Friday, April 19, 2024

धुर किसान विरोधी बजट: बड़ी लड़ाई में उतरने के अलावा किसानों के पास कोई विकल्प नहीं

मोदी सरकार के आखिरी पूर्ण बजट ने किसानों की रही सही उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया है। किसानों के मन में अब रत्ती भर भी शक नहीं बचा कि यह एक धुर किसान-विरोधी, गांव-विरोधी, गरीब विरोधी सरकार है।

2024 के Crucial चुनावों के पहले मोदी सरकार के आखिरी पूर्ण बजट के इस दुस्साहसिक रुख को लेकर लोग दंग हैं। दरअसल हाल ही में RSS के आनुषंगिक संगठन राष्ट्रीय किसान मंच ने रामलीला मैदान में बड़ी रैली करके जब कई अन्य मांगों के साथ किसान सम्मान निधि मासिक 500 रुपये- से बढ़ाकर 1000 रुपये- करने  की मांग की थी, तो यह माना जा रहा था कि यह चुनाव-पूर्व किसानों को खुश करने और बहलाने-फुसलाने के लिए सरकार के इशारे पर उठाई गई मांग है। लेकिन बजट में सरकार ने किसानों के पक्ष में यह न्यूनतम कदम भी नहीं उठाया।

बजट के तमाम किसान-विरोधी प्रावधान दुस्साहसिक इसलिये भी हैं कि यह सब उस समय हो रहा है जब देश कुछ समय पहले ही एक ऐतिहासिक आंदोलन से निकला है और सरकार किसानों से आंदोलन वापसी के समय किये गए बहुत से समझौतों से विश्वासघात कर चुकी है, जिसके खिलाफ पहले से ही किसानों में भारी आक्रोश है और अभी इसी सप्ताह वे एक बार फिर दिल्ली कूच का ऐलान कर चुके हैं।

इससे दो बातें साफ हैं पहली यह कि कॉरपोरेट की सेवा में सब कुछ “तुभ्यमेव समर्पयामि” की अवस्था में पहुंच चुके मोदी राज में अर्थव्यवस्था इस कदर तबाह हो चुकी है और सरकार के हाथ इतनी बुरी तरह बंधे हुए हैं कि चुनाव के समय भी वह पहले से ही नाराज विराट किसान मतदाता समूह को कुछ भी दे पाने की स्थिति में नहीं है। उनके पास Manoeuvre कर पाने का स्पेस खत्म हो गया है।

दूसरा यह कि सरकार की किसानों के प्रति न कोई संवेदना है, न उनके आंदोलन की कोई परवाह है। शायद वह कॉरपोरेट की मदद से अपने विभाजनकारी नैरेटिव के बल पर बिखरे, एजेंडा विहीन दिख रहे विपक्ष को रौंदते हुए चुनाव जीतने के प्रति आश्वस्त है।

स्वाभाविक है संयुक्त किसान मोर्चा ने बजट को किसान-विरोधी करार देते हुए बेहद तल्ख प्रतिक्रिया दी है, “यह तो सर्वविदित था कि खेती और किसानी की मोदी राज में घोर उपेक्षा होती रही है, पर हमें उम्मीद थी कि दिल्ली बॉर्डर पर ऐतिहासिक किसान आंदोलन के बाद, सत्तारूढ़ पार्टी कृषि क्षेत्र के महत्व तथा देश के विशाल बहुसंख्या वाले किसान समुदाय के लिए सुरक्षित आय और भविष्य की जरूरत को समझेगी।”

“कुल मिलाकर, इस बजट ने यह दिखा दिया है कि सरकार को किसानों के हितों की बिल्कुल भी परवाह नहीं है, बावजूद इसके कि उसने अपने मंत्रालय के नाम में ‘किसान कल्याण’ का ‘जुमला’ जोड़ रखा है।”

“ऐसा लग रहा है कि सरकार 3 कृषि कानूनों की वापसी की अपनी हार का किसान समुदाय से बदला लेने पर उतारू है। मोर्चा इस किसान विरोधी बजट की घोर भर्त्सना करता है और देश के किसानों से आह्वान करता है कि MSP समेत अन्य ज्वलंत मुद्दों को लेकर वे एक और बड़े संघर्ष (massive struggle) के अगले चक्र की तैयारी में उतर पड़ें।”

सचमुच बजट में कृषि क्षेत्र के आवंटन पर गौर किया जाय तो जिस तरह बढ़ने की बजाय वह पहले से भी घट गया है, यह किसानों को मुंह चिढ़ाने जैसा है। कृषि क्षेत्र का आवंटन 2022-23 के 3.84% से घटकर अब 3.20% रह गया है। इसी तरह ग्रामीण विकास का बजट भी पिछले 5.81% से घटकर 5.29% हो गया है। खाद सब्सिडी पिछले बजट के 225,000 करोड़ रुपये से घटकर 175,000 करोड़ रुपये रह गयी है।

मनरेगा का बजट आवंटन 2022 में 73,000 करोड़ रुपये था, लेकिन ग्रामीण बेरोजगारी और बढ़ती मांग के सामने सरकार को मजबूरन 90,000 करोड़ रुपये खर्च करना पड़ा था। ऐसे समय में, जब सामान्य अर्थव्यवस्था और विशेष रूप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार गहरे संकट में है, यह अकल्पनीय है कि सरकार ने मनरेगा के आवंटन को 30,000 करोड़ घटाकर, ₹ 60,000 करोड़ कर दिया है।

बहुप्रचारित किसान-सम्मान निधि के बारे में यह चौंकाने वाला खुलासा पहले ही हो चुका है कि उसके Beneficiaries की संख्या में भारी कटौती कर दी गयी है। कहां किसान उसके 6 हजार से बढ़कर 12 हजार होने की उम्मीद लगाए थे, कहां अब उसके लिए कुल आवंटन 68,000 करोड़ से घटाकर 60 हजार करोड़ कर दिया गया है।

ठीक इसी तरह PM फसल बीमा योजना, जिसके द्वारा प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान से किसानों को सुरक्षा दी जानी थी, उसका बजट भी पिछले साल के 15,500 करोड़ से घटकर 13,625 करोड़ रह गया है।

किसानों की आय और सुरक्षा के प्रति सरकार के रुख का सबसे बड़ा बैरोमीटर है MSP के सवाल पर उसका रुख, जो किसान आंदोलन के केंद्रीय प्रश्न के रूप में उभर चुका है।

किसानों की आय दोगुना करने और MSP गारंटी के सवाल से सरकार पल्ला झाड़ चुकी है। संयुक्त किसान मोर्चा के बयान में कहा गया है, “केंद्रीय बजट 2023 स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिश के अनुसार फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की स्थिति और किसानों को एमएसपी की कानूनी गारंटी सुनिश्चित करने के लिए उठाए जाने वाले कदम पर मौन है।”

“जहां सरकार एमएसपी और उसकी गारंटी के लिए किसानों की मांगों का तर्कहीन विरोध कर रही है, वहीं इस बजट ने किसानों को एमएसपी सुनिश्चित करने के लिए मामूली प्रयासों को भी हटा दिया है।”

“पीएम अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (AASHA) जैसी प्रमुख योजनाओं में आवंटन में लगातार गिरावट हुई है। 2 साल पहले यह ₹ 1500 करोड़ था। 2022 में यह ₹ 1 करोड़ हो गया। 15 करोड़ कृषि घरानों को सुरक्षित करने के लिए महज़ ₹ 1 करोड़।”

“इसी तरह, मूल्य समर्थन योजना (PSS) और बाजार हस्तक्षेप योजना (MIS) के लिए आवंटन ₹ 3,000 करोड़ रुपये से घटकर वर्ष 2022 में ₹ 1,500 करोड़ रुपये कर दिया गया था और इस साल यह एक अकल्पनीय ₹ 10 लाख रह गया है। वास्तव में, सरकार ने आशा, पीएसएस और एमआईएस को और इसके साथ किसानों की एमएसपी प्राप्त करने की उम्मीद को मार दिया है।”

“खेती-किसानी के सारे मदों में इतने बड़े पैमाने पर कटौती के साथ, सरकार का इरादा स्पष्ट है: भारत के कृषि क्षेत्र और किसानों की जीवन शक्ति निचोड़ लेना।”

प्रो0 प्रभात पटनायक के शब्दों में यह औपनिवेशिक दौर की साम्राज्यवादी नीति की तर्ज़ पर नवउदारवादी दौर में भारतीय कृषि को Squeeze कर उसके कॉरपोरेटीकरण की राह प्रशस्त करना है। किसानों को निचोड़कर, ग्रामीण क्षेत्र में खाद्यान्न की Demand को Suppress कर तथा MSP पर सरकारी खरीद और गरीबों के लिए खाद्यान्न योजना को हतोत्साहित कर यह कृषि क्षेत्र में वैश्विक वित्तीय-कॉरपोरेट पूंजी का प्रवेश सुनिश्चित करने की रणनीति है, यह भारत में Cropping Pattern को साम्राज्यवादी देशों की जरूरत के अनुरूप बदलकर भारत को खाद्यान्न आयातक देश में बदल देगा।

जाहिरा तौर पर इसके हमारी खाद्यान्न सुरक्षा व सम्प्रभुता के लिए गम्भीर निहितार्थ हैं। यह रणनीति सफल हुई तो वह दिन दूर नहीं जब देश में किसानों की आत्महत्याओं के साथ औपनिवेशिक काल के अकाल और दुर्भिक्ष फिर लौट आएंगे जिनमें अंग्रेजों के राज में 3 करोड़ हिंदुस्तानी मारे गए थे।

3 कृषि कानूनों के माध्यम से कृषि के कॉरपोरेटीकरण की साजिश को किसानों ने अपने ऐतिहासिक आंदोलन द्वारा नाकाम कर दिया था, अब यह बजटीय प्रावधानों और अन्य तरीकों से उसे अंजाम देने की मुहिम है।

जाहिर है पानी अब सर के ऊपर से निकल गया है, समय आ गया है कि किसान सरकार की बड़ी घेरेबंदी में उतरें। उम्मीद है संयुक्त किसान मोर्चा की 12 फरवरी की बैठक में निर्णायक लड़ाई का आगाज़ होगा।

(लाल बहादुर सिंह, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे हैं)

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