Thursday, December 1, 2022

पंजाब के आला सियासी दलों ने टेके किसान मोर्चे के सामने घुटने

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सामने खड़े व नंगी आंखों से दिखाई पड़ रहे पंजाब के विधानसभा चुनाव के दौर में किसान मोर्चा की एक हुंकार ने पंजाब के लगभग सभी सियासी दलों को घुटनों के बल लाकर खड़ा कर दिया है। बत्तीस विभिन्न संगठनों पर आधारित किसान मोर्चा की दिल्ली में फतेह में अभी शायद थोड़ा समय लगे पर एक बात तय है कि मोर्चा ने चंडीगढ़ जरूर फतेह कर लिया है। ताजा स्थिति ये है कि शुक्रवार को चंडीगढ़ में किसान मोर्चा ने सियासी दलों के साथ बात करने हेतु जो बैठक बुलाई गई वह बेहद कामयाब रही।

भाजपा का तो किसान मोर्चा बायकाट कर ही चुका है इसलिए भाजपा को आमंत्रित ही नहीं किया गया जबकि उसके अलावा तीनों प्रमुख दल शिरोमणि अकाली दल-बसपा, कांग्रेस व आम आदमी पार्टी के नेता किसान मोर्चे के सामने नतमस्तक ही हो गए। किसान मोर्चा का आदेश था कि जब तक चुनाव आचार सहिंता लागू नहीं हो जाती तब तक राजनीतिक दल चुनाव प्रचार न करें क्योंकि इस प्रकार की सियासी गतिविधियों से मोर्चे की गंभीरता से जनता का ध्यान भटकता है। आम आदमी पार्टी ने तो पूरे तौर पर उनकी ये मांग मौके पर ही स्वीकार कर ली। अकाली दल व कांग्रेस के नेताओं ने आलाकमान से सलाह करके फैसला देने का आश्वासन दिया। बांस बंधुओं की लोक इन्साफ पार्टी की ये शिकायत रही कि उनके दल को बैठक में आमंत्रित ही नहीं किया गया।

याद रहे कि मोगा में हुई शिरोमणि अकाली दल की रैली के बाद हुए उत्पात व अकाली कार्यकर्ताओं तथा किसानों के बीच हुई झड़प के बाद किसान प्रदर्शनकारियों के खिलाफ केस दायर हो गए थे। इसके साथ ही सुखबीर बादल न केवल घबरा गए थे बल्कि उन्होंने 100 विधानसभा सीटों तक की अपनी यात्रा को भी रद्द कर दिया था। इसके साथ ही अकाली दल की मुहिम को ब्रेक लग गया था। सुखबीर बादल ने खुद ही ये बयान दे दिया कि उनकी पार्टी किसान मोर्चा से सलाह मश्विरा करके ही अपनी सियासी गतिविधियों को आगे बढ़ाएगा। इससे किसान मोर्चे के हाथ में वो ताकत आ गई जिसका इस्तेमाल करके मोर्चा पंजाब में सियासत का रुख अपनी मर्जी के अनुसार, जिधर चाहे मोड़ सके। इसके साथ एक बात बिल्कुल साफ हो गई है कि किसान मोर्चा सियासी सोच को लेकर जहां पहले दिन से खड़ा था, आज भी वहीं खड़ा है।

उन्होंने किसी भी सियासी दल को मोर्चे में शामिल न किये जाने का जो प्रण लिया था उस पर मोर्चा कायम है और इस मामले पर दिखाई गई मजबूती ने ही आज पंजाब की सियासी पार्टियों को घुटने के बल ला खड़ा किया है। दूसरी बात भी स्पष्ट हो गई कि मोर्चा सक्रिय राजनीति नहीं करेगा बल्कि सक्रिय राजनीति को अपने चाबुक के साथ चलाएगा। बलबीर सिंह राजेवाल ने कहा कि उन्होंने समस्त पार्टियों से कहा है कि वे जनता से जो भी वायदे करें उसका रोडमैप बना कर कैलेंडर की तर्ज पर जनता को बताएं कि कौन सा वायदा किन साधनों के कारण कितनी देर में पूरा किया जाएगा। इन सारे हालात से लगता है कि इस बार पंजाब के चुनाव में बहुत सारी परंपराएं बनेगी और बहुत सारी पुरानी परंपराओं ढहेंगी।

आज की बैठक के बाद पंजाब के चुनावी परिदृष्य में ये बड़ा बदलाव आएगा कि  जिन किसानों को आने वाली सरकार के पास जाकर ज्ञापन देकर अपनी मांगें रखने की जरूरत पड़ती थी उन किसानों के संगठन ये तय करेंगे कि राजनीतिक दल जनता से जो वायदे करके चुनाव में उतरने जा रहे हैं उन वायदों को पूरा करने के लिए वो साधन सहां से लाएंगे। इसके साथ साथ चुनाव प्रचार का पैटर्न ज्यादातर सोशल प्लेटफार्म्स पर आधारित होगा या फिर यूरोप जैसा डिबेट आधारित चुनाव की पंजाब से ही शुरुआत होगी। यदि ऐसा होता है तो पंजाब फिर से चुनावी प्रक्रिया में देश का अगुवा साबित होगा।

(अर्जुन शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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