Tuesday, November 29, 2022

श्रीदेव सुमन: राजभक्त जिसकी मौत बनी राजशाही की मौत का कारण

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राजतंत्रों के इतिहास में शायद ही ऐसे मौके आये होंगे जब किसी राजभक्त की मौत राजशाही के अन्त का कारण बनी होगी। ऐसा उदाहरण भारत की तत्कालीन हिमालयी रियासतों में से सबसे बड़ी टिहरी रियासत में ज़रूर मिलता है, जहां राजभक्त श्रीदेव सुमन की राजशाही की जेल में 84 दिन की भूख हड़ताल के बाद मृत्यु हो गयी। उनकी मृत्यु अन्ततः न केवल टिहरी की राजशाही के अन्त का कारण बनी अपितु देश की तमाम लोकतंत्रकामी रियासतों के आन्दोलनकारियों के लिये एक नजीर बन गयी। सुमन की शहादत का स्वाधीनता आन्दोलन पर भी प्रभाव पड़ा, जिसका उल्लेख पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसे राष्ट्रीय नेताओं और तत्कालीन अखबारों ने भी किया।

 अन्य रियासतों की ही तरह टिहरी में भी उत्तरदायी शासन की मांग को लेकर आन्दोलन चला रहे प्रजामण्डल के नेता श्रीदेव सुमन आगरा जेल से छूटने के बाद 30 दिसम्बर, 1943 को टिहरी जेल में बन्द कर दिये गये। वह टिहरी जेल में 209 दिन तक रहे और फिर कभी जेल से बाहर नहीं निकल सके। जेल में ही मजिस्ट्रेट ने सुमन को दोषी करार देकर उन्हें दो वर्ष के कठोर कारावास और 200 रुपये अर्थदण्ड की सजा सुनाई। सुमन महाराजा के विरुद्ध नहीं बल्कि उनके कारिन्दों की ज्यादतियों के खिलाफ थे और राजा के अधीन ही उत्तरदायी शासन चाहते थे।

श्रीदेव सुमन ने फरवरी 1944 में अपने मुकदमे की पैरवी स्वयं करते हुये कहा था कि, “मेरे विरुद्ध पेश किये गये साक्षी सर्वथा बनावटी हैं। वे या तो सरकारी कर्मचारी हैं या पुलिस के आदमी हैं। टिहरी राज्य में मेरा तथा ’प्रजामण्डल’ का ध्येय वैध एवं शांतिपूर्ण ढंग से श्री महाराज की छत्रछाया में उत्तरदायी शासन प्राप्त करना है। श्री महाराज के प्रति मैं पूर्ण सद्भावना, श्रद्धा एवं भक्ति के भाव रखता हूं। टिहरी महाराज तथा उनके शासन के विरुद्ध किसी प्रकार का विद्रोह, द्वेष एवं घृणा का प्रचार मेरे सिद्धान्त के विरुद्ध है।” देखा जाए तो उस समय कम्युनिष्टों के अलावा राजभक्ति आन्दोलनकारियों की मजबूरी थी। ये आन्दोलनकारी कांग्रेसी ही थे और कांग्रेस का पहला लक्ष्य अंग्रेजों से आजादी था।

जेल में सुमन ने 3 मई 1944 को अपना ऐतिहासिक अनशन शुरू किया और 25 जुलाई 1944 को शाम 4 बजे उन्होंने प्राणोत्सर्ग कर दिया। टिहरी से मात्र 12 मील दूर सुमन के गांव जौलगांव में उनके परिजनों को मृत्यु का समाचार 30 जुलाई को पहुंचाया गया। उनकी पत्नी श्रीमती विनय लक्ष्मी उन दिनों महिला विद्यालय हरिद्वार में थी, जिन्हें कोई सूचना नहीं दी गयी। लेकिन श्रीदेव सुमन का यह बलिदान न केवल टिहरी की राजशाही के अंत का कारण बना बल्कि देशभर के स्वाधीनता सेनानियों के लिये प्रेरणा का स्रोत भी बना।

स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान भारत में लगभग 560 छोटी बड़ी रियासतें थीं। सीधे ब्रिटिश शासित भारत में जहां अंग्रेजी शासन से मुक्ति का संघर्ष चल रहा था वहीं इन रियासतों में ब्रिटिश भारत के समान होने की चाह कुलबुला रही थी। कारण साफ था। इनकी पैरामौट्सी या सार्वभौम सत्ता ब्रिटिश सम्राज्ञी में निहित होने के कारण रियासतों की प्रजा गुलाम सामंती शासकों द्वारा शासित थी। जबकि ब्रिटिश भारत के लोग सीधे अंग्रेजों के गुलाम थे। इसलिये कांग्रेस के सामने दुहरी चुनौती थी। पहली चुनौती अंग्रेजों के खिलाफ सम्पूर्ण भारत की जनता का समर्थन हासिल करने की थी। चूंकि एक साथ सैकड़ों राजशाहियों को उल्टा नहीं जा सकता था। उलट कर भी क्या करते? उनको आजादी से पहले ब्रिटिश भारत में मिलाया नहीं जा सकता था।

इसलिये कांग्रेस ने रियासतों में उत्तरदायी प्रजा वत्सल शासन की मांग को लेकर अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद का गठन किया जिसके पहले अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू बनाये गये। उनके बाद पट्टाभि सीतारमैया इसके अध्यक्ष रहे। यह लोक परिषद रियासतों के प्रजामण्डलों का ही महासंघ था। जिसमें टिहरी प्रजामण्डल भी एक था और अमर शहीद श्रीदेव सुमन इस प्रजामण्डल के संस्थापाकों में से एक थे। इस प्रजामण्डल के संस्थापकों में अन्तर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के नेता एमएन रॉय और श्यामचन्द सिंह नेगी भी थे। इसलिए जहां कांग्रेस की ब्रिटिश भारत और रियासतों के आन्दोलनों की जिम्मेदार थी वहीं श्रीदेव सुमन जैसे प्रजामण्डल नेताओं की भी दुहरी जिम्मेदारियां थीं। वे मूलतः कांग्रेसी थे और रियासतों के बाहर वे राष्ट्रीय आन्दोलनों में शामिल होते थे तो रियासतों के अन्दर वे राजशाही के खिलाफ उत्तरदायी शासन के लिये लड़ते थे।

श्रीदेव सुमन अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद के अधिवेशनों में भाग लेते थे, इसलिये आन्दोलन और संगठन का अनुभव उन्हें अधिक था। इसके बाद श्रीदेव सुमन, जिनका बचपन का नाम श्रीदत्त बडोनी था, टिहरी के जनसंघर्षों के महानायक के रूप में उभरते गये। 20 मार्च 1938 को दिल्ली में हुये अखिल भारतीय पर्वतीय सम्मेलन में बदरीदत्त पाण्डे के साथ टिहरी से श्रीदेव सुमन ने भी भाग लिया। हिमाचल की धामी रियासत में 16 जुलाई 1939 को हुये गोलीकांड की जांच के लिये अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद की ओर से गठित जांच समिति में सुमन को मंत्री बनाया गया।

अमर शहीद श्रीदेव सुमन की शहादत का भारत के स्वाधीनता आन्दोलन पर कितना प्रभाव पड़ा इसका उदाहरण स्वाधीनता आन्दोलन के दिनों में 2 अगस्त 1944 के दैनिक हिन्दुस्तान का वह सम्पादकीय आलेख था जिसमें सम्पादक ने लिखा था कि,:-

‘‘… श्रीदेव सुमन का पवित्र बलिदान भारतीय इतिहास में अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण और उल्लेख योग्य है। इससे पहले बोस्र्टल जेल में यतीन्द्र नाथ दास के बलिदान ने देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था और उसके फलस्वरूप भारतीय जेलों में राजनीतिक बंदियों को नाममात्र की सुविधाएं दी गयीं। श्रीदेव सुमन का बलिदान मगर, इससे अधिक उच्च सिद्धान्त के लिये हुआ है। टिहरी राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिये आपने बलिदान दिया है। टिहरी के शासन पर पड़ा काला पर्दा इससे उठ गया है। हमारा विश्वास है कि टिहरी की जनता की स्वतंत्रता की लड़ाई इस बलिदान के बाद और जोर पकड़ेगी और टिहरी के लोग उनके जीवनकाल में अपने लोकनेता का जैसे अनुकरण करते थे, वैसे ही भविष्य में अनुप्राणित होंगे।”

टिहरी जेल में 84 दिनों की भूख हड़ताल के बाद श्रीदेव सुमन की 25 जुलाई 1944 को शहादत पर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 31 दिसम्बर 1945 का उदयपुर में आयोजित देशी राज्य लोक परिषद के अधिवेशन में अपने भाषण में कहा था कि ‘‘……हमारे साथियों में से जो अनेक शहीद हुये हैं उनमें टिहरी राज्य के श्रीदेव सुमन का मैं विशेष तौर पर उल्लेख करना चाहता हूं। हममें से अनेक इस वीर को याद करते रहेंगे, जो कि राज्य की जनता की आजादी के लिये काम किया करते थे…।’’ देशी राज्य लोक परिषद कांग्रेस का ही एक अनुषांगिक संगठन था जिसका गठन भारत की 560 से अधिक छोटी बड़ी रियासतों में लोकतंत्र के लिये कांग्रेस द्वारा ही किया गया था। इसके पहले अध्यक्ष भी जवाहरलाल नेहरू ही थे। इस परिषद के अधीन सभी रियासतों के प्रजामण्डल काम करते थे।

(जयसिंह रावत वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल देहरादून में रहते हैं।) 

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