Tuesday, October 19, 2021

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patriarchy

लैंगिक समानता एक मिथक है!

हम सभी पुरुष प्रधान/पितृसत्तात्मक समाज में रहते हैं, जहां अभी भी एक महिला को अपने मूल अधिकारों के लिए लड़ना पड़ता है और अगर वह अपनी आवाज उठाने की हिम्मत करती है, तो उसे या तो अपने परिवार या समाज द्वारा...

क्या आदिवासी समाज में भी आ गयी है खापों की बीमारी?

मुंडा आदिवासी समुदाय में भी अन्य आदिवासी समाज की तरह एक ही किलि में शादी करना निषेध है।  लेकिन अगर ऐसा हो जाता रहा  है तो किलि को कुछ नेग द्वारा ऊपर नीचे करके एक सहजता के साथ शादी को...

सात समुंदर पार बोस्टन में गूंजी हाथरस की बेटी के लिए जस्टिस की आवाज

नई दिल्ली। हाथरस और बलरामपुर में दलित लड़कियों के साथ हुई वीभत्स घटनाओं के खिलाफ विरोध की लहर अब सात समुंदर पार भी पहुंच गयी है। अमेरिका के बोस्टन में लोगों ने इसके खिलाफ प्रदर्शन किया है। प्रदर्शनकारी अपने...

जन्मदिन विशेषः पेरियार ललई सिंह यादव थे बुद्ध, पेरियार और आंबेडकर की वैचारिकी के वाहक

कांग्रेस (1885) द्वारा ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ संघर्ष शुरू करने से करीब एक दशक पहले जोतीराव फुले (11 अप्रैल, 1827-28 नवंबर, 1890) ने वर्ण-जाति व्यवस्था और पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत कर दी थी। 1873 में प्रकाशित फुले...
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सत्ता मिली तो ‘हम दो, हमारे दो’ से कैसे निपटेगी कांग्रेस ,क्या है रोडमैप?

देश कि ध्वस्त अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी,भीषण मंहगाई और सरकार कि चतुर्दिक असफलता से एमपी, बिहार विधानसभा चुनाव से शुरू होकर...
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