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कार्पोरेट लूट की सरकारी साजिश के खिलाफ आदिवासियों की हुंकार

छत्तीसगढ़ में एक बार फिर से आदिवासी समाज अपनी मांगों को लेकर आंदोलित हो गया है। राजधानी रायपुर में वन स्वराज रैली का आयोजन किया गया। रैली में केंद्र और राज्य सरकार के खिलाफ हुंकार भरी गई। बस्तर के सुकमा और जगदलपुर जिले में भी आदिवासियों ने एक दिवसीय धरना प्रदर्शन किया।

बुढ़ा तालाब, रायपुर में वनाधिकार की मांग को लेकर आयोजित की गई वन स्वराज सभा और रैली में यह मांग जोर-शोर से उठी। छत्तीसगढ़ में वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन पर सरकार को अपना वादा याद दिलाने और आदिवासियों पर हुए ऐतिहासिक अन्याय को ख़त्म कराने के लिए वन स्वराज आन्दोलन का आयोजन वन अधिकार और आदिवासी अधिकार पर लड़ने वाले प्रदेश के 30 से अधिक संगठनों ने किया था। इसमें विभिन्न वन क्षेत्रों से कई हज़ार लोग शामिल हुए।

वन स्वराज सभा में स्पष्ट किया गया कि देश की संसद द्वारा आदिवासी और वन-निवासी समुदायों के अधिकारों के लिए वनाधिकार कानून बनाया गया है, लेकिन, जल, जंगल, जमीन पर उनके अधिकार को मान्य नहीं किया जा रहा हैं। यह अधिकार कोई भीख या दया नहीं है, बल्कि वन निवासियों का संविधान सम्मत अधिकार है। वन अधिकार दिए जाने का छत्तीसगढ़ सरकार का चुनावी वादा और घोषित प्राथमिकता के बावजूद भी, इस महत्वपूर्ण कानून का क्रियान्वयन सही तरीके से नहीं किया जा रहा है। केंद्र और प्रदेश की सरकार की कॉर्पोरेट परस्त नीतियां, प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव की वजह से यह सब हो रहा है।

सभा को संबोधित करते हुए, आदिवासी महासभा के मनीष कुंजाम ने कहा कि आदिवासी बिना लड़े अपनी अस्मिता को नहीं बचा सकते। बैलाडीला की 13 नंबर डिपोजिट खदान को अडानी को सौंपने के लिए राज्य सरकार ने ग्राम सभा से फर्जी जांच रिपोर्ट लिए बैठी है। आदिवासियों की अवाज़ को दबाने के लिए उल्टे नये पुलिस कैंप खोले जा रहे हैं। जिस दिन आदिवासी जमीन से हट गए, उस दिन से उनकी संस्कृति और परंपरा सब नष्ट हो जाएगी।

हाथी प्रभावित क्षेत्रों से आए ग्रामीणों ने बताया कि हम लोग लगातार कई वर्षों से हाथियों के हमले झेल रहे हैं, लेकिन मुआवजे की राशि नहीं मिलती। या मुश्किल से मिलती है। वह भी काफी कम। अब सुनने में आ रहा है कि हमारे गांव को हाथी रिजर्व में जोड़ा जा रहा है। हम नहीं चाहते कि हमारे घर, खेती-बाड़ी को अभ्यारण्य बनाया जाए। ऐसे कई उदहारण हैं कि अभ्यारण्य में वन अधिकार छीन लिया जाता है।    छत्तीसगढ़ वनाधिकार मंच के गंगाराम पैकरा ने कहा कि हम हाथी रिजर्व का विरोध करते हैं, क्योंकि इससे कोयला खदानों के लिए गांव हटाने का रास्ता साफ हो जाएगा। विस्थापन का विरोध बेचारा हाथी तो नहीं कर पाएगा, पर आदिवासी जरूर करेंगे।

वन स्वराज आंदोलन के संयोजक बिजय भाई ने कहा कि आदिवासियों की पारंपरिक लोकतान्त्रिक स्वशासन व्यवस्था को अपनाते हुए देश में पेसा और वनाधिकार जैसे कानून लागू हैं, जो जल, जंगल, जमीन पर सामुदायिक मालिकी और नियंत्रण को मान्य करता है, पर आज उसका खुल कर हनन किया जा रहा है। अगर वनाधिकार कानून को ठीक से लागू किया जाता तो आज छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल वन-क्षेत्रों की प्रबंधकीय व्यवस्था लोकतांत्रिक तौर पर ग्राम सभा के प्रभुत्व में स्थापित होती। यह एक मौका था, जब अंग्रेजों के ज़माने में जंगल को लूटने वाले कानून के बदले, जंगल के शासन का लोकतंत्रीकरण किया जाता। इस वर्ष गांधी जी की 150वीं जयंती पर स्वराज की बात करने वाले, जंगल में स्वराज स्थापित कर, उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते थे।

छत्तीसगढ़ वनाधिकार मंच, गरियाबंद की लोकेश्वरी नेताम ने कहा कि जंगल हमारी जिंदगी है। आदिवासी बगैर जल, जंगल, जमीन और जानवर के नहीं रह सकते। हमारा संविधान भी हमें यह हक देता है। पर हमारे संविधान से छेड़छाड़ हम बर्दाश्त नही करेंगे।

वनाधिकार संघर्ष समिति के सुरजु ठाकुर ने कहा कि देश के शासक वर्ग और पूंजी पतियों के दबाव के चलते, भारतीय वन कानून 1927 के जरिये और नयी भारतीय वन नीति लागू करने का प्रयास कर, वन स्वराज मिलने से पहले ही ख़त्म करने की कोशिश की जा रही है। यह आन्दोलन, देश के सर्वोच्च न्यायालय में वनाधिकार कानून की संवैधानिकता पर विचाराधीन मामले, और उससे उत्पन्न स्थिति पर चिंता व्यक्त करता है, जिससे लाखों आदिवासी परिवारों पर बेदखली की तलवार लटक रही है। सुनवाई के समय, खुद केंद्र और राज्य सरकार आदिवासी हितों के पक्ष में कमजोर दलील देकर या अनुपस्थित रह कर, वनाधिकार को कमजोर कर रही है। परिणामतः कोर्ट के बेदखली का आदेश स्थगित तो है, पर बेदखली का खतरा टला नहीं है।

हंसदेव अरन्य संघर्ष समिति के उमेश्वर आर्मो ने बताया कि अडानी कंपनी के लिए फर्जी तरीके से ग्राम सभा की सहमति ले कर वन भूमि छीनी गई है। इसके विरोध में ग्रामीण पिछले 36 दिनों से धरने पर बैठे हैं, पर सरकार उनकी सुध नहीं ले रही है। इसलिए उन्हें रायपुर तक आना पड़ा।

आदिवासी भारत महासभा के सौरा यादव ने कहा कि वन स्वराज आंदोलन, वन एवं पर्यावरण मंत्री के उस बयान का स्वागत करता है, जिसमें उन्होंने भारतीय वन अधिनियम 1927 में प्रस्तावित संशोधनों को वापिस लेने की बात की है। यह देश भर के उन जन संगठनों और आंदोलनों की जीत है, जो लगातार इस संशोधनों का विरोध करता रहा है। वन स्वराज आंदोलन, इस सभा के माध्यम से चेतावनी देना चाहता है कि भविष्य में यदि औपनिवेशिक और दमनकारी प्रवृत्ति के भारतीय वन अधिनियम 1927 में संशोधन करने की कोशिश की गई तो उसका देश भर में पुरजोर विरोध किया जाएगा। वनाधिकार कानून लागू होने के बाद, 1927 के कानून का वन स्वराज के लिए कोई औचित्य नहीं रह जाता।

सभा को पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम, पूर्व सांसद सोहन पोटाई, पूर्व विधायक झनकलाल ठाकुर, मनीष कुंजाम, पूर्व आइएएस बीपीएस नेताम ने भी संबोधित किया।

वन स्वराज सभा में वन अधिकार मंच, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन, आदिवासी महासभा ने संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि छत्तीसगढ़ के आदिवासियों और वननिवासियों का हक़ छीना जाना अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हमारे बहुत संघर्ष के बाद जल, जंगल और जमीन पर हक़ पाया है। सरकार को हमारे अधिकार का सम्मान करना होगा। चुनाव के समय, आज की सरकार ने जो वादा किया था, उसे निभाने का वक्त अभी है।

सभा में वन स्वराज लागू करने के लिए हमारी प्रमुख मांगे हैं कि…

* वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन को प्रदेश सरकार प्राथमिकता पर मिशन मोड में लाए।

* गलत तरीके से ख़ारिज किए या बगैर सुनवाई का अवसर दिए ख़ारिज किए गए दावों पर पुनर्विचार कर वाजिब दावे मान्य किए जाएं। प्रत्येक निरस्त दावों के कारणों को दर्ज कर दावेदार सहित सार्वजानिक जानकारी में उपलब्ध रखा जाए।

* खनन, उद्योगों एवं विकास परियोजनाओं के लिए वन भूमि के व्यपवर्तन (डायवर्जन) के लिए ग्राम सभा की दबाव-मुक्त, लिखित अनिवार्य सहमति लेने का पालन किया जाए।

* भारतीय वन अधिनियम, 1927 में प्रस्तावित संशोधनों को भविष्य में लागू न होने दिया जाए, और वन अधिकार कानून की मंशा के अनुरूप राज्य कानून में बदलाव किया जाए।

* प्रदेश में शून्य विस्थापन की नीति अपनाई जाए। विशेष रूप से वन जीव अभ्यारण्यों, टाइगर रिजर्व एवं राष्ट्रीय उद्यानों तथा विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों की बेदखली को तुरंत रोका जाए।

* हाथी रिजर्व सहित, प्रदेश में कोई भी वन जीव अभ्यारण्य घोषित करने से पूर्व संबंधित ग्राम सभा की दबाव मुक्त, पूर्व-सूचित सहमति ली जाए।

* वन विभाग द्वारा व्यय किए जाने वाले क्षतिपूर्ति वनीकरण निधि (कैम्पा) सहित अन्य मदों पर ग्रामसभा का नियंत्रण, वनाधिकार नियम 4 (1) च के तहत सुनिश्चित किया जाए। 

* राज्य सरकार वनाधिकार कानून के सभी उल्लंघन के प्रति अति संवेदनशीलता रहे एवं वनाधिकार के विरुद्ध दायर याचिकाओं की सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय औ उच्च न्यायालय में सजगता से जनपक्षीय दलील रखें।

वन स्वराज सभा और रैली में प्रदेश भर से 30 से अधिक संगठनों ने भाग लिया। इनमें प्रमुख रूप से वनाधिकार संघर्ष समिति (राजनंद गांव), छत्तीसगढ़ वनाधिकार मंच और उसकी विभिन्न जिला इकाइयां, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन, सर्व आदिवासी समाज, आदिवासी नगारची समाज, दलित आदिवासी मंच, भारत जन आंदोलन, पारधी आदिवासी महापंचायत, पहाड़ी कोरवा महापंचायत, आदिवासी भारत महासभा, छमुमो, अभा आदिवासी महासभा, जन मुक्ति मोर्चा, वनांचल वनाधिकार फेडरेशन (राजनांद गांव), छमुमो (कार्यकर्ता समिति), गोगपा, छत्तीसगढ़ किसान सभा, गांव बचाओ समिति, आदिवासी महिला महासंघ, अभा जंगल आन्दोलन मंच, आदिवासी एकता महासभा आदि शामिल रहे।

(रायपुर से जनचौक संवाददाता तामेश्वर सिन्हा की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on November 19, 2019 1:12 pm

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