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दूर-दूर तक पहुंचने लगी है किसानों के आंदोलन की गूंज

किसानों के आंदोलन को लेकर यूपी में भी राजनीतिक जमीन गरम होने लगी है। समाजवादी पार्टी मजबूती से किसानों के साथ खड़ी है। वहीं भाजपा के लोग इस आंदोलन को विफल करने के लिए इंटरनेट मीडिया में किसानों के विरोध में आंदोलन कर रहे हैं। यूपी में सपा के नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद चौधरी ने कहा है कि यह सरकार किसानों के साथ आतंकवादियों की तरह व्यवहार कर रही है। किसानों के समर्थन में समाजवादी पार्टी 14 दिसंबर से अपना आंदोलन और भी तेज करेगी। इसी तरह सपा के और भी नेता हैं जो किसानों की मांग को जायज ठहराते हुए अपने किसान आंदोलन को सही ठहरा रहे हैं। देश के सामान्य मानसिकता के लोग मान रहे हैं कि सरकार अभी चाहे जितनी मनमानी कर ले, किसान हमारे पालनहार हैं। उनको नाराज कर देश आगे नहीं बढ़ सकता। वह अपने आंदोलन में हर हाल में कामयाब होंगे। 

कृषि कानून में दिया गया है यह तथ्य

कृषि से जुड़े तीनों विधेयकों में पहला-कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश, दूसरा-आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन, तीसरा-मूल्य आश्वासन पर किसान (संरक्षण एवं सशक्तिकरण) समझौता और कृषि सेवा अध्यादेश। इन तीनों कानूनों के बारे में किसान गहन अध्ययन कर चुके हैं। केंद्र सरकार किसानों को अपने एंगल से समझाकर यह बताने में लगी है कि इन कृषि कानूनों से किसानों को फायदा होगा।

जबकि किसान या विपक्षी दलों के लोग किसानों के सुर में अपना सुर मिलाकर केंद्र सरकार को पटकनी देने की तैयारी में जुटे हैं। किसानों के इस आंदोलन को लेकर आमलोगों की मानसिकता भी अलग-अलग है। सत्ताधारी दल की मानसिकता से जुड़े लोग किसानों के इस आंदोलन को बेमतलब बता रहे हैं, लेकिन सामान्य लोग और देश के अन्य हिस्सों के अन्नदाता किसान आंदोलन के साथ हैं। वह मान रहे हैं कि भाजपा सरकार अपनी मनमानी करने से बाज नहीं आ रही है। वह कोई भी कानून जबरिया देश के लोगों पर लाद रही है। कभी नोटबंदी तो कभी जीएसटी, लेकिन किसी भी कानून का सार्थक रिजल्ट सामने नहीं है। जीएसटी का पेंच आज तक नहीं सुलझ पाया है। 

 विपक्ष का यह है मत

सपा सहित अन्य राजनीतिक दल जो किसान आंदोलन का संमर्थन कर रहे हैं, उनका कहना है कि तीनों कृषि कानून से मंडी की व्यवस्था ही खत्म हो जाएगी। इससे किसानों को नुकसान होगा और कॉरपोरेट और बिचौलियों को फायदा होगा। वे मंडी से बाहर ही किसानों से औने पौने दामों पर उनकी फसल खरीद लेंगे और एमएसपी का कोई महत्व नहीं रह जाएगा। इसके अलावा मंडी में कार्य करने वाले लाखों व्यक्तियों के जीवन-निर्वाह का क्या होगा। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ट्वीट किया है कि किसान आंदोलन भारत के इस लोकतांत्रिक मूल्य की पुनर्स्थापना का भी आंदोलन है। सरकार के सभी फैसलों में आम जनता की भागीदारी होनी चाहिए। सरकार की मनमानी नहीं। इसीलिए भारत में लोकतंत्र को बचाने के लिए देश का हर नागरिक भी आज ‘किसान आंदोलन’ के साथ भावात्मक रूप से जुड़ता जा रहा है।

सत्ताधारी दल का यह है तर्क

सत्ताधारी दल के नेता कृषि काननू के संभावित फायदों की बात कर रहा है। पहला यह कि इस कानून से किसान अपनी उपज देश में कहीं भी, किसी भी व्यक्ति या संस्था को बेच सकते हैं। इस कानून में कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी मंडियों) के बाहर भी कृषि उत्पाद बेचने और खरीदने की व्यवस्था तैयार करना है। दूसरा फायदा यह कि सरकार किसानों से धान-गेहूं की खरीद पहले की ही तरह करती रहेगी और किसानों को एमएसपी का लाभ पहले की तरह देती रहेगी। तीसरा फायदा यह बताया जा रहा है कि किसान मंडी के साथ-साथ मंडी से बाहर भी अपनी उपज भेज सकते हैं। 

जनता की है यह सरकार तो क्यों नहीं मान रहे किसानों की बात

भाजपा के कई नेताओं का कहना है कि उनकी सरकार जनता की है। जनता की सुविधाओं के लिए काम रही है। जनता के फयादे के लिए ही योजनाएं लागू कर रही है, इसमें कोई भेदभाव नहीं है। यदि वास्तव में ऐसा है तो किसानों की बात सरकार क्यों नहीं मान रही है। देश में कोई भी कानून देश के लोगों की भलाई के लिए होना चाहिए। किसान यदि इस कानून में अपनी भलाई नहीं देख रहे हैं तो जबरिया यह कानून उन पर थोपना कहां तक उचित है। भाजपा के लोग मानें या न मानें उन्हें 1975 के दरम्यान का जेपी आंदोलन जरूर याद होगा। तब भी केंद्र सरकार की तानाशाही के जवाब में देश भर के लोग उठ खड़े हुए थे। बिहार में छात्र आंदोलन से शुरू हुआ वह आंदोलन जेपी के नेतृत्व में देश व्यापी आंदोलन में तब्दील हो गया था।

देश के हालात ऐसे हो चले थे कि केंद्र सरकार को देश में आपातकाल तक लागू करना पड़ा। मीडिया पर भी कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए। तब भी केंद्र सरकार जन आंदोलन के सामने नहीं झुकना चाहती थी, आज की सरकार भी कुछ उसी अंदाज में अंदोलनकारियों से व्यवहार कर रही है। ऐसे में यह किसान आंदोलन भी कहीं वही राह न पकड़ ले, जिसमें देश भर के सामान्य लोग लामबंद होकर सरकार को ही उखाड़ फेकें। भाजपा के नेताओं को लगता है कि किसानों से ज्यादा देश के अन्य लोग सरकार के पक्ष में हैं। किसान आंदोलन कामयाब नहीं होगा, लेकिन यूपी में किसान आंदोलन के पक्ष में केवल राजनीतिक दल ही नहीं, किसान और सामान्य लोग भी लामबंद होते दिख रहे हैं। यदि ऐसा हुआ तो देश के लोगों की इस बगावत को केंद्र सरकार नहीं झेल पाएगी।  

(एलके सिंह, बलिया के वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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This post was last modified on December 13, 2020 8:28 pm

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