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क्या बाबरी के गुनाहगारों को मिलेगी सज़ा? फैसला आज

आज से 23 साल पहले 6 दिसंबर 1992 को सामूहिक बलात्कार के बाद बर्बरता पूर्वक मार कर दी गई बाबरी के गुनाहगारों को आज सज़ा मिलेगी या कि वो बेदाग़ बरी हो जाएंगे। बाबरी मस्जिद पर हमला भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने पर हमला था।

सीबीआई के स्पेशल जज सुरेंद्र कुमार यादव लखनऊ स्थित विशेष न्यायालय (अयोध्या प्रकरण) में आज बाबरी विध्वंस मामले में फैसला सुनाएंगे। पांच साल पहले उन्हें इस केस का विशेष जज नियुक्त किया गया था। जबकि पिछले साल सितंबर में वो जिला जज के पद से रिटायर हो चुके हैं। सिर्फ़ विशेष न्यायालय (अयोध्या प्रकरण) के जज की जिम्मेदारी के चलते सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें विशेष न्यायालय (अयोध्या प्रकरण) के पीठासीन अधिकारी के पद पर बने रहकर बाबरी मस्जिद विध्वंस केस की सुनवाई पूरी करने के लिए कहा। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिले अधिकार का इस्तेमाल किया था।

एफआईआर संख्या 197/1992 और 198/1992

6 दिसंबर, 1992 को दर्ज किए गए दो एफ़आईआर से जुड़े मामलों में आज फैसला होना है। पहली एफ़आईआर संख्या 197/1992 उन तमाम कारसेवकों के ख़िलाफ़ दर्ज की गई थी जिसमें उन पर डकैती, लूट-पाट, चोट पहुंचाने, सार्वजनिक इबादत की जगह को नुक़सान पहुंचाने, धर्म के आधार पर दो गुटों में शत्रुता बढ़ाने जैसे आरोप लगाए गए थे।

दूसरी एफ़आईआर 198/1992 बीजेपी, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और आरएसएस से जुड़े उन 8 लोगों के ख़िलाफ़ थी जिन्होंने रामकथा पार्क में मंच से कथित तौर पर भड़काऊ भाषण दिया था। इस एफ़आईआर में बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी, वीएचपी के तत्कालीन महासचिव अशोक सिंघल, बजरंग दल के नेता विनय कटियार, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, मुरली मनोहर जोशी, गिरिराज किशोर और विष्णु हरि डालमिया नामज़द किए गए थे।

पहली एफ़आईआर में दर्ज लोगों के मुक़दमे की जांच बाद में सीबीआई को सौंप दी गई जबकि दूसरी एफ़आईआर में दर्ज मामलों की जांच यूपी सीआईडी को सौंपा गया। साल 1993 में दोनों एफ़आईआर को अन्य जगहों पर ट्रांसफ़र कर दिया गया। कारसेवकों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर संख्या 197/1992  की सुनवाई के लिए ललितपुर में एक स्पेशल कोर्ट का गठन किया गया जबकि एफ़आईआर संख्या 198/1992 की सुनवाई रायबरेली की विशेष अदालत में ट्रांसफ़र की गई।

इन दो एफआईआर के अलावा 47 और मुक़दमे जिसमें पत्रकारों के साथ मारपीट और लूट आदि के भी लिखाए गए थे। बाद में सारे मुक़दमों की जाँच सीबीआई को दी गई और सीबीआई ने दोनों मामलों की संयुक्त चार्जशीट फाइल की।

इसके लिए हाई कोर्ट की सलाह पर लखनऊ में अयोध्या मामलों के लिए एक नई विशेष अदालत गठित हुई। लेकिन उसकी अधिसूचना में दूसरे वाले मुक़दमे का ज़िक्र नहीं था। यानी दूसरा मुक़दमा रायबरेली में ही चलता रहा। विशेष अदालत ने आरोप निर्धारण के लिए अपने आदेश में कहा कि चूँकि सभी मामले एक ही कृत्य से जुड़े हैं, इसलिए सभी मामलों में संयुक्त मुक़दमा चलाने का पर्याप्त आधार बनता है। 

आडवाणी और अन्य हिंदूवादी नेताओं पर दर्ज मुक़दमा क़ानूनी दांव-पेच और तकनीकी कारणों में फंसा रहा

आडवाणी समेत अनेक अभियुक्तों ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दे दी। 12 फ़रवरी 2001 को हाई कोर्ट ने सभी मामलों की संयुक्त चार्जशीट को तो सही माना लेकिन साथ में यह भी कहा कि लखनऊ विशेष अदालत को आठ नामज़द अभियुक्तों वाला दूसरा केस सुनने का अधिकार नहीं है, क्योंकि उसके गठन की अधिसूचना में वह केस नंबर शामिल नहीं था। अदालत ने तकनीकी कारणों का हवाला देते हुए आपराधिक साज़िश के मुक़दमे को रायबरेली की अदालत भेज दिया था। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रायबरेली में चल रहे मुक़दमे को बाबरी विध्वंस के मुक़दमे से जोड़ दिया।

साल 2003 में सीबीआई ने एफ़आईआर 198/1992  के तहत आठ अभियुक्तों के ख़िलाफ़ सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाख़िल की। हालांकि बाबरी मस्जिद ढहाने के आपराधिक साज़िश के आरोप को सीबीआई इसमें नहीं जोड़ सकी क्योंकि बाबरी मस्जिद ढहाने में आपराधिक साज़िश वाली एफ़आईआर संख्या 197/1992 और भड़काऊ भाषण वाली एफ़आईआर संख्या 198 /1992 दोनों अलग-अलग थीं।

इस बीच, रायबरेली कोर्ट ने लालकृष्ण आडवाणी की एक याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार की और उन्हें आरोपों से यह कहते हुए बरी कर दिया कि उनके ख़िलाफ़ केस चलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं। साल 2005 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रायबरेली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि आडवाणी और अन्य लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमे चलते रहेंगे। लेकिन उसमें आपराधिक साज़िश के आरोप नहीं थे। साल 2005 में रायबरेली कोर्ट ने मामले में आरोप तय किए और साल 2007 में इस मामले में पहली गवाही हुई।

इसके दो साल बाद साल 2009 में लिब्राहन आयोग ने भी अपनी नौ सौ पेज की रिपोर्ट सौंपी जिसे बाद में सार्वजनिक किया गया। इस रिपोर्ट में संघ परिवार, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और बीजेपी के प्रमुख नेताओं को उन घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार माना जिनकी वजह से बाबरी विध्वंस की घटना हुई।

साल 2010 में दोनों मामलों को अलग करने का निचली अदालत का फ़ैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। साल 2010 में इस मामले में हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सीबीआई ने पुनर्विचार याचिका दायर की थी।

हाईकोर्ट ने कहा था कि मामले में दो प्रकार के अभियुक्त थे- पहले वो नेता जो मस्जिद से 200 मीटर की दूरी पर मंच से कार सेवकों को भड़का रहे थे और दूसरे ख़ुद कारसेवक। यानी एलके आडवाणी और अन्य नेताओं के नाम आपराधिक साज़िश में नहीं जोड़े जा सकते थे।

8 भाजपा नेताओं के खिलाफ़ आपराधिक साजिश का मुकदमा दर्ज़

हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सीबीआई ने साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया और 20 मार्च 2012 को एक हलफ़नामा दायर किया जिसमें दोनों मामलों की एक साथ सुनवाई के पक्ष में दलील दी गई। मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साल 2015 में एलके आडवाणी, उमा भारती, मुरली मनोहर जोशी और कल्याण सिंह सहित वरिष्ठ बीजेपी नेताओं को नोटिस जारी कर बाबरी मस्जिद विध्वंस केस में आपराधिक साज़िश की धारा नहीं हटाने की सीबीआई की याचिका पर जवाब देने को कहा। और साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द कर दिया और साज़िश के आरोप फिर लगाए गए और दोनों ही मामलों की एक साथ सुनवाई करने की अनुमति दी गई। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इस गतिरोध को हमेशा के लिए ख़त्म करते हुए लाल कृष्ण आडवाणी और 20 अन्य लोगों सहित कई अभियुक्तों के ख़िलाफ़ साज़िश का आरोप फिर से लगाने का भी आदेश दिया।

बता दें कि पहले आडवाणी और अन्य नेताओं पर सिर्फ़ भड़काऊ भाषण देने का मुक़दमा रायबरेली में चल रहा था। लेकिन अप्रैल 2017 में सीबीआई की अपील पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती सहित 8 लोगों के ख़िलाफ़ आपराधिक साज़िश का मुक़दमा दर्ज किया गया था।

लखनऊ की विशेष सीबीआई अदालत ने ये कहते हुए कि –“आडवाणी, जोशी, उमा भारती और अन्य के ख़िलाफ़ आपराधिक साज़िश के आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं”- साल 2017 में बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती समेत 12 अभियुक्तों पर आपराधिक साज़िश के आरोप तय किए गए थे।

लिब्राहन आयोग का गठन और रिपोर्ट

बाबरी मस्जिद विध्वंस के दस दिन बाद पूरे मामले की जांच के लिए जस्टिस मनमोहन लिब्राहन की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया। आयोग को अधिकतम तीन महीने की समय सीमा के भीतर जांच रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा गया था। लेकिन फिर आयोग की समय सीमा को 48 बार बढ़ाया गया और जांच पूरी होने में ही 17 साल लग गए। 

लिब्राहन आयोग ने 30 जून 2009 को अपनी रिपोर्ट गृह मंत्रालय को सौंपी। बाबरी मस्जिद विध्वंस की जाँच रिपोर्ट में लिब्राहन आयोग ने पाया कि मस्जिद को एक गहरी साज़िश के तहत गिराया गया था। आयोग ने साज़िश में शामिल लोगों पर मुक़दमा चलाए जाने की सिफ़ारिश भी की थी।

सीबीआई की मुख्य चार्जशीट में क्या है 

सीबीआई की मूल चार्जशीट के मुताबिक भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, विनय कटियार, अशोक सिंहल, कल्याण सिंह, बाला साहब ठाकरे और उमा भारती अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद गिराने के ‘षड्यंत्र’ के मुख्य सूत्रधार हैं। और इनका षड्यंत्र अक्टूबर 1990 में शुरू होकर दिसंबर 1992 तक चला बताया गया है।

विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या, काशी और मथुरा के मंदिरों को मुक्त करने का अभियान चलाया और इसके अंतर्गत लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा की। शिव सेना नेता बाल ठाकरे ने मुंबई के दादर में आडवाणी का स्वागत किया। उसी दिन लाल कृष्ण आडवाणी ने पंचवटी में घोषणा की थी कि बाबरी मस्जिद कभी भी मस्जिद नहीं रही और हिंदू संगठन प्रत्येक दशा में अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए दृढ़ संकल्प हैं।

चार्जशीट के अनुसार 1991 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने इस योजना में सक्रिय साथ दिया।

पांच दिसंबर 1992 को अयोध्या में भाजपा नेता विनय कटियार के घर पर एक गोपनीय बैठक हुई, जिसमें विवादित ढांचे को गिराने का अंतिम निर्णय लिया गया।

आडवाणी ने छह दिसंबर को कहा था, “आज कार सेवा का आखिरी दिन है। कारसेवक आज आखिरी बार कार सेवा करेंगे।”

जब लाल कृष्ण आडवाणी को पता चला कि केन्द्रीय बल फैजाबाद से अयोध्या आ रहा है तब उन्होंने जनता से राष्ट्रीय राजमार्ग रोकने को कहा। अभियोजन पक्ष का यह भी कहना है कि आडवाणी ने कल्याण सिंह को फोन पर कहा कि वे विवादित ढांचा पूर्ण रूप से गिराए जाने तक अपना त्यागपत्र न दें।

आडवाणी ने राम कथा अकुंज के मंच से चिल्लाकर कहा कि- “जो कार सेवक शहीद होने आए हैं, उन्हें शहीद होने दिया जाए।”

आडवाणी पर आरोप है कि उन्होंने यह भी कहा कि, “मंदिर बनाना है, मंदिर बनाकर जाएंगे। हिंदू राष्ट्र बनाएंगे।”

स्थानीय प्रशासन ने विवादित ढांचा गिराए जाने से रोकने का कोई प्रयास नहीं किया इसलिए अभियोजन के अनुसार तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट आरएन श्रीवास्तव और पुलिस अधीक्षक डीबी राय इस ‘षड्यंत्र’ में शामिल थे। हालांकि राय का निधन हो चुका है।

सीबीआई की मूल चार्जशीट के मुताबिक़ 1991 में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद कल्याण सिंह ने डॉ. मुरली मनोहर जोशी और अन्य नेताओं के साथ अयोध्या जाकर शपथ ली थी कि विवादित स्थान पर ही मंदिर का निर्माण होगा। उन्होंने नारा लगाया, “राम लला हम आए हैं, मंदिर यहीं बनाएंगे।”

केंद्र सरकार ने 195 कंपनी केन्द्रीय पैरा मिलिटरी फ़ोर्स कानून व्यवस्था में मदद के लिए भेजी, लेकिन भाजपा सरकार ने उसका उपयोग नहीं किया। पांच दिसंबर को उत्तर प्रदेश सरकार के प्रमुख सचिव गृह ने केन्द्रीय बल का प्रयोग करने का सुझाव दिया, लेकिन कल्याण सिंह इससे सहमत नहीं हुए।

कल्याण सिंह ने मस्जिद की सुरक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट में दिए गए आश्वासन का पालन नहीं किया, जबकि उन्होंने संविधान और देश के कानून की सुरक्षा की शपथ ली थी।

चार्जशीट के अनुसार कल्याण सिंह ने छह दिसंबर के बाद अपने बयानों में स्वीकार किया कि गोली न चलाने का आदेश उन्होंने ही जारी किया था और उसी वजह से प्रशासन का कोई अधिकारी दोषी नहीं माना जाएगा।

चार्जशीट के अनुसार अशोक सिंघल 20 नवंबर, 1992 को बाल ठाकरे से मिले और उन्हें कार सेवा में भाग लेने का निमंत्रण दिया। इसके बाद चार दिसंबर, 1992 को बाल ठाकरे ने शिव सैनिकों को अयोध्या जाने का आदेश दिया।

शिव सेना नेता जय भान सिंह पवैया ने अशोक सिंघल से चंबल घाटी में प्रशिक्षित मौत दस्ता तैनात करने के लिए कहा। अशोक सिंघल ने यह भी कहा था कि छह दिसंबर की कार सेवा में मस्जिद के ऊपर मीर बाक़ी का शिलालेख हटाया जाएगा, क्योंकि यही अकेला चिन्ह मस्जिद के संबंध में है।

दूसरे दिन पांच दिसंबर को अशोक सिंघल ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा था- “जो भी मंदिर निर्माण में बाधा आएगी उसको हम दूर कर देंगे। कार सेवा केवल भजन कीर्तन के लिए नहीं है बल्कि मंदिर के निर्माण कार्य को प्रारम्भ करने के लिए है।”

चार्जशीट में अशोक सिंघल पर आरोप है कि वो छह दिसंबर को राम कथा कुंज पर बने मंच से अन्य अभियुक्तों के साथ- साथ कारसेवकों से नारा लगवा रहे थे कि- “राम लला हम आए हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे। एक धक्का और दो बाबरी मस्जिद तोड़ दो।”

जब बाबरी मस्जिद ढहाई जा रही थी तो अभियुक्त हर्षित थे और मंच पर उपस्थित लोगों के साथ उत्साहित होकर मिठाई बांटी जा रही थी। अभियुक्तों के भाषण से उत्तेजित होकर पहले बाबरी मस्जिद ढहाई गई और उसी दिन अयोध्या में स्थित मुसलमानों के घरों को तोड़ा गया, जलाया गया, मस्जिदें और कब्रें तोड़ी गईं। इससे मुसलमानों में भय उत्पन्न हुआ और वे अयोध्या छोड़ जाने को बाध्य हुए।

चार्जशीट के अनुसार 14 नवंबर, 1992 को विनय कटियार ने अयोध्या में कहा कि बजरंग दल का आत्मघाती दस्ता कार सेवा करने को तैयार है, और छह दिसंबर को मौत दस्ता शिवाजी की रणनीति अपनाएगा।

मस्जिद गिरने से एक दिन पूर्व पांच दिसंबर को अयोध्या में विनय कटियार के घर पर एक गोपनीय बैठक हुई, जिसमें आडवाणी के अलावा शिव सेना नेता पवन पांडेय मौजूद थे। इसी बैठक में विवादित ढांचे को गिराने का अंतिम निर्णय लिया गया।

चार्जशीट के अनुसार कटियार ने छह दिसंबर को अपने भाषण में कहा था,- “हमारे बजरंगियों का उत्साह समुद्री तूफान से भी आगे बढ़ चुका है, जो एक नहीं तमाम बाबरी मस्जिदों को ध्वस्त कर देगा।”

मुरली मनोहर जोशी छह दिसंबर को विवादित परिसर में मौजूद थे। चार्जशीट के अनुसार मस्जिद का गुम्बद गिरने पर उमा भारती, आडवाणी और डॉ. जोशी के गले मिल रही थीं।

मुरली मनोहर जोशी के बारे में अभियोजन पक्ष की ओर से कहा गया है कि वे और आडवाणी कार सेवा अभियान के लिए मथुरा और काशी होते हुए दिल्ली से अयोध्या के लिए चले।

इन सभी पर आरोप है कि 28 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट से प्रतीकात्मक कार सेवा का निर्णय हो जाने के बाद भी इन लोगों ने पूरे प्रदेश में सांप्रदायिकता से ओतप्रोत भाषण दिए। इन उत्तेजनात्मक भाषणों से धर्मनिरपेक्ष भारत में सांप्रदायिक जहर घोला गया।

क्या मंदिर फैसले का असर इस केस पर होगा

पिछले साल अयोध्या में विवादित भूमि पर राम मंदिर के हक़ में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के मामलों की जांच करने वाले जस्टिस मनमोहन लिब्रहान आयोग ने बीबीसी से एक इंटरव्यू में ये पूछे जाने पर कि क्या इसका असर बाबरी मस्जिद ढहाए जाने और इससे जुड़े आपराधिक साज़िश के मामले पर भी हो सकता है, उन्होंने कहा था,-“मेरा मानना है कि इस फ़ैसले का असर उस मामले पर भी हो सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं है।”

क्या सुप्रीम कोर्ट में आज आए फ़ैसले के आधार पर बाबरी मस्जिद के ध्वंस को सही ठहराए जाने का तर्क भी दिया जा सकता है, के जवाब में जस्टिस लिब्रहान ने कहा था,- “अदालत में ये तर्क भी दिया जा सकता है।”

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on September 30, 2020 9:13 am

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