Monday, October 25, 2021

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गांधी को कौन मार सकता है!

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देश को ब्रिटिश हुकूमत के पंजों से आज़ाद कराने के लिये सत्याग्रह, अहिंसा और असहयोग पर आधारित जनांदोलन की शुरुआत करने वाले महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती पर देश ही नहीं पूरा विश्व उन्हें याद कर रहा है। अंग्रेजी सत्ता की सैन्य और प्रशासनिक ताक़त के सामने घुटने टेकने की बजाय गांधीजी ने जिस कूटनीति से देशवासियों को बिना हिंसा के आततायियों के सामने सीना तान कर खड़ा होना सिखाया वो आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है। यहां तक कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ़ हिंसक संघर्ष कर रहे क्रांतिकारियों ने भी समय समय पर उन्हें अभूतपूर्व सम्मान दिया। ग़ुलामी की जंजीरों में जकड़े भारतीय समाज को उनके इस अनूठे प्रयोग ने नया आत्मबल दिया। इसकी सबसे बड़ी वजह थी उनकी कथनी और करनी में फ़र्क न होना। दुर्भाग्य है कि आज़ादी के बाद धीरे-धीरे देश के नेताओं में ये फ़र्क बढ़ता ही गया है।

गांधी जी ने सबसे पहले देशवासियों का भरोसा जीता, जीवन पर्यंत उसे निभाया और उसकी क़ीमत भी अपनी जान देकर चुकाई। दक्षिण अफ्रीका से बैरिस्टर के तौर पर लौटे मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा और बापू उन्होंने खुद नहीं बनाया। मीडिया विहीन और साधनहीनता के उस दौर में उनके सिद्धान्तों को अपने जीवन में उतार कर देश के कई सपूतों ने आम लोगों के बीच गांधी को जीवंत किया। ये वही लोग थे जिन्होंने आज़ादी के आंदोलन की गांधीवादी धारा का देश के सुदूरवर्ती दुर्गम क्षेत्रों में प्रचार किया और बड़ी संख्या में लोगों को उनके विचारों से जोड़ा। बापू को याद करते समय हमें ऐसे लोगों का भी तनिक स्मरण करना चाहिए जिन्होंने गांधी की आंधी को उस वक़्त घर घर तक पहुंचाया जब आज की तरह न तो व्यक्ति केंद्रित प्रचार था और न ही एक सभा को पचास सभाओं में बदल देने का तकनीकी मंत्र। बस कुछ था तो आज़ाद होने का जज़्बा।

जिस वक़्त गांधी जी के इर्द-गिर्द रह कर कई नेता खुद को आंदोलन के केंद्र में रखने की जद्दोजहद कर रहे थे उसी वक़्त भारत के कई सपूतों ने खुद को ख़ुशी ख़ुशी आज़ादी के आंदोलन की नींव का पत्थर बनने की राह पर झोंक दिया। इतिहास के पन्ने में सत्ताओं के हाथों हाशिये पर फेंके गये ऐसे ही एक गांधीवादी सपूत का आज फिर ज़िक्र करना चाहता हूं। बहुत कम लोग जानते हैं या शायद जानते ही नहीं कि उत्तराखंड (आज के) में गांधीवादी आंदोलन का बिगुल बजाने वाले पहले स्वाधीनता सेनानी थे स्वर्गीय प्रयागदत्त पंत। इतिहास के जानकार और प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेने वालों के लिये वो एक ऐसा उत्तर हैं जिनकी उपेक्षा का प्रश्न खुद आज तक अनुत्तरित है। देश की आज़ादी के आंदोलन में कूदने से पहले प्रयागदत्त पंत इलाहाबाद में स्नातक की पढ़ाई कर रहे थे। ये वो दौर था जब इलाहाबाद स्वाधीनता आंदोलन का बड़ा केंद्र था।

गांधीजी के विचारों से प्रेरित प्रयागदत्त पंत बहुत प्रतिभाशाली छात्र थे और उन्हें नजदीक से जानने वालों से सुना है कि गणित के कठिन से कठिन प्रश्नों को वो चुटकी में सुलझा लेते थे। ऐसे वक़्त में जब गोविंद बल्लभ पंत, हरगोविंद पंत जैसे युवा आंदोलन की मुख्यधारा में शामिल होकर अपना सियासी कद बढ़ा रहे थे तब इस सपूत ने गांधीवादी विचारधारा की अलख जगाने के लिये सुदूर पहाड़ का रुख किया। क्या उनका ये फैसला ही उन्हें इस तरह इतिहास के हाशिये पर धकेलने का सबब बना या फिर इसके पीछे क्षेत्रीय औपनिवेशिकता की एक राजनीतिक और बौद्धिक मानसिकता काम कर रही थी? प्रयागदत्त पंत के जीवन की इस गुत्थी को हल करने के लिये विशेष शोध की ज़रूरत है।

स्व. प्रयागदत्त पन्त का जन्म स्थान पिथौरागढ़ ही उनकी कर्मभूमि भी बना। तब के अल्मोड़ा जनपद की एक सीमांत तहसील जो आज़ादी के बाद जनपद बना। बीडी पांडे ने कुमाऊं का इतिहास नाम की अपनी प्रसिद्ध और प्रामाणिक पुस्तक में प्रयाग दत्त पंत का पिथौरागढ़ जनपद के पहले स्वतंत्रता सेनानी के रूप में ज़िक्र किया है। आज़ादी की लड़ाई में पं. गोविंद बल्लभ पंत, पं हरगोविंद पंत और बीडी पांडे के समकक्ष रहे प्रयागदत्त पंत को इस क्षेत्र में गांधीवादी आंदोलन का सूत्रधार माना जाता है। उन्होंने इलाहाबाद में बीए की डिग्री स्वर्ण पदक के साथ हासिल की और जनपद का पहला स्नातक होने का गौरव भी हासिल किया। गांधीजी के असहयोग आंदोलन के संदेश को अपने ओजस्वी विचारों के ज़रिये कुमाऊं के दूरदराज इलाकों के पिछड़े इलाकों में फैलाने वाले प्रयागदत्त पंत 1921 में बागेश्वर में आयोजित कुली-बेगार उन्मूलन आंदोलन में पिथौरागढ़ का प्रतिनिधित्व करने वाले एकमात्र व्यक्ति थे।

दुर्भाग्य से वो जिस आज़ादी के लिये लड़े उसका सूरज नहीं देख पाये और 1940 में उनकी मृत्यु हो गयी। इसके बाद तो जैसे सरकारों के साथ-साथ इस क्षेत्र के गांधीवादियों ने भी अपने सेनानायक को बिसरा दिया। गांधीवादी तरीके से ऐसे ही एक स्वत: स्फूर्त जनांदोलन और शहादतों के बाद अलग राज्य बनने के बावजूद उत्तराखंड के नेताओं, इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों की जुबान से उनका नाम आपको शायद ही कभी सुनाई दे। जातीय और क्षेत्रीय सीमाओं में बंधी उनकी दृष्टि भला ऐसे सेनानी को क्यों देखना चाहेगी जिसके पास न तो कोई राजनीतिक विरासत है और न ही उनसे किसी तरह का लाभ हासिल हो सकता है। आज गांधी जयंती के दिन प्रयागदत्त पंत और उनके जैसे कई ग़ुमनाम गांधीवादी योद्धाओं को नमन करना तो बनता है.. नहीं।

गांधीजी का शरीर भले ही दशकों पहले ख़त्म हो चुका हो लेकिन उनके समर्पित अहिंसावादियों ने आज भी उनके विचारों को मरने नहीं दिया। हालांकि उनके नाम पर सत्ता में आए नेताओं ने उनके जीवन दर्शन से ज़्यादा दिलचस्पी उनकी तस्वीर से सजे कागज़ के टुकड़ों पर ही दिखायी। गांधीजी को उन्होंने भी कई बार मारा। गांधीजी ने ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ़ जिस तरह सत्य और अहिंसा के कूटनीतिक शस्त्र का इस्तेमाल किया उसके मुरीद तो बाहर से वो भी हैं जिनके तार बापू के हत्यारे से जोड़े जाते हैं। गांधीजी के सिद्धांतों और प्रयोगों को उनके अपनों ने छोड़ा तो ऐसी ही ताकतों ने लबादा बना कर पहन लिया है जिसकी आड़ में उन्हीं आदर्शों की जड़ों में मट्ठा डाला जा रहा है।

उन्हीं के तरीकों का इस्तेमाल कर उन्हें वैचारिक तौर पर मारने की कोशिश हो रही है। तकनीक और प्रचार माध्यमों के इस्तेमाल से एक ही व्यक्ति के कई कई पुतले तैयार किये जा रहे हैं। हाल के कुछ वर्षों में स्वच्छता और छुआछूत उन्मूलन जैसे गांधी दर्शन के कई नये प्रयोगों का अहसास देश ने बखूबी किया है। लेकिन कहते हैं न कि नकल के लिये अकल भी चाहिये। गांधी के आदर्शों पर सचाई के साथ चल पाना आसान नहीं है और जो उन पर चले उन्होंने देश के गौरवशाली इतिहास का निर्माण किया। आज भी कुछ लोग खुद को सबसे बड़ा गांधीभक्त दिखा कर एक इतिहास तो रच ही रहे हैं.. पाखंड का इतिहास। लेकिन इस देश का भविष्य कभी गांधीविहीन नहीं होगा। हो ही नहीं सकता।
(भूपेश पंत वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल देहरादून में रहते हैं।)

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