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सुनो सरकार! कब करोगे गरीबों का उद्धार?

मयस्सर नहीं उसे दो कौर निवाले, गर्मी हो बरसात हो या पड़े पाले

वो छांव ढूंढता है,वो ठांव ढूंढता।

कैसे कहूं की देश आजाद है मेरा, गरीबी ने उसके पांवों में डाल दिये ताले।।

ये चार लाइन की पंक्तियां मेरे मन के उदगार हैं जिन्हें लिखते हुए मेरे होंठ और हाथ लरज (कम्पन) रहे हैं।

वाकई, गरीबी वो बला है या यूं कहें कि अभिशाप है जिससे जीवित इंसान जीते जी धरती पर ही नर्क का दर्शन कर लेता है।

आजादी के सात दशक बीत चुके हैं, इस दौरान देश में बहुत कुछ बदला। कई सरकारें आईं और गयीं, हम नेहरू, इंदिरा, राजीव, नरसिम्ह राव, वीपी, देवगौड़ा, मनमोहन से होते हुए अटल, आडवाणी के बाद नरेंद्र मोदी युग में आ गए। हम काम काज के मैनुअल तरीके को पीछे छोड़कर डिजिटल दौर में पहुंच गए हैं। देश आसमान में ही दुश्मन की मिसाइल खत्म करने वाली मिसाइलें बना चुका है, मगर अफसोस देश से गरीबी खत्म करने में सरकारें असफल रहीं। इसके लिए पूर्व और वर्तमान सरकार की कमजोर इच्छाशक्ति, अदूरदर्शिता और ढुलमुल रवैये को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

कहने से गुरेज नहीं है कि देश पर सबसे ज्यादा समय तक शासन करने वाली कांग्रेस के लिए गरीबी एक चुनावी लॉलीपॉप से ज्यादा नहीं थी।

1971 में इंदिरा गांधी ने सत्ता पाने के लिए ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था। नारे की सफलता का ही नतीजा था कि इंदिरा को पूर्ण बहुमत मिला। मगर गरीबी शायद ही अपनी जगह से टस से मस हुई हो। यही वजह है कि इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी भी ‘गरीबी हटाओ’ नारे के सहारे चुनावी वैतरणी पार करते रहे। मगर देश में गरीबी यथावत अंगद पांव की तरह जमी रही।

समय बीतता गया। जब केंद्र की राजनीति में मोदी युग का पर्दापण हुआ तो बीजेपी की तरफ से एक बात उछाली गई कि अगर हमारी सरकार बनती है तो हर व्यक्ति के खाते में पंद्रह लाख रुपये होंगे, यह अप्रत्यक्ष रूप से गरीबी हटाओ नारे का मोडिफाइड वर्जन ही था। क्योंकि जब किसी के खाते में पंद्रह लाख रुपये होंगे तो जाहिर सी बात है वह गरीब नहीं रह जायेगा। हालांकि चुनाव जीतने के बाद बीजेपी अध्यक्ष ने इसे एक चुनावी जुमला कहते हुए खारिज कर दिया। बाद में बीजेपी सरकार में गरीबी उन्मूलन पर ठोस कार्यवाही की बजाय राष्ट्रवाद, बुलेटट्रेन, धर्म और डिजिटल इंडिया की बीन बजने लगी और खुद को गरीब का बेटा कहने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेशी यात्रायों पर बल देने लगे। हालांकि बाद में गरीबों के लिए उज्ज्वला योजना, इज्जत घर योजना सहित दो चार योजनाओं को लागू किया मगर उससे गरीबों की व्यवस्था में मामूली सुधार हुआ अवस्था में नहीं।

2019 के चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जब अपना मेनिफेस्टो लेकर आए उन्होंने उसमें गरीबों को सालाना 72000 रुपये देने की बात कही। मगर जनता ने उन्हें नकार दिया और नरेंद्र मोदी पुनः सत्ता में आ गए।

मगर मोदी सरकार भी गरीबी पर लगाम लगाने की बजाय बुलेट ट्रेन और डिजिटल इंडिया में उलझी हुई है। बुलेट ट्रेन हो या हर तरफ डिजिटलाईजेशन इसका लाभ उच्च मध्यम वर्ग ही लेगा। गरीबों का इससे भला क्या मतलब ? सरकार देश में सुविधाओं सहूलियतों का अम्बार लगाए मगर जब कोई व्यक्ति दो वक्त की रोटी के लिए तरसे एक अदद छत उसके नसीब में न हो तो उसके लिए 1947 क्या और क्या 2019 ?

वैसे सरकार कहेगी कि गरीबी खत्म करने का प्रयास अनवरत चल रहा है, लेकिन सवाल यह है कि इतने दशकों बाद गरीबी खत्म क्यों नहीं हो रही? सम्भवतः यह भी कारण हो सकता है कि  गरीबी हटा दी गई, तो भविष्य में चुनाव के एक बड़े मुद्दे का अंत हो जाएगा और सरकारी तंत्र को लगता हो कि फिर योजनाएं क्यों और किस विषय पर चलेंगी।  कमाई और बंदरबांट का सिस्टम खत्म हो जाएगा।

और ऊपर गरीबी को मैंने इसलिए भी अभिशाप लिखा है, क्योंकि हममें से कुछ लोग गरीबों को बड़ी हेय दृष्टि से देखते हैं, किसी सार्वजनिक जगह पर किसी व्यक्ति का सामान चोरी हो गया तो सबसे पहले हमारे शक की सुई आस-पास के सबसे गरीब व्यक्ति पर टिक जाती है। इसलिए अब चोर सूटेड बूटेड रहने लगे हैं। हम विवाह-शादियों में गेट पर खड़े होकर चमक धमक वाले कपड़े फहने लोगों का स्वागत करते हैं भले ही वो आमंत्रित न हों, मगर आस पड़ोस के साधारण कपड़ों में खाने की लालसा में गए बच्चों को डांट कर भगा देते हैं।

हम मंदिरों की दानपेटी में भले ही नोट डालते हों, मगर हाथ फैलाये किसी शख्स को झिड़क देते हैं या सिक्के देते हैं।

हम श्राद्ध कार्यों में भले ही तोंद निकाले पंडे पुजारियों को हलवा पूड़ी रायता  खिलाते हैं मगर सूखी अतड़ियों वाले गरीबों को बुलाकर भोजन नहीं कराते। या देते भी हैं तो बासी या बेकार भोजन।

हम मॉल में भले ही दस रुपये की चीज तीस में खरीद लेते हैं, मगर गुब्बारे, खिलौने या कुछ बेच रहे गरीब से बिना मोलभाव के कुछ नहीं खरीदते।

इसलिये यही भेदभाव गरीबों के लिये नर्क है, जिसकी जिम्मेदार सरकार के साथ हम भी हैं। अगर सरकार वाकई गरीबी खत्म करना चाहती है तो बेसिक खाद्य पदार्थों के मूल्यों पर नियंत्रण, सस्ती चिकित्सा शिक्षा, जनसंख्या नियंत्रण, हर हाथ को रोजगार, सस्ते यातायात के साधनों के बारे में गम्भीर हो, वरना आजादी का स्वाद सिर्फ अमीरों के मुंह तक रहेगा। गरीब पैरों में लिए छाले और दो वक्त के निवाले के लिए भटकते हुए मरता रहेगा।

(अमित मौर्या “गूंज उठी रणभेरी” के संपादक हैं और आजकल वाराणसी में रहते हैं।)

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