Sunday, May 29, 2022

झारखंड: मसंस को प्रतिबंधित करने के बाद भी मजदूरों की ताकत को तोड़ने में नाकाम रही सरकार 

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बोकारो। 11 फरवरी, 2022 को झारखंड हाईकोर्ट ने मजदूर संगठन समिति को झारखंड की तत्कालीन भाजपा नीत रघुवर दास सरकार द्वारा लगाये प्रतिबंध को वापस लेने का आदेश दिया था। इस फैसले के बाद संगठन से जुड़े तमाम मेहनतकश मजदूरों में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ है। इस खुशी का इजहार वो राज्य के अलग-अलग हिस्सों में रैली, सम्मेलन व अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से कर रहे हैं। इसके जरिये वो जनता को यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि किस तरह सरकार ने मजदूर संगठन समिति को प्रतिबंधित माओवादी पार्टी का फ्रंटल संगठन बताया बल्कि इसके जरिये संगठन को प्रतिबंधित कर, मजदूरों की ताकत को तोड़ने एवं मजदूर विरोधी ताकतों को मजबूत करने का काम किया है।

इसी कड़ी में 30 मार्च को बोकारो जिले के सेक्टर 9 के हटिया मोड़ पर मजदूर संगठन समिति बोकारो इकाई द्वारा विजय संकल्प जुलूस निकाल कर एक आम सभा की गई। 

इस कार्यक्रम में मजदूर संगठन समिति के संयोजक बच्चा सिंह सहित अजीत राय, गणेश रजवार, दीपक कुमार, अरविंद कुमार, संतोष मुर्मू, प्रदीप कुमार, सुरेंद्र कुमार, सरफराज अंसारी, रंजीत कुमार, संतोष सिंह, प्रेमचंद मांझी, नरेश राय, सुरेश राय, चमेली देवी, दिनेश्वरी देवी, आनंद कर्मकार, हरिल कुमार, कन्हैया महतो, महावीर मरांडी, वासुदेव महतो आदि उपस्थित रहे।

बताते चलें कि 11 फरवरी, 2022 को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश चन्द्रशेखर ने अपने आदेश में कहा है कि कोई भी ऐसा सबूत झारखंड सरकार के द्वारा पेश नहीं किया गया, जिसके हिसाब से मजदूर संगठन समिति को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का अग्र संगठन माना जाए,  न ही कभी कोई ऐसी शिकायत दर्ज हुई थी, जिससे ये पता चले कि मजदूर संगठन समिति किसी भी प्रकार की चरमपंथी गतिविधि या अराजकता में शामिल है। न्यायालय ने साथ-साथ ये नाराजगी भी जताई कि सरकार ने इस मामले में पूरी तरह से गैर-जिम्मेदाराना रवैया अख्तियार किया है।

दरअसल मजदूर संगठन समिति (एमएसएस) को पिछली 22 दिसंबर, 2017 को झारखंड की तत्कालीन भाजपा नीत रघुवर दास सरकार ने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का अग्र संगठन बताकर प्रतिबंधित कर दिया था। 

देश में जब उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण की नीतियां लाई जा रही थीं। ठीक उसी समय तत्कालीन बिहार के एक कोने में क्रांतिकारी ट्रेड यूनियन की आधारशिला रखी जा रही थी। 

1989 में वरिष्ठ अधिवक्ता सत्यनारायण भट्टाचार्य द्वारा बिहार श्रम विभाग में एक ट्रेड यूनियन पंजीकृत कराया गया था, जिसका नाम था मजदूर संगठन समिति और इसकी पंजीकरण संख्या 3113 / 89 मिला। प्रारंभ में इस मजदूर यूनियन का कार्यक्षेत्र सिर्फ धनबाद जिला था। धनबाद जिले के कतरास के आस-पास में बीसीसीएल के मजदूरों के बीच इसकी धमक ने जल्द ही इसे लोकप्रिय बना दिया। इसका प्रभाव धनबाद के अगल-बगल के जिलों पर भी पड़ा और जल्द ही यह मजदूर यूनियन तेजी से फैलने लगा।  2000 ईस्वी में बिहार से झारखंड अलग होने के बाद तो मजदूर संगठन समिति दिन दूनी रात चौगुनी की रफ्तार से मजदूरों के बीच अपनी लोकप्रियता हासिल किया और इसका फैलाव अन्य क्षेत्रों में होने लगा।

कालांतर में मजदूर संगठन समिति ने गिरिडीह जिले के रोलिंग फैक्ट्री व स्पंज आयरन के मजदूरों के बीच अपनी पैठ बना ली। साथ में जैन धर्मावलम्बियों के विश्व प्रसिद्ध तीर्थस्थल शिखर जी (मधुबन गिरिडीह) में स्थापित दर्जनों जैन कोठियों में कार्यरत मजदूरों के अलावा वहां हजारों डोली व गोदी मजदूरों के बीच भी इनका कामकाज बड़ी तेजी से फैला। बोकारो जिला में बोकारो धर्मल पावर 11 प्लांट, तेनुघाट पावर प्लांट, चन्द्रपुरा पावर प्लांट के मजदूरों, खासकर ठेका मजदूरों के बीच इसने अपनी एक मजबूत जगह बनाई। साथ ही बोकारो स्टील प्लांट के कारण विस्थापन का दंश झेल रहे दर्जनों विस्थापित गांवों में भी विस्थापितों को गोलबंद करने में इस यूनियन ने सफलता पायी। 

रांची जिले के खलारी, हेन्देगीर, पिपरवार, रामगढ़ जिले के उरीमारी, बड़का सयाल एरिया, सीसीएल व रामगढ़ के जिंदल कारखाना के मजदूरों के बीच काम प्रारंभ करने के बाद यहां पर दैनिक मजदूरों के बीच इसकी मजबूत पैठ बनी। राजधानी रांची के कुछ अधिवक्ता और विस्थापित नेता भी इस यूनियन से जुड़े। तत्कालीन हजारीबाग जिले के गिद्दी व रजरप्पा सीसीएल में ठेका पर काम कराने वाली कम्पनी डीएलएफ के बीच भी इसने अपना पाव पसारा। कोडरमा में पीडब्लूडी के मजदूरों के बीच भी इस यूनियन का काम प्रारंभ हुआ। सरायकेला-खरसावां जिला के चांडिल में विस्थापितों के बीच इसका कामकाज काफी जोर-शोर से शुरू हुआ। साथ ही बिहार के गया जिला के गुरारू चीनी मिल में भी इसने अपनी मजबूत पैठ बनायी। पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के बागमुंडी और झालदा में बीड़ी मजदूरों के बीच भी इसने कामकाज प्रारंभ किया।

मजदूर संगठन समिति का मजदूरों के बीच बढ़ते प्रभाव व लगातार निर्णायक आंदोलन के कारण जल्द ही यह यूनियन सत्ता के निशाने पर आ गया और इसे भारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित तत्कालीन माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (एमसीसीआई) का फ्रंटल संगठन कहा जाने लगा। इसके नेताओं पर पुलिस दमन भी काफी बढ़ गया। अब जहां भी नये क्षेत्र में यूनियन के नेता संगठन विस्तार के लिए जाते, पुलिस और दलाल ट्रेड यूनियन द्वारा इस यूनियन के नक्सल होने का प्रचार इतना अधिक करते कि मजदूरों में इस यूनियन को लेकर पुलिसिया दमन का डर पैदा हो जाता।

इन्हीं परिस्थितियों में सत्ता की चुनौतियों का सामना करते हुए मजदूर संगठन समिति तीन राज्यों (बिहार, झारखंड व पश्चिम बंगाल) में फैल गई थी। तब 2003 में इसका पहला केन्द्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें वरिष्ठ अधिवक्ता कामरेड सत्यनारायण भट्टाचार्य केन्द्रीय अध्यक्ष व बोकारो थर्मल पावर प्लाट के ठेका मजदूर कामरेड बच्चा सिंह केन्द्रीय महासचिव निर्वाचित हुए। 2003 के बाद प्रत्येक दो साल पर मजदूर संगठन समिति का केन्द्रीय सम्मेलन आयोजित होना शुरु हुआ, जिससे यूनियन के कार्यक्रम व आंदोलन के साथ-साथ संगठन विस्तार पर भी व्यापक सकारात्मक प्रभाव पड़ा। 

मजदूर संगठन समिति का आखिरी 5 वां केन्द्रीय सम्मेलन 21/22 फरवरी 2015 को झारखंड के बोकारो में हुआ। मजदूर संगठन समिति के मधुबन (गिरिडीह) शाखा द्वारा मधुबन में 5 मई, 2015 को मजदूरों का मजदूरों के लिए व मजदूरों के द्वारा बनाये गये श्रमजीवी अस्पताल की स्थापना की गयी, जिसका उद्घाटन गिरिडीह के तत्कालीन सिविल सर्जन डॉक्टर सिद्धार्थ सन्याल ने किया था। इस अस्पताल में प्रत्येक दिन सैकड़ों मजदूरों का फ्री में इलाज होता था।

वर्ष 2017 में मजदूर संगठन समिति की सदस्यता संख्या लाखों में थी, झारखंड के कई इलाकों में मजदूरों के बीच इसकी मजबूत पैठ थी। कुछ इलाके तो ऐसे थे, जहां मजदूर संगठन समिति के अलावा कोई ट्रेड यूनियन था ही नहीं। 2017 में नक्सलबाड़ी सशस्त्र किसान विद्रोह की 50वीं वर्षगांठ थी और इसी वर्ष रूस में हुई बोल्शेविक  क्रान्ति की सौवीं वर्षगांठ भी थी। इन दोनों वर्षगांठों को हमारे देश में कई राजनीतिक दलों, ट्रेड यूनियनों व जनसंगठनों द्वारा मनाया जा रहा था। 

झारखंड में भी नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह की अर्द्ध-शताब्दी समारोह समिति का गठन हुआ था, जिसमें मजदूर संगठन समिति के अलावा दर्जनों संगठन शामिल थे और इसके बैनर तले कई जगह सफल कार्यक्रम भी हुए। जिसमें आरडीएफ के केन्द्रीय अध्यक्ष व प्रसिद्ध क्रांतिकारी कवि वरवर राव भी शामिल हुए थे। इन कार्यक्रमों की सफलता से झारखंड की तत्कालीन भाजपा की सरकार के हाथ-पांव फूलने लगे और फिर से सत्ता द्वारा मजदूर संगठन समिति को माओवादियों का फ्रंटल संगठन कहा जाने लगा। इस बीच जून 2017 को मजदूर संगठन समिति का सदस्य डोली मजदूर मोतीलाल बास्के की हत्या सीआरपीएफ कोबरा ने दुर्दांत नक्सली बताकर कर दिया। इसके खिलाफ गिरिडीह जिले में आंदोलन का ज्वार फूट पड़ा, जिसका नेतृत्व भी मजदूर संगठन समिति के नेतृत्व में बने दमन विरोधी मोर्चा ने किया। यह आंदोलन गिरिडीह जिले से प्रारंभ होकर राज्य की राजधानी तक पहुंच गया। परिणामस्वरूप इस फर्जी मुठभेड़ की बात झारखंड विधानसभा से लेकर लोकसभा व राज्यसभा में भी उठी। मजदूर संगठन समिति के इन दो कार्यक्रमों ने झारखंड सरकार की नींद हराम कर दी थी और अब बारी थी रूस की बोल्शेविक क्रांति की शताब्दी समारोह की। 

झारखंड में इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए बोल्शेविक क्रांति की शताब्दी समारोह समिति बनायी गई, जिसमें मजदूर संगठन समिति के अलावा दर्जनों संगठन शामिल हुए। इस समिति के बैनर तले झारखंड में 17 जगहों पर शानदार कार्यक्रम आयोजित किये गये। इन तीनों कार्यक्रमों से झारखंड सरकार विचलित हो गई और उसने मजदूर संगठन समिति के खिलाफ साजिश करना प्रारंभ कर दिया। जिसका परिणाम 22 दिसंबर 2017 को बिना किसी नोटिस या पूर्व सूचना के अचानक झारखंड गृह विभाग के प्रधान सचिव एसकेजी रहाटे व निधि खरे ने प्रेस कांफ्रेंस के जरिये भाकपा (माओवादी) का फ्रंटल संगठन बतलाकर मजदूर संगठन समिति पर झारखण्ड सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर दी।

इस बाबत मजदूर संगठन समिति के तत्कालीन महासचिव बच्चा सिंह बताते हैं कि प्रतिबंध की घोषणा के बाद आनन-फानन में हमारे सारे कार्यालयों को सील कर दिया गया। हमारे दर्जनों नेताओं पर काले कानून यूएपीए के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल में बंद कर दिया गया। हमारे यूनियन के तमाम बैंक अकाउंट फ्रीज कर दिये गये। हमारे कई नेताओं के व्यक्तिगत बैंक अकाउंट भी फ्रीज कर दिये गये। सबसे दुखद तो यह रहा कि मजदूरों का फ्री इलाज करने वाले श्रमजीवी अस्पताल को भी दवा समेत सीज कर दिया गया। वैसे तो हमारे संगठन सभी नेता जमानत पर छूटकर जेल से बाहर आ गये हैं, लेकिन अभी भी हमारे दर्जनों नेताओं के व्यक्तिगत बैंक अकाउंट फ्रीज हैं। श्रमजीवी अस्पताल समेत सभी कार्यालय सीज हैं।

वे कहते हैं कि अब जब मजदूर संगठन समिति से प्रतिबंध हट गया है। तो देश की परिस्थिति भी काफी बदली हुई है। 2019 में दोबारा मजदूरविरोधी-जनविरोधी फासीवादी नरेन्द्र मोदी के हमारे देश के प्रधानमंत्री बनने के बाद मेहनतकश मजदूरों पर हमला काफी तेजी से बढ़ा है। मजदूर विरोधी 4 लेबर कोड के जरिए मजदूरों से सारे अधिकार छीन लिए गये हैं। मजदूर संगठन समिति पर प्रतिबंध लगने के बाद यहां भी सभी जगह पर कंपनी प्रबंधन व ठेकेदारों के द्वारा मजदूरों का शोषण काफी बढ़ गया है।

बच्चा सिंह कहते हैं कि जब मजदूर संगठन समिति पर प्रतिबंध लगा था, तो मजदूर विरोधी सरकार, पूंजीपति, कंपनी प्रबंधन, ठेकेदार व दलाल काफी खुश हुए थे, लेकिन अब मजदूरों की बारी है। मजदूर भी मजदूर संगठन समिति पर से प्रतिबंध हटने की खुशी में सभी जगह विजय जुलूस निकालेंगे,  निकाल रहे हैं और मजदूरों के अधिकारों पर बढ़ते हमले के खिलाफ आवाज बुलंद करेंगे, कर रहे हैं। 

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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