Saturday, October 16, 2021

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रेलवे जमीन बिक्री के लिए हरी झंडी है जस्टिस मिश्रा का झुग्गी उजाड़ने का फैसला

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यकीन हो तो कोई रास्ता निकलता है
हवा की ओट लेकर भी चिराग जलता है
मंजूर हाशमी के इस शेर के साथ 1 फरवरी 2020 को बजट (2019-20) पेश करते हुए वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने सरकारी ज़मीनों को बेचने का ऐलान किया था।

वो बजट ‘सशक्त राष्ट्र, सशक्त नागरिक’ के नागरिक के सिद्धांत पर पेश किया गया था, लेकिन ये नहीं बताया गया था कि राष्ट्र कौन है और नागरिक कौन, और किस राष्ट्र और किस नागरिक को सशक्त करने की बात कही जा रही है। साल बीतते ये बात भी समझ में आ गई है कि अडानी-अंबानी ही असली राष्ट्र हैं और सरकार उन्हें सशक्त करने की मुहिम में लगी हुई है, जबकि गरीब-गुरबा तो वो नागरिक नहीं हैं, वर्ना उनकी झुग्गियों को तोड़कर अडानी-अंबानी रूपी राष्ट्र को सशक्त नहीं किया जाता।

रेल मंत्रालय के अधीनस्थ रेल भूमि विकास प्राधिकरण (RLDA) द्वारा विकट कोविड-19 वैश्विक प्रकोप के दौरान ही 17 अप्रैल को रेलवे के विभिन्न भूखंडों को लीज पर देने के लिए ई-बोलियां आमंत्रित की गई थीं। रेल भूमि विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष वेद प्रकाश डुडेजा ने प्राधिकरण द्वारा विभिन्न रेल भूखंडों को लीज पर देने के लिए जहां ई-बोलियां आमंत्रित कीं और इस संबंध में सभी प्री-बिड मीटिंग्स का आयोजन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शुरू किए जाने की सूचना दी थी।

9 जुलाई को स्टेक होल्डर्स की समस्याओं और उनके सवालों का समाधान तत्काल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से की गई थी। माध्यम से या बाद में ई-मेल द्वारा किए जाने और और सुचारु कामकाज के लिए शीघ्र ही ई-फाइलिंग प्रणाली को लागू करने की घोषणा की गई थी।

गौरतलब है कि रेल भूमि विकास प्राधिकरण गैर-भाड़ा उपायों द्वारा राजस्व अर्जन के उद्देश्य से रेल भूमि का वाणिज्यिक विकास करने के लिए कार्य करता है। आरएलडीए को 2007 में बनाया गया था, जिसे ट्रांसपोर्टर की खाली भूमि के कुछ हिस्सों को वाणिज्य माध्यम के लिए पहचानने का अधिकार था। रेलवे बोर्ड द्वारा एक टुकड़े के रूप में जमीन को निर्धारित करने की एक पहले की नीति भी शामिल है, जिसमें भारतीय रेलवे के पास पूरे देश में लगभग 43,000 हेक्टेयर खाली भूमि है।

रेलवे की ज़मीन पर फूलेंगे-फलेंगे बिल्डर
जुलाई, 2015 में मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने रेलवे की ज़मीन को 40 से 99 साल की लीज पर देने का फैसला किया था। तब ही केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि रेलवे की जमीन को अधिकतम 99 साल की लीज पर दिया जा सकेगा। पीपीपी मॉडल में रेलवे स्टेशनों के पुनर्विकास के लिए इंडियन रेलवे स्टेशन डेवलपमेंट कॉरपोरेशन का गठन पहले ही किया जा चुका है। रेलवे की ज़मीन पर होटल, रेस्त्रां, कमशिर्यल कॉम्पलेक्स, फूड प्लाजा का निर्माण किया जाएगा। इसके अलावा बिल्डर रेलवे की ज़मीन पर बहुमंजिला इमारतें बनाकर बेच कर मोटा मुनाफ़ा बटोर सकेंगे।

असल बात ये है कि केंद्र की मोदी सरकार ने रेलवे और उसकी संपत्तियों को निजी हाथों में देने का खाका तैयार कर लिया है। देश भर में फैली विभिन्न मंत्रालयों और सार्वजनिक उपक्रमों की बहुमूल्य ज़मीन पर केंद्र सरकार की नज़र पहले से लगी हुई थी, लेकिन पहली बार सरकार ने फरवरी 2020 में संसद में आधिकारिक घोषणा करते हुए इस ज़मीन का निजी क्षेत्र की मदद से व्यावसायिक इस्तेमाल करने की घोषणा की। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट भाषण में स्पष्ट कर दिया कि सरकारी ज़मीन के विकास के लिए निजी क्षेत्र का सहयोग लिया जाएगा। देश में सबसे अधिक ज़मीन सेना और रेलवे के पास है। इसके अलावा एयर इंडिया, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया और अन्य सार्वजनिक उपक्रमों की बहुमूल्य ज़मीन शहरों में पड़ी हैं।

रेलवे की ज्यादातर ज़मीन छोटे-बड़े शहरों के बीचों बीच है। संसद की लोक लेखा समिति (पीएसी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, रेलवे के पास चार लाख 58 हजार 588 हेक्टेयर जमीन है। इनमें से 46 हजार 409 हेक्टेयर भूमि खाली पड़ी है, जबकि 931 हेक्टेयर पर अवैध क़ब्ज़ा है।

भारतीय रेलवे की ज़मीन की मुद्रीकरण करने की योजना
रेलवे के मानक नियमों के तहत रेलखंड के दोनों तरफ 15 मीटर की जमीन खाली रखनी होती है। ट्रांसपोर्टर अपने वर्तमान और भविष्य की परियोजनाओं के लिए अपनी खाली जमीन के पार्सल की भी पहचान करने में व्यस्त हैं। भूमि सीमा को रेखांकित किया जा रहा है, ताकि अतिक्रमण हटाया जा सके और जब आवश्यक हो, भूमि पार्सल परियोजना के लिए तैयार हो जाए। रेलवे इसी बात के मद्देनज़र कि आने वाले वक्त में कितनी ज़मीन इस्तेमाल की जा सकती है पटरियों के किनारे बसी झुग्गी-बस्तियों को हटाने पर आमादा है। अधिशेष स्थापित होने के बाद, ये जमीन पार्सल रेलवे परियोजनाओं जैसे कि स्टेशन पुनर्विकास, माल ढुलाई, गोदामों, लॉजिस्टिक्स पार्क और मॉडल स्टेशनों के लिए आवंटित किए जाएंगे। इन आवंटन के बाद अधिशेष RLDA द्वारा वाणिज्यिक विकास के लिए जाएगा।

साल 2018 की फाइनेंशियल एक्सप्रेस की एक ख़बर के मुताबिक साल 2018 से ही भारतीय रेलवे ने अपनी भूमि मुद्रीकरण परियोजना पर तेजी से काम किया है। रेल भूमि विकास प्राधिकरण (RLDA) 30 भूमि पार्सल के वाणिज्यिक विकास के लिए मध्य अप्रैल तक बोलियां आमंत्रित करेगा। ट्रांसपोर्टर्स की संभावित रसीदों के रूप में इन भूमि पार्सल से लीज रेंटल 10 साल की अवधि में लगभग 7,000 करोड़ रुपये हो सकती है। रेलवे की योजना अगले पांच सालों में भूमि मुद्रीकरण से कम से कम 19,000 करोड़ रुपये का अधिग्रहण करने का है, जिसका मतलब है कि ज्यादा से ज्यादा जमीन के पार्सल को जल्द ही वाणिज्यिक उपयोग में लाया जाएगा।

साल 2018 से ही RLDA डेवलपर्स को जमीन दे रही है, जिनका प्रीमियम (रेंटल) आधार पर चयन किया जाता रहा है। शिमला, बांद्रा, रक्सौल, ग्वालियर और पाडी (चेन्नई) में पांच जगह की भूमि का प्रीमियम साल 2018 ही में पेश किया गया था, जो करीब 72 करोड़ रुपये था। सितंबर 2019 में झांसी में सीपरी बाज़ार मार्ग पर रेलवे की जमीन घनाराम मल्टीप्लेक्स प्राइवेट लिमिटेड को 45 वर्षों की लीज पर मात्र 30.68 करोड़ में दे दी गई थी, जिसमें कंपनी मल्टीप्लेक्स कांपलेक्स बनाएगी। साल 2018 में रेलवे ने 13 राज्यों को रेलवे की 12,066 एकड़ भूमि पार्सलों को खरीदने के लिए पत्र लिखा था।

रेलवे की ज़मीन को लीज पर देने के बाद डेवलपर्स वाणिज्यिक उपयोग के प्रकार को तय करने के लिए स्वतंत्र होंगे, जिसमें होटल, मॉल या स्थान पर निर्भर करते हुए व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य कुछ भी शामिल हैं। दिल्ली में सराय रोहिल्ला (2000 करोड़ रुपये), अशोक विहार (1500 करोड़ रुपये) और मुंबई के बांद्रा (2000 करोड़ रुपये) की रेट फिक्स हो चुकी है। बता दें कि डेवलपर्स को कुल प्रीमियम अपफ्रंट का 10% का भुगतान करना पड़ता है, फिर वे दो-दो साल के लिए बिना भुगतान वाले विकल्प ले सकते हैं। भुगतान तीसरे वर्ष के बाद से फिर से शुरू होगा जो 10वें साल तक जाएगा। यदि डेवलपर्स चाहें तो उनके पास पूर्ण प्रीमियम अग्रिम भुगतान करने का विकल्प होता है।

2017-18 वित्त वर्ष की शुरुआत में, रेलवे द्वारा RLDA को सौंपी गई कुल भूमि 485.70 हेक्टेयर थी। इसी वक्त, रेलवे में कुल 51,648 हेक्टेयर रिक्त भूमि थी। हालांकि बहुसंख्यक रेलवे पटरियों के साथ स्ट्रिप्स हैं जो वाणिज्यिक रूप से व्यवहार्य नहीं हैं और लगभग 862 हेक्टेयर अतिक्रमण किए गए हैं।

जज अरुण मिश्रा ने बिना इस बात पर तनिक भी विचार किए कि इस विकट कोरोनाकाल में 48 हजार झुग्गी बस्ती के लोग कहां जाएंगे, सामान्य करुणा और संवेदनशीलता तक को ताख पर रखते हुए महज तीन महीने में तोड़कर हटाने का फरमान सुना दिया।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव का लेख।)

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