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केरल की वाम सरकार ने अध्यादेश किया रद्द, क्या मोदी सरकार जनविरोधी कानूनों को करेगी खत्म!

भारी जन विरोध का सम्मान करते हुए केरल के राज्यपाल ने केरल की वाममोर्चा सरकार की सिफारिश पर केरल पुलिस अधिनियम, 2011 की विवादास्पद धारा 118-ए को सम्मिलित करने वाले पहले वाले अध्यादेश को वापस ले लिया है। केरल के राज्यपाल मोहम्मद आरिफ खान द्वारा  बुधवार को केरल पुलिस अधिनियम, 2011 में विवादास्पद धारा 118 ए को सम्मिलित करने वाले एक नए अध्यादेश को वापस लेने पर हस्ताक्षर करने के साथ ही एक अप्रिय विवाद का समापन हो गया, लेकिन यह बड़ा सवाल भी छोड़ गया है कि क्या व्यापक जन विरोध के चलते दक्षिणपंथी भाजपा सरकार अपने जनविरोधी, किसान विरोधी, मीडिया की गलाघोंटू नीतियों, रेल निजीकरण से लेकर बैंकों तक को कॉरपोरेटों को सौंपने और रोजगार विरोधी नीतियों को क्या त्याग देगी? उत्तर नकारात्मक ही मिलेगा।

एक ओर केरल की पिनयारी विजयन के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने एक हफ्ते में ही इस अध्यादेश को वापस ले लिया और इमरजेंसी के लिए तानाशाह मानी जानी वाली इंदिरा गांधी ने वर्ष 1982 में पत्रकारों के राष्ट्रव्यापी विरोध के चलते बिहार प्रेस बिल वापस करा दिया था, जो बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र लेकर आ रहे थे। पर आज भी यूपी सहित भाजपा शासित राज्यों में और कश्मीर में व्यवस्था की गड़बड़ियों को उजागर करने वाले पत्रकारों को देशद्रोह के आरोपों में जेल में ठूंस दिया गया है और कोई पुरसाहाल नहीं है।

केरल के इस अध्यादेश की चारों ओर तीखी आलोचना होने और इसे बोलने की आजादी के अधिकार पर अंकुश लगाने वाला करार दिए जाने के बाद राज्य की वाम मोर्चा सरकार ने अपने पांव पीछे खींच लिए और राज्यपाल से इसे वापस लेने की सिफारिश कर दी। केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने प्रदेश की वाम मोर्चा सरकार द्वारा लाए गए इस विवादास्पद अध्यादेश को शनिवार को अपनी मंजूरी प्रदान की थी।

खेती से जुड़े केंद्र सरकार के तीन क़ानूनों के विरोध में पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसान 26-27 नवंबर को ‘दिल्ली चलो’ के आह्वान के साथ घर से निकल पड़े हैं। ऑल इंडिया किसान संघर्ष कोऑर्डिनेशन कमेटी (एआईकेएससीसी) के आह्वान पर  26 और 27 नवंबर को दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन होना है। इन संगठनों के मुताबिक, जहां भी किसानों को दिल्ली में जाने से रोका जाएगा, किसान वहीं पर बैठ कर विरोध-प्रदर्शन करेंगे। पर इतने बड़े किसान आंदोलन के बावजूद मोदी सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही है। ऐसा क्यों? यह लाख टके का सवाल है, क्योंकि अब तो खुलेआम चाय के ठीहों से लेकर गांव के चौपालों तक चर्चा होने लगी है कि जब ईवीएम से ही सरकार जीत रही है तो वह जन सरोकारों की चिंता क्यों करे?

सीएए (नागरिकता संशोधन अधिनियम) और एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर) में संशोधन के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन हुए, लेकिन मोदी सरकार ने इसे अब तक वापस नहीं लिया है। इसके विरोध में अटक से कटक और हिमालय से कन्याकुमारी तक विरोध-प्रदर्शन करने वालों को गंभीर आपराधिक धाराओं के साथ राजद्रोह तक की धाराओं में जेल भेजा गया है।

मद्रास उच्च न्यायालय की जस्टिस जे निशा बानू की एकल पीठ ने एक निर्णय में कहा है कि यह देखते हुए कि याचिकाकर्ताओं ने सीएए (नागरिकता संशोधन अधिनियम) और एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर) में संशोधन के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन/विरोध प्रदर्शन किया था, सीएए-एनआरसी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दायर एफआईआर को रद्द कर दियास, क्योंकि कोई अप्रिय घटना नहीं हुई थी। एकल पीठ ने अपने आदेश में टिप्पणी की कि देश ने उक्त संशोधनों के खिलाफ लोगों के विभिन्न वर्गों द्वारा विरोध प्रदर्शन देखा था, चूंकि विरोध शांतिपूर्ण था और यहां तक कि पहली सूचना रिपोर्ट में हिंसा या किसी अप्रिय घटना के होने का कोई भी खुलासा नहीं किया गया है, मेरा मानना है कि अभियोजन का जारी रहना आवश्यक नहीं है।

इस देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पर्सनल लिबर्टी मालिक-संपादक अर्णब गोस्वामी से शुरू होकर अर्णब गोस्वामी पर ही खत्म हो जाती है। कंगना रानौत पर राष्ट्र द्रोह का आरोप लगने पर बिना गिरफ़्तारी के कोर्ट द्वारा सवाल पूछा जाता है जो सरकार की हां में हां न मिलाए उस पर राष्ट्र द्रोह की धारा क्यों लगा दी जाती है? बाकि लोगों के मामले में वे गिरफ्तार हो गए तो बिना मुकदमा चले सालों-साल जेल में सड़ना पड़ता है।

देश में असहमति के दमन के लिए जिस तरह अंग्रेजों के बनाए देशद्रोह कानून का बेशर्म इस्तेमाल किया जा रहा है, उस पर उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस दीपक गुप्ता तक को यह कहना पड़ा कि पिछले कुछ सालों से राजद्रोह से संबंधित कानून का दुरुपयोग बढ़ा है।

जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा है कि सरकार की आलोचना करने से कोई भी व्यक्ति कम देश भक्त नहीं हो जाता। देश विरोधी नारे लगाना राजद्रोह नहीं है। उन्होंने कहा कि कार्यपालिका, न्यायपालिका, नौकरशाही या सशस्त्र बलों की आलोचना को देशद्रोह नहीं कहा जा सकता। संवैधानिक अधिकार होने के नाते अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की राजद्रोह के कानून से ज्यादा अहमियत होनी चाहिए।

जस्टिस गुप्ता ने कहा है कि पिछले कुछ सालों में कई ऐसे मामले हुए हैं, जहां राजद्रोह या सौहार्द बिगाड़ने के कानून का पुलिस ने जमकर दुरुपयोग किया है और उन लोगों को गिरफ़्तार करने और अपमानित करने के लिए इनका इस्तेमाल किया है, जिन्होंने राजद्रोह के तहत कोई अपराध नहीं किया है। दुर्भाग्य से आम धारणा यह बन रही है कि या तो आप मुझसे सहमत हैं या आप मेरे दुश्मन हैं और इससे भी बदतर कि एक आप राष्ट्रद्रोही हैं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया का कहना है कि भारत में सच बोलने वालों के लिए यह खतरनाक समय है। एमनेस्टी ने इस बात पर जोर दिया कि यह भारत में अधिकारियों को सच कहने के लिहाज से ‘खतरनाक’ समय है। यह भारत में सत्ता को सच कहने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए खतरनाक समय है। मानवाधिकार संगठन ने कहा कि पत्रकारिता पर हमले से न केवल भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार का गला घोंटा जाता है, बल्कि लोगों को चुप कराने पर भी इसका काफी प्रभाव पड़ता है। एमनेस्टी ने नक्सलियों से संबंध के आरोप में नजरबंद किए गए पत्रकार एवं नागरिक अधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा और वामपंथी कवि वरवर राव का उदाहरण देते हुए बताया कि यह अभिव्यक्ति की आजादी का दमन है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on November 26, 2020 1:05 pm

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