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लखनऊ घंटाघरः ‘पुलिसिया इमरजेंसी’ के खिलाफ महिलाओं ने बनाई हौसले की दीवार

शायर अली सरदार जाफरी का एक शेर है,
बहुत बर्बाद हैं लेकिन सदा-ए-इंक़लाब आए
वहीं से वो पुकार उठेगा जो ज़र्रा जहां होगा
लखनऊ के चौक यानी हुसैनाबाद में स्थित घंटाघर के आसपास चल रहे महिलाओं के विरोध प्रदर्शन को देखते हुए, यह मशहूर शेर मेरे कानों में लगातार गूंज रहा था। हजारों की संख्या में मौजूद महिलाएं एक स्वर में CAA, NRC और NPR के विरोध में अपनी आवाज़ को उठा रही थीं। यही नहीं, वे संविधान और इस मुल्क की विरासत के हक़ में भी प्रदर्शन कर रही हैं।

वहां मौजूद हर एक महिला अपने आप में एक स्वतंत्र आवाज़ का प्रतिनिधित्व भी कर रही थी। किसी महिला के हाथ में छोटा बच्चा था तो किसी महिला के हाथ में बैनर, किसी के हाथ में दूसरों को देने के लिए खाने के पैकेट थे, कोई जरूरतमंदों को पानी पिला रहा था तो किसी का हाथ हवा में नारों के साथ लहरा रहा था।

वहां मौजूद महिलाओं के हाथ में बड़ी संख्या में CAA और NRC के विरोध की तख्तियां मौजूद थीं। गांधी जी और अंबेडकर जी की तस्वीरें भी हाथों में देखाई दे रही थीं। यहां देश भक्ति के गीत गाए जा रहे थे। प्रदर्शन में महिलाओं के अलावा छोटे-छोटे बच्चे और बच्चियां भी शामिल थीं।

बात अगर सीएए-एनआरसी के विरोध प्रदर्शन से जुड़ी न होती तो शायद शांतिपूर्ण ढंग से लखनऊ के घंटाघर में (जिसे लखनऊ का शाहीन बाग़ भी कहा जा रहा है) प्रदर्शन कर रही महिलाओं का यह हुजूम, उनकी स्वतंत्र होती आवाज़ की बानगी के तौर पर हमेशा याद किया जाता। शायद इस हुजूम और इसके विचारों को राष्ट्रीय मीडिया के ‘प्राइम टाइम’ का स्लॉट भी दे दिया जाता।

मगर अफ़सोस, यह वो महिलाएं हैं जो बिना पुरुषों पर निर्भर हुए अपनी आवाज़ एक कानून के खिलाफ उठा रही हैं और वो भी बिना किसी प्रकार की हिंसा को अंजाम देते हुए। राष्ट्रीय मीडिया तो छोड़िए यह लोकल मीडिया से भी बात करने में डर रहीं थीं। जब भी कोई उनसे बातचीत करने की कोशिश करता वो ये जरूर कहती, “पुलिस का डर है इसलिए मीडिया से बात नहीं कर रहे, कब हमें यहां से उठा के बाहर फेंक दिया जाए, कह नहीं सकते।”

यह डर लाजिम भी है, क्योंकि इनमें से कोई भी महिला इस प्रकार का प्रदर्शन करने के लिए पोलिटकल ट्रेनिंग के साथ नहीं आई हैं। वो बस एक डर के कारण घंटाघर पर जुटी हैं कि उन्हें उनके मुल्क से उनकी पहचान के चलते कोई जुदा न कर दे। वो इसलिए भी प्रदर्शन कर रही हैं कि वो न केवल शाहीन बाग़ बल्कि देश के हर कोने में फ़ैल चुके जन-आंदोलन को अपना समर्थन दे सकें।

रात होते ही ये महिलाएं घंटाघर के नीचे खुले आसमान में कैंडल जलाकर बैठ जाती हैं। यहां मौजूद महिलाओं का कहना है कि यह प्रदर्शन अनवरत रूप से तब तक चलेगा जब तक उनकी मांगें नहीं मान ली जाती हैं। उनका कहना है कि JNU में जो भी हुआ है वे उसका विरोध करती हैं। उनका मानना है कि NRC और CAA ध्यान भटकाने के लिए है, जबकि मुख्य मुद्दा विकास और रोजगार का है, जिसको सरकार नहीं देख रही है।

घंटाघर पर मौजूद महिलाओं में कुछ छात्राएं हैं, कुछ शिक्षिकाएं हैं, और ज्यादातर गृहणियां हैं। उनमें कुछ कलाकार हैं, कुछ कवियित्री हैं और कुछ वालंटियर हैं। उनके बर्ताव भले एक समान नहीं हैं, लेकिन उन सब का लक्ष्य एक ही है, और वो है अपने संविधान और अपने मुल्क की संस्कृति को बचाना और अपने अस्तित्व के लिए लड़ना। ये महिलाएं बारी-बारी से अपन- अपने घरों को जाकर रसोई भी देखती हैं, अपने बच्चों और पति का ख्याल भी रखती हैं और रात भर यहां रुकने के लिए प्रतिबद्धता भी दिखाती हैं।

इससे पहले हम इस पूरे प्रदर्शन के हर एक पहलू और मेरे द्वारा वहां बिताए कुछ घंटों के अनुभव के बारे में जानना शुरू करें। यहां यह अवश्य कहना चाहूंगा कि प्रदर्शन स्थल पर जाकर और उनमें से कुछ महिलाओं के साथ बातचीत करने के दौरान मुझे इस बात का एहसास हुआ कि वहां मौजूद महिलाएं ये अच्छी तरह से समझती हैं कि वो वहां किस उद्देश्य के साथ जमा हुई हैं।

उनके उद्देश्य में मुझे किसी प्रकार का निजी हित नहीं दिखाई पड़ा, क्यूंकि वे सभी अपने आप को एक सामाजिक आंदोलन का हिस्सा मानती हैं। वे यह जानती हैं कि CAA-NRC-NPR क्या है, और वे अपने फ़ोन में मौजूद तमाम वीडियो दिखाते हुए यह समझाती हैं कि यह गलत क्यों है। इसका सीधा मतलब है कि वे यह समझती हैं कि उनकी यह लड़ाई किस लिए है।

“गाड़ी का कट जाएगा चालान”
जैसे ही इमामबाड़ा के आगे बढ़कर रूमी दरवाजा होते हुए मैं प्रदर्शन स्थल (चौक पर स्थित घंटाघर) पहुंचा, वहां बड़ी संख्या में पुलिस बल की तैनाती देखने को मिली। वहीं अपना दुपहिया वाहन पार्क करके मैंने जैसे ही प्रदर्शन वाली जगह जाने की कोशिश की तो एक पुलिस वाले ने मुझे रोकते हुए कहा, “यहां गाड़ी लगाओगे तो चालान काट दूंगा, फोटो के साथ चालान घर पर मिलेगा फिर भरते फिरना।”

पुलिस वाले के रवैये को छोड़कर कुछ भी ग़लत नहीं था। हालांकि यह बात अलग है कि जिस जगह मैं अपना दुपहिया वाहन लगा चुका था, वहां आमतौर पर गाड़ियां खड़ी करके लोग घंटाघर टहलने-घूमने जाते हैं। मैं स्वयं न जाने कितनी बार वहां गाड़ी पार्क करके घंटाघर घूमने के उद्देश्य से जाता हूं, पर पहली बार इतना सख्ती से मुझे ऐसा करने से रोका गया।

इस जगह के ठीक सामने, रूमी दरवाजा पुलिस चौकी है, और आज तक कभी भी वहां गाड़ी लगाने पर किसी ने आपत्ति नहीं जताई, जबकि वहीं पुलिस की तमाम गाड़ियां बेतरतीब तरीके से हर बार कि तरह खड़ी थीं (सड़क के कुछ हिस्से को अवरुद्ध किए हुए)।

खैर, मैं वापस गया और इमामबाड़ा पर अपनी गाड़ी पार्क की और पैदल प्रदर्शन स्थल तक आया। सबसे पहले वहां मेरा सामना तमाम मीडियाकर्मियों से हुआ, जो विरोध प्रदर्शन का वीडियो बना रहे थे। इरादा मेरा भी जनचौक के फेसबुक पेज से लाइव करने का था, हालांकि नेट न चल पाने के कारण वो हो न सका। मुझे लगा मेरे मोबाइल का नेटवर्क उस इलाके में नहीं पकड़ रहा होगा, लेकिन जब अन्य मीडियाकर्मियों से बात की तो पता चला कि वहां किसी के भी मोबाइल में इंटरनेट स्पीड अच्छी नहीं आ रही थी।

यह बात भी बाद में सुनने में आई कि उस इलाके में नेट स्पीड को प्रशासन द्वारा धीमा कर दिया गया है, हालांकि इस बात की सत्यता की पुष्टि मैं स्वयं नहीं कर सकता हूं, पर यह जरूर है कि वहां मौजूद कई लोगों का मोबाइल नेट, लाइव वीडियो चलाने के लिए जरूरी स्पीड प्राप्त करने में असमर्थ था। कई मीडियाकर्मी ऑफलाइन वीडियो बना रहे थे और कुछ लोग (जिनमें से ज्यादातर समाज सेवी थे) मीडिया को बाइट भी दे रहे थे।

जहां मीडियाकर्मी खड़े थे उससे कुछ ही दूरी पर एक लाल रंग की रस्सी थी (161355), जिसके उस पार हजारों की संख्या में महिलाएं बैठी थीं। बार-बार आयोजकों द्वारा हमें उस रस्सी के बाहर रहने को बोला जा रहा था, इसलिए मीडियाकर्मी उस रस्सी के बाहर से ही खड़े होकर वीडियो बना रहे थे एवं तस्वीरें ले रहे थे, हालांकि हमने कुछ तस्वीरें रस्सी के उस पार जाकर भी लीं और महिलाओं से बात करने की भी कोशिश की।

“हम बात नहीं कर सकते, यह ठीक नहीं होगा”
जैसा कि हमने बताया, हमने काफी प्रयास किए कि वहां मौजूद महिलाओं से बातचीत हो पाए लेकिन बहुत अधिक सफलता हमारे हाथ नहीं लगी। यहां तक कि वीडियो बनाते वक़्त भी एक सज्जन (जो इस प्रदर्शन में वालंटियर की भूमिका निभा रहे थे) ने हमसे कहा, “आप मीडियाकर्मी ज्यादा वीडियो एवं तस्वीरें न लें, आप समझ नहीं रहे लेकिन हमारे लिए मुश्किलें हो जाएंगी।”

एक और वालंटियर एजाज खान (उम्र 59 वर्ष) ने बताया, “पुलिस वालों की तरफ से सख्त निर्देश हैं कि हम यहां से जल्द से जल्द उठकर चले जाएं। उनकी तरफ से यह आर्डर है कि हम मीडिया से कतई बात न करें और इसीलिए हम चाहकर भी इस आंदोलन के बारे में खुलकर मीडिया से बोल नहीं पा रहे हैं क्योंकि हमारे अंदर पुलिस को लेकर डर है।”

हालांकि, वहां मौजूद एक अन्य वालंटियर फरजाना खातून (उम्र 35 वर्ष) जो कि एक बैनर लिए खड़ी थीं, ने हमसे थोड़ा खुलकर इस प्रदर्शन के बारे में बात की। उन्होंने कहा, “हम अपने हक के लिए लड़ रहे हैं, हम हिटलरशाही का हर हाल में विरोध करेंगे। CAA-NRC-NPR की अवधारणा अपने आप में अनुचित है, यह प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री की हिटलरशाही है, जिसका विरोध दिल्ली के शाहीन बाग़ में भी हो रहा है और यहां भी हो रहा है।”

मुनव्वर राना की बेटी अर्शिया राना ने खासतौर पर जनचौक से बात करते हुए कहा कि, “पुलिस वाले हमारे कंबल उठाकर ले गए और जब हमने उनसे कहा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं, क्या आप इंसान नहीं हैं तो पुलिस वालों का जवाब था कि नहीं हम पुलिस वाले हैं, हम में इंसानियत नहीं है। पुलिस वालों ने इसके बाद न टेंट लगने दिए, न कम्बल वापस किए न ही खाने के सामान लौटाए।”

यह जरूर है कि कुछ वालंटियर और कुछ समाजसेवी प्रदर्शन को लेकर बात करने के लिए आगे आ रहे थे, लेकिन अधिकतर महिलाएं, मीडियाकर्मियों से बात करने में डर रही थीं, क्योंकि उनका मानना था कि यदि मीडिया से इस प्रदर्शन के संबंध में बात की गई तो पुलिस उनके साथ बदसलूकी करेगी और उन्हें वहां से हटा देगी।

कुछ औरतें तो यह भी कहते दिखीं कि उनसे अगर उनकी नागरिकता को साबित करने के लिए कागज दिखाने को कहा गया तो वे शायद नहीं दिखा पाएंगी और उन जैसे लाखों गरीब भी सरकार द्वारा नागरिकता साबित करने के लिए कागज मांगे जाने पर दिखाने में असमर्थ होंगे।

“पुलिस की बदसलूकी ने कर दी हैं हदें पार”
काफी वृद्ध वालंटियर, शमा (उम्र 73 वर्ष) ने हमसे बातचीत में बताया कि 18 जनवरी को पुलिस ने वहां पानी गिरा दिया और महिलाओं को उनकी जगह से उठने को मजबूर किया, उनके कंबल, खाने के पैकेट, कपड़े और बैठने के लिए गद्दे-चटाई को भी पुलिस उठा ले गई, जिससे महिलाएं ठण्ड में बेबस हो जाएं और वो जगह छोड़ कर चली जाएं, लेकिन महिलाओं के जज्बे ने पुलिस वालों की बर्बरता को हरा दिया। उन्होंने यह भी बताया कि उनके कोयले एवं अन्य सामान भी भीग गए और ठंडी रात में महिलाएं ठिठुरने को मजबूर हो गईं।

गौरतलब है कि CAA के समर्थन में आगामी 21 जनवरी को लखनऊ में गृह मंत्री अमित शाह की रैली है। प्रदर्शन स्थल पर मौजूद महिलाएं यह समझ रही हैं कि गृहमंत्री की रैली से पहले इस धरने को समाप्त कराने के लिए पुलिस हर स्तर पर प्रयास करेगी और ये महिलाएं इसके लिए तैयार हैं। गणतंत्र दिवस को देखते हुए लखनऊ में पुलिस आयुक्त की ओर से शनिवार को ही धारा 144 लागू की जा चुकी है। अब तक 112 लोगों के खिलाफ एफआईआर की जा चुकी है। इसके बावजूद पूरे मैदान में महिलाएं एवं बच्चे, हाथों में तिरंगा लेकर संविधान बचाने एवं देश बचाने की शपथ लेते नजर आए।

एक आम नागरिक के तौर पर प्रदर्शन में शामिल रुखसाना ने कहा, “पुलिस हर तरह के हथकंडे अपना रही है, लेकिन वे अब तक हमें यहां से हटाने में नाकामयाब रहे हैं। आलम तो यह है कि पुलिस ने हुसैनाबाद हेरिटेज जोन में बने महिला शौचालय में ताला डाल दिया है। इसके अलावा रात को घंटाघर पार्क की लाइट भी बंद कर दी गई। शौचालय बंद हो जाने के कारण सर्दी में हम महिलाओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।”

ज्यादातर महिलाएं यह मानती हैं कि पुलिस उन पर कभी भी लाठी चार्ज कर सकती है, और पुलिस बस सरकार के आदेशों का इंतज़ार कर रही है कि कब उन्हें आदेश मिलें और कब वे अपनी बर्बरता का प्रदर्शन करें। जेबा यास्मिन ने बातचीत करते हुए कहा, “उत्तर प्रदेश सरकार ने महिला सुरक्षा और सम्मान को लेकर एक भी बयान जारी नहीं किया, जबकि पुलिस वालों ने हमारे कंबल एवं रेक्स छीने। हम लोगों को अपने स्तर से अपनी सुरक्षा का इंतजाम करना पड़ रहा है। पुलिस की ओर से हमें किसी प्रकार का कोई सहयोग नहीं मिल रहा है। हम चाहते हैं कि सरकार CAA को वापस ले।”

“हमारी हिम्मत को बना दिया है सरकार ने फौलादी”
जब सरकार यह कहती है कि महिलाओं को आगे आकर अपनी आवाज़ बुलंद करनी चाहिए तो सरकार यह स्वीकार क्यों नहीं करती कि महिलाएं यदि किसी कानून एवं किसी अवधारणा का विरोध कर रही है तो उन्हें इसमें भी सरकार का समर्थन मिलना चाहिए?

देश के संविधान से लेकर हर कानून और सत्ता में रही सरकारों ने कथित तौर पर महिलाओं के अधिकारों को और मजबूत करने के तमाम प्रयास किए हैं, लेकिन ऐसा क्या है कि दिल्ली के शाहीन बाग से लेकर लखनऊ के घंटाघर में जब महिलाएं अपनी आवाज़ उठाने के लिए एकजुट होती दिखती हैं तो इसे उनकी एक प्रगतिशील मुहिम करार नहीं दिया जाता? आखिर क्यों इसे महिलाओं के चरित्र हनन का एक जरिया बनाया जाता है? आखिर क्यों बीजेपी आईटी सेल का हेड यह कहता है कि शाहीन बाग़ में महिलाएं पैसे लेकर प्रदर्शन करने आती हैं?

लखनऊ के शाहीन बाग़, यानी कि घंटाघर में प्रदर्शन कर रही महिलाओं से जब यह पूछा गया कि उनका बीजेपी आईटी सेल एवं बीजेपी के तमाम नेताओं की उस टिपण्णी पर क्या कहना है कि महिलाओं द्वारा पैसे लेकर विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं तो वे इस बात को लेकर काफी खफा नजर आईं।

उन्होंने हमसे बातचीत में कहा कि सत्ताधारी पार्टी के नेता हमारे चरित्र पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि उनका आईटी सेल खुद पैसे देकर लोगों को ऑनलाइन ट्रोल करवाता है। इस मुद्दे पर महिलाओं का यह भी कहना था कि इस तरह की बयानबाजी से उनकी हिम्मत और ज्यादा बढ़ती है, और वे विरोध प्रदर्शन से पीछे हटने वाली नहीं हैं।

प्रदर्शन स्थल पर कुछ डॉक्टर युवतियां भी वालंटियर के तौर पर नजर आईं जो वहां किसी भी इमरजेंसी की हालत में अपनी सेवाएं देने के लिए दिन रात बैठी रहती हैं, इसके अलावा वहां पर लगातार पानी की बोतलें, अंडे, एनर्जी ड्रिंक एवं बिस्कुट भी लोगों को दिए जा रहे हैं, जिससे लोग प्रदर्शन के दौरान अपनी सेहत को बनाए रखें।

अंत में, अब देखना यह है कि यहां मौजूद महिलाओं की मांगों और उनकी सुरक्षा की तरफ सरकार की निगाह कब जाती है (या जाती भी है या नहीं)। लेकिन एक बात बिलकुल तय है कि बिना किसी निजी स्वार्थ के, अपने मुल्क के प्रति प्यार और अपने अस्तित्व एवं आत्मसम्मान की रक्षा के लिए ये महिलाएं पूरे समाज को एक सीख दे रही हैं कि यदि लोग एकजुट हो जाएं तो क्या कुछ नहीं हो सकता है। जहां तक बात सरकार के रवैये की है, तो भले ही अभी सत्ताधारी दल अपने अहम् में डूबा हुआ प्रतीत होता है, परन्तु यह सत्य है कि इंसाफ का एक दिन मुक़र्रर है, और वो दिन देर सवेर आ ही जाएगा।

स्पर्श उपाध्याय
(लेखक पेशे से वकील हैं एवं लखनऊ में रहते हैं।)

This post was last modified on January 20, 2020 2:38 pm

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Published by
Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi