बिहार में कोरोना का प्रकोप बढ़ा! पटना में लॉकडाउन की घोषणा, माले ने लगाया नीतीश पर लापरवाही बरतने का आरोप

पटना। बिहार में कोरोना का प्रकोप तेज हो गया है। नतीजतन राजधानी पटना में प्रशासन को फिर से लॉक डाउन की घोषणा करनी पड़ी है। यह लॉकडाउन 10 जुलाई से 16 जुलाई तक लागू रहेगा। पटना के जिलाधिकारी कुमार रवि ने आज इसकी घोषणा की। उनकी ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में तमाम अधिकारों का हवाला देते हुए लॉकडाउन के दौरान मुहैया की जाने वाली जरूरी सुविधाओं का विस्तार से जिक्र किया गया है।

बताया जा रहा है कि कोरोना का असर मुख्यमंत्री आवास तक पहुंच गया है और उसके कुछ कर्मचारियों के कोरोना संक्रमित पाए जाने की रिपोर्ट मिली है। जिसके बाद आनन-फानन में प्रशासन सक्रिय हुआ। और इस संक्रमित बीमारी को लेकर एहतियातों को और कड़ा कर दिया गया। 

इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए भाकपा-माले के राज्य सचिव कुणाल ने कहा कि बिहार में कोरोना का बढ़ता कहर बेहद चिंताजनक है। लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश को केवल अपनी चिंता सता रही है और आम लोगों को मरने-खपने के लिए यूं ही छोड़ दिया है। मुख्यमंत्री आवास में कोरोना पाॅजिटिव पाए जाने के बाद सीएम नीतीश पीएमसीएच के वरिष्ठ डाॅक्टरों व पूरी इमरजेंसी सेवा का सेट अप खड़ा कर अपनी जिंदगी की तो चिंता कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने आम लोगों को भगवान भरोसे छोड़ दिया है।

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माननीय मुख्यमंत्री स्वस्थ व सुरक्षित रहें लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे बिहार के गरीब मजदूरों व आम लोगों के प्रति अपनी जवाबदेही से मुंह मोड़ लें। हमने लगातार मांग की है कि यदि लोगों को कोरोना के प्रकोप से बचाना है तो कोरोना टेस्ट की संख्या और ऊपर से लेकर नीचे तक के अस्पतालों में आईसीयू की संख्या बढ़ानी होगी। लेकिन इन उपायों की गारंटी करने की बजाए बिहार सरकार वर्चुअल प्रचार के तरीके से बिहार विधान सभा चुनाव को हड़पने में लग गई, जिसकी वजह से आज पटना सहित पूरे राज्य में कोरोना संक्रमण बेकाबू हो चुका है।

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सच्चाई यह है कि लाॅकडाउन कोई उपाय नहीं है। आम लोग लंबे लाॅकडाउन की वजह से पहले ही भीषण कठिनाई भरी जिंदगी जी रहे हैं। कोरोना के साथ-साथ वे भुखमरी व बेराजगारी का भीषण दंश झेल रहे हैं। ऐसी स्थिति में सरकार को आयकर के बाहर के सभी परिवारों को कम से कम छह महीने तक न्यूनतम राशि व अनाज देने की गारंटी करनी चाहिए थी। कोरोना टेस्ट की संख्या व आईसीयू की व्यवस्था की जानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हो सका।

आनन-फानन में सरकार ने प्रवासी मजदूरों के बिना टेस्ट के क्वारंटाइन सेंटरों को खत्म कर दिया। इससे समस्या और जटिल ही हुई। हमने कहा था कि क्वारंटाइन सेंटरों को खत्म नहीं किया जाए, लेकिन सरकार अपनी मनमर्जी करती रही।

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