Wednesday, October 20, 2021

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किसान संसद बुलाने से किसका नुकसान?

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एक तरफ जहां किसान आंदोलन में शामिल किसान नेता, पत्रकारों और कलाकारों के पीछे केंद्र सरकार ने एनआईए को खुला छोड़ दिया है, वहीं दूसरी ओर कल रात कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर तोमर ने साफ कह दिया कि कृषि क़ानून वापस नहीं लेंगे किसानों के पास कोई और विकल्प हो तो लेकर आयें।

वहीं एक तीसरे स्तर पर संयुक्त किसान मोर्चा में दरार डालने की केंद्र सरकार की रणनीति भी अब फलती फूलती नजर आ रही है। दरअसल कल संयुक्त मोर्चा की मीटिंग में हरियाणा भाकियू के अध्यक्ष गुरनाम चढूनी पर आंदोलन को राजनीति का अड्डा बनाने, कांग्रेस समेत राज नेताओं को बुलाने और दिल्ली में सक्रिय हरियाणा के एक कांग्रेस नेता से आंदोलन के नाम पर करीब 10 करोड़ रुपए लेने के गंभीर आरोप लगे। आरोप था कि वह कांग्रेसी टिकट के बदले हरियाणा सरकार को गिराने की डील भी कर रहे हैं। चढू़नी ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है।

बैठक की अध्यक्षता कर रहे किसान नेता शिव कुमार कक्का ने बताया कि बैठक में मोर्चा के सदस्य उन्हें तुरंत मोर्चे से निकालना चाहते थे। लेकिन आरोपों की जांच के लिए 5 सदस्यों की कमेटी बनाई गई जो 20 जनवरी को रिपोर्ट देगी। उसी आधार पर फैसला लिया जाएगा।

बता दें कि संयुक्त किसान मोर्चा ने लगभग दो महीने लंबे आंदोलन में अब तक अपनी इस लड़ाई से विपक्षी राजनीतिक दलों व नेताओं को दूर रखा है। जबकि संयुक्त किसान मोर्चा के अहम सदस्य और भारतीय किसान यूनियन के नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी एक ओर जहां संयुक्त किसान मोर्चा की रविवार को हुई रणनीतिक बैठक से गायब रहे। वहीं वह कांस्टीट्यूशन क्लब में 23 जनवरी को ‘किसान संसद’ की रणनीति तैयार कर रहे थे। रविवार को कांस्टीट्यूशन क्लब के एनेक्सी हॉल में किसान संसद की तैयारी को लेकर पहली बैठक हुई। इसमें कांग्रेस, माकपा, इनेलो, एनसीपी, जनाअधिकार पार्टी, आप, अकाली दल आदि के कई नेताओं-प्रतिनिधियों ने शिरकत की। उम्मीद की जा रही है कि सपा, तृणमूल समेत कई और दल इस किसान संसद में शामिल होंगे। गुरनाम सिंह चढ़ूनी इस किसान, मजदूर, बेरोजगार, कर्जदार समर्थक जनप्रतिनिधि संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष हैं।

इससे पहले वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने किसान आंदोलन और कृषि क़ानूनों के मुद्दे पर जनता पार्लियामेंट बुलाया था जिसमें तममा विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था।

बता दें कि संयुक्त किसान मोर्चा की पूर्व घोषित रणनीति के तहत 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चंद बोस की जयंती पर उनकी याद में संयुक्त किसान मोर्चा ने देश में आजाद हिंद किसान फौज दिवस बनाने का एलान कर रखा है। खासतौर से बंगाल में इसे ऐतिहासिक बनाने की तैयारी है। दिल्ली-एनसीआर बॉर्डर के सभी आंदोलन स्थलों पर इस दिवस को यादगार बनाने तैयारी जारी है। वहीं 23-24 जनवरी को ही सिंघु बॉर्डर पर जन प्रतिनिधि संघर्ष मोर्चा की ओर से ‘किसान संसद’ की तैयारी शुरू कर दी गई है। जनप्रतिनिधि संघर्ष मोर्चा की दलील है कि इस किसान संसद की जरूरत इसलिए महसूस की गई ताकि कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन का जल्दी हल निकल सके। इस संसद में तमाम विपक्षी दलों को जुटाने का बीड़ा उठाया गया है। इस किसान संसद के आयोजक मंडल में जस्टिस गोपाल गौड़ा, जस्टिस कोलसे पाटिल, एडमिरल रामदास, अरुणा राय, पी साईंनाथ, यशवंत सिन्हा, मेधा पाटकर, संत गोपालदास, मोहम्मद अदीब, जगमोहन सिंह, सोमपाल शास्त्री, प्रशांत भूषण आदि के नाम शामिल हैं।

रविवार को जब भाकियू के गुरनाम सिंह चढूनी ने संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक से दूरी बनाकर किसान संसद की नई रणनीति बनाई तो सवाल खड़े होने लाजिमी हैं कि क्या यह संयुक्त किसान मोर्चा में बिखराव का संकेत है और सरकार अपने मकसद में कामयाब होती दिख रही है। इस बाबत खुद गुरनाम सिंह चढूनी का कहना है कि वे संयुक्त किसान मोर्चा से अलग नहीं हुए हैं। वह संघर्ष में साथ हैं।

वहीं कल संयुक्त किसान मोर्चा की प्रेस कांफ्रेंस के दौरान जब चढूनी के अलग किसान संसद आयोजन को लेकर पत्रकारों द्वारा सवाल किए गए, तो क्रांतिकारी किसान यूनियन के डॉ. दर्शनपाल ने सफाई दी कि यह प्रशांत भूषण की पहल है।

जब पत्रकारों की ओर से सवाल किया गया कि सियासी दलों से संयुक्त किसान मोर्चा अब तक दूरी बनाकर चलता रहा है और गुरनाम सिंह चढूनी संयुक्त किसान मोर्चा का अहम हिस्सा हैं तो उन पर क्या कोई कार्रवाई होगी? इस सवाल पर जवाब देते हुए सर्वहिंद राष्ट्रीय किसान महासंघ के शिवकुमार कक्का ने कहा कि चढ़ूनी से इस बाबत पूछा जाएगा, उसके बाद ही संयुक्त किसान मोर्चा फैसला लेगा। राजनीतिक दलों से नाता नहीं होने का दावा जरूर किया जा रहा है, लेकिन संकेत तो यह भी हैं कि यदि किसान संसद के बहाने विपक्षी दलों-संयुक्त मोर्चा का यह कॉकटेल देशव्यापी असरदार हुआ तो चढूनी की तरह एक-एक कर किसान संगठन इसमें भागीदारी बढ़ाते जाएंगे।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।) 

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