Sunday, October 17, 2021

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सरकारी घोषणाएँ और मुंह चिढ़ाती जमीनी हकीकत

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बोकारो। लातेहार जिला मुख्यालय से 90 किमी दूर स्थित है माहुआडांड़ प्रखण्ड, जहां से महज 2 किमी की लंबी दूरी पर है अंबा टोली पंचायत का गुड़गु टोली गांव। कुंती नगेसिया यहीं रहती हैं। विधवा कुंती पर ज़िंदगी का बोझ भारी पड़ गया है। बीमारी की हालत में उनके लिए कहीं आना-जाना भी अब संभव नहीं है। लॉकडाउन इनके जीवन पर क़हर बनकर टूटा है। अनाज के अभाव में यह महिला अब तिल-तिल कर मरने को मजबूर है। इससे पहले कुंती 9 महीने तक राँची के एक अस्पताल में भर्ती थीं। जहां उनका टीबी का इलाज चल रहा था। इलाज के लिए राँची जाने से पहले 2 अप्रैल 2019 को उन्होंने राशन कार्ड बनवाने के लिए अपने सभी कागजात अनुमण्डल अधिकारी महुआडांड़ को सौंप दिए थे।

दिलचस्प बात यह है कि आवेदन सौंपते वक्त दफ्तर में अंचल अधिकारी एवं अनुमण्डल पुलिस पदाधिकारी दोनों मौजूद थे। सीओ को भी उन्होंने विधवा पेंशन के लिए उसी दिन आवेदन सौंपा था। कुन्ती ऑनलाइन आवेदन कराने में असमर्थ थीं, क्योंकि उक्त प्रखण्ड में प्रज्ञा केन्द्र के सभी संचालक 50 रुपये प्रति सदस्य ऑनलाइन आवेदन कराने का शुल्क मांगते हैं, जिसे देना गरीब कुन्ती के लिए संभव नहीं था। आज उनके पास कार्यालय में समर्पित दोनों आवेदनों की पावती है, लेकिन एसडीओ महुआटांड़ ने एक वर्ष बीत जाने के बाद भी ऑनलाइन आवेदन की पावती आवेदिका को उपलब्ध नहीं करायी है।

 लोहरदगा ज़िले में सेन्हा बांधटोली की रहने वाली चिन्तामुनी कुमारी घर में अकेली रहती हैं। बेहद गरीब कुमारी के पास पीएच कार्ड है जिसकी संख्या नंबर 202002191351 है। लेकिन राशन लेने जाने पर उनसे कहा जाता था कि उनका कार्ड डिलीट हो गया है। चेक करने पर पता चला कि उस नंबर पर प्रमिला नाम के किसी दूसरे परिवार को कार्ड जारी कर दिया गया है। इनके पास भी राशन कार्ड संबंधी ऑनलाइन की कोई रसीद नहीं है। अब इन हालात में ये भी अब दाने-दाने को मोहताज हैं। जब मामले पर पूछताछ की प्रक्रिया शुरू हुई तो संबंधित एजेंसी द्वारा आनन फानन में उन्हें 5 किग्रा चावल देकर अपना फर्ज पूरा कर लिया गया। 

परिवार के भरण पोषण के लिए बाहर मजदूरी करने वाला पश्चिम सिंहभूम का बारी निवासी अगस्ती गागराई लॉकडाउन के ठीक पहले हांफते-डांफते घर पहुंचा। तीन बच्चों समेत पाँच के इस परिवार को हमेशा भोजन का संकट बना रहता है। बावजूद इसके इसके पास लाल कार्ड नहीं है। सरकारी अधिकारियों ने इन्हें सफेद कार्ड थमा दिया है, जिस पर मिट्टी तेल के अलावा कोई दूसरी सामग्री नहीं दी जाती है। और अब जबकि उसे राशन की ज़रूरत है तो उसके पास कोटे से हासिल मिट्टी के तेल से घर जलाने के सिवा कोई चारा नहीं बचा है।

इस मामले पर झारखण्ड नरेगा वाच के समन्वयक जेम्स हेरेंज कहते हैं कि ”कुन्ती नगेसिया, चिन्तामुनी कुमारी और अगस्ती गागराई ये कुछेक उदाहरण मात्र हैं। जबकि सर्वे किया जाए तो राज्य में एक बहुत बड़ी आबादी मिलेगी जो कोरोना के साथ उसकी जंग भूख और कुपोषण से भी चल रही है। इनको राशन मुहैया कराने के लिए राज्य सरकार ने हालिया के संकल्प पत्र में दो शर्तें लगायी हैं।

जिसके तहत पहले से ऑनलाइन किए हुए 697443 परिवारों तथा दूसरा सुपात्र परिवारों को ऑनलाइन कराते हुए एक रुपए की दर से प्रति परिवार को 10 किलो अनाज अप्रैल एवं मई महीने का उपलब्ध कराया जाना है। दूसरी तरफ जरूरतमंद ऐसे परिवार जिनको इसके बारे कोई जानकारी नहीं है, उन्होंने राशन कार्ड के आवेदन के लिए मुखिया/डीलर/स्वयं सेवकों/दलालों को पैसे दिए, बावजूद इसके उन परिवारों को ऑनलाइन की रसीद नहीं मिली।”

उनका कहना कि ”जब लॉक डाउन के चलते दुकानों समेत सब कुछ बंद है और घर की डेहरी ही लक्ष्मण रेखा बन गयी है ऐसे में कैसे कोई आन लाइन आवेदन हो सकता है? स्पष्ट है कि ऑनलाइन के नाम पर पिछले दरवाजे से गरीबों का आर्थिक शोषण हो रहा है। सरकार गरीबों को राहत दे रही है या गरीबी की दलदल में उन्हें और धकेलना चाहती है यह समझ से परे है। आखिर कोरोना की इस वैश्विक महामारी में खाद्य संकट से जूझ रहे परिवारों को सरकारों के समक्ष अपनी गरीबी साबित करने के लिए और कितनी अग्नि परीक्षाएं देनी पड़ेंगी।”

कहना ना होगा कि कोरोना के खतरों और भूख के बीच आज आम इंसान बुरी तरह फंसा है, जिसके कई उदाहरण लॉकडाउन के बाद आए दिन देखने को मिल रहे हैं। अब सरकारी घोषणाओं को मुंह चिढ़ाती जमीनी हकीकत से यह साफ हो जाता है कि कितना भी खतरनाक माहौल क्यों न हो हमारी भ्रष्ट व्यवस्था और उसके पोषक तत्वों के चरित्र में कोई बदलाव नहीं आ सकता।

हम देख सकते हैं कि झारखण्ड सरकार के राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम समेत तमाम योजनाओं के तहत झारखंड में लोगों के मद में अप्रैल एवं मई 2020 के लिए प्रति परिवार प्रति माह 10 किलोग्राम चावल उपलब्ध कराने के लिए 36.11 करोड़ रूपये दिए गए हैं।

इसके तहत सरकार ने तमाम तरह की घोषणाएँ कर रखी है। जिसमें पीडीएस के तहत आवेदनकर्ताओं के लंबितों की संख्या के साथ ही लाभार्थियों तक राशन पहुँचाने में आ रही दिक़्क़तों और उनके समाधान की बात की गयी है। अपर मुख्य सचिव अरुण कुमार की ओर से जारी इस घोषणा को लेकर लोगों की अलग-अलग राय है। 

 नरेगा वाच के समन्वयक जेम्स हेरेंज कहते हैं कि इस संकल्प में दो बाधाएं है जिससे परिवारों को खाद्यान्न लेने में परेशानी होगी। (1) पहले से ऑनलाइन किए हुए परिवार और दूसरा सुपात्र परिवारों को ऑनलाइन कराते हुए एक रुपए के दर से खाद्यान्न प्रति परिवार दस किलो अप्रैल एवं मई का उपलब्ध कराना है।

सवाल है परिवारों ने आवेदन के लिए मुखिया/ डीलर/ स्वयंसेवकों/ दलालों को पैसे दिए लेकिन परिवारों को ऑनलाइन की रसीद नहीं मिली। दूसरा अभी लॉकडाउन में सभी तरह की दुकानें बंद हैं। लोगों को घरों की लक्ष्मण रेखा लांघनी नहीं है फिर योग्य परिवार भी ऑनलाइन कैसे आवेदन करेंगे? सरकार गरीबों को राहत देने का प्रयास कर रही है या सिर्फ घोषणाओं के बदौलत लोकप्रियता हासिल करना चाहती है, यह बड़ा सवाल है।

बताते चलें कि पिछली 2 अप्रैल 2020 को राज्य के गढ़वा जिला मुख्यालय से करीब 55 किमी दूर और भण्डरिया प्रखण्ड मुख्यालय से करीब 30 किमी उत्तर पूर्व घने जंगलों के बीच बसे आदिवासी बहुल कुरून गाँव में रहने वाली 70 वर्षीय सोमारिया देवी की भूख से मौत हो गई थी। सोमरिया देवी अपने 75 वर्षीय पति लच्छू लोहरा के साथ रहती थी। उनकी कोई संतान नहीं थी। मृत्यु के पूर्व यह दम्पति करीब 4 दिनों से अनाज के अभाव में कुछ खाया नहीं था। इसके पहले भी ये दोनों बुजुर्ग किसी प्रकार आधे पेट खाकर गुजारा करते थे।

(बोकारो से विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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