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सुप्रीम कोर्ट पर सरकार को भरोसा है लेकिन किसानों को नहीं, आखिर क्यों?

बेशक भारतीय संविधान ने सुप्रीम कोर्ट को सरकार के बनाए किसी भी कानून की संवैधानिकता परखने का अधिकार दिया है। इस अधिकार के तहत वह तीनों विवादास्पद कृषि कानूनों को भी संविधान की कसौटी पर कस सकता है। उसे ऐसा करना भी चाहिए। मगर किसी भी कानून की व्यावहारिकता और आवश्यकता सुप्रीम कोर्ट तय नहीं कर सकता। यह मसला तो कानून बनाने वाली सरकार और कानून से प्रभावित होने वाले लोगों के बीच ही तय हो सकता है। लेकिन कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे किसानों से बहुमत के नशे में चूर सरकार कह रही है कि अगर आपको हमारे बनाए कानून मान्य नहीं हैं तो आप सुप्रीम कोर्ट चले जाइए।

भारत के संविधान ने कानून बनाने की जिम्मेदारी संसद को दी है, न कि न्यायपालिका को। तीनों विवादास्पद कृषि कानून भी सुप्रीम कोर्ट ने नहीं, संसद ने बनाए हैं और किस तरह नियम-कायदों और मान्य परंपराओं को नजरअंदाज कर बनाए हैं, उसे पूरे देश ने देखा है। लेकिन अब सरकार अपनी जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट की तरफ धकेल रही है। सवाल है कि संसद सार्वभौम है या सुप्रीम कोर्ट? क्या संसद और निर्वाचित सरकार से ज्यादा शक्ति सुप्रीम कोर्ट के पास है? दुनिया के लोकतांत्रिक इतिहास में शायद यह पहला मौका है जब कोई निर्वाचित सरकार जनता की मांगों और तकलीफों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने के बजाय कह रही है कि आपको हमारा कोई फैसला मंजूर नहीं है तो आप कोर्ट चले जाइए।

किसान अपनी मांगों को लेकर पिछले डेढ़ महीने से देश की राजधानी को घेर कर बैठे हैं। इस दौरान हड्डियां गला देने वाली शीतलहर और भीषण बारिश का सामना करते हुए जारी इस आंदोलन में शामिल करीब 70 किसानों की मौत हो चुकी है, लेकिन किसानों की हमदर्द होने का दावा करने वाली सरकार पर इसका कोई असर नहीं हो रहा है। आठ जनवरी को आठवें दौर की बेनतीजा बातचीत के बाद सरकार का किसानों को सुप्रीम कोर्ट जाने का सुझाव यह भी बताता है कि सरकार ने किसानों से अब तक जो भी बातचीत की है, वह महज नाटक था। हकीकत तो यह है कि किसानों की चिंता से उपजी मांगों पर वह सोचना ही नहीं चाहती है। इसीलिए उसने बड़ी ढिठाई से किसानों को कह दिया है कि आप सुप्रीम कोर्ट चले जाइए। जाहिर है कि सरकार इस बात को लेकर आश्वस्त है कि इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट भी उसकी ही तरफदारी करेगा यानी कानूनों को जायज और जरूरी ठहराएगा।

दूसरी ओर तीनों कानूनों को अपने लिए डेथ वारंट मान रहे किसानों ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वे न तो सुप्रीम कोर्ट जाएंगे, न ही इस मसले पर पहले जारी अदालती कार्यवाही का हिस्सा बनेंगे। वो जिस तरह राजनीतिक दलों से दूरी बनाए रखे हुए हैं, वैसे ही वे अदालती झंझट से भी आंदोलन को दूर रखना चाहते हैं। उन्होंने कहा है वे अपना आंदोलन जारी रखेंगे और उनका संकल्प है- ‘मरेंगे या जीतेंगे।’ इस संकल्प के गहरे मायने हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट की निष्पक्षता पर किसानों ने औपचारिक तौर पर कोई सवाल नहीं उठाया है, लेकिन इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट न जाने का उनका फैसला निश्चित ही इस आशंका से प्रेरित है कि वहां उनके साथ इंसाफ नहीं होगा।

सवाल है कि आखिर सरकार किस आधार पर आश्वस्त होकर किसानों को सुप्रीम कोर्ट जाने की सलाह दे रही है और किसान क्यों अदालती कार्यवाही का हिस्सा बनने से इंकार कर रहे हैं? दरअसल, पिछले दो-तीन वर्षों के दौरान तमाम महत्वपूर्ण मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसले आश्चर्यजनक रूप से सरकार के मनमाफिक आए हैं। इस सिलसिले में राम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद विवाद, तीन तलाक, रॉफेल विमान सौदा, इलेक्टोरल बॉन्ड, पीएम केयर्स फंड, नए संसद भवन और सेंट्रल विस्टा जैसे मामले उल्लेखनीय हैं। कई मामले ऐसे भी हैं, जिन्हें सरकार लटकाए रखना चाहती है, उन पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई तक शुरू नहीं की है। यही नहीं, कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान घर लौट रहे प्रवासी मजदूरों के मामले भी सरकार ने अपने बचाव में जो कुछ गलत बयानी की उसे सुप्रीम कोर्ट ने मान लिया था।

इस सबके अलावा गृह मंत्री अमित शाह के उस बहुचर्चित बयान को भी लोग भूले नहीं हैं, जिसमें उन्होंने समूची न्यायपालिका को नसीहत देते हुए कहा था कि अदालतें फैसले ऐसे दें, जिनका कि लोग पालन कर सकें या सरकार उन फैसलों को लागू कर सके। अमित शाह ने यह बयान 2018 में सबरीमाला मंदिर से संबंधित सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने पर दिया था। इन्हीं सब मामलों के चलते सुप्रीम कोर्ट की साख को बट्टा लगा है और उसके प्रति आम आदमी का भरोसा कम हुआ है।

किसान आंदोलन को लेकर भी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसी टिप्पणी की है, जिसकी वजह से किसानों को आशंका है कि सुप्रीम कोर्ट से उन्हें इंसाफ नहीं मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट ने किसान आंदोलन को लेकर यह टिप्पणी तब्लीगी जमात के खिलाफ एक याचिका की सुनवाई करते हुए की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कोरोना काल में दिल्ली में हुए तब्लीगी जमात के आयोजन से देश में कोरोना संक्रमण फैला, लेकिन कार्यक्रम के आयोजक निजामुद्दीन मरकज के मौलाना साद को दिल्ली पुलिस आज तक गिरफ्तार नहीं कर पाई।

इस याचिका की सुनवाई करते हुए प्रधान न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे की अगुवाई वाली पीठ ने सरकार से सवाल किया कि क्या किसान आंदोलन वाली जगहों पर कोरोना संक्रमण से संबंधित स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशा-निर्देशों का पालन किया जा रहा है? उसने सरकार से यह भी पूछा है कि उसने निजामुद्दीन स्थित तब्लीगी जमात के मरकज वाले मामले से क्या सबक लिया है? इन सवालों के साथ ही अदालत ने कहा है कि कहीं किसान आंदोलन भी तब्लीगी जमात के कार्यक्रम जैसा न बन जाए, क्योंकि कोरोना फैलने का डर तो किसान आंदोलन वाली जगहों पर भी है। केंद्र सरकार से सवाल पूछने के अंदाज में की गई यह टिप्पणी चौंकाती भी है और चिंता भी पैदा करती है।

किसानों का आंदोलन पिछले डेढ़ महीने से जारी है। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट में किसान आंदोलन और कृषि कानूनों के खिलाफ दायर की गई याचिकाओं पर भी सुनवाई जारी है, लेकिन अभी तक की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक बार भी किसान आंदोलन के संदर्भ में कोरोना संक्रमण का कोई जिक्र नहीं किया। लेकिन अब जबकि सरकार और किसानों के बीच बातचीत से मसले का हल नहीं निकल रहा है, आंदोलन को कमजोर करने और किसान संगठनों में फूट डालने की तमाम सरकारी कोशिशें भी नाकाम हो चुकी हैं और किसानों ने अपना आंदोलन तेज और व्यापक करने का इरादा जता दिया है तो सुप्रीम कोर्ट को कोरोना की याद आना हैरान करता है। यही नहीं, उसका इस संदर्भ में तब्लीगी जमात का हवाला देना भी सरासर अनुचित है, क्योंकि तब्लीगी जमात पर कोरोना फैलाने के आरोप और उसके खिलाफ सरकारी, राजनीतिक और मीडिया के स्तर पर किए गए दुष्प्रचार को भी देश की कई अदालतें पहले ही खारिज कर चुकी हैं।

यहां यह भी गौरतलब है कि कोरोना महामारी की आड़ में तब्लीगी जमात के बहाने एक समुदाय विशेष को निशाना बनाने के अभियान में मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भी बढ़-चढ़ कर शिरकत कर रहा था। तमाम टीवी चैनलों पर प्रायोजित रूप से तब्लीगी जमात के बहाने पूरे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ मीडिया ट्रायल किया जा रहा था। मीडिया को इस तरह सांप्रदायिक नफरत फैलाने से रोकने के लिए जब एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थी तो प्रधान न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने ही मीडिया की आजादी की दुहाई देते हुए उस याचिका को खारिज कर दिया था।

बहरहाल, कहा जा सकता है कि आंदोलन स्थल पर कोरोना फैलने की चिंता जता कर सुप्रीम कोर्ट ने एक तरह से सरकार को किसानों के आंदोलन से निबटने का रास्ता सुझाया है। यह चिंता परोक्ष रूप से किसानों को चेतावनी भी है कि अगर उन्होंने आगे आंदोलन जारी रखा तो जैसा उत्पीड़न तब्लीगी जमात वालों का हुआ था और जिस तरह उन्हें बदनाम किया गया था, वैसा ही किसानों के साथ भी हो सकता है। वैसे भी सरकार के मंत्रियों, भाजपा नेताओं, पार्टी के आईटी सेल, सोशल मीडिया पर ट्रोल आर्मी और सरकार के ढिंढोरची की भूमिका निभाने वाले टीवी चैनलों की ओर से किसान आंदोलन को पहले दिन से ही तरह-तरह से बदनाम किया जा रहा है। खालिस्तान, पाकिस्तान, माओवाद, टुकड़े-टुकड़े गैंग की श्रृंखला में अब उनको सुप्रीम कोर्ट के ‘सौजन्य’ से तब्लीगी जमात का एक नया रेफरेंस मिल गया है।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी तब्लीगी जमात और आंदोलन कर रहे किसानों का अपमान है। यही नहीं, इस टिप्पणी से देश की उस न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवालिया निशान लगता है, जिसमें आई तमाम विकृतियों के बावजदू लोगों का भरोसा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। यही वजह है कि किसान अपनी मांगों को लेकर अदालती कार्रवाई का हिस्सा बनने से इंकार कर रहे हैं।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on January 11, 2021 10:10 am

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