सुप्रीमकोर्ट कोलेजियम ने क्यों नहीं भेजी जस्टिस कुरैशी के नाम की सिफारिश

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उच्चतम न्यायालय के कोलेजियम ने अंततः 22 महीने बाद उच्चतम न्यायालय में 9 नई नियुक्तियों की सिफारिश सरकार को भेजी है, जिसमें त्रिपुरा के चीफ जस्टिस अकील कुरैशी का नाम नहीं हैं। दरअसल तत्कालीन चीफ जस्टिस एसए बोबडे के कार्यकाल से ही नामों के चयन में गतिरोध बना हुआ था क्योंकि इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, कोलेजियम के एक वरिष्ठ सदस्य जस्टिस नरीमन इस बात पर अड़े हुए थे कि जब तक अखिल भारतीय वरीयता सूची के सबसे वरिष्ठ दो जजों, कर्नाटक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अभय ओका और त्रिपुरा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अकील कुरैशी, के नामों की सिफ़ारिश नहीं की जाती, सुप्रीम कोर्ट कॉलिजियम में आम सहमति नहीं बन सकती। तो क्या अभी भी माना जाए कि उच्चतम न्यायालय सरकार के दबाव में है?

कोलेजियम ने 22 महीने बाद 9 नई नियुक्तियों की सिफारिश भेजी है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एनवी रमना ने मंगलवार को सरकार के पास यह नाम भेजे हैं। 9 नामों में से तीन नाम महिला न्यायाधीशों के हैं। तीन महिला न्यायाधीशों में से एक आने वाले समय में भारत की पहली महिला चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया भी बन सकती हैं। कॉलेजियम ने पहली बार तीन महिला न्यायाधीशों के नामों की सिफारिश की है। इसमें कर्नाटक हाईकोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना, तेलंगाना हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस हिमा कोहली और गुजरात हाईकोर्ट की जज जस्टिस बेला त्रिवेदी के नाम सरकार को भेजे गए हैं। इसमें जज जस्टिस नागरत्ना भारत की पहली महिला सीजेआई बन सकती हैं। नागरत्ना साल 2027 में सीजेआई बन सकती हैं।

उच्चतम न्यायालय में फिलहाल एक महिला जज जस्टिस इंदिरा बनर्जी हैं। वह सितंबर 2022 में सेवानिवृत्त होने वाली हैं। उच्चतम न्यायालय में अब तक केवल आठ महिला न्यायाधीशों की नियुक्ति हुई है।

जस्टिस रोहिंटन नरीमन के सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के कुछ ही दिनों बाद यह सिफारिशें की गई हैं। जज जस्टिस नरीमन साल 2019 से कॉलेजियम के सदस्य थे। जस्टिस नरीमन, कर्नाटक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अभय ओका और त्रिपुरा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अकील कुरैशी की सिफारिश पहले करने की बात पर अड़े हुए थे, जिसके चलते कोलेजियम से नाम भेजे नहीं जा रहे थे।

कर्नाटक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ओका के साथ ही गुजरात हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस विक्रम नाथ और सिक्किम हाईकोर्ट के जस्टिस जे के माहेश्वरी के भी नामों की सिफारिश की गई है। वहीं बार से कोलेजियम ने पूर्व अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पीएस नरसिम्हा का नाम दिया है। वहीं हिन्दुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार केरल हाईकोर्ट के जज जस्टिस सीटी रविकुमार, जज जस्टिस एमएम सुंदरेश के नाम की सिफारिश भी की गई है।

उच्चतम न्यायालय में 34 जजों का पद है, लेकिन इसमें 25 जज ही हैं। जस्टिस नवीन सिन्हा के 19 अगस्त को रिटायर होने के बाद उच्चतम न्यायालय में जजों के खाली पदों की संख्या 10 हो जाएगी। उच्चतम न्यायालय में जज की अंतिम नियुक्ति सितंबर 2019 में हुई थी। नवंबर 2019 में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई रिटायर हुए थे, लेकिन किसी की नियुक्ति नहीं की गई।

कोलेजियम में सीजेआई रमना के अलावा जज जस्टिस यूयू ललित, जज जस्टिस ए एम खानविलकर, जज जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जज जस्टिस एल नागेश्वर राव शामिल हैं।

तत्कालीन चीफ जस्टिस एस ए बोबडे के कार्यकाल में कोलेजियम में जस्टिस अकील कुरैशी की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति को लेकर सहमति नहीं बन पायी थी। हालांकि, इसके पहले भी जस्टिस कुरैशी के नाम को लेकर बात तय होने में मुश्किलें आयी थीं। गुजरात हाईकोर्ट के जज रहे जस्टिस कुरैशी की त्रिपुरा के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर नियुक्ति के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम के लिए विवाद की स्थिति बनी थी, पहले उन्हें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के लिए मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था लेकिन सरकार की आपत्तियों के बाद उन्हें त्रिपुरा भेजा गया। तब कोलेजियम का नेतृत्व पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई कर रहे थे।

 उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने आउटलुक से बातचीत में कहा था कि इसमें अब शक की गुंजाइश भी नहीं बची कि कॉलेजियम सिस्टम कोलैप्स कर गया है। सरकार जिस भी जज को चाहती है, कॉलेजियम पर दबाव डालकर फौरन उसका नाम रेकमेंड करवा लेती है और अगले ही दिन राष्ट्रपति की मंजूरी मिल जाती है। राजस्थान हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नंद्राजोग और दिल्ली हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र मेनन बेहद ईमानदार और निष्पक्ष जज थे । दोनों का नाम जब कॉलेजियम से रेकमेंड हुआ तो मेरे ख्याल से जानबूझकर फाइल उस दिन नहीं भेजी गई। जब तक न्यायाधीश मदन बी. लोकुर रिटायर नहीं हुए, उसे दबाकर रखा गया। उसके बाद लीक होने और नई सूचनाओं के बहाने उनके नाम वापस ले लिए गए। ऐसी बात है तो दो अहम हाइकोर्ट में उन्हें चीफ जस्टिस क्यों बनाए रखा गया था। लेकिन कॉलेजियम जानता है कि कोई सबूत नहीं था। राजनैतिक दबाव में कॉलेजियम व्यवस्था ध्वस्त हो गई है। कॉलेजियम और स्वतंत्र जजों पर पहला हमला जस्टिस जयंत पटेल का कर्नाटक से ट्रांसफर था। दूसरा हमला जस्टिस अकील कुरैशी को गुजरात से बॉम्बे ट्रांसफर करना था। तीसरा हमला दो जजों के नामों की दुर्भाग्यपूर्ण वापसी थी। इसके लिए चीफ जस्टिस और कॉलेजियम के सभी जज जिम्मेदार हैं। उन्हें देश को जवाब देना चाहिए।

इसके पहले उच्चतम न्यायालय ने देशभर के हाईकोर्ट में जजों के खाली पड़े पदों को लेकर नाराजगी जताते हुए केंद्र सरकार को फटकार लगाई थी । उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जजों की नियुक्ति नहीं करके केंद्र ने लोकतंत्र के तीसरे स्तंभ (न्यायपालिका) को ठप कर दिया है, अगर यही रवैया जारी रहा तो प्रशासनिक कामकाज भी बाधित हो जाएगा।

जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस हृषिकेश रॉय की पीठ ने कहा, सरकारी अथॉरिटी को यह समझना चाहिए कि इस तरह से काम नहीं चलेगा। आपने हद पार कर दी है। अगर आप न्यायिक व्यवस्था को ठप करना चाहते हैं तो आपकी व्यवस्था भी चौपट हो जाएगी। आप लोकतंत्र के तीसरे स्तंभ को रुकने नहीं दे सकते।

पीठ ने हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति मामले में सरकार के अड़ियल रवैये पर सख्त नाराजगी दिखाई। कहा, कॉलेजियम द्वारा की गई सिफारिशों के बावजूद नियुक्ति नहीं हो रही है, जबकि न्यायिक आदेश के जरिये इसके लिए समय सीमा भी तय की गई है। पीठ ने कहा, सरकार यह तर्क नहीं दे सकती कि कोई जज मामले की शीघ्रता से सुनवाई करने में सक्षम नहीं है, क्योंकि सरकार हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति नहीं करती है।

ताजा आंकड़ों के मुताबिक, देश भर के 25 हाईकोर्ट में न्यायाधीशों के कुल 455 पद रिक्त हैं, जबकि कुल स्वीकृत पदों की संख्या 1098 है। यानी करीब 40 फीसदी पद रिक्त हैं। दिल्ली, इलाहाबाद, कलकत्ता, मध्यप्रदेश, पटना हाईकोर्ट की स्थिति बेहद खराब है।

इस बीच कानून मंत्रालय ने संसद में दिए लिखित जवाब में माना है कि देश के हाई कोर्टस में भी जजों की भारी कमी है। पिछले एक साल में 80 जजों की नियुक्ति की सिफारिश की गई लेकिन सिर्फ 45 नियुक्ति हो पाए। कई हाईकोर्ट में जजों के 50 फीसदी तक पद खाली हैं। कानून मंत्री के बयान के मुताबिक, देश के हाई कोर्ट्स में जजों के 1098 पद हैं। लेकिन फिलहाल 645 जज ही सेवारत हैं। यानी 453 पद खाली पड़े हैं।

सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, सबसे ज्यादा इलाहाबाद हाई कोर्ट में 66 जजों के पद खाली हैं, जबकि पिछले साल सिर्फ 4 जजों की नियुक्ति हुई। इसके अलावा कलकत्ता हाई कोर्ट में 41, पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में 39, पटना हाई कोर्ट में 34, बॉम्बे हाई कोर्ट में 31, दिल्ली हाई कोर्ट में 30, तेलंगाना हाई कोर्ट में 28, राजस्थान हाई कोर्ट में 27, मध्य प्रदेश और गुजरात हाई कोर्ट में 24-24 जजों के पद खाली हैं।

इसी तरह देश के सभी राज्यों की निचली अदालतों में जजों के 5,132 पद रिक्त हैं। इसमें सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में 1,053, बिहार में 533, मध्य प्रदेश में 435, गुजरात में 385 और हरियाणा में 284 पद खाली हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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