Friday, December 2, 2022

मछुआरों को भारत-पाकिस्तान शत्रुता में बंधक नहीं बनाया जा सकता

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“यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसे समय में जब पाकिस्तान और भारत आजादी के 75 वें वर्ष का जश्न मना रहे हैं, अनजाने में समुद्री सीमा पार करने के लिए गिरफ्तार किए गए सैकड़ों निर्दोष मछुआरे एक-दूसरे की जेलों में बंद हैं और उनकी सैकड़ों नावें दूसरे देश की हिरासत में सड़ रही हैं।” उपरोक्त बातें ‘क्या पानी में सरहद होती है?’ फिल्म की स्क्रीनिंग और परिचर्चा बैठक में प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए पाकिस्तान-इंडिया पीपुल्स फोरम फॉर पीस एंड डेमोक्रेसी (PIPFPD) की एविटा दास ने कहा।

गौरतलब है कि भारत और पाकिस्तान के जेल में बंद मछुआरों की दुर्दशा पर बनी संतोष कोहली की डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘क्या पानी में सरहद होती है?’ की स्क्रीनिंग और पैनल चर्चा 10 अगस्त 2022 को शाम 4 बजे नई दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में हुई। फिल्म रिलीज के मौके पर फिल्म निर्माता संतोष और प्रगति बांखेले मौजूद थे। पैनल चर्चा में सांसदों, राजनीतिक नेताओं और पत्रकारों और पाकिस्तान में जेल में बंद मछुआरों के परिवारों की भागीदारी देखी गई।

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पाकिस्तान और भारत की सरकारों को सभी मतभेदों के बावजूद एक साथ काम करना चाहिए, एक समान आधार खोजने के लिए – उन सैकड़ों मछुआरों की खातिर जो हर साल एक-दूसरे की जेलों में गिरफ्तार और कै़द होते हैं, फिल्म की स्क्रीनिंग में उपस्थित संसद सदस्यों और अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने कहा। ‘

योजना आयोग की पूर्व सदस्य डॉ सैयदा हमीद ने कहा कि यह क्रूर है कि हमारे मछुआरों को उनकी आजीविका की खोज के लिए गिरफ्तार किया गया है। वे एक युद्ध में युद्ध के कैदी बन गए हैं, जिसमें वे कभी भी पक्ष नहीं थे। 

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बैठक में मौजूद सांसदों में कुमार केतकर (राज्य सभा), शक्तिसिंह गोहिल (राज्य सभा), पूर्व सांसद और किसान सभा नेता हन्नान मोल्लाह आदि शामिल थे। मछुआरों के लिए एकजुटता दिखाने वाले अन्य सांसदों में गुजरात के लोकसभा सांसद लालूभाई पटेल और राजेश चुडासमा शामिल थे। वक्ताओं में वरिष्ठ पत्रकार भारत भूषण और जतिन देसाई और गुजरात के समुदाय के नेता शामिल थे। सत्र की अध्यक्षता डॉ. सैयदा हमीद ने की।

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गुजरात से संसद सदस्य (राज्य सभा ) शक्तिसिंह गोहिल ने परिचर्चा में भाग लेते हुए कहा कि जब उन्होंने इस मुद्दे को संसद में उठाया, तो दुख की बात है कि उन्हें मानवीय के बजाय एक बहुत ही राजनीतिक जवाब मिला …। उन्होंने कार्यक्रम में आगे कहा कि पाकिस्तान की जेल में बंद 600 मछुआरे भाजपा या कांग्रेस के नहीं हैं, वे इंसान हैं, वे भारत के नागरिक हैं। हर भारतीय को दबाव बनाते रहना चाहिए ताकि सरकार सुने और इस मुद्दे पर कार्रवाई करे और इसके स्थायी समाधान की दिशा में काम करे। “

इसके बाद सांसद कुमार केतकर ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों को संबोधित करके बताया कि जब भारतीय छात्र यूक्रेन में फंसे हुए थे, मीडिया उनकी मदद करने में तल्लीन था और भारत सरकार द्वारा उन्हें बचाने के लिए एक विमान भेजा गया था, लेकिन पाकिस्तान में फंसे 600 मछुआरों का क्या? ऐसा क्यों है कि उनका जीवन हमारे देश के लिए कीमती नहीं है?”

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इसके बाद वरिष्ठ पत्रकार भारत भूषण ने समाधान सुझाते हुये कहा कि “इस सीमा मुद्दे को सुलझाया जाना चाहिए और सीमा रेखाओं को परिभाषित किया जाना चाहिए ….दोनों देशों के मछुआरों के लिए संयुक्त लाइसेंस दिए जाने चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि युद्ध की स्थिति में भी मछुआरों की आजीविका सुनिश्चित होगी … अगर सरकार चाहे तो 10 मिनट में इस समस्या का समाधान कर सकती है।

बैठक में महिला मछुआरों और पाकिस्तान की जेल में बंद मछुआरों की पत्नियों ने बात की। उनमें से एक, नानी बेन बामनिया ने दूसरे देश की जेल में अपने परिवार के सदस्यों की सुरक्षा के बारे में परिजनों को आश्वस्त करने के लिए किसी भी संचार सुविधा की कमी के बारे में शिकायत की।वरिष्ठ पत्रकार जतिन देसाई, वेलजीभाई मसानी और जीवनभाई जंगी, जिन्होंने इस मुद्दे पर बहुत वर्षों से काम किया है, ने बैठक में कॉन्सुलर एक्सेस, राष्ट्रीयता सत्यापन, इस मुद्दे पर संयुक्त न्यायिक समिति के पुनर्सक्रियन आदि के मुद्दे भी उठाए।

यह आयोजन नेशनल फिशवर्कर्स फोरम, दिल्ली समर्थक समूह और पाकिस्तान इंडिया पीपुल्स फोरम फॉर पीस एंड डेमोक्रेसी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हुआ। 

(जनचौक ब्यूरो की रिपोर्ट।)

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