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Friday, September 24, 2021

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समस्या अब भी दिल्ली में ही है, सीमा पर नहीं !

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प्रधानमंत्री जी के अनेक उद्धरणों में, उनका एक कालजयी वाक्य है, 

” समस्या सीमा पर नहीं, बल्कि दिल्ली में है और समाधान भी दिल्ली से ढूंढना होगा। जब तक दिल्ली में सक्षम सरकार नहीं बनती, तब तक सेना कितनी भी समर्थ हो सुरक्षा की गारंटी नहीं ले सकती।”

यह बात बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित होने पर पीएम नरेंद्र मोदी जी ने हरियाणा के रेवाड़ी में पूर्व सैनिकों की एक बड़ी रैली को संबोधित करते हुए, 15 सितंबर 2013 को कही थी । वीडियो और खबरें इसकी गूगल कीजिएगा तो मिल जाएंगी।

दिल्ली यहां सत्ता के केंद्र के रूप उद्धृत किया गया है। जब यह बात कही जा रही थी तो केंद्र में यूपीए सरकार सत्तारूढ़ थी और डॉ. मनमोहन सिंह देश के पीएम थे। यूपीए 2 के आखिरी तीन साल बेहद विवादित और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे थे। तब यह बात कही गयी थी। 

वक़्त पलटा, जो सज्जन कह रहे हैं वही 2014 में गद्दीनशीन हुए और अब तक वे ही सरकार में बने हुए हैं, और 2024 ई तक  अपने पद पर जलवा अफरोज भी रहेंगे। आज फिर वही बात याद आ रही है कि दिल्ली यानी सत्ता यानी सरकार क्या करती रही कि आज एक ऐसी विषम स्थिति उत्पन्न हो गयी कि आमने-सामने की हाथापाई में हमारे 20 अफसर और जवान शहीद हो गए? क्या इसका दोष दिल्ली पर नहीं है ? या यह वाक्य दिल्ली का रंग बदलते ही, बस एक मुर्दा उद्धरण बन कर रह गया है ?

गलवान घाटी और पयोग्योंग झील के आसपास, लद्दाख में जो हो रहा है, वह सैनिक समस्या ज़रूर है पर उस समस्या की जड़ अब भी दिल्ली में ही है, सीमा की समस्या भी दिल्ली की ही वजह से है।

अब भी साबरमती तट और मामल्लपुरम के खूबसूरत सागर तट पर, झूला झूलते और सागर को छू कर आती हुई पुरवैया के सभी वीडियो और स्टिल फोटोग्राफ, जिसमें दोनों ही महान नेता, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग बेहद आत्मीयता से बात करते हुए दिख रहे हैं, बरबस याद आ रहे हैं। 

1962 से हमें यह पता है कि, चीन बेहद अविश्वसनीय पड़ोसी है, वह एक लंबे समय से, धीरे-धीरे हमारे सभी पड़ोसियों को साम, दाम, दंड, भेद से हमारे खिलाफ कर रहा है, फिर भी हम सचेत क्यों नहीं हुए? 

करगिल में भी हम ऊंघते हुए पकड़े गए और भले ही उसे हम विजय मानें, पर वह हमारी जबरदस्त इंटेलिजेंस विफलता थी। इस बार भी हम ऊंघते हुए ही तो नहीं पकड़े गये हैं ? 

पिछले दस दिनों ने सोशल मीडिया, ट्विटर, अखबारों में डिफेंस एक्सपर्ट के बयान, ट्वीट और लेख आ रहे हैं कि सीमा पर सब कुछ ठीक नहीं है। 7000 चीनी सैनिकों का जमावड़ा है। हमारी रूटीन गश्त तक, जहां तक जा सकती थी, नहीं जा पा रही है। पर सरकार ने कुछ किया कि, नहीं किया, यह स्पष्ट नहीं है। परिणाम, आज हमारे 20 अफसर और जवान शहीद हो गए। दुनिया में जैसी आज की परिस्थितियां हैं, उसे देखते हुए किसी बड़े युद्ध की संभावना नहीं है, लेकिन आज जो नुकसान हमारी सैन्य जन शक्ति का हुआ है, वह एक बड़ा नुकसान है। 

चीन के भी सैनिकों के मरने की खबर आ रही है। दोपहर में ग्लोबल टाइम्स ने पीएलए के 5 सैनिकों के मरने की खबर दी बाद में उसका उन्होंने खंडन कर दिया। याद रखिए, चीन के सैनिकों के मर जाने से हमारे जवानों के बलिदान की कसक कम नहीं होगी। अभी अखबारों ने 43 चीनी सैनिकों के मारे जाने की खबर दी है । पर यह खबर कितनी पुष्ट है, यह पता नहीं है। 

भारत चीन सीमा पर तनाव के बीच हम चीनी कंपनियों को लगातार अरबों रुपये के ठेके क्यों देते जा रहे हैं? हमीं से मोहब्बत, हमीं से लड़ाई ! 

गुजरात के धोलेरा में सबसे बड़ी स्टील फैक्ट्री का ठेका जनवरी 2020 में दिया गया। चीन की तसिंगशन लिमिटेड ने 21,000 करोड़ रुपये की लागत से धोलेरा में प्लांट लगाने की घोषणा की है। वाइब्रेंट समिट में चीन की इस प्रमुख स्टील उत्पादक कंपनी ने गुजरात के इस्कॉन ग्रुप के साथ मिलकर धोलेरा में स्टील प्लांट लगाने का करार किया है। कंपनी इस प्लांट में 21,000 करोड़ का निवेश करेगी। तीन साल में यहां उत्पादन शुरू हो जाएगा, ऐसा गुजरात सरकार की कंपनी धोलेरा इंडस्ट्रियल सिटी डेवलपमेंट लिमिटेड का विश्वास है। धोलेरा में कुल 500 एकड़ में बनने वाले इस प्लांट में हर महीने 4 लाख मीट्रिक टन स्टील का उत्पादन होगा। ये पूरा स्टील कॉम्प्लेक्स होगा और यहां पर स्टील से बनने वाली हर चीज़ बनेगी।

दिल्ली-मेरठ रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (RRTS) प्रोजेक्ट के अंडरग्राउंड स्ट्रेच बनाने के लिए एक चीनी कंपनी शंघाई टनल इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड (STEC) को ठेका मिला है। यह ठेका मिलने की खबर 15 जून को सामने आयी और उसी दिन हमारे 20 जवान शहीद हो गए। जब सीमा पर सरगर्मी थी तब यह टेंडर, ठेके की कार्यवाही क्यों की गई ? ऐसे समय में जब देश में चीन के खिलाफ माहौल है और चीनी माल के बहिष्कार की बातें की जा रही हैं करीब 1100 करोड़ रुपये का यह ठेका चीनी कंपनी को मिलेगा तो सवाल उठेंगे ही। यही नहीं, इस पर सवाल, बीजेपी के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच (SJM) ने भी उठाये हैं। 

स्वदेशी जागरण मंच ने नरेंद्र मोदी सरकार से इस बोली को रद्द करने की मांग भी की थी। पर उन बेचारों की तो और मुसीबत है। वे तो सरकार के खिलाफ, खुलकर कुछ कह भी नहीं सकते हैं। चीन से आर्थिक संबंधों पर सख्ती से चीन की मुखालफत करने वाली, स्वदेशी जागरण मंच ने सरकार से मांग की है कि ‘इस ठेके को रद्द करते हुए इसे किसी भारतीय कंपनी को दिया जाए। मंच ने कहा कि यदि सरकार के आत्मनिर्भर भारत अभियान को सफल बनाना है तो ऐसी महत्वपूर्ण परियोजनाओं में चीनी कंपनियों को शामिल होने का अधिकार ही नहीं देना चाहिए।’ टिकटॉक को अनइंस्टॉल करना और बत्तियों की झालर का बहिष्कार करना, सरकार के समर्थकों को भले ही तुष्ट कर दे पर इससे चीन का धेले भर का नुकसान नहीं  होगा। 

4 बार, मुख्यमंत्री रहते और 6 साल में 4 बार प्रधानमंत्री रहते, नरेन्द्र मोदी जी चीन गए है। शी जिनपिंग से उनके दोस्ताना ताल्लुकात हैं। फिर ऐसी स्थिति क्यों आ गयी ? कुछ लोग कहेंगे कि चीन तो पुराना अविश्वसनीय है। 1962 से धोखा देता रहा है। जब यह इतिहास पता है तो उस पर इतना भरोसा क्यों किया गया ? आखिर इसकी ज़रूरत क्या थी ?  

अब भारत चीन के आपसी व्यापार पर कुछ आंकड़े देखें: 

भारत और चीन के बीच कारोबार में किस तरह बढ़ोतरी हुई है, इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि इस सदी की शुरुआत यानी साल 2000 में दोनों देशों के बीच का कारोबार केवल तीन अरब डॉलर का था जो 2008 में बढ़कर 51.8 अरब डॉलर का हो गया। इस तरह सामान के मामले में चीन अमरीका की जगह लेकर अब भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है।

2018 में दोनों देशों के बीच कारोबारी रिश्ते नई ऊंचाइयों पर पहुंच गये और दोनों के बीच 95.54 अरब डॉलर का व्यापार हुआ।

2019 में भारत-चीन के बीच व्यापार 2018 की तुलना में करीब 3 अरब डॉलर कम रहा। दोनों देशों में आर्थिक नरमी से व्यापार प्रभावित हुआ है। व्यापार में गिरावट के बावजूद वर्ष 2019 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा (चीन को निर्यात की तुलना में वहां से आयात का आधिक्य) 56.77 अरब डॉलर के साथ ऊंचा बना रहा।

चीन के सीमा शुल्क सामान्य विभाग (जीएसीसी) के मंगलवार को जारी आंकड़े के अनुसार भारत के साथ व्यापार में चीनी मुद्रा-आरएमबी-युआन के हिसाब से 1.6 प्रतिशत की हल्की वृद्धि हुई है। जीएसीसी के उप-मंत्री जोऊ झिवु ने कहा कि चीन-भारत का द्विपक्षीय व्यापार पिछले साल 639.52 अरब युआन (करीब 92.68 अरब डॉलर) रहा। यह सालाना आधार पर 1.6 प्रतिशत अधिक है। 

चीन का भारत को निर्यात पिछले साल 2.1 प्रतिशत बढ़कर 515.63 अरब युआन रहा जबकि भारत का चीन को निर्यात 0.2 प्रतिशत घटकर 123.89 अरब युआन रहा। भारत का व्यापार घाटा 2019 में 391.74 अरब युआन रहा। हालांकि डॉलर के संदर्भ में दोनों देशों के बीच व्यापार कम हुआ है। 

2018 में द्विपक्षीय व्यापार 95.7 अरब डॉलर था। 2019 में इसके 100 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद थी यह 3 अरब डॉलर कम होकर 92.68 अरब डॉलर रहा।

वर्ष-2019 में चीन से भारत को निर्यात 74.72 अरब डॉलर रहा। 

2018 में चीन ने भारत को 76.87 अरब डॉलर का निर्यात किया था। इसी दौरान भारत का चीन को निर्यात घट कर 17.95 अरब डॉलर के बराबर रहा। यह इससे पिछले वर्ष 18.83 अरब डॉलर था। वर्ष 2019 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 56.77 अरब डॉलर रहा। यह 2018 में 58.04 अरब डॉलर था।

चीन में भारत के राजदूत ने जून 2019 में दावा किया था कि इस साल यानी 2019 में भारत-चीन का कारोबार 100 बिलियन डॉलर पार कर जाएगा।  लेकिन, कारोबार बढ़ रहा है, इसका यह मतलब नहीं है कि फ़ायदा दोनों को बराबर हो रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक, 2018 में भारत-चीन के बीच 95.54 अरब डॉलर का कारोबार हुआ लेकिन इसमें भारत ने जो सामान निर्यात किया उसकी क़ीमत 18.84 अरब डॉलर थी।

इसका मतलब है कि चीन ने भारत से कम सामान खरीदा और उसे पांच गुना ज़्यादा सामान बेचा। ऐसे में इस कारोबार में चीन को फ़ायदा हुआ। भारत को अगर किसी देश के साथ सबसे ज़्यादा कारोबारी घाटा हो रहा है तो वह चीन ही है। यानी भारत, चीन से सामान ज़्यादा खरीद रहा है और उसके मुक़ाबले बेच बहुत कम रहा है।

2018 में भारत को चीन के साथ 57.86 अरब डॉलर का व्यापारिक घाटा हुआ। दोनों देशों के बीच का यह व्यापारिक असंतुलन भारत के लिए सरदर्द बन गया है। भारत चाहता है कि वो इस व्यापारिक घाटे को किसी ना किसी तरह से कम करे। चीन के वाणिज्य मंत्रालय के मुताबिक़ दिसंबर 2017 के आखिर तक चीन ने भारत में 4.747 अरब डॉलर का निवेश किया।

चीन भारत के स्टार्ट-अप्स में काफ़ी निवेश कर रहा है। हालांकि, भारत का चीन में निवेश तुलनात्मक रूप से कम है। सितंबर 2017 के आखिर तक भारत ने चीन में 851.91 मिलियन डॉलर का निवेश किया है। अब दोनों देश यह कोशिश कर रहे हैं कि वो आपसी निवेश को बढ़ाएं।

आज सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि, लद्दाख में इतनी शहादत के बाद हमने क्या पाया है अब तक ?

अब जो चीजें साफ हो रही हैं उससे यह दिख रहा है कि, लद्दाख क्षेत्र में जो हमारे सैन्य बल की शहादत हुई है वह एक बड़ा नुकसान है। कहा जा रहा है कि सैनिकों के पीछे हटने हटाने को लेकर यह शहादत हुई है। अखबार की खबर के अनुसार, 43 सैनिक चीन के भी मारे गए हैं। हालांकि, इस खबर की पुष्टि, न तो हमारी सेना ने की है और न चीन ने। यह एएनआई की खबर है। एएनआई को यह खबर कहां से मिली, यह नहीं पता है। शहादत की भरपाई, दुश्मन देश की सैन्य हानि से नहीं आंकी जा सकती है। एक भी जवान की शहादत युद्ध के नियमों में एक बड़ा नुकसान होता है। यह बस, एक मानसिक तर्क-वितर्क की ही बात होती है कि, उन्होंने 20 हमारे मारे तो 43 हमने उनके मार डाले। पर इतने सैनिक खो कर, हमने पाया क्या, यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। 

इस पूरे घटनाक्रम को देखें तो, यह तनाव पिछले दस पंद्रह दिन से जोरों से चल रहा है और ऐसा भी नहीं कि, दबा छुपा हो । डिफेंस एक्सपर्ट अजय शुक्ल पिछले कई दिनों से चीनी सेना की, लद्दाख क्षेत्र में, सीमा पर बढ़ रही गतिविधियों पर, जो स्थितियां है उसके बारे में लगातार ट्वीट कर रहे हैं। उन्होंने बिजनेस स्टैंडर्ड अखबार में एक लेख भी लिखा और यह भी कहा कि, 60 वर्ग किमी हमारी ज़मीन, चीन दबा चुका है। उनके अलावा अन्य रक्षा विशेषज्ञ चीन की हरकतों पर उसकी अविश्वसनीयता के इतिहास के मद्देनजर हमें सतर्क पहले भी करते रहे हैं। लेकिन, सरकार ने इन सब चेतावनियों पर या तो ध्यान नहीं दिया, या ध्यान दिया भी तो समय से उचित रणनीति नहीं बना पायी। 

गलवान घाटी के पास, आठ पहाड़ियों के छोटे-छोटे शिखर जिन्हें फिंगर कहा जाता है, के पास यह सीमा विवाद है। सीमा निर्धारित नहीं है और जो दुर्गम भौगोलिक स्थिति वहां है उसमें सीमा निर्धारण आसान भी नहीं है तो, कभी हम, चीन के अनुसार, चीन के इलाके में तो कभी वे हमारे अनुसार, भारत के इलाके में गश्त करने चले जाते रहे हैं। लेकिन यह यदा कदा होता रहा है। सीमा निर्धारित न होने के कारण, यह कन्फ्यूजन दोनों तरफ है।

लेकिन जब चीनी सैनिकों का जमावड़ा उस क्षेत्र में बढ़ने लगा और इसकी खबर भी असरकारी स्रोत से मिलने लगी तो उस पर सरकार ने क्या किया ? हो सकता है सरकार ने डिप्लोमैटिक चैनल से बात की भी हो, पर उसका असर धरातल पर नहीं दिखा। अन्ततः, चीनी सेना की मौजदगी, 7,000 सैनिकों तक की, वहां बताई जाने लगी। 

क्या इतनी शहादत के बाद हम पूर्ववत स्थिति में आ गए हैं ? यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। अगर इतने नुकसान के बाद भी हमने चीन को उनकी सीमा में खदेड़ दिया है और अपनी सीमा बंदी मुकम्मल तरीके से कर ली है तब तो यह एक उपलब्धि है अन्यथा यह शहादत एक गम्भीर कसक ही बनी रहेगी। 

युद्ध का मैदान शतरंज की बिसात नहीं है कि उसने हमारे जितने प्यादे मारे हमने उससे अधिक प्यादे मारे। युद्ध का पहला उद्देश्य है कि जिस लक्ष्य के लिये युद्ध छेड़ा जाए वह प्राप्त हो। यहां जो झड़प हुयी है वह आर्म्ड कॉम्बैट की बताई जा रही है, जिसकी शुरुआत चीन की तरफ से हुयी है। हमारे अफसर, सीमा पर पीछे हटने की जो बात तय हुयी थी, उसे लागू कराने गए थे। अब इस अचानक झड़प का कोई न कोई या तो तात्कालिक कारण होगा या यह चीन की पीठ में छुरा भौंकने की पुरानी आदत और फितरत, का ही एक, स्वाभाविक परिणाम है, यह तो जब सेना की कोर्ट ऑफ इंक्वायरी होगी तभी पता चल पाएगा। 

इस समय सबसे ज़रूरी यह है कि

● हम जहां तक उस क्षेत्र में इस विवाद के पहले काबिज़ थे, वहां तक काबिज़ हों और चीन की सीमा पर अपनी सतर्कता बढ़ाएं। 

● चीन को हमसे आर्थिक लाभ भी बहुत है। उसे अभी अभी 1100 करोड़ का एक बड़ा ठेका मिला है और गुजरात में जनवरी में देश के सबसे बड़े स्टील प्लांट बनाने का जिम्मा भी। इस परस्पर आर्थिक संपर्क को कम किया जाए न कि टिकटॉक को अन्स्टाल और झालरों के बहिष्कार तक ही सीमित रहा जाए। 

● भारत को अपने सभी पड़ोसी देशों से संबंध बेहतर बनाने और उन्हें साथ रखने के बारे में गम्भीरता से सोचना होगा। इन्हें चीन के प्रभाव में जाने से रोकना होगा। 

● पाकिस्तान से संबंध सुधरे यह फिलहाल तब तक सम्भव नहीं है। इसका कारण अलग और जटिल है। 

सरकार को तुरंत एक सर्वदलीय मीटिंग बुलानी चाहिए और सबको बैठ कर इस जटिल समस्या का समाधान ढूंढना चाहिए। सीमा पर समस्या ज़रूर है पर उसका समाधान दिल्ली से ही होगा। 

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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