसा के भयानक प्रदर्शन की घिनौनी कथा है।

महिला पहलवानों का कहना है उनका लगातार शारीरिक शोषण, धमकाना, दबाना, भद्दे नामों से बुलाना, सबके सामने जलील करना, दहाड़ना आदि और अपनी बेरोक ताकत का नंगा प्रदर्शन खेल जगत की कुरूपता को सामने लाता है। यह दर्शाता है एक घातक गठजोड़ को, राजनीतिज्ञों एवं खेलों के प्रबन्धन में मर्दों के दबदबे को, जिसका शिकार महिला खिलाड़ी बनती हैं।

ये युवा पहलवान खिलाड़ी जनवरी माह में जंतर-मंतर पर बृजभूषण के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज करने की मांग को लेकर बैठी थीं। उस वक्‍त उन्हें यह भरोसा दिया गया था कि दोषों की जांच के लिए अधिकृत ‘ओवरसाईट कमेटी’ बनाई जाएगी। इस कमेटी का गठन 23 जनवरी, 2023 को प्रसिद्ध मुक्केबाज मैरी कॉम की अध्यक्षता में कर दिया गया। कमेटी के अन्य सदस्य थे ओलम्पिक पदक विजेता योगेश्वर दत, ध्यानचंद पुरस्कार विजेता तृप्ती मुरगुंडे और स्पोर्टस अथारिटी ऑफ इंडिया की सदस्य राधिका श्रीमान।

कमेटी ने 5 अप्रैल को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी लेकिन खेल मंत्रालय ने इसका खुलासा नहीं किया। इसके कुछ हिस्से प्रेस में लीक हुए तो पता लगा कि इसमें महिला पहलवानों की शिकायत के विशेष मुद्दे को अस्वीकार कर दिया है एवं छोटी-मोटी सिफारिशें ही दी गई हैं जैसे खिलाड़िनों और प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल होना चाहिए आदि।

इससे पीडित महिला पहलवानों को बहुत निराशा हुई। मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होनें बताया कि मैरी कॉम के सामने उन्होंने गवाही दी तो मैरी कॉम रो पड़ीं ओर भावुक होते हुए उन्होंने बताया कि यही दास्तान उसकी भी रही है। कमेटी की दूसरी सदस्यगण भी भावुक हो उठीं। यह पीड़ा महिला खिलाडियों की एक समान थी लेकिन जब रिपोर्ट आई तो इसमें झेली गई पीड़ा की पूर्णतया उपेक्षा कर दी गई।

महिला पहलवान अब न्याय की मांग करती हुई पुनःजंतर-मंतर पर वापस आ गईं। उन्हें धरने वाली जगह पर जाने-पहचाने नतीजों का सामना करना पड़ रहा है। बिजली काट दी गई, पानी की सप्लाई रोक दी गई, रोटी एवं रोजाना खपत की वस्तुएं पहुंचाने वाले वाहनों को उन तक पहुंचने से रोका जा रहा है। धरने वाली जगह पर पुलिस ने भारी बैरिकेड लगा दी है, जिससे आम नागरिकों को धरने में शामिल होना असंभव नहीं तो कठिन जरूर हो गया है।

दिल्‍ली पुलिस ने तीन महीने से अधिक समय तक केस दर्ज करने का विरोध किया और पहलवान लड़कियां जब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गईं तो पुलिस को बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ केस दर्ज करने को मजबूर होना पड़ा।

धरने पर बैठी ये युवा खिलाड़ी हैं जिन्होंने अपनी जिंदगियों को दाव पर लगा दिया है। उन्होंने वर्षो तक अपना पसीना बहाते हुए कड़े अनुशासन की मांग करती कठिन ट्रेनिंग हासिल की। ज्यादातर खिलाड़ी बहुत साधारण ग्रामीण परिवारों से ताल्लुक रखती हैं, जिन्होंने अल्पतम साधनों के बावजूद अपनी पूंजी बच्चियों की सिखलाई पर लगा दी। खेल केरियर के अलावा इनके पास कोई दूसरा पेशेवर विकल्प भी नहीं है।

खेल जगत में महिला खिलाडियों की शिकायत सुनने के लिए कोई ईमानदार तंत्र नहीं है और समाधान के कोई पुख्ता तरीके भी उपलब्ध नहीं हैं। महिला खिलाड़ियों को चुपचाप दुर्व्यवहार सहन करने के लिए छोड़ दिया गया है। इन महीनों के दौरान ही एक राज्य मंत्री पर भी एक महिला कोच की तरफ से यौन-शोषण के ऐसे ही आरोप लगाए गए और हमने देखा कि कैसे सत्तासीन राजनैतिक जमात उस मंत्री के पक्ष में आ कर खड़ी हो गई।

हम जानते हैं कि हमारे देश में औरतों की तरफ से बड़े रुतबे वाले व्यक्तियों के विरूद्ध बोलना अथवा दोष लगाना आसान नहीं है। इन खिलाडियों के लिए भी इस विरोध के गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। पिछले मामलों में कई उदाहरण हैं जहां महिला एथलीटों को शिकायत करने के उपरान्त अपना करियर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

अंतहीन मेहनत के पश्चात इन महिला खिलाडियों ने कुश्ती क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है, पदक जीते हैं एवं रुतबा ही हासिल नहीं किया है बल्कि देश का सम्मान बढ़ाया है। खेल क्षेत्र में आगे बढ़ने, ट्रेनिंग जारी रखने एवं रोजगार के लिए इन्हें अपने देश की सरकार की मदद की सख्त आवश्यकता है। इतनी ताकत एवं राजनैतिक दबदबे वाले मंत्रियों एवं अधिकारियों का सामना करना न सिर्फ दिलेरी का कार्य है बल्कि इससे सरकार के समर्थन से वंचित रह जाने का बहुत बड़ा खतरा भी है।

इन महिला खिलाडियों ने अपनी अन्‍तरात्मा की आवाज सुनकर यह जोखिम उठाया। जब मैं धरने पर उनसे मिलने पहुंची तो उनके और उनके शुभचिंतकों के चेहरों पर चिंता की लकीरें स्पष्ट दिखाई दे रही थीं। आज उन्हें ये लग रहा है कि वे अकेले ही यह लडाई लड़ रही है। उन्हें अपने कुश्ती के परिवार के अन्दरूनी मामले बाहर बेगानों में लाकर खेलों के प्रति अनादर के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।

भारतीय ओलम्पिक संघ की अध्यक्षा पी.टी. उषा ने कहा कि पहलवानों का विरोध प्रदर्शन ‘अनुशासनहीनता के बराबर’ है; “खिलाडियों को सड़कों पर विरोध प्रदर्शन नहीं करना चाहिए था। उन्होंने जो किया, वह खेल और देश के लिए अच्छा नहीं है।’ इन पहलवानों को कुछ और लोगों से भी ऐसा ही उपदेश मिला कि वे देश का नाम बदनाम कर रही हैं।

यदि औरतें चुप रहें, तो क्या देश का मान-सम्मान ऊंचा होता है? यदि औरतें न्याय मांगती हैं तो क्या देश का नाम बदनाम हो जाता है? क्‍या वे देश की नागरिक नहीं हैं, जिन्हें न्याय मांगने का हक हासिल है? ओरतों को राष्ट्र की प्रतिष्ठा का वाहक बना दिया गया है, ठीक उसी तरह जैसे उन्हें परिवार के सम्मान का वाहक माना जाता है और घरेलू हिंसा के सामने चुप रहने की नसीहत दी जाती है।

यह कैसा राष्ट्र है जो अपनी बेटियों से राष्ट्रीय गौरव के नाम पर हिंसा, अन्याय और दुर्व्यवहार पर चुप रहकर सहने की मांग करता है? यह कैसा राष्ट्र है जिसका गौरव औरतों के चुप रहने पर टिका हुआ है? कई जगहों पर औरतें सामूहिक बलात्कार की शिकार हुईं। कई स्थानों पर इन घटनाओं में ताकतवर हस्तियों के नाम सामने आए और कई बार तो सेना, सुरक्षा बलों ओर पुलिसकर्मियों के भी। मणिपुर में 2004 में 12 औरतों ने निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया।

यौन शोषण का यह इतिहास हमारे दिलों में अंकित है। यह सवाल पूछा जाना स्वाभाविक है कि इस केस में पारदर्शिता क्यों नहीं है और एक शख्स का बचाव क्‍यों किया जा रहा है? जब उस व्यक्ति के खिलाफ दर्जनों आपराधिक मामलें हैं तो क्‍यों बड़े स्तर पर कोई जांच शुरू नहीं की जाती? हम ये पुलिस और सरकार पर छोड देते हैं। इन सात पहलवानों, जिनमें एक नाबालिग बच्ची भी है, की शिकायत पर कार्रवाई न करने के लिए जवाब जरूर मांगते हैं।

क्या समाज और सरकार ये चाहते हैं कि औरतें चुप रहें और अपने शारीरिक शोषण और स्वतंत्र देह पर हो रहे हमलों के बारे सवाल न पूछें? यह इसलिए है क्योंकि यह सवाल न पूछा जाए कि गुजरात में बिलकीस बानो के परिवार के 14 सदस्यों के कत्ल और सामूहिक बलात्कार के केस में दोषी पाए गये अपराधियों को जेल से समय से पहले रिहा क्‍यों कर दिया गया? इस रिहाई ने निश्चित तौर पर बहुत लोगों के मनोबल को ऊंचा किया होगा जो इस तरह की हिंसक गतिविधियों में शामिल हैं।

देश की शान, हमारी युवा पहलवान औरतें एवं बच्चियां, देश के हर आम नागरिक के समर्थन की हकदार हैं। हम जानते हैं कि देश के बहुतेरे लोगों का दिल इन बच्चियों के लिए उदास है। हम इन्हें इंसाफ मिलता हुआ देखना चाहते हैं। इसलिए जरूरी है कि हम हौसला दिखाएं, ठीक उसी तरह जैसे इन बच्चियों ने दिखाया है।

आज जरूरत है कि हम संगठित होकर यह मांग करें कि दोषों की निष्पक्ष जांच करवाई जाए, खिलाड़ियों की शिकायत सुनी जाए एवं दोषी पाए व्यक्तियों के खिलाफ़ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए। औरतों का शारीरिक शोषण सामाजिक नासूर है। इसकी पीड़ा को औरतों के शरीर में दफ़न नहीं किया जा सकता।

(डॉ नवशरण कौर जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता हैं, दिल्ली में रहती हैं और उनके इस लेख का अनुवाद गुरबक्श सिंह मोंगा ने किया है।)

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