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धार्मिक मामलों में संविधान का कितना दखल? सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की बेंच करेगी तय

उच्चतम न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सोमवार को कहा कि वह आवश्यक धार्मिक प्रथाओं पर मुद्दों को फिर से तैयार करने, आस्था और मौलिक अधिकारों के बीच परस्पर संबंध और धार्मिक प्रथाओं पर न्यायिक समीक्षा की सीमा पर विचार करेगी, जिन्हें 14 नवंबर, 2019 को पांच जजों की बेंच ने सबरीमला पुनर्विचार आदेश में संदर्भित किया था।

भारत का संविधान हर नागरिक को समानता का अधिकार देता है। यानी किसी धर्म, लिंग या किसी और वजह से भेद-भाव नहीं किया जा सकता। वहीं संविधान धर्म की आज़ादी देता है, जिसमें कहा गया है कि सरकार किसी के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी। तो प्रश्न ये है कि अगर किसी मंदिर या मस्जिद को एक धार्मिक संस्थान संचालित कर रहा है और उनकी मान्यता के अनुसार वहां किसी महिला का प्रवेश नहीं हो सकता तो क्या सरकार उसमें हस्तक्षेप कर सकती है?

यहां धार्मिक संस्था की आज़ादी का मान रखा जाएगा या फिर महिला की समानता का अधिकार सर्वोपरि होगा। अब उच्चतम न्यायालय ऐसे मामलों के लिए विस्तार से आदेश देगा। विधि क्षेत्रों में इसे सकारात्मक रूप से देखा जा रहा है क्योंकि देश संविधान और रुल ऑफ़ लॉ की अवधारणा पर चलना चाहे, जबकि पिछले कुछ समय से संतुलन बनाने की न्यायपालिका की कोशिश में संविधान की ही अनदेखी हो रही है।

उच्चतम न्यायालय के नौ जजों की संविधान पीठ ने सोमवार को इस मामले की सुनवाई शुरू की कि धार्मिक मामलों में संविधान का कितना होगा दखल होगा। मौजूदा मामले में उच्चतम न्यायालय को तय करना है कि धर्म और संविधान का दायरा क्या है, इनकी लक्ष्मण रेखा क्या है और दोनों एक-दूसरे में किस हद तक हस्तक्षेप कर सकते हैं। एक तरफ जहां आज के समाज में संविधान सर्वोपरि है। वहीं संविधान धार्मिक आजादी की भी सुरक्षा देता है। ऐसे में दोनों में समन्वय कैसे बनेगा।

गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय की सात जजों की पीठ ने 1954 में उडुपी जिले के शिरूर मठ के संचालन के मामले में एक ऐतिहासिक फैसला (THE COMMISSIONER, HINDU RELIGIOUS ENDOWMENTS, MADRASVs.SRI LAKSHMINDRA THIRTHA SWAMIAR OF SRI SHIRUR MUTT.निर्णय तिथि 16/04/1954) दिया था। उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी थी कि सरकार द्वारा नियुक्त कमिश्नर को अधिकार होगा कि वह मठ से जुड़े पैसे और संचालन में दखल दे। ऐसा मठ के बेहतर संचालन और भ्रष्टाचार पर नजर रखने के लिए किया गया।

इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने धर्म से जुड़े संस्थान को दो हिस्सों में बांट दिया था। एक जो सीधे धर्म से जुड़ी मान्यता और तौर तरीके और दूसरा उस संस्थान का संचालन। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सरकार धर्म के अभिन्न अंग में हस्तक्षेप नहीं कर सकती, लेकिन पैसे के लेनदेन और संचालन में सरकार का दखल हो सकता है। इस फैसले को आज तक चुनौती नहीं दी गई। अब उच्चतम न्यायालय के नौ जजों की संविधान पीठ उन सात जजों की पीठ के आदेश पर विचार करेगा। उच्चतम न्यायालय ये देखेगा कि धार्मिक संस्थान के मामलों में भारत के संविधान का कितना दखल होगा।

उच्चतम न्यायालय तीन मामलों को मुख्य बिंदु की तरह लेगा। इसमें मंदिर या मस्जिद में महिलाओं का प्रवेश, दाउदी बोहरा औरतों का खतना और पारसी महिलाओं का फायर टेंपल में प्रवेश का मामला शामिल है।

न्यायालय में कई मामले लंबित हैं, जिसमें मांग कि गई है कि महिलाओं को मस्जिद और हर मंदिर में जाने की अनुमति दी जाए। एक याचिका में बोहरा महिलाओं के खतने पर रोक लगाने की मांग की गई है। पारसी महिलाएं जो अपने धर्म से बाहर शादी कर लेती हैं, उन्हें फायर टेंपल में जाने की आज़ादी नहीं है। इस प्रथा को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई है। उच्चतम न्यायालय का ये फैसला कई अन्य मामलों को भी सुलझाने में मदद करेगा। हालांकि फिलहाल उच्चतम न्यायालय ने बहु विवाह और हलाला जैसे मामलों पर विचार करने से मना कर दिया है।

उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को आदेश दिया कि इस मामले से जुड़े सभी वकील तीन हफ्तों में आपस में बातचीत कर बताएं की इस पर किस तरह से बहस की जाएगी। चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस आर बानुमति, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस  एल नागेश्वर राव, जस्टिस मोहन एम शांतनगौदर, जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत की नौ सदस्यीय पीठ ने सेकेट्री जनरल से इस उद्देश्य के लिए 17 जनवरी को मामले में शामिल सभी वकीलों की एक बैठक बुलाने को कहा है।

बैठक में जो बिंदु तय करेंगे उनमें मुद्दों को फिर से पढ़ना या जोड़ना, वकीलों के बीच मुद्दों का आवंटन तथा वकीलों के बीच समय का विभाजन शामिल होगा। शुरुआत में चीफ जस्टिस ने स्पष्ट किया कि पीठ सबरीमला पुनर्विचार को नहीं सुनेगी बल्कि केवल सबरीमला पुनर्विचार पीठ द्वारा पारित 14 नवंबर के आदेश में संदर्भित मुद्दों पर विचार करेगी। उन याचिकाओं को तब तक लंबित रखा जाएगा जब तक कि संदर्भित प्रश्नों का निर्धारण नहीं किया जाता।

वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि सबरीमला के फैसले को गलत करार दिए बिना संदर्भ संभव नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि शिरूर मठ मामले में सात न्यायाधीशों की पीठ के फैसले पर भी संदेह नहीं किया गया है ताकि नौ-न्यायाधीशों वाली पीठ के संदर्भ को सही ठहराया जा सके। त्रावणकोर देवासम बोर्ड की ओर से पेश वरिष्ठ वकील डॉ. एएम सिंघवी ने कहा कि सभी इरादों के बावजूद मुद्दों को बहुत व्यापक रूप से तैयार किया गया है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी इस बात पर सहमति जताई कि सात मुद्दों को ‘फाइन-ट्यूनिंग’ किया जाना है। चीफ जस्टिस ने वकीलों से यह भी आग्रह किया कि वे सुगम सुनवाई के लिए आपस में बहस के लिए समय का बंटवारा करें, जैसा कि अयोध्या मामले की सुनवाई में किया गया था। कोर्ट ने मुद्दों के निपटारे के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है। गौरतलब है कि 28 सितंबर, 2018 को मूल निर्णय देने वाली पीठ के न्यायाधीशों में से कोई भी जज जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस इंदु मल्होत्रा इस पीठ में शामिल नहीं हैं।

14 नवंबर को तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने सबरीमला पुनर्विचार याचिकाओं में आवश्यक धार्मिक प्रथाओं के कुछ सवालों के संदर्भ में आदेश दिया था। उस पीठ ने 3:2 बहुमत से कहा था कि कुछ समान प्रश्न हैं जो मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश से संबंधित लंबित मामलों में उत्पन्न होने की संभावना है, पारसी महिलाओं फायर टेंपल का उपयोग करने का अधिकार, जिन्होंने धर्म से बाहर विवाह किया था, की प्रथा की वैधता और दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना की प्रथा आदि।

14 नवंबर के आदेश के अनुसार, बड़ी पीठ के विचार के लिए संदर्भित मुद्दे हैं (i) संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धर्म की स्वतंत्रता और भाग III, विशेष रूप से अनुच्छेद 14 में अन्य प्रावधानों के बीच परस्पर संबंध के बारे में। (ii) संविधान के अनुच्छेद 25 (1) में होने वाली अभिव्यक्ति, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य ‘के लिए क्या है। (iii) संविधान में अभिव्यक्ति ‘नैतिकता’ या ‘संवैधानिक नैतिकता’ को परिभाषित नहीं किया गया है।

क्या यह धार्मिक आस्था या विश्वास के लिए प्रस्तावना या सीमित होने के संदर्भ में नैतिकता पर आधारित है। उस अभिव्यक्ति के अंतर्विरोधों को चित्रित करने की जरूरत है, ऐसा नहीं है कि यह व्यक्तिपरक हो जाता है (iv) किसी विशेष प्रथा के मुद्दे पर अदालत किस हद तक जांच कर सकती है, यह किसी विशेष धार्मिक संप्रदाय के धर्म या धार्मिक प्रचलन का एक अभिन्न अंग है या जिसे विशेष रूप से उस धारा के प्रमुख धार्मिक समूह द्वारा निर्धारित किए जाने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए।

(v) संविधान के अनुच्छेद 25 (2) (बी) में प्रदर्शित होने वाले हिंदुओं के वर्गों ‘की अभिव्यक्ति का अर्थ क्या है। (vi) क्या एक धार्मिक संप्रदाय की “आवश्यक धार्मिक प्रथाओं”, या यहां तक कि एक खंड को अनुच्छेद 26 के तहत संवैधानिक संरक्षण दिया गया है। (vii) ऐसे मामलों में संप्रदाय की धार्मिक प्रथाएं या उन लोगों के उदाहरण पर एक खंड जो ऐसे धार्मिक संप्रदाय से संबंधित नहीं हैं, पर न्यायिक मान्यता की अनुमेय सीमा क्या होगी?

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

This post was last modified on January 14, 2020 3:17 pm

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