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30 अप्रैलः हिटलर की खुदकुशी का दिन और उसकी नाटकीयता

30 अप्रैल यानी आज ही के दिन एडोल्फ हिटलर ने आत्महत्या की थी। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जब हिटलर को लगने लगा कि अब वह यह बड़ी जंग किसी भी तरह से, जीत नहीं पायेगा तो उसने अपनी पत्नी इवा ब्राउन के साथ खुद को बर्लिन में मौजूद एक खुफिया बंकर के एक कमरे में बंद कर लिया। यह बंकर करीब 50 फिट नीचे जमीन में बना हुआ था। अपनी क्रूरता, ज़िद और अहंकार से दुनिया भर में डर का माहौल पैदा करने वाला हिटलर हार के भय से इतनी बुरी तरह से टूट गया था कि उसने खुद को खत्म करने का फैसला कर लिया। सोवियत सेनाओं की पकड़ में आने से पहले ही उसने पकड़े जाने के डर से खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। हिटलर मरने के बाद भी दुश्मनों के हाथ नहीं लगना चाहता था, इसीलिए उसने अपने एक करीबी अधिकारी से एक वादा लिया, कि मरने के बाद उसकी और पत्नी एवा की लाश को पेट्रोल छिड़ककर जला दिया जाए, और ऐसा हुआ भी।

हिटलर आधुनिक इतिहास का एक विलक्षण चरित्र है। अतिराष्ट्रवाद या अंधराष्ट्रवाद से पीड़ित, एक जाति या धर्म के प्रति भयंकर पूर्वाग्रह और आपराधिक मानसिकता से ग्रस्त, रक्त की शुद्धता के प्रति उन्माद भरे विचारों से लैस, इस व्यक्ति ने अपने पागलपन से बीसवीं सदी के ही नहीं बल्कि मानव इतिहास के सबसे त्रासद और हिंसक युद्ध की पीठिका रखी थी। अपने देश को यूरोप में सबसे सम्मानित स्थान और एक मज़बूत राष्ट्र के रूप में स्थापित करने की इसकी अभिलाषा ने अंततः इसके देश को खंड-खंड कर दिया। बेहद मज़बूत इरादों का खुद को दिखाने वाले इस दंभी व्यक्ति ने अंततः आत्महत्या कर ली, और अपने पीछे छोड़ गया, एक भग्न और विखंडित देश, और अपने विचारों का खोखला पाखण्ड।

1919 में प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त हुआ था। 1939 में दूसरा शुरू हुआ। प्रथम में भी जर्मनी बुरी तरह हारा था। दूसरे में तो उसे मित्र देशों ने बाँट ही लिया था। 1919 से 1939 के बीच के बीस सालों में हिटलर ने अंधराष्ट्रवाद और रक्त की शुद्धता का जो मायाजाल फैलाया, उस से पूरा जर्मनी चौंधिया गया और उस चौंधियाहट ने पूरे जर्मनी के युवा वर्ग को अंधा कर दिया। प्रकाश का यह सन्निपात युवाओं को और कुछ देखने ही नहीं देता था। केवल एक ही भावना ठाठें मार रही थी कि पहले विश्व युद्ध का बदला लिया जाए। हिटलर एक अद्भुत और अत्यंत प्रभावशाली वक्ता था। उसके भाषण लोगों को हिस्टिरिकल बना देते थे। दुनिया उसकी वाणी का लोहा मानती थी।

लोग बताते हैं, बनारस के इक्के वाले भी जब इक्कों की दौड़ होती थी तो घोड़े को पुचकार कर ललकारते थे, चल बेटा, हिटलर की चाल। यह राजनेता का गुण और देश को दिशा देने वाली मानसिकता का लक्षण नहीं था, यह उन्माद और केवल उन्माद था।

वह खुद को आर्य कहता था। आर्यों की एक शाखा का, ईरान और यूरोप की ओर जाना प्रमाणित है। ईरानी इस्लामी क्रान्ति जो 1979 में अयातुल्लाह खोमैनी के नेतृत्व में हुयी थी, जिसमें ईरान के शाह रजा पहलवी को अपदस्थ कर दिया गया था, में शाह ईरान की एक पदवी आर्यमिहिर भी थी। उसका राज चिह्न सूर्य था। शाह को इस क्रान्ति के बाद अमेरिका में शरण लेनी पड़ी। दूसरी शाखा यूरोप की और गयी। हिटलर खुद को इसी शाखा का मानता था और रक्त की शुद्धता का भाव उसे बहुत था। उसने भी एक राजनीतिक दल, नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी का गठन 1920-1945 में किया था। यह दल बाद में नाज़ी पार्टी कहलाई और हिटलर की विचार धारा नाजीवादी विचार धारा कहलाई।

नाज़ी शब्द जर्मन भाषा के नेशनल सोशलिज्म का सक्षिप्त रूप है। यह दल और विचारधारा रक्त की शुद्धता और सेमेटिक विरोधी था। बाद में हिटलर नाज़ी पार्टी का सर्वेसर्वा बन गया। यहूदियों से जो सेमेटिक थे, उसकी जानी दुश्मनी थी। आधुनिक युग में किसी एक धर्म की सामूहिक हत्या और पलायन का इतना वीभत्स इतिहास शायद ही मिलेगा। उसकी आत्म कथा, मीन काम्फ़, मेरा संघर्ष एक अत्यंत चर्चित और लोकप्रिय पुस्तक है। पेंटर से ले कर जर्मनी का राज प्रमुख बनने की उसकी कहानी रोचक तो है ही, साथ ही  उसके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को भी दर्शाती है।

पर हर व्यक्ति का सब कुछ कभी नहीं दिखता है। कुछ न कुछ गोपन रहता ही है और कुछ वह कभी नहीं किसी से कहना चाहता है। पर साथ के लोग, उसके बारे में कुछ न कुछ, सायास या अनायास जान ही जाते हैं। आज ऐसे ही उसके जीवन और व्यक्तित्व के अनदेखे और अनजाने पक्ष की ओर मैं आप को ले जा रहा हूं।

1940 में उसकी आत्मकथा मीन काम्फ़ की समीक्षा जॉर्ज ऑरवेल ने की थी।  वह प्रसिद्ध लेखक जॉर्ज ओरवेल नहीं हैं, बल्कि एक अन्य अल्पख्याति समीक्षक हैं। उन्होंने समीक्षा के दौरान हिटलर के व्यक्तित्व में नकारात्मक अंशों के विकास पर बहुत बारीकी से अध्ययन किया। ऑरवेल एक मनोवैज्ञानिक भी थे। उनकी मनोविज्ञान में दिलचस्पी ने हिटलर के व्यक्तित्व के नकारात्मक भाव को समझने में बहुत मदद की। उन्होंने इसे बुराई का जीवंत प्रतीक या मानवीय प्रतीक कहा। 1930 में ही हिटलर का  उत्थान शुरू हो गया था। उसके व्यक्तित्व के नकारात्मक पक्ष को जर्मनी झेलने भी लगा था। नौ साल बाद ही जो द्वीतीय महासमर हुआ, उसमें शुरुआती तीन साल तक तो जर्मनी अजेय ही दिखा, पर अंततः जैसे सारी बुराइयों का अंत होता है, इसका भी हुआ।

जॉर्ज ऑरवेल लिखते हैं, “हिटलर, अपने प्रतिद्वंद्वियों के विरुद्ध, कभी सफल नहीं हो पाता, अगर उसने अपने व्यक्तित्व को और आकर्षक नहीं बनाया होता तो। वह अपनी क्षवि और अपने भाषणों के प्रति बहुत सजग रहता था। उसके आत्मकथा से यह बात अक्सर प्रमाणित होती है। उसके भाषणों को जब आप बार-बार सुनेंगे तो यह स्वतः प्रमाणित हो जाएगा। मैं इसे जोर देकर कहना चाहूँगा कि हिटलर को मैं कभी नापसंद नहीं कर सका, जब तक कि वह सत्ता में नहीं आ गया। पर मैंने खुद को छला गया महसूस किया जब वह सत्ता में आया तो।  मैं सोचता था कि अगर मैं उसके क़रीब किसी प्रकार पहुंच जाता तो उसकी हत्या कर देता। पर इसलिए नहीं कि  उस से मेरी कोई व्यक्तिगत शत्रुता थी। पर हैरानी यह है कि वह इन बुराइयों के बाद भी मुझे कभी-कभी अपील भी करता था,  जब मैं विभिन्न मुद्राओं में, उसके फ़ोटो देखता था तो।

उसकी पुस्तक के हर्स्ट और ब्लैकेट संस्करण में जो शुरुआती दौर के फ़ोटो छपे हैं उन्हें देखने के लिए ज़रूर मैं आप को सुझाव दूंगा, जिसमें वह भूरी शर्ट पहने दिखता है। वह खुद को इन चित्रों में कभी सलीब पर टंगे ईसा की तरह, कभी शहीद की मुद्रा में तो कभी खुद को पीड़ित रूप से दिखने की कोशिश करता है। वह खुद को प्रोमेथियस (ग्रीक देवता जो मनुष्य जाति के लिए अनेक कष्ट सहता है। ग्रीक माइथोलॉजी में इसकी बहुत चर्चा की गयी है) की तरह जो एक शिला से जंजीरों से बंधा हुआ, दुनिया भर की सारी विषमताओं से अकेले हीं लड़ता हुआ दिख रहा है। दिखाना चाहता था।”

ऑरवेल आगे लिखते हैं, “हिटलर की क्षवि या अपील मूलतः प्रतीकात्मक थी।” आज के अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनावों से इसकी तुलना करें तो पाएंगे कि रूज़वेल्ट से लेकर, निक्सन और अब ओबामा तक सभी प्रत्याशियों ने अपनी क्षवि जो जनता के सामने प्रस्तुत की जानी है पर विशेष ध्यान दिया। यह नाटकीयता हिटलर का प्रभाव है या नहीं यह कहना मुश्किल है, पर ऐसी नाटकीयता का इस्तेमाल हिटलर ने ही पहली बार किया था। मंच सज्जा और वक्तृता शैली में नाटकीयता का समावेश बढ़ता गया है और भाषणों की गुणवत्ता उपेक्षित होती गयी है। राजनीति का प्रचार पक्ष अब एक इवेंट मैनेजमेंट की तरह हो गया है।

भाषणों में चाक्षुष भाव और अभिनय कला का इतना समावेश हो गया है, नेता जो कहना चाहता है, वह या तो गौड़ हो गया है या गौड़ कर दिया गया है। हिटलर ने ऐसी ही उन्माद भरी भाषण शैली का प्रयोग कर जर्मनी के युवाओं को दीवाना बना दिया था। लोग उन्माद में आ कर अपने शर्ट के बटन फाड़ देते थे और चीखने-चिल्लाने लगते थे। यह अंदर से निकलती हुयी लोकप्रियता और सम्मान का भाव नहीं था, बल्कि एक मनोरोग जैसा था। इसीलिए जब हिटलर ने आत्म हत्या की तो जर्मनी में उस लोकप्रियता का जिस की लहर में चढ़ कर वह शिखर पर पहुंचा था, शतांश भी नहीं दिखा। वह शायद अकेला राष्ट्र प्रमुख होगा, जिसके मृत्यु पर प्रसन्नता मनाई गयी होगी।

हिटलर को यह नाटकीयता पसंद थी। वह प्रेजेन्टेशन में विश्वास करता था। अपनी आत्म कथा, मीन काम्फ़ की भूमिका में वह लिखता है, “मैं जानता हूँ, जनता का दिल लिखित अंश के बजाय बोले गए शब्दों से अधिक जीता जा सकता है। इसीलिए इस धरती पर हुआ हर महान आंदोलन का विकास उसके भाषणकर्ताओं का ऋणी है न कि महान लेखकों का।”

अंग्रेज़ी में यह उद्धरण इस प्रकार है, “I know that men are won over less by the written than by the spoken word, that every great movement on this earth owes its growth to orators and not to great writers।”

इस प्रकार हिटलर ने भाषण कला, ओरेटरी की ताक़त समझा और उसमें और धार देने के लिए उसने अभिनय और नाट्य कला का भरपूर उपयोग किया। वह घंटों इसका रिहर्सल करता था। उसका अधिकृत फोटोग्राफर, हेनरिख हॉफमैन अपने संस्मरण में लिखता है कि हिटलर अपने पूर्वाभ्यास की ढेर सारी तस्वीरें खिंचवाता था और विभिन्न कोणों से उसे फ़ोटो उतारने के लिए कहता भी था। भाषण की गुणवत्ता पर कम बल्कि हिटलर का ध्यान भाषण की नाटकीयता और परिधान बोध पर अधिक रहता था। हॉफमैन ने कुल 20 लाख फ़ोटो उतारे थे। हिटलर उन फ़ोटो को बार-बार देखता था और बाद में उन्हें वह नष्ट करा दिया करता था। हॉफमैन ने उसी दुर्लभ एलबम में से कुछ फ़ोटो बचा लिए थे। हॉफमैन आगे कहते हैं, हिटलर विभिन्न तरह से हाथ उठाने, गिराने और स्वरों के आरोह-अवरोह से भीड़ पर जादुई असर डाल देता था।

यह वह समय था जब फोटोग्राफी कला अधिक विकसित भी नहीं थी। फिल्मों के लिए भी वह तकनीकी रूप से कम विकसित काल था। आज जब कि हर व्यक्ति के पास फ़ोटो खींचने और उसे तुरंत ही सोशल मीडिया के माध्यम से दुनिया भर में फैला देने का विकल्प उपलब्ध है तो राजनीतिक दलों के जलसे, एक इवेंट बन जाएं तो आश्चर्य की कोई बात नहीं है। अब तो प्रचार कंपनियां प्रचार, मंच सज्जा, भीड़ एकत्र करने और सभा के प्रचार प्रसार के साथ-साथ, सारी जिम्मेदारी खुद ही ले ले रहीं है। अब यह लोकतंत्र का एक सर्कस या कोई ग्रैंड तमाशा ही बन कर रह गया है।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और कानपुर में रहते हैं

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This post was last modified on April 30, 2021 12:46 pm

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