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खेती छीन कर किसानों के हाथ में मजीरा पकड़ाने की तैयारी

अफ्रीका में जब ब्रिटिश पूंजीवादी लोग पहुंचे तो देखा कि लोग अपने मवेशियों व जमीन से बहुत प्यार करते हैं। मवेशी परिवार के सदस्य की तरह व जमीन को मां-बाप की तरह मानते हैं। ब्रिटिश पूंजीवादियों ने एक युक्ति निकाली। मिशनरी को फंडिंग की और बाइबिल दे कर आगे कर दिया। बाइबिल की न्यू टेस्टामेंट व ओल्ड टेस्टामेंट की रूहानी कहानियां व जीवन बदलने की चमत्कारिक बातों ने बड़ा कमाल कर दिया।

जब मवेशी व जमीन सब छिन गए तो धर्म का नशा उतरा और अस्तित्व की आंख खुली। जब आंख खुली तो उन के हाथ में बाइबिल व कंपनियों के पास पशु से ले कर जमीनों तक की शर्तों के करार थे। भारत में जिन आदिवासी इलाकों को पिछड़ा कहा जाता है, वहां भी धर्म की अफीम दे कर पूंजीवादी लुटेरों ने बिचौलिए भेजे। उन्होंने सब्जबाग दिखाया कि हम आप का जीवन बेहतर करने आए हैं। जब असलियत समझ में आई तो हाथों में बाइबिल/गीता/कुरान थी और जमीनों पर जिंदल/अडानी/अम्बानी थे।

चमत्कारिक किताबें फेंक कर अंत में हथियार उठाने पड़े और देश के असली मूल निवासी आज नक्सली कहला कर कीड़े मकोड़ों की तरह मर रहे हैं और देश का बहुसंख्यक तबका उनको दुश्मन समझ कर गालियां दे रहा है।कुछ दशक पहले रामलीला मंडली, कथावाचक किसानों के इलाकों में आए और कहा कि तुम्हारा भविष्य यहां है, सुख समृद्धि, तरक्की और खुशहाली का रास्ता यहीं से गुजरता है। किसान इन की रूहानी कहानियों में झूमने लगे और खुद तो अपने भाइयों को फांसी पर झुलाए ही मगर अपने बच्चों को शाखाओं, कथाओं, राम लीलाओं में भेज कर भाग्य खोजते रहे।

आज किसानों के घरों में व्रत कथाओं की किताबें है, गीता है, कुरान है, बाइबिल है और कुछ शेष बच गया तो भूतप्रेत से बचने के, खोया प्यार पाने के, धन की वर्षा करवाने के ताबीज हैं, मगर पशु/मवेशी आवारा हैं और जमीन साहूकारों व बैंकों के यहां गिरवी हैं।

जाति-धर्म का फितूर

पिछले 6 सालों से सत्ताधारी नेताओं के बयानों, टीवी की प्राइम टाइम डिबेट्स को देखा जाए तो धार्मिक उन्माद के अलावा कभी किसानों की समस्याओं पर कोई चर्चा नहीं हुई। अखबार, टीवी, पत्रकारों के सोशल मीडिया पेज आदि सब के सब धार्मिक उन्माद से भरे रहे। यही वजह रही कि किसानों की वर्तमान पीढ़ी धर्म की अफीम में उलझ कर जड़ों से कट गई। कटी हुई पतंगे हवा के रुख के हिसाब से किधर भी जा कर गिर सकती हैं मगर मूल जड़ पर कभी नहीं गिरेंगी।

पश्चिम में जब विज्ञान की बुनियाद रखी जा रही थी तब चर्च वालों को सत्ता के गलियारों से निकाल कर बाहर कर दिया गया। यहां जब जागने का दौर आया तब तक मंदिर-मस्जिद वाले सत्ता पर काबिज हो गए और मीडिया डिबेट्स में वानरों की तरह उछल कूद करने लग गए। जब धर्म को सत्ता से तोड़ कर मंदिर-मस्जिदों तक समेटना था, तब मठों, मंदिरों, मस्जिदों से निकल कर कुर्सियों पर काबिज हो गए।

साल 1990 के बाद जो कमंडल उठा उन्होंने सब से ज्यादा बर्बाद ओबीसी अर्थात भारत के सब से बड़े किसान वर्ग को किया। एक मेहनतकश वर्ग की युवा पीढ़ी को हिंदुत्व की अफीम पिला कर बर्बादी के चंगुल में फांस लिया गया। इन्होंने किसानों के बीच धार्मिक उन्माद की घुंटी बांटी और बड़े स्तर पर अनुयायी खड़े किए। किसानों से ही चंदा ले कर मठ मंदिर खड़े किए।

इस कार्यक्रम को मूर्तरूप दिया आरएसएस, मंदिर व मठ वालों ने। हिंदुत्व के ऊपर खतरे के काले बादल खड़े किए और खुद चुनावी मैदान में अपने अनुयायियों के साथ उतर पड़े। नब्बे के दशक के बाद जितने भी ढोंगी खड़े हुए हैं उन के पीछे अनुयायियों की फौज ज्यादातर किसान वर्ग से है।

किसान चंदा तो इन को देता है, वोट दे कर सत्ता इन को सौंप देता है क्योंकि किसान को हिंदुत्व के नाम पर कुर्सियों के जो कीड़े नुमा नेता पैदा हुए हैं उन्होंने समझा रखा है कि खतरे के काले बादल साफ कर रहे है। जब किसानों के ऊपर मार पड़ती है तो ये सब लोग गुफाओं में, मठों में, मंदिरों में, मस्जिदों में आराम फरमा रहे होते हैं।

जब हरियाणा का किसान पिटा तो उत्तर प्रदेश का गन्ना किसान, राजस्थान का बाजरे का किसान, मध्य प्रदेश का कपास का किसान और अन्य प्रदेशों के आलू, टमाटर और सब्जियों के किसान तमाशा देखते रहे। जब उन प्रदेशों के एक एक कर के किसान पिटते हैं या पिटेंगे तब हरियाणा के किसान तमाशा देखेंगे। पिटाई सब की होनी तय है। इसलिए किसी को गिला नहीं होना चाहिए। किसान भी आज फसलों के आधार पर ही नहीं, धर्म और जातियों के आधार पर भी बंट चुका है। उस के इस बंटवारे का फायदा तमाम सरकारें और पूंजीपति उठाते हैं।

आज किसानों की दुर्दशा व अन्याय की अनदेखी कर उसे बांटने का काम तथाकथित नेताओं द्वारा किया जा रहा है। किसान के न्याय की लड़ाई भटक चुकी है। मज़हब, वर्ण, जाति, कुल, गोत्र, क्षेत्र, भाषा, ग़रीब, अमीर, छोटा, बड़ा में बंटे निजी स्वार्थ और न जाने कितना पागलपन, पाखंड वाद, आडम्बर, सनातन धर्म के प्रचार का ठेकेदार, गौरक्षा के नाम पर गौशाला के लिए चंदा मांगने, गांव में स्कूल या अस्पताल के लिए नही अपितु नए मन्दिर बनाने, गांव के पुराने मन्दिर में सालभर में हर तीन महीने में भंडारा करवाने की जिम्मेदारी इन किसानों के कंधे पर ही तो है।

आप अक्सर देखते होंगे गांव, कस्बों और जिलों में जगराते, हरिद्वार से कांवड़ लाना, माता के दरबार मे पैदल जाने, नवरात्रे रखने, धार्मिक कार्यों में आगे आ कर किसान धरती पुत्र की बजाय धर्मपुत्र बन कर अपने कीमती समय का दुरुपयोग कर रहा है। खासतौर से पिछले कुछ सालों में हरिद्वार से कांवड़ का प्रचलन किसानों में बहुत तेजी से बढ़ा है।

जानकारी करने पर पता चला इन कांवड़ यात्रियों में आजकल ओबीसी और अन्य पिछड़ी जातियों के युवा बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। पिछले साल अखबार में फ़ोटो के साथ खबर थी कि यूपी के शामली के पुलिस निरीक्षक ने कांवड़ियों के पैर दबाये और अगले दिन मेरठ के कमिश्नर ने हेलीकॉप्टर से फूल बरसाए।

भारतीय राजनीति में किसान का पक्ष मजबूती से रखने वाले कई नेता हुए और किसानों की आवाज़ उठाने वाले नेताओं को किसानों ने कभी हताश या निराश भी नहीं किया। आज ना पहले वाले किसान नेता रहे और ना ही अपने नेताओं का डट कर साथ देने वाले किसान रहे हैं। आज का राजनीतिक दौर धार्मिक और जातिवाद के साथ बदल चुका है।

हर कदम बेइंतहा दर्द

भारत के लोग इस बात को बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि पिछले एक दशक से किसानों की हालत इतनी दयनीय हो गई है जिस की कोई सीमा नहीं है। कई किसान आत्महत्या कर चुके हैं। यह हालात आज़ादी से पहले के भारत की तरह दिखते हैं, जब भारत में नील की खेती करवा कर किसानों का शोषण किया जाता था और अंत में वे आत्महत्या कर लेते थे। आज भी वही हालात हैं।

दूसरी ओर देखें तो सरकार नई योजनाओं को लागू कर रही है। उदाहरण के तौर पर नये किसान अध्यादेश बिल ने सभी को ऊंचे ख्वाब देखने का आग्रह किया, जब नीति के एकाएक शब्दों के पीछे गौर से देखा तो पता लगा कि ये ऊंचे ख्वाब दिखाने वाली नीति वास्तव में ज़मीन के बाशिंदों को पाताल में पहुंचाने की तैयारी कर रही है और जो इस समय हवाओं में हैं, उन को और ऊंचाइयों तक पहुंचाने का एक रास्ता खोल दिया है।

दरअसल, इस किसान विरोधी बिल के मद्देनजर देश को शर्मसार करती कई तस्वीरें सामने हैं। एक तस्वीर उस अन्नदाता प्रीतम सिंह की है, जिसने अकाली नेता प्रकाश सिंह बादल के महल के बाहर कृषि विधेयकों के ख़िलाफ़ ज़हर खा कर जान दे दी थी। दूसरी तस्वीर राज्य सभा में हो रहे बंपर हंगामे की है, जिस में सरकार जम्हूरियत की धज्जियां उड़ाते हुए धक्के से वॉयस वोट से बिल को पास करवा करवाती है.

किसान रोज अपने दर्द को ले कर सोता है और नींद से जागते ही गहरे दर्द की आवाज को भागदौड़ की जिंदगी में भूल जाता है। जाति धर्म की द्वेष भावना में सच्चाई दब जाती है। यह देश का दुर्भाग्य ही है कि किसान अपने उत्पाद की कीमत तक तय नहीं कर सकता, जबकि 90% किसान अपनी जरूरत की वस्तुओं को खरीद कर टैक्स देता है।  ईमानदारी व खून-पसीने की कमाई से अपने परिवार की परवरिश कर देश की आर्थिक व्यवस्था को 70% संभाल कर विश्व में अपना और देश का नाम रोशन करता है।

सरकारों की तरफ से घोषणाएं और योजनाएं कागजों तक ही सीमित रह जाती हैं। राजनीतिक और पावरफुल व्यक्ति उस का लाभ उठा कर उस के हक को खा जाते हैं। बेमौसम बरसात, सूखा, कुदरती आपदा, सरकारों आदि से हारे कुचले अन्नदाता की बरदाश्त की सीमा जब समाप्त हो जाती है तो अपने परिवार पर दुखों का पहाड़ छोड़ कर आत्महत्या कर दुनिया छोड़ जाता है।

देश में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाली लगभग 40% जनता है जिस में सब से ज्यादा तादाद किसान व मजदूर की है। जब कि राजनीतिक पार्टियों का वोट बैंक भी यही है। इन को झूठ, धार्मिक व जातीय नफरत में लपेट कर सत्ता पाई जाती है। हर बार एक उम्मीद व आशा के कारण अन्नदाता वोटर मुख्य रोल भी अदा करता है। अपने अधिकार से वंचित जाति व धर्म विशेष की भूलभुलैया में  किसान बर्बादी के किनारे को पकड़ कर अपनी नैया को पार लगाने की जीवनभर जद्दोजहद करता रहता है।

कौन करे किसान आंदोलन की अगुवाई ?

अगर वर्तमान समय में किसानों को अपनी समस्याओं के लिए सत्ता से लड़ना है तो पिछले 30 सालों के अपने आचरण का विश्लेषण करना होगा। किसानों को सीधे सत्ता के साथ टकराव से बचना चाहिए।

किसान जब आंदोलन की सोचे तो उस का नेतृत्व अपने गांव/कस्बे के मंदिर/आश्रम/मठ वाले को दें। उस के पीछे भजन संध्याओं वाले करतबबाजों को ढोलक/मंजीरों के साथ आगे करें। उन के पीछे हिंदुत्व वाले चरमपंथी संगठनों/सेनाओं को कर दें। जब किसान इन को चंदा दे कर, पाल पोस कर स्थापित करते हैं, नारों/जुलूस/झंडों के लिए अपने बच्चों के भविष्य की कुर्बानी दे कर लगाए हुए है तो इन को काम जरूर लेना चाहिए।

जब अपने मुद्दों पर खड़े न रह कर धर्म की अफीम पी कर मदमस्त हो कर घूमोगे तो सत्ता अपने मित्रों के लिए आप के बच्चों को आप के सामने लट्ठ दे कर खड़ा करेगी ही। जैसी जनता की सोच होगी, उसी अनुरूप राज्य व्यवस्था चलेगी।

(मदन कोथुनियां स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल जयपुर में रहते हैं।)

This post was last modified on September 22, 2020 3:59 pm

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