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एक खतरनाक संकेत है श्रम कानूनों का निलंबन

श्रम कानूनों के निलंबन का निर्णय जो कुछ सरकारों द्वारा किया गया है जिसमें यूपी, एमपी और गुजरात है, एक टेस्टिंग निर्णय है। यह सरकार द्वारा पूंजीपतियों के पक्ष में किया गया एक फैसला है, जिसका आधार यह दिया जा रहा है कि चीन से पलायित होने वाले उद्योग इन कानूनों के शिथिल होने से कहीं अन्यत्र जाने के बजाय देश में आएंगे और उनसे देश का औद्योगीकरण बढ़ेगा जिससे बेरोजगारी कम होगी। राजस्थान भी अंशतः इसमें सम्मिलित है क्योंकि उसने भी काम के घन्टे जो अब तक 8 निर्धारित थे, को बढ़ा कर 12 करने की बात कही है।

उद्योग जगत को बढ़ावा देने का सरकार का उद्देश्य तो उचित है, पर इस उचित उद्देश्य को पूरा करने के लिये कामगारों के ही हित और उन्हें ही प्राप्त कानूनी संरक्षण की बलि क्यों दी जा रही है ? क्या वे ही सबसे आसान टारगेट हैं ?

देश मे वाइब्रेंट गुजरात से लेकर प्रवासी भारतीय सम्मेलन और उस सम्मेलन में सरकार द्वारा नियम कानूनों में उद्योगपतियों को छूट, सस्ती भूमि, पर्यावरण नियमों में शिथिलता के अनेक वादे किए गए हैं पर क्या इन सम्मेलनों का कोई उचित प्रभाव विदेशी निवेश पर पड़ा है ?

सरकार के किसी अध्ययन दल ने क्या उन कारणों को जानने और ढूंढने की कोशिश की है कि पीएम द्वारा पूरी दुनिया का चक्रमण करने और अनेक राज्यों में, विदेशी निवेश को आमंत्रित करने के लिये भव्य और स्वप्निल आयोजनों के बाद भी विदेशी निवेशक क्यों नहीं देश में अपनी पूंजी लगाने के लिये प्रेरित हो रहे हैं ?

क्या पूंजीपतियों के किसी संगठन ने सरकार को यह बताया है कि देश में विदेशी निवेश न आने का कारण देश या राज्यों के विविध श्रम कानून हैं, और उन्हें बदला जाना चाहिये ? और बदला भी जाना चाहिए तो वह बदलाव किस तरह का हो, और क्या उन बदलावों के बारे में कोई त्रिपक्षीय विचार विमर्श, सरकार, पूंजीपति और श्रमिक संगठनों के बीच हुआ है या सरकार का यह निर्णय केवल किचेन कैबिनेट के अफसरों द्वारा ही ले लिया गया है ?

देश ही नहीं विश्वभर की आर्थिक परिस्थितियों को कोरोनापूर्व और कोरोनोत्तर काल खंड में बांट कर देखना होगा। विदेशी निवेश और ब्रांड आसक्ति की परिपाटी 1991 के बाद नए अर्थतंत्र की उपज है। वह दौर ग्लोबलाइजेशन का था। हमने भी बंद खिड़कियों को खोला। ताज़ी हवा के झोंके को महसूस किया। देश मे सर्वांगीण तरक़्क़ी हुई। पुराने और परंपरागत पूंजीपति घराने कमज़ोर हुए, कुछ अतीत हुए और नए नए घराने भी उगे। दुनिया भर में सबसे अधिक अरबपतियों की संख्या हमारे यहां हुई। यह आर्थिक विकास नीचे तक रिस कर आया। ब्रांड आसक्ति से जुड़ा एक नया मध्यवर्ग उत्पन्न हुआ।

जिसकी आर्थिक प्रगति ही केवल नहीं हुई, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी एक अलग समाज बना। समृद्धि गांव गांव तक दिखने लगी। यह एक अच्छा परिवर्तन हुआ। इस समृद्धि का श्रेय पूंजीवादी सिद्धांतों पर आधारित अर्थव्यवस्था ने लिया। कुछ हद तक यह बात सही भी है। लेकिन इस चमक दमक के पीछे यह बात छुप गयी कि इस अर्थतन्त्र का एक परिणाम यह भी हुआ कि अमीर गरीब के बीच एक लंबी दूरी बन गयी। संपत्ति का भयानक रूप से असमान वितरण हुआ। जिससे अन्य समस्याओं का भी जन्म हुआ। विपन्नता और अभाव के सागर में समृद्धि के द्वीप बजबजाते कीचड़ में अलग से उग आए।

कोरोनोत्तर अर्थतंत्र क्या होगा इस पर अभी कुछ भी नहीं कहा जा सकता है, लेकिन जो संकेत मिल रहे हैं वह बहुत आशाजनक नहीं हैं। पूंजीवादी अर्थतंत्र के बेलगाम विकास का एक परिणाम यह भी हुआ कि लोकतंत्र, बस लोक से वोट लेने का एक साधन बन गया और नीति निर्माण में लोक के बजाय पूंजीवादी अर्थतंत्र के समूह का, जो और सिमट कर एक गिरोहबंद पूंजीवाद, जिसे क्रोनी कैपिटलिज़्म कहते हैं, का खुलकर दखल हो गया। पूंजीपति, राजनेता, नौकरशाही गठजोड़ जो कभी पर्दे के पीछे होता था, वह अब अयाँ हो गया और इधर चार पांच साल से एक और विकास यह हुआ है कि इस गठजोड़ में, न्यायपालिका भी कहीं कहीं शामिल हो गयी है।

श्रमिकों से तात्पर्य केवल कारखाने में काम करने वाला श्रमिक वर्ग ही नहीं है बल्कि वह विशाल श्रम बल है जो संगठित और असंगठित क्षेत्रों में अपने श्रम से पूंजी में वृद्धि करता है। पूंजी का कोई मूल्य नहीं है अगर उसमें श्रम न जुड़े तो। श्रमिक कानूनों से किस प्रकार औद्योगीकरण में बाधा पहुंच रही है यह सरकार को खुल कर श्रमिक संगठनों के समक्ष रखना चाहिए और श्रमिक संगठनों को भी इस संबंध में बात करनी चाहिए।

अब सरकारों द्वारा जो कानून निलंबित किये गए हैं उनकी चर्चा करते हैं।

● यूपी, एमपी, गुजरात ने तीन वर्ष के लिए न केवल मौजूदा श्रम कानूनों को निलंबित किया है बल्कि, उद्योगों को उनके रजिस्ट्रेशन और लाइसेंसिंग प्रक्रिया को भी ऑनलाइन कर के सरल कर दिया है।

● नए उद्योगों को अभी श्रम कानून की विभिन्न धाराओं के तहत पंजीकरण कराने और लाइसेंस प्राप्त करने में 30 दिन का समय लगता था, अब वह प्रक्रिया एक दिन में पूरी की जाएगी।

● उद्योगों को उत्पादन बढ़ाने के लिए शिफ्ट में परिवर्तन करने, श्रमिक यूनियनों को मान्यता देने जैसी कई छूट भी मिलेगी।

यह बदलाव चीन से पलायन करने वाली कंपनियों को आकर्षित करने के आधार पर राज्य सरकारों ने किया है। इस परिवर्तन के पीछे सरकारों का तर्क है कि इन बदलावों से उद्योगों को राहत मिलेगी। साथ ही प्रदेश में नए उद्योगों का लगना आसान हो जाएगा। प्रदेश में नए उद्योग आने से लोगों को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे, विशेष तौर पर अन्य राज्यों से पलायन कर अपने घरों को वापस लौटने वाले श्रमिकों को उनके गृह जनपद में रोजगार की संभावना बढ़ेगी।

उत्तर प्रदेश सरकार ने इसके लिए ‘उत्तर प्रदेश टेंपरेरी एग्जेम्प्शन फ्रॉम सर्टेन लेबर लॉज ऑर्डिनेंस 2020’ को मंजूरी प्रदान कर दी है। इससे कानून में किए गए प्रमुख बदलाव इस प्रकार हैं।

● संसोधन के बाद यूपी में अब केवल बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स एक्ट 1996 लागू रहेगा।

● उद्योगों को वर्कमैन कंपेनसेशन एक्ट 1923 और बंधुआ मजदूर एक्ट 1976 का पालन करना होगा।

● उद्योगों पर अब ‘पेमेंट ऑफ वेजेज एक्ट 1936’ की धारा 5 ही लागू होगी।

● श्रम कानून में बाल मजदूरी व महिला मजदूरों से संबंधित प्रावधानों को बरकरार रखा गया है।

●  उपर्युक्त श्रम कानूनों के अलावा शेष सभी कानून अगले 1000 दिन के लिए निष्प्रभावी रहेंगे।

● औद्योगिक विवादों का निपटारा, व्यावसायिक सुरक्षा, श्रमिकों का स्वास्थ्य व काम करने की स्थिति संबंधित कानून समाप्त हो गए।

● ट्रेड यूनियनों को मान्यता देने वाला कानून भी 1000 दिन के लिए खत्म कर दिया गया है।

● अनुबंध श्रमिकों व प्रवासी मजदूरों से संबंधित कानून भी 1000 दिन के लिए समाप्त कर दिए गए हैं।

● यूपी सरकार द्वारा लेबर कानून में किए गए बदलाव नए और मौजूदा, दोनों तरह के कारोबार व उद्योगों पर लागू होगा।

● उद्योगों को अपनी सुविधानुसार शिफ्ट में काम कराने की छूट दी गई है।

मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने उद्योगों को राहत व बढ़ावा देने के लिए सबसे पहले लेबर कानूनों में बदलाव की घोषणा की थी। मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य में अगले 1000 दिनों (लगभग ढाई वर्ष) के लिए श्रम कानूनों से उद्योगों को छूट दे दी है। एमपी सरकार ने श्रम कानून में निम्न अहम बदलाव किये हैं…

● छूट की इस अवधि में केवल औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25 लागू रहेगी।

● 1000 दिनों की इस अवधि में लेबर इंस्पेक्टर उद्योगों की जांच नहीं कर सकेंगे।

● उद्योगों का पंजीकरण/लाइसेंस प्रक्रिया 30 दिन की जगह 1 दिन में ऑनलाइन पूरी होगी।

● अब दुकानें सुबह 6 से रात 12 बजे तक खुल सकेंगी। पहले ये समय सुबह 8 बजे से रात 10 बजे तक था।

● कंपनियां अतिरिक्त भुगतान कर सप्ताह में 72 घंटे ओवर टाइम करा सकती हैं। शिफ्ट भी बदल सकती हैं।

● कामकाज का हिसाब रखने के लिए पहले 61 रजिस्टर बनाने होते थे और 13 रिटर्न दाखिल करने होते थे।

● संशोधित लेबर कानून में उद्योगों को एक रजिस्टर रखने और एक ही रिटर्न दाखिल करने की छूट दी गई है।

●  20 से ज्यादा श्रमिक वाले ठेकेदारों को पंजीकरण कराना होता था। ये संख्या बढ़ाकर अब 50 कर दी गई है।

● 50 से कम श्रमिक रखने वाले उद्योगों व फैक्ट्रियों को लेबर कानूनों के दायरे से बाहर कर दिया गया है।

● संस्थान सुविधानुसार श्रमिकों को रख सकेंगे। श्रमिकों पर की गई कार्रवाई में श्रम विभाग व श्रम न्यायालय का हस्तक्षेप नहीं होगा।

मध्य प्रदेश व यूपी के बाद गुजरात ने भी राज्य श्रम कानूनों में कुछ बदलाव और निलंबन की घोषणा की है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में 1000 दिन की छूट के मुकाबले गुजरात ने 200 दिन ज्यादा के लिए कानूनी छूट की घोषणा की है। गुजरात में उद्योगों को 1200 दिनों (3.2 साल) के लिए लेबर कानून से छूट प्रदान की गई है। गुजरात सरकार द्वारा किए गए अहम बदलाव इस प्रकार हैं।

● नए उद्योगों के लिए 7 दिन में जमीन आवंटन की प्रक्रिया को पूरा किया जाएगा।

● नए उद्योगों को काम शुरू करने के लिए 15 दिन के भीतर हर तरह की मंजूरी प्रदान की जाएगी।

● नए उद्योगों को दी जाने वाली छूट उत्पादन शुरू करने के अगले दिन से 1200 दिनों तक जारी रहेगी।

● चीन से काम समेटनी वाली जापानी, अमेरिकी, कोरियाई और यूरोपियन कंपनियों को लाने का है लक्ष्य।

● गुजरात ने नए उद्योगों के लिए 33 हजार हेक्टेयर भूमि की चिन्हित।

● नए उद्योगों के रजिस्ट्रेशन व लाइसेंस आदि की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन कर दी गई है।

● नए उद्योगों को न्यूनतम मजदूरी एक्ट, औद्योगिक सुरक्षा नियम और कर्मचारी मुआवजा एक्ट का पालन करना होगा।

●  देश की जीडीपी में गुजरात की हिस्सेदारी 7.9 फीसद है। कुल निर्यात में हिस्सेदारी करीब 20 फीसद है।

● उद्योगों को लेबर इंस्पेक्टर की जांच और निरीक्षण से मुक्ति।

●  अपनी सुविधानुसार शिफ्ट में परिवर्तन करने का अधिकार।

सरकार का अनुमान है कि इससे औद्योगीकरण में निम्न लाभ होगा।

● उद्योग-धंधे बंद होने से नौकरियां खतरे में हैं और वेतन कटौती का सिलसिला शुरू हो चुका है। उद्योग शुरू होने से स्थिति सुधरेगी।

● राज्य अगर चीन से पलायन करने वाली या अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाने में सफल होते हैं तो ये अर्थव्यवस्था और रोजगार दोनों के लिए लाभकारी होगा।

● प्रतिमाह 15000 रुपये या कम वेतन वाले कर्मचारी की तनख्वाह में कटौती नहीं की जा सकती है।

● पंजीकरण व लाइसेंसी प्रक्रिया तेज होने से उद्योगों के लिए अब कार्य विस्तार करना आसान होगा। इससे रोजगार भी बढ़ेगा।

● काम के घंटे बढ़ाकर लॉकडाउन में कम लेबर से भी काम किया जा सकेगा और सोशल डिस्टेंसिंग भी बरकरार रहेगी।

● इतिहास की सबसे बड़ी बेरोजगारी व मंदी से बचने में काफी हद तक मददगार साबित हो सकता है।

● श्रमिकों के शोषण जैसी आशंका पर विशेषज्ञ कहते हैं, इस वक्त जब बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा या लोग लॉकडाउन में फंसे हुए हैं, उद्योगों को भी श्रमिकों की जरूरत है।

● उद्योग शुरू होने से सरकार को भी राजस्व प्राप्त होगा, जो कोरोना की जंग लड़ने में सबसे अहम है।

लेकिन इन कानूनों को जिन्हें एक लंबी लड़ाई और समयसमय पर अनेक सरकारी और पूंजीपतियों की लॉबी के विरोध के बाद पाया गया है पर क्या प्रभाव पड़ेगा, एक नज़र उस पर भी देखते हैं।

● आशंका है कि उद्योगों को जांच और निरीक्षण से मुक्ति देने से कर्मचारियों का शोषण बढ़ेगा।

● शिफ्ट व कार्य अवधि में बदलाव की मंजूरी मिलने से हो सकता है लोगों को बिना साप्ताहिक अवकाश के प्रतिदिन ज्यादा घंटे काम करना पड़े। हालांकि, इसके लिए ओवर टाइम देना होगा।

● श्रमिक यूनियनों को मान्यता न मिलने से कर्मचारियों के अधिकारों की आवाज कमजोर पड़ेगी।

● उद्योग-धंधों को ज्यादा देर खोलने से वहां श्रमिकों को डबल शिफ्ट करनी पड़ सकती है। हालांकि, इसके लिए ओवर टाइम का प्रावधान भी किया गया है।

● पहले प्राविधान था कि जिन उद्योग में 100 या ज्यादा मजदूर हैं, उसे बंद करने से पहले श्रमिकों का पक्ष सुनना होगा और अनुमति लेनी होगी। अब ऐसा नहीं होगा।

● आशंका है कि मजदूरों के काम करने की परिस्थिति और उनकी सुविधाओं पर निगरानी खत्म हो जाएगी।

● आशंका है कि अगर अर्थव्यवस्था जल्द पटरी पर नहीं लौटी तो उद्योगों में बड़े पैमाने पर छंटनी और कामगारों की वेतन कटौती शुरू हो सकती है।

● ग्रेच्युटी से बचने के लिए उद्योग, श्रमिकों की ठेके पर लेने की प्रथा बढ़ सकती हैं।

उद्योगों को सुविधाएं देने के दो विंदु हैं जो उद्योगों के संसाधन और सुविधाओं से जुड़े हैं दूसरे उसमें काम करने वाले कामगारों से जुड़े हैं। सरकार द्वारा  भूमि,  बिजली, करों में राहत, तरह तरह के इंसेंटिव, ऋण आदि उद्योगों को राहत देने वाले कदमों का कोई विरोध नहीं है। सरकार उद्योगों की प्रकृति के आधार पर यह सब सुविधाएं दे सकती है। लेकिन श्रम कानूनों को निलंबित करना तो शोषण का ही रास्ता प्रशस्त करना है। वैसे भी श्रम विभाग के होते हुए भी अधिकतर श्रम कानून केवल कागज़ पर ही हैं और उनका पालन भी नहीं होता है। वे एक प्रकार से उत्कोच उगाही के माध्यम बन कर रह गए हैं। लेकिन फिर भी इन कानूनों का कुछ न कुछ तो भय उद्योगपतियों पर तो रहता ही है।

अब जब यह कानून हज़ार दिनों के लिये निलंबित हो गए हैं तो न केवल कामगारों की आवाज़ कमज़ोर हो जाएगी, बल्कि सरकार भी आगे चल कर इन कानूनों को पुनर्जीवित करने से बचेगी औऱ ऐसा न करने के लिये उस पर उद्योगपति लॉबी का दबाव भी पड़ेगा। आज भी भले ही सरकार चीन से आने वाले उद्योगों के लिये इन कदमों को उठाने की ज़रूरत का तर्क दे, पर सच तो यह है कि वह इस आपदा में पूंजीपतियों के एजेंडे पर चलने का एक अवसर तैयार कर रही है। श्रम कानूनों के निलंबन का विरोध जम कर होना चाहिए। संकट में उद्योग, अर्थव्यवस्था, बाजार, पूंजी और पूंजीपति हैं तो श्रमिकों के समक्ष भी संकट कम नहीं है। श्रमिकों के समक्ष जो आपदा इस कोरोना वायरस ने उत्पन्न की है वैसी आपदा समाज के किसी भी वर्ग पर नहीं आयी है। सरकार को इस संकट में विपन्न और ज़रूरतमंद कामगारों की ओर रहना चाहिये।

श्रमिक कानूनों के अंतर्गत मिले हुये न्यूनतम मजदूरी, कार्यस्थल पर आवास, चिकित्सा, परिवार के लिये अन्य सुविधाएं, प्रोविडेंट फंड, ईएसआई, बेहतर आवासीय और बच्चों के लिये स्कूल आदि की सुविधाएं कोई खैरात या आजकल का एक प्रचलित निष्ठुर शब्द फ्रीबी नहीं है, बल्कि यह लम्बी लड़ाई के बाद पाया गया एक अधिकार है जो संविधान के मौलिक अधिकारों से संरक्षित और नीति निर्देशक तत्वों से निर्देशित हैं। हम एक लोक कल्याणकारी राज्य के अंतर्गत आते हैं। हमारे संविधान का मूल लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर आधारित है। किसी भी लोक कल्याणकारी राज्य में श्रमिक कानूनों के अंतर्गत जीने के अधिकार को, भले ही वह कुछ समय के लिए ही न हो, यूँ ही नहीं स्थगित किया जाना चाहिये। आर्थिक विकास बेहतर जीवन का लक्ष्य नहीं है बल्कि वह बेहतर जीवन पाने का एक साधन है।

श्रमिक संगठन और लोग, अगर आज इस निर्णय पर मौन रहे तो कल इसी पूंजीवादी विकास के नाम पर मौलिक अधिकारों पर हमले होंगे, सुख पूर्वक तमाम संकटों से सुरक्षित सरकारी नौकरियाँ भी इस मौन के बाद सुरक्षित नहीं रह पाएंगी। निशाने पर वह भी है। जैसे 2004 के बाद लोगों की पेंशन बंद हो गई है, एक-एक कर के यह सारे संरक्षण कम होते जाएंगे। सरकार को अगर लगता है कि आर्थिक विकास में कुछ श्रम कानून बाधक हैं तो उसे यह बात बतानी चाहिए और श्रमिक संगठनों को आश्वस्त भी करना चाहिए, किन कानूनों ने देश या राज्यों के औद्योगीकरण में बाधा पहुंचाई है और कैसे पहुंचाई है।

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफ़सर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं। )

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This post was last modified on May 13, 2020 11:10 pm

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