भारत-चीन सीमा विवाद: कमांडरों की बैठक का क्या निकलेगा कोई नतीजा?

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सीमा पर भारतीय सेना के जवान।

भारत-चीन सीमा पर तनाव के बीच, आज सैन्य कमांडर स्तरीय वार्ता शुरू होने वाली है। ख़बरों के मुताबिक़ यह बैठक आज सुबह भारत-चीन सीमा पर पूर्वी लद्दाख के चुशूल सेक्टर (मालदो) में होनी तय है। एक दिन पहले विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव (पूर्व एशिया) नवीन श्रीवास्तव और चीन के विदेश मंत्रालय के डायरेक्टर जनरल वूं जिंघाओ ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिये बातचीत की। यह क़दम स्वागत योग्य है कि एशिया की दो बड़ी शक्तियों ने अपने विवाद सुलझाने के लिए कूटनीतिक रास्ता अख्तियार किया है। मगर बड़ा सवाल यह है कि दोनों देशों को शांति स्थापित करने के लिए और क्या करना चाहिए? 

सब से अहम बात यह है कि युद्ध से मामले अक्सर हल नहीं होते। साल 1962 में दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को लेकर भयानक युद्ध हो चुका है। इस युद्ध में जान और माल का बड़ा नुकसान तो हुआ, मगर विवाद का खात्मा नहीं हुआ। युद्ध के बाद की स्थिति ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ (लाइन ऑफ ऐक्चुअल कंट्रोल) में तब्दील हो गयी। तब से यह रेखा दोनों देशों के बीच बॉर्डर बनी हुई है। बीच-बीच में सीमा पर विवाद होते रहे, मगर दोनों देशों ने स्थिति बिगड़ने से पहले संभाल ली।

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कुछ लोगों को लगता है कि युद्ध में जान देना ही देशभक्ति है। मगर वे यह नहीं सोचते कि युद्ध को टालने के लिए प्रयास करना भी देशभक्ति है। अगर युद्ध टल जाता है तो न जानें जाती हैं और देश मलबे का ढेर बनने से बच जाता है। भारत और चीन ‘नयूक्लियर पावर’ हैं। अगर वे आपस में टकराए तो बहुत बड़ी तबाही होगी।  

युद्ध को टालने के लिए ज़रूरी है कि जनता के सामने सही तस्वीर रखी जाये। कहा जाता है कि जहाँ ‘पब्लिक ओपिनियन’ मज़बूत होता है, वहां अक्सर युद्ध होने नहीं दिया जाता। क्योंकि जनता युद्ध के खिलाफ सड़कों पर उतर जाती है। जब बातें खुल कर होती हैं, तो बड़ी से बड़ी समस्या का भी समाधान निकल जाता है।

इस लिए सरकार का यह फर्ज़ है कि वह सिर्फ तथ्यों को जनता के सामने पेश करे। मगर अफ़सोस कि पिछली 5 मई के बाद, जब से सीमा पर हालात बिगड़ने शुरू हुए, आधिकारिक तौर पर अमूमन चुप्पी साधी गयी। विपक्ष भी सरकार से सही जानकारी प्रस्तुत करने की मांग करता रहा। 

जब अख़बार की ‘लीड’ खबर यह छप रही थी कि चीन भारत सीमा के अन्दर दाखिल हो गया है, तब भी सरकार ने वस्तुस्थिति पेश नहीं की। चीन की सरकार ने अपनी जनता को हालात से अवगत कराया इस की बहुत ज्यादा जानकारी हमारे पास नहीं है। मगर चीन की सरकार पर तथ्य भी छुपाने के आरोप लगते रहे हैं।

इस बात से कोई इंकार नहीं कर रहा है कि सरहद पर तनाव नहीं था, मगर इस तनाव को भड़काऊ सुर्खी के साथ पेश करना अनैतिक है। दुर्भाग्य की बात है कि ज़्यादातर अख़बारों ने मज़बूत स्रोतों का हवाला नहीं दिया। कई बार तो ख़बरें पढ़ कर ऐसा महसूस हुआ जैसे दोनों देशों के बीच जंग होनी तय है। इस बीच तथाकथिक अन्तरराष्ट्रीय और सामरिक मामलों के बहुत सारे “जानकारों” ने सत्ता वर्ग की ताली बटोरने के लिए जटिल सवालों का सरलीकरण किया। 

जंग के लिए भड़काने वाले सक्रिय हैं। उनसे सतर्क रहने की ज़रूरत है। युद्ध का महिमामंडन करने वाले अक्सर देशभक्त होने का चोला पहन लेते हैं। मगर उनके बहकावे में न आने वाला व्यक्ति ही सही अर्थों में देशभक्त है। ऐसी शक्तियां लोगों के दिलों में कट्टर राष्ट्रवाद का उन्माद भड़काने की कोशिश करती हैं। उनको कई बार राजनीतिक प्रश्रय भी हासिल होता है। कट्टर राष्ट्रवाद का उन्माद इस लिए भड़काया जाता है ताकि घरेलू संकट से लोगों का ध्यान भटकाया जाये। मगर इस के दूरगामी परिणाम काफी नुकसानदेह हो सकते हैं। 

भारत और चीन 3500 किलोमीटर लम्बी सीमा साझा करते हैं। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद एक सच्चाई है। विवाद सीमा के तीन क्षेत्रों में उभर कर सामने आया है। पूर्वी क्षेत्र (अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम के पास), मध्य क्षेत्र (उत्तराखंड और हिमाचल के पास) और पश्चिमी क्षेत्र (लद्दाख के पास) को लेकर दोनों देशों के आपसी मतभेद है। 

मोटे तौर पर भारत सरकार 1914 में ब्रिटिश सरकार के विदेश सचिव सर हेनेरी मैकमोहन और राजनीतिक विभाग तिब्बत के बीच हुए भारत-तिब्बत समझौते के आधार पर भारत चीन सरहद का हल तलाश करना चाहती है। इसे “मैक मोहन लाइन” कहते हैं। मगर चीन इस पर आपत्ति जताता है। वहीं भारत मैक मोहन लाइन के आधार पर आपसी विवाद सुलझाना चाहता है। 9 मई 2009 को संसद में बोलते हुए उस वक़्त के विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने “मैक मोहन लाइन” पर ज़ोर दिया और कहा कि चीन ने भारत के अरुणाचल प्रदेश राज्य की 90,000 वर्ग किलोमीटर ज़मीन “अवैध” रूप से अपने क़ब्ज़े में ले लिया है।

जहां तक मौजूदा सीमा विवाद का प्रश्न है तो इसको लेकर तमाम तरह के दावे-प्रतिदावे किए जा रहे हैं। लेफ्टिनेंट (रिटायर्ड) एचसी पनाग ने प्रिंट में छपे एक लेख में दावा किया है कि चीन भारत सीमा के भीतर लगभग 40-60 वर्ग किलोमीटर क़ब्ज़ा कर चुका है। इस हालत में चीन की पोजीशन मज़बूत नज़र आ रही है। उनके अनुसार भारत की कोशिश यह होनी चाहिए कि वह 1 अप्रैल 2020 से पहले वाली यथास्थिति बहाल करे। ऐसा होने पर चीन दोबारा भारत के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई सामरिक बढ़त बढ़ाने की नीयत से नहीं करेगा और भारत के लिए अपमान का सबब नहीं बनेगा। 

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने यह बात कुबूल की है कि चीन के सैनिक भारत सीमा के अन्दर (लद्दाख) अच्छी ख़ासी संख्या में दाख़िल हो गए हैं। “अच्छी ख़ासी संख्या में चीन के लोग भी आ गए हैं”।  

न्यूज़ एजेंसी पीटीआई ने लगभग दो हफ्ते पहले अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि चीन भारत द्वारा पेंगॉन्ग त्सो झील के ‘फिंगर एरिया’ में एक अहम सड़क बनाए जाने से नाराज़ है। भारत गलवान घाटी में दुरबुक और दौलत बेग ओल्डी को जोड़ने वाली सड़क का भी निर्माण कर रहा है। चीन ने सड़क निर्माण का विरोध किया है। फिर 5 मई को भारत और चीन के सैनिक पेंगॉन्ग त्सो झील में एक दूसरे से भिड़ गए। तब से तनाव बना हुआ है। इसके बाद दोनों देश ने सरहद पर अपने फौजियों की संख्या काफी बढ़ा दी है।

भूतपूर्व राजदूत और इंस्टीट्यूट आफ चाइनीज़ स्टडीज के निदेशक अशोक कान्त ने अंग्रेजी अखबार “द हिन्दू” (मई 25) से बातचीत करते हुए कहा कि भारत और चीन के सैनिकों के बीच झड़प पहले भी हुए हैं लेकिन इस बार चीन ज्यादा “आक्रामक” दिख रहा है और उसने “प्रोटोकॉल” भी तोड़े हैं। उन्होंने “द वायर” के साथ एक दूसरे इंटरव्यू में यह भी कहा है कि गलवान क्षेत्र पर चीन पहली बार विवाद खड़ा कर रहा है।

बहरहाल विवाद को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत शुरू हो गयी है। पहली वार्ता बगैर किसी नतीजे के समाप्त हो गयी और अब दोनों देशों के बीच लेफ्टिनेंट जनरल के स्तर की वार्ता आज हो रही है।  

सीमा विवाद के अलावा टकराव के अलग क्षेत्र भी हैं। दोनों देश एशिया की बड़ी अर्थवस्था भी हैं। कई मामलों में दोनों एक दूसरे के प्रतिद्वंदी भी हैं। ‘ट्रेड’ के क्षेत्र में दोनों एक दूसरे को पछाड़ने के लिए दौड़ रहे हैं। चीन ‘इन्फ़्रास्ट्रक्चर’ के खड़ा करने के मामले में भारत से काफी आगे है। भारत सरहद पर इन्फ़्रास्ट्रक्चर बनाने के क्षेत्र में काम कर रहा है। ताज़ा विवाद का एक पहलू यह भी है।

अगर दोनों देशों में प्रतिस्पर्धा है तो सहयोग के लिए भी अपार मौक़े हैं। उदाहरण के तौर पर, दोनों देशों के बीच हजारों साल पुराने संबंध हैं। व्यापार से ले कर ज्ञान के क्षेत्र में दोनों देश आपस में मिलते रहे हैं। दोनों देश उपनिवेशवाद के भी शिकार रहे हैं। दोनों देशों ने गुलामी से मुक्ति पाकर गरीबी दूर करने और बराबरी लाने का वादा किया था, जो अब तक पूरा नहीं हुआ है। दुनिया के सब से ज्यादा गरीब और बीमार लोग भारत और चीन में ही रहते हैं। कोरोना महामारी की वजह से दोनों देश बुरी तरह से परेशान हैं। 

अगर सहयोग करने के जज्बे से काम किया जाये तो रास्ते निकल सकते हैं। मगर पहली शर्त यह है कि कट्टर राष्ट्रवाद से उपजी घमण्ड को त्याग दिया जाए। दोनों देशों के बीच अगर ऐतिहासिक संबंध हजारों साल से रहे हैं तो कोई वजह नहीं है कि उसे आगे बनाए न रखा जाये। दोनों देशों के मसले और उसका समाधान भी एक ही है। दोनों देशों को करोड़ों लोगों को गरीबी के दलदल से बाहर निकालने की बड़ी ज़िम्मेदारी है। 

दोनों देशों की सरकारों को यह बात याद रखनी चाहिए कि राजनीतिक बॉर्डर इतिहास ने बनाया है। इतिहास इसे बदल भी सकता है। राजनीतिक बॉर्डर को इतिहास से पीछे ले जाना और इस पर खून खराबा करना बड़ी मूर्खता और तबाही का सबब है।

पंचशील समझौता और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच पिछले साल चेन्नई में हुए ‘सेकेंड इंडिया-चाइना इनफॉर्मल समिट’ में भी शांति और अमन की बात कही गयी है। उन बातों पर अमल करने का वक़्त आ गया है। 

भारत और चीन अगर मिल बैठ कर सीमा विवाद सुलझा लें तो उनकी ऊर्जा युद्ध के बजाये करोड़ों लोगों की आँखों से आंसू पोंछने में लग सकती है। मासूमों की जान बचाने के लिए और शांति स्थापित करने के लिए समझौता करना होशियारी है। इसके लिए दोनों देशों को आगे आना चाहिए।

(अभय कुमार जेएनयू से पीएचडी हैं। आप अपनी राय इन्हें debatingissues@gmail.com पर भेज सकते हैं।)  

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