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सुप्रीम कोर्ट की आरक्षण की समीक्षा की बात लोकतंत्र और सामाजिक न्याय विरोधी

कोरोना महामारी और लॉकडाउन के बीच केन्द्र सरकार मेहनतकशों के प्रति चरम क्रूरता दिखा रही है तो दूसरी तरफ संकट के इस दौर को संविधान, सामाजिक न्याय व लोकतंत्र पर हमले के अवसर के बतौर भी इस्तेमाल कर रही है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी और ओबीसी के आरक्षण के समीक्षा की बात भी कर दी है। यों तो इस दौर में भी केन्द्र सरकार के दबाव में काम करने को लेकर लगातार सुप्रीम कोर्ट सवालों के घेरे में है। आरक्षण के मसले पर भी सवाल उठ खड़ा हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश के आदिवासी बहुल इलाके में शिक्षक नियुक्ति में 100 प्रतिशत आरक्षण को रद्द कर दिया हैं। इसके साथ ही एससी, एसटी और ओबीसी के आरक्षण की समीक्षा करने की जरूरत बताने के साथ विस्तृत टिप्पणी की है। आंध्र प्रदेश का मामला पिछले 20 वर्षों से चल रहा था। फिर भी संकट के इस दौर में सुप्रीम कोर्ट ने इसे अर्जेंट मैटर की तरह लिया। दूसरी तरफ एससी, एसटी और ओबीसी का आरक्षण तो विचाराधीन भी नहीं था। सबसे पहले तो विचार किये जाने पर ही सवाल उठ खड़ा होता है।

समीक्षा की बात करते हुए आई टिप्पणी ने तो एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट को संविधान व सामाजिक न्याय के खिलाफ मोर्चे पर होने को रेखांकित कर दिया है। समीक्षा को आरक्षित वर्गों के भीतर जरूरतमंद बनाम संपन्न या सक्षम के सवाल पर केन्द्रित कर दिया गया है। जबकि सुप्रीम कोर्ट को समीक्षा ही करनी थी तो इस बिंदु पर करनी चाहिए कि आरक्षण के लागू होने के बाद भी शासन-सत्ता की संस्थाओं और शैक्षणिक संस्थानों में सवर्णों का वर्चस्व क्यों बना हुआ है। पारम्परिक आरक्षण क्यों नहीं कमजोर हो रहा है? आज भी ग्रुप ए के 74.48 प्रतिशत, ग्रुप बी के 68.25 प्रतिशत और ग्रुप सी के 56.73 प्रतिशत नौकरियों पर सवर्णों का कब्जा है। समीक्षा के केन्द्र बिंदु से सुप्रीम कोर्ट की मंशा स्पष्ट हो जाती है। साफ तौर पर संकट की इस घड़ी को आरक्षण पर हमले के मौके के बतौर ही इस्तेमाल किया गया है। चूंकि अभी प्रतिरोध की संभावना भी नहीं है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों ही जस्टिस अरुण मिश्र ने एक सम्मेलन में नरेन्द्र मोदी को दूरदर्शी और बहुमुखी प्रतिभा का धनी कहा था। जिस पर काफी विवाद भी हुआ था। कहा जाता है कि भाजपा के साथ जस्टिस अरुण मिश्र के गहरे संबंध हैं।

जस्टिस अरुण मिश्र की अध्यक्षता में ही आंध्र प्रदेश मामले में सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ ने कहा कि ‘आरक्षण का लाभ उन महानुभावों को नहीं मिलना चाहिए जो 70वर्षों से आरक्षण का लाभ उठाकर धनाढ़्यों की श्रेणी में आ चुके हैं।’

संविधान पीठ ने यह भी कहा है कि ‘यह सरकारों की जिम्मेवारी है कि वे समय-समय पर इसकी समीक्षा करें ताकि जरूरतमंदों को आरक्षण का लाभ मिले और संपन्न या सक्षम लोग इस पर अधिकार जमाए न बैठे रहें।’

किन ठोस तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ऐसा कह रहा है? स्पष्ट नहीं है। लेकिन यह तो स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा का आधार आर्थिक है और समीक्षा का यह आधार जरूरतमंदों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाने के लिए क्रीमी लेयर के प्रावधान को लागू करने की आशंका को भी बल देता है। ब्रह्मणवादी शक्तियां पहले से ही आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने की मांग करती आ रही हैं और एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने का सवाल भी पहले से ही बहस में है। सुप्रीम कोर्ट ने जरूरतमंदों के प्रति चिंता की आड़ में एक बार फिर संविधान में निहित सामाजिक न्याय और आरक्षण के मूल अवधारणा पर ही चोट किया है।

चाहे आर्थिक आधार पर आरक्षण की समीक्षा हो या क्रीमी लेयर के प्रावधान का मसला हो, अंततः संविधान विरोधी ही है, आरक्षण की मूल अवधारणा के खिलाफ ही है। संविधान में आरक्षण आर्थिक न्याय से नहीं, सामाजिक न्याय से जुड़ा मसला है। इसलिए यह गरीबी दूर करने के लिए नहीं है। कोई भी समृद्ध हो जाने के कारण आरक्षण की पात्रता नहीं खो देता है क्योंकि आरक्षण किसी व्यक्ति विशेष को आर्थिक स्थिति के आधार पर नहीं मिलता है। आरक्षित वर्ग की इकाई जाति है, व्यक्ति नहीं! आरक्षण जाति-समूह को भेदभाव-ऐतिहासिक वंचना के कारण मिलता है। शासन-सत्ता की विभिन्न संस्थाओं व शिक्षा सहित अन्य क्षेत्रों में भेदभाव व ऐतिहासिक वंचना के शिकार एससी, एसटी व ओबीसी को प्रतिनिधित्व की गारंटी के लिए एक संवैधानिक उपाय के बतौर आरक्षण है।

अगर सचमुच एससी-एसटी में क्रीमी लेयर मौजूद है जो जरूरतमंदों की हकमारी कर रहा है, जिसको आरक्षण से वंचित कर देना चाहिए तो यह भी सवाल उठता है कि क्या वह सामान्य सीटों को हासिल कर पा रहा है?आज भी एससी-एसटी के समृद्ध लोग कितना प्रतिशत सामान्य सीटों को हासिल कर पा रहे हैं? क्या इन प्रश्नों के जवाब में कोई सर्वे रिपोर्ट और आंकड़ा सुप्रीम कोर्ट के पास मौजूद है? दरअसल क्रीमी लेयर के प्रावधान के जरिए एससी-एसटी से उन हिस्सों को ही आरक्षण के दायरे से बाहर कर दिया जाएगा, जो आरक्षण के जरिए प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। यह अंततः प्रतिनिधित्व को कमजोर करने की ही साजिश साबित होगा। आरक्षण पर हमला ही होगा।

आगे संविधान पीठ का कहना है कि ‘ऐसा नहीं है कि आरक्षण पाने वाले वर्ग की जो सूची बनी है वह पवित्र है और उसे छेड़ा नहीं जा सकता है। आरक्षण का सिद्धांत ही जरूरतमंदों को लाभ पहुंचाना है। सरकार का दायित्व है कि सूची में बदलाव करे।’

सबसे पहले तो गौरतलब है कि आरक्षित वर्गों की सूची जातियों के आधार पर बनी है। कुछ लोगों की समृद्धि किसी जाति-समूह को आरक्षण के दायरे से बाहर करने का आधार नहीं बन सकता। क्योंकि कुछ की समृद्धि किसी जाति-समूह के जातीय भेदभाव और ऐतिहासिक वंचना से मुक्ति का पैमाना नहीं है। सूची में संशोधन केवल आरक्षण के दायरे का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के दायरे का मसला है। आरक्षित वर्गों की सूची केवल आरक्षण के लिए बनी सूची नहीं है।

किसी जाति-समूह को इस सूची से बाहर करने की बात तभी किया जा सकता है, जब उस जाति-समूह ने सामाजिक न्याय के मोर्चे पर अपेक्षित उपलब्धियां हासिल कर ली हो, वह सामान्य श्रेणी के स्तर पर पहुंच चुका हो। ऐसी कौन सी जातियां हैं जिसके लिए आरक्षण का आधार खत्म हो गया है, जिसने भेदभाव और ऐतिहासिक वंचना से मुक्ति हासिल कर ली है? ऐसा कोई तथ्य और आंकड़ा भी नहीं है कि एससी-एसटी के बीच से कोई जाति-समूह आरक्षण के दायरे से बाहर इस पैमाने पर भागीदारी हासिल कर रहा है कि अब उसे आरक्षण की जरूरत नहीं है।

सच यह भी है कि समृद्धि हासिल कर लेने से किसी व्यक्ति विशेष को जाति भेदभाव से मुक्ति नहीं मिल जाती। आर्थिक तौर पर समान होना ही सामाजिक समानता की गारंटी नहीं करता है।

सच यह है कि आरक्षण लागू होने के बाद आज भी शासन-सत्ता की संस्थाओं और  विश्वविद्यालयों व अन्य संस्थानों में आरक्षित वर्गों का प्रतिनिधित्व कोटा के बराबर भी नहीं हो पाया है।

दरहकीकत, आरक्षण आरक्षित वर्गों के आंतरिक आर्थिक असमानता दूर करने का संवैधानिक उपाय नहीं है। सुप्रीम कोर्ट आरक्षित वर्गों के भीतर आरक्षण का लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंचने का सवाल उठाकर आरक्षण को आरक्षित वर्गों का आंतरिक मसला बना दे रहा है, जबकि यह ब्राह्मणवादी सवर्ण वर्चस्व बनाम एससी, एसटी और ओबीसी के सामाजिक न्याय का मसला है। आज भी हकीकत क्या है?यूजीसी से आरटीआई द्वारा हासिल 1अप्रैल 2018 तक आंकड़ा है कि 40 केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर 95.2 प्रतिशत, एसोसिएट प्रोफेसर 92.9 प्रतिशत और असिस्टेंट प्रोफेसर 66.27 प्रतिशत सामान्य श्रेणी के हैं। दरअसल सुप्रीम कोर्ट सवर्णों द्वारा हकमारी को ढ़ंक  रहा है और वंचितों के भीतर ही विभाजन करते हुए एक हिस्से को दूसरे हिस्से के वंचना के लिए जिम्मेवार ठहरा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट आरक्षित वर्गों को भरमाने-बरगलाने के साथ आपस में लड़ने के लिए उकसा कर रहा है। यह सवर्ण वर्चस्व की रक्षा में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बहुजन आंदोलन को दिया गया ब्राह्मणवादी जवाब है। आगे की टिप्पणी के जरिए सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ अपना एजेंडा साफ कर दे रही है। संविधान पीठ कहती है कि “अब आरक्षित वर्ग के भीतर चिंताएं हैं। इस समय एससी-एसटी के भीतर संपन्न और सामाजिक-आर्थिक रूप से उच्च श्रेणी के वर्ग हैं। एससी-एसटी में से कुछ के सामाजिक उत्थान से वंचित व्यक्तियों द्वारा आवाज उठाई गयी है लेकिन वे अभी भी जरूरतमंदों तक लाभ नहीं पहुंचने देते हैं। इस प्रकार, एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के आरक्षित वर्गों के भीतर पात्रता को लेकर संघर्ष चल रहा है।”

सबसे पहले तो फिर इस टिप्पणी के लिए ठोस आधार के बतौर सुप्रीम कोर्ट को कोई सर्वे रिपोर्ट-अध्ययन का हवाला देना चाहिए। दूसरी तरफ, संविधान पीठ आरक्षित वर्ग के भीतर की चिंताओं पर केन्द्रित है, भीतर की आवाज को सुन रहा है, लेकिन आरक्षित वर्गों की सड़कों पर बुलंद हो रही आवाज नहीं सुन रहा है। निजी क्षेत्र, हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट व प्रोन्नति में आरक्षण और बैकलॉग भरने की मांग लंबे समय से हो रही है। ओबीसी द्वारा आबादी के अनुपात में आरक्षण बढ़ाने की आवाज उन तक नहीं पहुंच रही है। सवर्णों का वर्चस्व बना हुआ है और लेकिन संविधान विरोधी सवर्ण आरक्षण लागू किए जाने के खिलाफ एससी-एसटी-ओबीसी की आवाज सुनाई नहीं पड़ती है, जबकि सुप्रीम कोर्ट में सवर्ण आरक्षण के खिलाफ कई याचिकाएं पड़ी हुई हैं।

स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट एससी,एसटी और ओबीसी के आरक्षण के खिलाफ है, सामाजिक न्याय की हत्या और ब्राह्मणवादी सवर्ण वर्चस्व को बढ़ाने के पक्ष में है। समीक्षा तो सबसे पहले हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति प्रक्रिया की होनी चाहिए। वहां खास जाति-समूह और परिवारों का ही कब्जा है। देश के सर्वोच्च न्यायालय में 33 फीसदी जज और हाईकोर्ट के 50% जज ऐसे हैं, जिनके परिवार के सदस्य पहले ही न्यायपालिका में उच्च पदों पर रह चुके हैं।

राज्य सरकारों को एससी-एसटी सूची में बदलाव का संवैधानिक अधिकार नहीं है, लेकिन एससी-एसटी सूची के संशोधन पर टिप्पणी के क्रम में संविधान पीठ ने कहा है कि’ ऐसा देखने को मिला है कि राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में बनाए गये आयोग की रिपोर्ट में सूची में बदलाव की सिफारिश की गयी है। आयोग ने सूची में किसी जाति, समुदाय व श्रेणी को जोड़ने या हटाने की सिफारिश की है। जहां ऐसी रिपोर्ट उपलब्ध है वहां राज्य सरकार मुस्तैदी दिखाकर तार्किक तरीके से इसे अंजाम दे।’

बेशक, इस टिप्पणी के जरिए संविधान पीठ राज्य सरकारों को इस दिशा में बढ़ने के लिए उकसा रही है, ताकत दे रही है।

आंध्र प्रदेश मामले में 100 फीसदी आरक्षण के खिलाफ संविधान पीठ द्वारा साल 1992 में इंदिरा साहनी फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय अधिकतम 50 फीसदी आरक्षण का हवाला दिया है। जबकि पहले ही आर्थिक आधार पर लागू 10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण ने इस सीमा को तोड़ दिया है। संविधान पीठ इस ओर देखने के लिए तैयार नहीं है।

न्यायपालिका का दलितों-आदिवासियों व पिछड़ों के हितों की पक्षधरता का अच्छा रिकॉर्ड पहले भी नहीं रहा है, लेकिन नरेन्द्र मोदी के केन्द्र की सत्ता में आने के बाद तो खासतौर पर न्याय की सुप्रीम संस्था-सुप्रीम कोर्ट का ब्राह्मणवादी चरित्र खुलकर सामने है। ब्राह्मणवादी सवर्ण वर्चस्व को मजबूत करने के भाजपा-आरएसएस के एजेंडे को सुप्रीम कोर्ट तत्परता के साथ आगे बढ़ा रहा है। लगातार दलितों-आदिवासियों-पिछड़ों के खिलाफ फैसला दे रहा है। एससी-एसटी एक्ट को कमजोर करने, विश्वविद्यालयों में शिक्षक नियुक्ति में एससी, एसटी और ओबीसी विरोधी 13 प्वाइंट रोस्टर प्रणाली लागू करने, दिल्ली के रविदास आश्रम को ध्वस्त करने से लेकर पिछले दिनों उत्तराखंड के एससी-एसटी कर्मचारियों के प्रोन्नति में आरक्षण पर फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियुक्ति व प्रोन्नति में आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है, यह राज्यो़ं के विवेक से जुड़ा मसला है! यह सिलसिला आगे बढ़ रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के बहुजन व संविधान विरोधी चरित्र को बदलने के लिए यह जरूरी हो गया है कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए जारी कॉलेजियम सिस्टम को खत्म किया जाए और एससी, एसटी और ओबीसी के प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण व्यवस्था बहाल हो। यह भाजपा-आरएसएस विरोधी लड़ाई का महत्वपूर्ण एजेंडा है।

(रिंकु यादव राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता हैं। सामाजिक न्याय से जुड़े आंदोलनों में अगुआ भूमिका निभाते रहे हैं। आप आजकल भागलपुर में रहते हैं।)

(लेख में दिए गए विचार लेखक के निजी हैं।)

This post was last modified on May 16, 2020 7:48 pm

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