विश्व प्रसिद्ध नीलामी घर सोथबी ने बुद्ध से जुड़े प्राचीन रत्न भारत को लौटा दिए हैं। भारत सरकार ने नीलामी घर को तब से आरोपों के कठघरे में खड़ा कर रखा था, जब इन अवशेषों की नीलामी की योजना बनाई गई थी। पीएम मोदी ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, कि हर भारतीय को इस बात पर गर्व होगा कि भगवान बुद्ध के पवित्र पिपरहवा अवशेष 127 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद स्वदेश लौट आए हैं। ये पवित्र अवशेष भगवान बुद्ध और उनकी महान शिक्षाओं के साथ भारत के घनिष्ठ जुड़ाव को दर्शाते हैं। उन्होंने आगे कहा, कि यह हमारी गौरवशाली संस्कृति के विभिन्न पहलुओं के संरक्षण और सुरक्षा के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है।
इस संग्रह की खोज मूलतः ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारी और शौकिया पुरातत्वविद् विलियम क्लैक्सटन पेप्पे ने नेपाल से सटे पूर्वी उत्तर प्रदेश में बस्ती जिले के नौगढ़ तहसील और वर्तमान समय में सिद्धार्थनगर जिले के पिपराहवा नामक गाँव में एक प्राचीन टीलेनुमा स्थल पर की थी। ब्रिटिश राज ने 1878 के भारतीय खजाना अधिनियम के तहत पेप्पे परिवार की खोज को अपने क़ब्जे में ले लिया, लेकिन परिवार को 1,800 रत्नों में से पाँचवाँ हिस्सा अपने पास रखने की अनुमति दी गई। वहीं मुकुट के रत्न कोलकाता के भारतीय संग्रहालय में चले गए। परिवार ने अपनी कलाकृतियाँ सोथबी को सौंप दीं। जहाँ मई के आरंभ में उन्हें हांगकांग में नीलामी के लिए रखा जाना था।
संग्रह में मौजूद हड्डियाँ और राख सियाम (वर्तमान थाईलैंड) के बौद्ध सम्राट राजा चुलालोंगकोर्न को उपहार स्वरूप दी गई थीं। भारत सरकार द्वारा रत्नों को वापस लौटाने की माँग करने तथा कानूनी कार्रवाई की धमकी देने के बाद बिक्री को रद्द कर दिया गया। सरकार ने कहा था कि अवशेषों को बुद्ध के पवित्र शरीर के रूप में माना जाना चाहिए।” यह नीलामी अब भी औपनिवेशिक शोषण में शामिल होने जैसा होगा।

इन रत्नों की नीलामी 100 मिलियन हांगकांग डॉलर (9.7 मिलियन पाउंड) की शुरुआती बोली के साथ होनी थी, इनमें हड्डियों के टुकड़े, क्रिस्टल और सोपस्टोन के अवशेष, सोने के आभूषण और गार्नेट, मोती, मूंगा और नीलम जैसे बहुमूल्य पत्थर शामिल थे। रत्नों की नीलामी की घोषणा के बाद भारत के संस्कृति मंत्रालय ने सोथबी पर निरंतर औपनिवेशिक शोषण में भाग लेने का आरोप लगाया और कहा, कि अवशेषों को पुरातात्विक नमूनों के रूप में नहीं, बल्कि बुद्ध के “पवित्र शरीर” के रूप में माना जाना चाहिए, जो धार्मिक सम्मान के योग्य हैं।
मंत्रालय के कानूनी नोटिस में कहा गया है,कि “ये अवशेष- जिन्हें ‘डुप्लीकेट रत्न’ कहा गया है- भारत और वैश्विक बौद्ध समुदाय की अविभाज्य धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत हैं। उनकी बिक्री भारतीय और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र सम्मेलनों का भी उल्लंघन करती है।” विलियम क्लैक्सटन पेप्पे के वंशज क्रिस पेप्पे ने नीलामी का बचाव करते हुए तर्क दिया कि यह बौद्धों को अवशेष हस्तांतरित करने का सबसे उचित और पारदर्शी तरीका था। उन्होंने कहा, कि “ये रत्न भौतिक अवशेष नहीं थे, बल्कि बाद के काल के चढ़ावे थे तथा उनका स्वामित्व कानूनी रूप से निर्विवाद था।” सोथबी की वेबसाइट पर एक पोस्ट में श्री पेप्पे ने कहा कि “उन्हें और उनके दो चचेरे भाइयों को 2013 में ये अवशेष विरासत में मिले थे और उन्होंने उनके ऐतिहासिक संदर्भ में शोध शुरू किया।”
वास्तव में बुद्ध से जुड़े पवित्र अवशेषों को भारत लाने में एक कॉरपोरेट घराने गोदरेज इंडस्ट्रीज की बड़ी भूमिका है, जिसने लाखों डॉलर ख़र्च करके पेप्पे परिवार से ये अमूल्य धरोहर खरीद ली। तकनीकी रूप से देखा जाए तो यह औद्योगिक घराना ही इसका मालिक है, शक्ति भारत सरकार। इस इंडस्ट्री के कार्यकारी उपाध्यक्ष फिरोजशाह गोदरेज ने कहा, “इस ऐतिहासिक क्षण में योगदान देकर हम गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। पिपरहवा रत्न केवल कलाकृतियाँ नहीं हैं,वे शान्ति, करुणा और मानवता के साझी विरासत के शाश्वत प्रतीक हैं। भारत सरकार के साथ साझेदारी भावी पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।”
इस सारे प्रकरण में एक गौर करने वाली बात है, जिस पर लोग कम ध्यान देते हैं, कि वापस लाई गई ये कलाकृतियाँ अब गोदरेज इंडस्ट्रीज की निजी सम्पत्ति हैं, वह उसे भारत सरकार को पाँच साल के ऋण पर देखा, जिसे सरकार प्रदर्शन के लिए विभिन्न संग्रहालयों में भेज सकेगी। एक बात विचार करने की है, सरकार ने कहा था कि “ये हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत हैं तथा इसकी खरीद-फरोख्त नहीं हो सकती है।” लेकिन अब सरकार ने ख़ुद ही इसे भारतीय कॉरपोरेट को खरीदने की अनुमति देकर अपने ही तर्कों को गलत सिद्ध कर दिया। औपनिवेशिक शासन के दौरान हमारी ढेरों सांस्कृतिक विरासतें लूटकर विदेशों में ले जाई गईं, उनकी वापसी ज़रूरी है, परन्तु कारपोरेट द्वारा उनकी खरीद-फरोख्त भविष्य के एक नजीर बनती है, जो कि चिन्ताजनक है।
(स्वदेश नीलम लेखक और टिप्पणीकार हैं।)