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Tuesday, September 21, 2021

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ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम समीकरण के बल पर सत्ता तक पहुंचने की बीएसपी की कोशिश

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उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में भले ही कुछ महीने शेष हों लेकिन चुनावी गतिविधियां पूरे जोर शोर से शुरू हो चुकी हैं। हर दल अपने लिये खास वर्ग समुदाय के मतदाता को साधने के साथ ही नये समीकरणों को साधने में लगा हुआ है। पिछले विधानसभा चुनाव में जिसे एक पार्टी का वोट बैंक कहा जाता है उसमें भाजपा ने सेंध लगाकर बहुमत से कहीं ज़्यादा सीटें हासिल की थी। ऐसे में तमाम विपक्षी दलों को सत्ता के घोड़े को साधने के लिये नये मतदाता समीकरणों की दरकार है।

आज की इस रिपोर्ट में बात बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की। बसपा अध्यक्ष मायावती अपना आजमाया हुआ चुनावी समीकरण (ब्राह्मण, मुस्लिम और बहुजन) फिट करने के लिये ब्राह्मण मतदाताओं को अपने पाले में लाने में लगी हुयी हैं। बसपा महासचिव सतीश मिश्रा की अगुवाई में 23 जुलाई 2021 को अयोध्या (फैजाबाद) जिले से शुरू हुआ ब्राह्मण सम्मेलन प्रदेश के 74 जिलों से होता हुआ आखिरी ब्राह्मण सम्मेलन राजधानी लखनऊ में बसपा के पार्टी मुख्यालय में 7 सितंबर मंगलवार को संपन्न हुआ। जिसमें खुद बसपा अध्यक्ष मायावती भी शामिल हुयीं। हालांकि इसकी शुरुआत उन्होंने पिछले ही साल से कर दिया था। 9 अगस्त 2020 को उन्होंने ऐलान किया था कि अगर वो सत्ता में लौटीं तो परपशुराम का मंदिर बनवायेंगी और परशुराम जयंती को सार्वजनिक अवकाश घोषित करेंगी।

 ‘जय भीम के साथ जय श्री राम के नारे 

राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री और बीएसपी प्रमुख मायावती ने सम्मेलन को संबोधित किया और अपनी पार्टी की सरकार बनने पर ब्राह्मणों को सम्मान और सरकार में सहभागी बनाने का भरोसा दिलाया। साल 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद यह पहला मौका था जब मायावती किसी सार्वजनिक मंच पर दिखीं।

फ़ैज़ाबाद (अयोध्या) जिले से प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन की शुरुआत में बहुजन समाज पार्टी के पारंपरिक जय भीम के साथ ‘जय श्रीराम’ जैसे नारे भी लगे थे और मंगलवार को लखनऊ में संपन्न हुये प्रबुद्ध (ब्राह्मण) सम्मेलन में भी इन नारों की धूम रही। इतना ही नहीं सम्मेलन में शंख बजे, मंत्रोच्चारण हुआ, त्रिशूल लहराये गए और जगह गणेश प्रतिमाएं भी नज़र आईं। खुद मायावती अपने हाथों में त्रिशूल लिये मंच पर नज़र आयीं।

लखनऊ में अपने पहले चुनावी संबोधन में बीएसपी प्रमुख मायावती ने ब्राह्मण समाज को आश्वस्त करते हुये अन्य राजनीतिक दलों के बहकावे में न आने और बीएसपी पर भरोसा करने की अपील करते हुये उन्होनें कहा कि “राज्य में बीजेपी की सरकार के दौरान ब्राह्मणों पर जो एक्शन हुआ, उसकी जांच कराई जाएगी। जो भी अधिकारी दोषी पाए जाएंगे, उन पर कार्रवाई की जाएगी। बीएसपी के शासन में ब्राह्मणों के मान-सम्मान और सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाएगा।”

मायावती ने कहा कि ब्राह्मणों के साथ हमेशा अत्याचार और अन्याय हुआ। बीएसपी ने ब्राह्मण समाज के सम्मान, उनकी सुरक्षा और तरक़्क़ी के लिए पहले चरण में सभी ज़िलों में उनकी संगोष्ठी करके उन्हें जोड़ा गया है। ब्राह्मण समाज की भागीदारी ने सभी विरोधी पार्टियों को चिंतित किया है।”

बता दें कि साल 2007 के चुनाव अभियान की शुरुआत में बसपा ने ब्राम्हण सम्मेलन किया था। दरअसल बसपा अध्यक्ष चाहती हैं कि ‘ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी चलता जाएगा’ का नारा एक बार फिर गूंजे और वो सत्ता तक पहुंचे। बता दूँ कि साल 2007 में बसपा ने कुल मत का 30% वोट के साथ कुल 403 विधानसभा सीटों में से 206 सीटें जीतकर पहली बार अकेले दम पर सरकार बनाया था। बसपा की चुनावी रणनीति के तहत बीएसपी के लोग हर विधानसभा में 1000 ब्राह्मण वर्कर्स को जोड़ेंगे और उन्हें चुनावी अभियान में साथ लेकर काम करेंगे।

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम और दलित मतदाताओं के बाद सबसे अधिक संख्या ब्राह्मण मतदाताओं की है। प्रदेश में 20 फीसदी के आसपास दलित हैं, जबकि ब्राह्मण वोटर की संख्या 14 फीसदी के करीब है। साल 2007 में मायावती ने दलित-ब्राह्मण गठजोड़ का फ़ॉर्मूला आज़माया था और राज्य में पहली बार बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी। उस चुनाव में मायावती ने 86 ब्राह्मण प्रत्याशियों को टिकट दिया था, जिसमें से 41 उम्मीदवार विधानसभा पहुंचे थे।

मुस्लिम मतदाताओं पर नज़र

पिछले साल नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी विरोधी आंदोलन में बसपा कार्यकर्ताओं और दलित समुदाय के लोगों को सड़क पर न उतरने की अपील करने वाली मायावती ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान का विरोध करते हुये उन पर मुस्लिम समुदाय को उत्पीड़ित करने का आरोप लगाया है। मायावती ने चुनावी नफ़ा-नुकसान का कैलकुलेशन करके आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के एक बयान पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर हिंदुओं और मुसलमानों के पूर्वज एक ही थे तो बीजेपी मुसलमानों से सौतेला व्यवहार क्यों करती है?  

मायावती ने 7 सितंबर को लखनऊ में प्रबुद्ध सम्मेलन के मंच से मुसलमानों की याददाश्त दुरुस्त करते हुये कहा है कि मेरठ का मलियाना कांड और 2013 में हुए मुज़फ्फ़रनगर दंगे को नहीं भूलना चाहिये। गौरतलब है कि मेरठ का मलियाना कांड कांग्रेस सरकार के दौरान हुआ था जबकि मुज़फ्फ़रनगर का दंगा सपा सरकार में हुआ था और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे। साथ थी उन्होंने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर भी मुसलमानों के साथ भेदभाव करने का आरोप लगाते हुये कहा कि “मुसलमानों को तबाह और बर्बाद करने के मामले में सपा और कांग्रेस भी कम नहीं रही हैं। पश्चिमी यूपी में मेरठ का मलियाना और मुज़फ़्फ़रनगर कांड मुसलमानों को नहीं भूलना चाहिए।”

मायावती ने कहा कि कांग्रेस और सपा दोनों की ही सरकारों में मुस्लिमों का यह हाल हुआ था। ऐसे में मुसलमानों को इन दोनों ही पार्टी से दूर रहना चाहिये।

बता दें कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 20 फीसदी है। प्रदेश की कुल 403 सीटों में से 36 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार अपने दम पर जीत दर्ज कर सकते हैं और करीब 107 विधानसभा सीटें पर अल्पसंख्यक मतदाता चुनावी नतीजों को खासा प्रभावित करते हैं। 70 सीटों पर मुस्लिम आबादी 20-30% के बीच है जबकि 73 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम मातदाता 30%  से ज्यादा हैं। जबकि बरेली, रामपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, अमरोहा, मेरठ, सहारनपुर, मुज़फ्फ़रनगर और हापुड़, बागपत, सहारनपुर जनपदों में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 35-45 % है। वहीं, वाराणसी में 15%, आजमगढ़ में 28%, मऊ में 23%, ग़ाज़ीपुर में 18%, बहराइच में 30%, लखनऊ में 22 % मुस्लिम मतादाता हैं। 

दलित बहुजन मतदाताओं में बिखराव

साल 2012 में सत्ता गँवाने के बाद मायावती ने कई दलित बहुजन और मुस्लिम नेताओं को पार्टी से बाहर कर दिया है। इन्द्रजीत सरोज को पार्टी से बाहर करने के बाद पासवान मतदाता बसपा से कटकर भाजपा की ओर चले गये।

इंद्रजीत सरोज के अलावा नसीमुद्दीन सिद्दीकी, राम अचल राजभर और लाल जी वर्मा, वेदराम भाटी, स्वामी प्रसाद मौर्य, बाबू सिंह कुशवाहा, चौधरी लक्ष्मी नारायण, फागू चौहान और धर्म सिंह सैनी, असलम रायनी जैसे मुस्लिम बहुजन नेताओं को पार्टी से निष्कासित करके बसपा अध्यक्ष ने अपने पारंपरिक मतदाताओं को खुद ही खुद से दूर कर दिया।

रही सही कसर भाजपा ने दलित आरक्षण का फायदा केवल जाटवों को मिलने का मुद्दा उठाकर गैरजाटवों को आरक्षण में भागीदारी सुनिश्चत करने का जुमला देकर जो ‘जाटव बनाम गैरजाटव’ का विभाजन खड़ा किया उसने भी बसपा को कमजोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

बता दें कि इंन्द्रजीत सरोज बसपा से निकाले जाने के बाद सपा में चले गये। नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कांग्रेस ज्वाइन कर ली। ठाकुर जयवीर सिंह, वेदराम भाटी, स्वामी प्रसाद मौर्य, चौधरी लक्ष्मी नारायण, फागू चौहान और धर्म सिंह सैनी ने भारतीय जनता पार्टी जॉइन कर ली। बसपा से निकलने के बाद बाबू सिंह कुशवाहा ने भी भाजपा ज्वाइन की थी लेकिन बाद में उन्होंने इस्तीफा दे दिया और अपनी जन अधिकार पार्टी बनाई। इंद्रजीत सरोज और राम प्रसाद सैनी जैसे नेताओं ने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया है। बृजेश पाठक का नाम भी बसपा के कद्दावर नेताओं में गिना जाता था। वह मौजूदा योगी सरकार में मंत्री हैं।

बसपा संस्थापक कांशीराम ने अलग-अलग समाज के लोगों को चुनकर उन्हें नेता बनाया था। ताकि बसपा में हर जाति उपजाति के दलित बहुजनों का प्रतिनिधित्व हो। ओमप्रकाश राजभर, सोनेलाल पटेल, आर के चौधरी और मसूद अहमद ऐसे ही नेताओं में शामिल रहे हैं। लेकिन राजभर ने 2002 में, दिवंगत सोनेलाल पटेल ने 1995 में और आर के चौधरी ने 2016 में बसपा छोड़ दी थी। आज ओमप्रकाश राजभर और सोने लाल पटेल की पार्टी अपना दल भाजपा के लिये सत्ता की सीढ़ी बनी हुयी है।

 साल 2007 में 206 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली मायावती ने नसीमुद्दीन सिद्दीकी, लालजी वर्मा, रामवीर उपाध्याय, ठाकुर जयवीर सिंह, सुधीर गोयल, स्वामी प्रसाद मौर्य, वेदराम भाटी, चौधरी लक्ष्मी नारायण, राकेश धर त्रिपाठी, बाबू सिंह कुशवाहा, फागू चौहान, दद्दू प्रसाद, राम प्रसाद चौधरी, धर्म सिंह सैनी, राम अचल राजभर, सुखदेव राजभर और इंद्रजीत सरोज को बड़े पद दिये थे।

बता दें कि उत्तर प्रदेश को 24 करोड़ की आबादी में 20.7 फीसद से ज्यादा दलित हैं। इनके लिए राज्य की 14 लोकसभा और 86 विधानसभा की सीटें आरक्षित रखी गई हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 76 आरक्षित सीटों पर जीत हासिल की थी। 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में कुल दलित आबादी का 55 फीसद जाटव मतदाता हैं। वहीं पश्चिमी यूपी में यह संख्या 68% है।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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