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मजरूह सुल्तानपुरी की पुण्यतिथि: मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर…

’‘मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर/ लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया’’ उर्दू अदब में ऐसे बहुत कम शेर हैं, जो शायर की पहचान बन गए और आज भी सियासी, समाजी महफिलों और तमाम ऐसी बैठकों में कहावतों की तरह दोहराए जाते हैं। मजरूह सुल्तानपुरी गर अपनी जिन्दगी में इस शेर के अलावा कुछ और नहीं लिखते, तब भी वे इस शेर के बदौलत ही अदबी दुनिया में अलग से उनकी एक पहचान होती। ये बेशकीमती शेर है ही ऐसा, जो आज भी हजारों की भीड़ को आंदोलित, प्रेरित करने का काम करता है। इस शेर को लिखे हुए एक लंबा अरसा बीत गया, मगर इस शेर की तासीर ठंडी नही हुई। साल 2019, मजरूह सुल्तानपुरी का जन्मशती वर्ष था।

आज से एक सदी पहले 1 अक्टूबर, 1919 को उत्तर प्रदेश, आजमगढ़ जिले के निजामाबाद गांव में जन्मे, असरार-उल हसन ख़ान यानी मजरूह सुल्तानपुरी के घर वालों और खुद उन्होंने कभी यह सपने में भी नहीं सोचा था कि आगे चलकर गीत-गजल उनकी जिंदगी बन जाएंगे और वे अपने नगमों और शायरी से ही दुनिया भर में जाने-पहचाने जाएंगे। मजरूह सुल्तानपुरी के वालिद चाहते थे कि वे अच्छी पढ़ाई कर, नौकरी हासिल करें और इसी चाहत में उन्हें मदरसे भेज दिया गया। जहां उन्होंने उर्दू, अरबी और फारसी जबान सीखी। शुरुआती तालीम के बाद उन्होंने ‘तक्मील उत्तिब कॉलेज’ लखनऊ से यूनानी चिकित्सा में डिग्री हासिल की और सुल्तानपुर में प्रैक्टिस करने लगे। लेकिन उनकी किस्मत में तो कुछ और ही मंजूर था। शेर-ओ-अदब की चर्चा सुनते-सुनते, उनके अंदर भी शेर कहने का शौक पैदा हुआ।

अपने इस शौक के बारे में उनका खुद का यह कहना था,‘‘मैंने अपने जमालियाती जौक (सौंदर्य बोध) की तस्कीन के लिए सन् 1940 में शायरी शुरू की। इब्तिदा गीत-नुमा नज्मों से हुई। लेकिन बेहद जल्द मैं गजल की तरफ आ गया।’’ बहरहाल कुछ ही समय में वे बाकायदगी से शायरी करने लगे। हकीमी करने के साथ-साथ मुशायरों में अपनी आमद बढ़ा दी। इस सिलसिले में उन्होंने उस दौर के मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी को अपना उस्ताद बना लिया। जिगर साहब से उन्होंने बहुत कुछ सीखा। उनमें से एक सीख यह थी कि,‘‘अगर किसी का कोई अच्छा शेर सुनो, तो कभी नकल ना करो, बल्कि जो गुजरे (आत्मानुभव), वही कहो।’’ एक लिहाज से कहें, तो उर्दू अदब में मजरूह सुल्तानपुरी का आगाज जिगर मुरादाबादी की शायरी की रिवायतों के साथ हुआ और आखिरी वक्त तक उन्होंने इसका दामन नहीं छोड़ा।

मजरूह सुल्तानपुरी शुरू में तरक्कीपसंद तहरीक की विचारधारा और सियासत से रजामंद नहीं थे। इस विचारधारा से उनके कुछ इख्तिलाफ (विरोध) थे, लेकिन बाद में वे इस तहरीक के सरगर्म हमसफर बन गए। उनका यकीन इस बात में पुख्ता हो गया कि समाजी मकसद के बिना कोई भी अजीम फन पैदा नहीं हो सकता। एक बार उनका यह ख्याल बना, तो उनकी शायरी बामकसद होती चली गई। मजरूह सुल्तानपुरी की शायरी का शुरूआती दौर, आजादी के आंदोलन का दौर था। उस वक्त जो भी इंकलाबी मुशायरे होते, वे उनमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते। उनकी गजलों में तरन्नुम और सादगी का दिलकश मेल होता था।

मजरूह की शुरू की गजलों को यदि देखें, तो उनमें एक बयानिया लहजा है, लेकिन जैसे-जैसे उनका तजुर्बा बढ़ा, उनकी गजलों की जबान और मौजूआत में नुमायां तब्दीली पैदा हुई और इशारियत (सांकेतिकता) और तहदारी (गहराई) में भी इजाफा हुआ। तरक्कीपसंद तहरीक के शुरूआती दौर का अध्ययन करें, तो यह बात सामने आती है कि तरक्कीपसंद शायर और आलोचक गजल विधा से मुतमईन नहीं थे। उन्होंने अपने तईं गजल की पुरजोर मुखालिफत की, उसे जानबूझकर नजरअंदाज किया। यहां तक की शायर-ए-इंकलाब जोश मलीहाबादी, तो गजल को एक काव्य विधा की हैसियत से मुर्दा करार देते थे।

विरोध के पीछे अक्सर यह दलीलें होती थीं कि गजल नए दौर की जरूरतों के लिहाज से नाकाफी जरिया है। कम अल्फाजों, बह्रों-छंदों की सीमा का बंधन खुलकर कहने नहीं देता। लिहाजा उस दौर में उर्दू अदब में मंसूबाबंद तरीके से नज्म आई। फैज अहमद फैज, अली सरदार जाफरी, साहिर लुधियानवी, कैफी आजमी, वामिक जौनपुरी और मजाज वगैरह शायरों ने एक से बढ़कर एक नज्में लिखीं। हालांकि इन लोगों ने गजलें भी लिखीं, लेकिन मजरूह ने सिर्फ गजल लिखी।

मजरूह सुल्तानपुरी ने ना सिर्फ गजलें लिखीं, बल्कि वे उन शायरों में शामिल रहे, जिन्होंने गजल की हमेशा तरफदारी की और इसे ही अपने जज्बात के इजहार का जरिया बनाया। गजल के बारे में उनका नजरिया था,‘‘मेरे लिए यही एक मोतबर जरिया है। गजल की खुसूसियत उसका ईजाजो-इख्तिसार (संक्षिप्तता) और जामइयत (संपूर्णता) व गहराई है। इस एतबार से ये सब से बेहतर सिन्फ (विधा) है।’’ मजरूह सुल्तानपुरी से पहले गजल की यह जमीन मीर, सौदा, मोमिन, ग़ालिब, और दाग के साथ-साथ हसरत मोहानी, इक़बाल, जिगर, फिराक का घर-आंगन हुआ करती थी। अली सरदार जाफरी के अल्फाजों में कहें, तो ‘‘मजरूह गजल के इस आंगन में किसी सिमटी सकुचाई दुल्हन की तरह नहीं, बल्कि एक निडर, बेबाक दूल्हे की तरह दाखिल हुए थे।’’

गजल के जानिब मजरूह की ये बेबाकी और पक्षधरता आखिरी समय तक कायम रही। गजल के विरोधियों से उन्होंने कभी हार नहीं मानी। प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक सदस्य सज्जाद जहीर ने अपनी किताब ‘रौशनाई’ में मजरूह सुल्तानपुरी की गजल के जानिब इस जज्बे और हिम्मत की दाद देते हुए लिखा है,‘‘मजरूह को बंबई में गोया दो मोर्चों पर जंग करनी पड़ती थी। एक तरफ वह अपने पहले के रिवायती गजल गायकों और शाइरों से तरक्कीपसंदी के उसूलों को सही मनवाने के लिए लड़ते, दूसरी तरफ तरक्कीपसंद लेखकों की अक्सरियत से गजल को स्वीकार कराने और उसकी अहमियत को तसलीम करवाने के लिए उन्हें असाधारण साहित्यिक वाद-विवाद करना पड़ता।’’

अलबत्ता रिवायती गजल के घिसे-पिटे मौजूं और तर्जे बयान को उन्होंने अपनी तरफ से बदलने की पूरी कोशिश की। जिसमें वे कामयाब भी हुए। मजरूह की शायरी में रूमानियत और इंकलाब का बेहतरीन संगम है। ऐसी ही उनकी एक गजल के कुछ अश्आर इस तरह से हैं, ‘‘अब अहले-दर्द (दर्द वाले आशिक) ये जीने का अहतिमाम (प्रबंध) करें/उसे भुला के गमे-जिंदगी (जीवन के दुःख) का नाम करें।/………..गुलाम रह चुके, तोड़ें ये बंदे-रुसवाई (बदनामी की जंजीर)/खुद अपने बाजू-ए-मेहनत (परिश्रम करने वाली बांहों का) का एहतिराम करें।’’

मजरूह सुल्तानपुरी की इस बात से हमेशा नाइत्तफाकी रही, कि मौजूदा जमाने के मसायल को शायराना रूप देने के लिए गजल नामौजूं है, बल्कि उनका तो इससे उलट यह साफ मानना था,‘‘कुछ ऐसी मंजिलें हैं, जहां सिर्फ गजल ही शायर का साथ दे सकती है।’’ कमोबेश यही बात काजी अब्दुल गफ्फार, मजरूह की एक मात्र शायरी की किताब ‘गजल’ की प्रस्तावना में लिखते हुए कहते हैं, ‘‘मजरूह का शुमार उन तरक्कीपसंद शायरों में होता है, जो कम कहते हैं और (शायद इसलिए) बहुत अच्छा कहते हैं। गजल के मैदान में उसने वह सब कुछ कहा है, जिसके लिए बाज तरक्कीपसंद शायर सिर्फ नज्म का ही पैराया जरूरी और नागुजीर (अनिवार्य) समझते हैं। सही तौर पर उसने गजल के कदीम शीशे (बोतल) में एक नई शराब भर दी है।’’

काजी अब्दुल गफ्फार की यह बात सही भी है। उनकी एक नहीं, कई ऐसी गजलें हैं जिसमें विषय से लेकर उनके कहन का अंदाज निराला है। मसलन ‘‘सर पर हवा-ए-जुल्म चले सौ जतन के साथ/अपनी कुलाह कज है उसी बांकपन के साथ।’’, ‘‘जला के मश्अले-जां हम जुनूं-सिफात चले/जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले।’’ मजरूह, मुशायरों के कामयाब शायर थे। खुशगुलू (अच्छा गायक) होने की वजह से जब वे तरन्नुम में अपनी गजल पढ़ते, तो श्रोता झूम उठते थे। गजल में उनके बगावती तेवर अवाम को आंदोलित कर देते। वे मर मिटने को तैयार हो जाते।

मजरूह सुल्तानपुरी के कलाम में हालांकि ज्यादा गजलें नहीं हैं। उनकी किताब ‘गजल’ में सिर्फ 50 गजलें ही संकलित हैं, लेकिन इन गजलों में से किसी भी गजल को कमजोर नहीं कह सकते। उन्होंने अदबी कलाम कम लिखा, लेकिन बेहतर और लाजवाब लिखा। मजरूह की एक नहीं, बल्कि कई ऐसी गजलें हैं, जिनमें उन्होंने समाजी और सियासी मौजूआत को कामयाबी के साथ उठाया है। इनमें उनके बगावती तेवर देखते ही बनते हैं। मुल्क की आजादी की तहरीक में ये गजलें, नारों की तरह इस्तेमाल हुईं।

‘‘सितम को सर-निगूं (झुका सर), जालिम को रुसवा हम भी देखेंगे/चले ऐ अज्मे बगावत (बगावत का निश्चय) चल, तमाशा हम भी देखेंगे/……..अभी तो फिक्र कर इन दिल से नाजुक आबगीनों (कांच के बने हुए) की/ब-फैजे-अम्न (शांति और अमन के सौजन्य से) फिर सागर (शराब का प्याला) में दरिया हम भी देखेंगे/निगारे-चीं (चीन की कला का प्रिय) का घायल तोड़ता है दम सरे-मकतल (वधस्थल के सामने)/बचाले आके एजाजे-मसीहा (मसीहा का कमाल) हम भी देखेंगे/जबीं (माथे) पर ताजे-जर (पूंजी-रूपी ताज), पहलू में जिंदा (जेलखाना), बैंक छाती पर/उठेगा बेकफन कब ये जनाजा हम भी देखेंगे।’’

मजरूह सुल्तानपुरी की शुरूआती दौर की गजलों पर आजादी के आंदोलन का साफ असर दिखलाई देता है। दीगर तरक्कीपसंद शायरों की तरह, उनकी भी गजलों में मुल्क के लिए मर-मिटने का जज्बा नजर आता है। ये गजलें सीधे-सीधे अवाम को संबोधित करते हुए लिखी गई हैं। ‘‘आहे-जां-सोज (जान को जला देने वाली आह) की महरूमी-ए-तासीर (प्रभाव की विफलता) न देख/हो ही जाएगी कोई जीने की तद्बीर (उक्ति) न देख/…….यह जरा दूर पे मंजिल, यह उजाला, यह सुकूं/ख्वाब को देख अभी ख्वाब की ताबीर न देख/देख जिंदां से परे, रंगे-चमन, जोशे-बहार/रक्स करना है तो फिर पांव की जंजीर न देख।’’

अवामी मुशायरों में तरक्कीपसंद शायर जब इस तरह की गजलें और नज्में पढ़ते थे, तो पूरा माहौल मुल्क की मोहब्बत से सराबोर हो जाता था। लोग कुछ कर गुजरने के लिए तैयार हो जाते थे। अप्रत्यक्ष तौर पर ये अवामी मुशायरे अवाम को बेदार करने का काम करते थे। खास तौर से मजरूह की शायरी उन पर गहरा असर करती।‘‘तकदीर का शिकवा बेमानी, जीना ही तुझे मंजूर नहीं/आप अपना मुकद्दर बन न सके, इतना तो कोई मजबूर नहीं/……..‘मजरूह’ उठी है मौजे-सबा (सुबह का शीतल हवा का झोंका), आसार लिए तूफानों के/हर कतरए-शबनम (ओंस की बूंद) बन जाए, इक जू-ए-रवां (बहती नदी) कुछ दूर नहीं।’’

लंबे संघर्षों के बाद, जब मुल्क आजाद हुआ तो मजरूह सुल्तानपुरी ने इस आजादी का इस्तेकबाल करते हुए लिखा,‘‘अहदे-इंकलाब आया, दौरे-आफताब (सूर्य का युग) आया/मुन्तजिर (प्रतीक्षित) थीं ये आंखें जिसकी एक जमाने से/अब जमीन गायेगी, हल के साज पर नगमे/वादियों मे नाचेंगे हर तरफ तराने से/अहले-दिल (दिलवाले) उगायेंगे खाक से महो-अंजुम (चांद-सितारे)/अब गुहर (मोती) सुबक (कम कीमत का) होगा जौ के एक दाने से/मनचले बुनेंगे अब रंगो-बू (रंग और गंध) के पैराहन (लिबास)/अब संवर के निकलेगा हुस्न (सौंदर्य) कारखाने से।’’ मजरूह की गजलों में आत्मविश्वास और आत्मसम्मान गजब का है।

उनकी गजलों के कई शेर इस बात की तस्दीक करते हैं। मसलन ‘‘हम ही काबा, हम ही बुतखाना, हमीं हैं कायनात/हो सके तो खुद को भी इक बार सजदा कीजिए।’’ या फिर‘‘अश्कों में रंगो-बूए-चमन (उपवन के रंग और गंध) दूर तक मिले/जिस दम असीर (बंदी) हो के चले गुलसितां से हम।’’, ‘‘ये हुक्म है रहे मुट्ठी में बंद सैले-नसीम (बहती हवा)/ये जिद है बहरे-तपां (तपने के लिए) कूजा-ए-कुहन (पुराना घड़ा) में रहे।’’ शायर का ये आत्मसम्मान ही है, जो उसे अपने से ताकतवर से सीधे-सीधे भिड़ा देता है। किसी तरह का कोई भी डर, उन्हें अपनी अभिव्यक्ति करने से रोक नहीं पाता।

मजरूह सुल्तानपुरी का आगाज फिल्मों में कैसे हुआ ?, इसका किस्सा कुछ इस तरह से है, मशहूर फिल्म निर्माता एआर कारदार ने अपनी फिल्म ‘शाहजहां’ के गीतों के लिए जिगर मुरादाबादी को साइन किया हुआ था। लेकिन जिगर साहब ने किसी वजह से यह फिल्म नहीं की। उन्हीं दिनों मुम्बई के एक मुशायरे में एआर कारदार ने मजरूह को सुना और उनकी गजल ‘‘शबे-इंतजार की कश्मकश में न पूछ कैसे सहर हुई/कभी इक चिराग बुझा दिया, कभी एक चिराग जला दिया।’’ को भरपूर दाद देते हुए अपनी फिल्म के लिए गाने लिखने की पेशकश कर दी। मगर मजरूह ने फिल्मों के लिए लिखने से साफ इंकार कर दिया। वजह, उन दिनों फिल्मों में काम करने को अच्छा नहीं समझा जाता था। शरीफ घराने के लोग इस काम को कमतर समझते थे। बहरहाल जिगर मुरादाबादी की समझाइश के बाद किसी तरह से मजरूह गाने लिखने के लिए तैयार हुए।

पहली ही फिल्म में उन्हें संगीत सम्राट नौशाद के साथ काम करने का मौका मिला। फिल्म के सारे गाने ही सुपरहिट साबित हुए। मजरूह के गीत और केएल सहगल की मखमली आवाज में जो गीत आये, वे आज भी सिनेमा प्रेमियों की जबान पर हैं। मसलन‘‘गम दिए मुस्तकिल, कितना नाजुक है दिल, ये न जाना’’, ‘’जब दिल ही टूट गया, हम जी के क्या करेंगे।’’ खास तौर से‘’जब दिल ही टूट गया…’’ इस गीत से केएल सहगल इतना मुतास्सिर हुए थे कि उन्होंने अपने अंतिम संस्कार के वक्त इस गीत को बजाने की वसीयत की थी और उनकी मौत के वक्त ऐसा ही किया गया।

‘शाहजहां’ के कामयाब गीतों के साथ ही मजरूह सुल्तानपुरी का फिल्मी सफर शुरू हो गया। उनकी कलम से एक के बाद एक शाहकार गीत निकले। ‘अंदाज’, ‘आरजू’, ‘सी.आई.डी.’, ‘चलती का नाम गाड़ी’, ‘नौ-दो ग्यारह’, ‘पेइंग गेस्ट’, ‘काला पानी’, ‘दिल्ली का ठग’, ‘पारसमणि’, ‘दोस्ती’, ‘फुटपाथ’, ‘तीन देवियां’, ‘बंबई का बाबू’ आदि फिल्मों के लगातार हिट गीतों ने उन्हें फिल्मी दुनिया में शिखर पर पहुंचा दिया। उनके लिखे गाने फिल्मों की कामयाबी की जमानत होते थे। हालांकि ‘मजरूह’ के मायने घायल होता है, लेकिन इससे उलट अपने पचास साल के फिल्मी कैरियर में मजरूह के गीतों ने टूटे हुए दिलों पर मरहम लगाने का काम किया है। उनके गीत आज भी उसी शिद्दत और प्यार से गुनगुनाये जाते हैं। मजरूह सुल्तानपुरी ने साल 1945 से लेकर साल 2000 तक हिंदी फिल्मों के लिए गीत लिखे। अपने पचपन साल के फ़िल्मी सफ़र में उन्होंने 300 फिल्मों के लिए तकरीबन 4000 गीतों की रचना की।

फिल्मी दुनिया में इतना लंबा समय और इतने सारे गीत किसी भी गीतकार ने नहीं रचे हैं। यह वाकई एक कीर्तिमान है। मजरूह ने नौशाद से लेकर चित्रगुप्त, एसडी बर्मन, ओपी नैयर, खैयाम, आरडी बर्मन और नये से नये संगीतकार राजेश रोशन, अनु मलिक, जतिन ललित, एआर रहमान और लेस्ली लेविस तक के साथ काम किया। फिल्म निर्माता नासिर हुसैन के साथ उनकी खूब जोड़ी जमी। ‘तुमसा नहीं देखा’, ‘दिल दे के देखो’, ‘फिर वही दिल लाया हूं’, ‘तीसरी मंजिल’, ‘प्यार का मौसम’, ‘कारवां’, ‘यादों की बारात’, ‘हम किसी से कम नहीं’, ‘ज़माने को दिखाना है’, ‘कयामत से कयामत तक’, ‘जो जीता वही सिकंदर’ आदि नासिर हुसैन की इन सभी फिल्मों के सुपर हिट गाने मजरूह के ही लिखे हुए हैं।

फिल्मी गीतों ने मजरूह सुल्तानपुरी को खूब इज्जत, शोहरत और पैसा दिया। बावजूद इसके वे अदबी काम को ही बेहतर समझते थे। अपने फिल्मी गीतों के बारे में उनका कहना था,‘‘फिल्मी शायरी मेरे लिए जरिया-ए-इज्जत नहीं, बल्कि जरिया-ए-मआश (जीविका का साधन) है। मैं अपनी शायरी को कुछ ज्यादा मैयारी (ऊंचे स्तर की) भी नहीं समझता। इसके जरिए मुझे कोई अदबी फायदा भी नहीं पहुंचा है, बल्कि फिल्मी मशरुफियत मेरी शेर-गोई (काव्य लेखन) की रफ्तार में हाइल रही।’’ यह बात सही भी है। फिल्मी गानों की मशरुफियत के चलते, वे ज्यादा अदबी लेखन नहीं कर पाये। लेकिन उन्होंने जो कुछ भी लिखा, वह उन्हें ऊंचे गजलकार के दर्जे में शामिल करने के लिए काफी है।

फिल्मों में जब भी मजरूह को गुंजाइश मिली, उन्होंने गीत की बजाय गजल को आगे बढ़ाया और ये गजल खूब मकबूल भी हुईं। फिल्मों में ऐसी ही उनकी कुछ मशहूर गजलें हैं,‘‘रहते थे कभी जिनके दिल में हम जान से भी प्यारों की तरह/बैठे हैं उन्हीं के कूचे में हम आज गुनहगारों की तरह।’’ (फिल्म : ममता), ‘‘हमीं करें कोई सूरत उन्हें बुलाने की/सुना है उनको तो आदत है भूल जाने की।’’ (फिल्म : एक नजर) इनमें भी फिल्म ‘दस्तक’ की ये गजल, ‘‘हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाजार की तरह/उठती है हर निगाह खरीदार की तरह।/…….मजरूह लिख रहे हैं वो अहले-वफे का नाम/हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह।’’, तो जैसे पूरी फिल्म का केन्द्रीय भाव प्रकट कर देती है।

मजरूह सुल्तानपुरी ने गजलें, नज्में, शेर जो कुछ भी रचा, वह सारा उर्दू और दीगर जबानों के अलावा देवनागरी लिपि में भी आ गया है। उनकी कुछ गजलों का अंग्रेजी में अनुवाद हुआ है। किताब का नाम ‘नेवर माइंड युअर चेन’ है। मजरूह ने हालांकि ज्यादातर गजलें ही लिखीं हैं, लेकिन उनकी जो नज्में हैं मसलन ‘कलम’, ‘लता मंगेशकर के नाम’ आदि वे भी किसी स्तर से कम नहीं। अदब की खिदमत और फिल्मी दुनिया में लिखे गीतों के लिए मजरूह सुल्तानपुरी, अपनी जिंदगी में ही कई अवार्डों से नवाजे गए। ‘ग़ालिब अवार्ड’, ‘इकबाल सम्मान’ और ‘वली अवार्ड’ जैसे अदबी अवार्डों के अलावा उन्हें फिल्म ’दोस्ती’ के गाने ’चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे’ के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला। मजरूह सुल्तानपुरी फिल्मी दुनिया में ऐसे गीतकार थे, जिन्हें सबसे पहले ‘दादा साहब फाल्के अवार्ड’ मिला। 24 मई, साल 2000 को 80 साल की उम्र में वे इस फानी दुनिया से हमेशा के लिए रुखसत हो गए। मजरूह सुल्तानपुरी भले ही जिस्मानी तौर पर हमसे जुदा हो गए हों, पर उनकी शायरी-गीत आज भी हवाओं में ये सदा दे रहे हैं,‘‘हमारे बाद अब महफिल में अफसाने बयां होंगे/बहारें हम को ढ़ूॅंढ़ेंगी न जाने हम कहॉं हांगे।’’

(मध्यप्रदेश निवासी लेखक-पत्रकार जाहिद खान, ‘आजाद हिंदुस्तान में मुसलमान’ और ‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफर’ समेत पांच किताबों के लेखक हैं।)

This post was last modified on May 24, 2020 5:19 pm

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