Sunday, October 24, 2021

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भारत में फेसबुक की गतिविधियों की यूएन एजेंसी से जांच के लिए ऑनलाइन याचिका

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फेसबुक खोलिए तो वो पूछता है, “What’s on your mind” यानि आपके दिमाग में क्या है ! जहां तक फेसबुक का अपना सवाल है तो भारत में फेसबुक का दिमाग कैसे चलता है, इसका खुलासा अगस्त के महीने में अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल और पत्रिका टाइम में छपी हुई रिपोर्टों से हुआ। इन पत्र-पत्रिकाओं में छपी रिपोर्टों के बाद अमेरिका में भारतीय नागरिक अधिकार समूहों ने फेसबुक के खिलाफ कार्यवाही की मांग, अमेरिकी कांग्रेस के सामने रखी है। इसके लिए अमेरिकी कांग्रेस की न्यायिक समिति के समक्ष याचिका प्रस्तुत की जा रही है। 

भारत के स्वतंत्रता दिवस के एक दिन पहले यानि 14 अगस्त को अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने “Facebook Hate-Speech Rule Collide with Indian Politics” शीर्षक से एक विश्लेषणात्मक आलेख प्रकाशित किया। न्यूले पर्नल और जेफ हॉर्विट्ज़ द्वारा लिखित इस आलेख में भाजपा के तेलंगाना के विधायक टी. राजा सिंह के उदाहरण से बताया गया था कि कैसे सत्ताधारी भाजपा से जुड़े हुए लोगों के घृणा फैलाने वाले बयानों पर फेसबुक ने कोई कार्यवाही नहीं की और ऐसे घृणा वक्तव्यों का प्रसार होने दिया। इस मामले में अखबार ने भारत में फेसबुक की नीति प्रमुख आंखी दास की भूमिका का विस्तार से उल्लेख किया।

अखबार ने फेसबुक के वर्तमान और पूर्व कर्मचारियों के हवाले से लिखा कि टी राजा सिंह और घृणा फैलाने और उसे प्रोत्साहित करने के लिए चिन्हित कम से कम तीन अन्य हिंदुत्ववादी व्यक्तियों और समूहों पर फेसबुक के घृणा वक्तव्य विरोधी नियमों को लागू करने का आंखी दास ने विरोध किया। इस रिपोर्ट के अनुसार आंखी दास का काम भारत सरकार के साथ कंपनी के लिए लॉबिंग करना भी है और उन्होंने उक्त व्यक्तियों के घृणा फैलाने वाले भाषणों पर प्रतिबंध लगाने का विरोध करते हुए कहा कि श्री मोदी की पार्टी के नेताओं पर कार्यवाही करने से भारत में कंपनी की व्यापारिक संभावनाओं पर विपरीत असर पड़ेगा।

रिपोर्ट फेसबुक के पूर्व और वर्तमान कर्मचारियों के हवाले से यह भी कहती है कि आंखी दास ने चुनाव संबंधी मामलों में भाजपा के साथ सहयोगात्मक व्यवहार किया। आंखी दास के मुस्लिमों के प्रति घृणा वाले पोस्ट साझा करने की बात भी उक्त रिपोर्ट में कही गयी है। फेसबुक के मुकेश अंबानी की कंपनी जियो के साथ व्यापारिक साझीदारी और फेसबुक के ही स्वामित्व वाले सोशल मीडिया प्लेटफ़ार्म-व्हाट्स ऐप को सशुल्क करने के प्रयासों और दो साल से सरकार द्वारा उसे रोके जाने का जिक्र भी उक्त रिपोर्ट करती है। 

घृणा वक्तव्यों को लेकर भारत में फेसबुक के तौर तरीकों के संदर्भ में एक अन्य रिपोर्ट 27 अगस्त को अमेरिकी साप्ताहिक पत्रिका- टाइम- में प्रकाशित हुई, जिसका शीर्षक था- “Facebook’s Ties to India’s Ruling Party Complicate It’s Fight Against Hate Speech.”

बिली पेरिगो द्वारा लिखित उक्त रिपोर्ट कहती है कि भारत में फेसबुक और व्हाट्स ऐप का इस्तेमाल घृणा और गलत सूचनाओं को फैलाने तथा अल्पसंख्यकों के विरुद्ध घृणा फैलाने के लिए किया गया है। रिपोर्ट कहती है कि गौ रक्षकों द्वारा बहुत सारी हत्याएं व्हाट्स ऐप पर फैलाई गयी अफवाहों के बाद की गयीं। लिंचिंग और मारपीट के बहुत सारे वीडियो भी व्हाट्स ऐप द्वारा फैलाये जाते हैं। घृणा वक्तव्यों पर नजर रखने वाले एक्टिविस्टों के हवाले से रिपोर्ट कहती है कि फेसबुक इंडिया, भाजपा नेताओं और समर्थकों के घृणा फैलाने वाले पोस्टों को नियंत्रित करने से बचता है। ऐसा वह इसलिए करता है क्योंकि वह सरकार से टकराव मोल नहीं लेना चाहता। रिपोर्ट कहती है कि फेसबुक इंडिया के इस रवैये से हताश होने के कारण बड़ी तादाद में एक्टिविस्ट, घृणा फैलाने वाली पोस्टों की शिकायत फेसबुक इंडिया से करने के बजाय सीधे फेसबुक के अमेरिका स्थित मुख्यालय में करते हैं। 

टाइम की रिपोर्ट भी फेसबुक इंडिया के नीति निर्धारकों में से एक प्रमुख व्यक्ति और उनके भाजपाई रिश्तों का खुलासा करती है। इन सज्जन का नाम है शिवनाथ ठुकराल। ये भारत और दक्षिण एशिया में फेसबुक के सार्वजनिक नीति के निदेशक थे। ठुकराल सरकार के साथ लॉबिंग और घृणा फैलाने वाले वक्तव्यों का  नियंत्रण, दोनों काम देखते हैं। रिपोर्ट बताती है कि फेसबुक में आने से पहले ठुकराल भाजपा के साथ काम कर चुके थे।

2013 में ठुकराल, भाजपा के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ “मेरा भरोसा” नाम की वेबसाइट और फेसबुक पेज चलाते थे। 2014 आते-आते “मेरा भरोसा” का नाम बदल कर “मोदी भरोसा” कर दिया गया। फेसबुक ने ठुकराल के भाजपा के साथ काम करने की तस्दीक की। रिपोर्ट के अनुसार फेसबुक के पूर्व कर्मचारी मानते हैं कि ठुकराल को फेसबुक में उनकी सत्ताधारी पार्टी से निकटता के कारण ही लिया गया। मार्च 2020 में ठुकराल, व्हाट्स ऐप, भारत के भी नीति निदेशक बना दिये गए। 

फेसबुक के बारे में इन खुलासों के बाद अमेरिका में नागरिक अधिकारों के लिए कार्यरत संस्था- इंडिया सिविल वॉच इंटरनेशनल ने अमेरिकी संसद की हाउस ज्यूडीशियरी कमेटी, अन्य संबद्ध कमेटियों और अमेरिकी गृह विभाग के समक्ष याचिका प्रस्तुत करके फेसबुक के विरुद्ध कार्यवाही किए जाने की मांग की है। याचिका कहती है कि अमेरिकी कंपनी फेसबुक ने घृणा वक्तव्यों और फर्जी खबरों के प्रति आंखें मूँद रखी है। भारत में आम तौर पर सभी घृणा फैलाने वालों और खास तौर पर भाजपा नेताओं को झूठ, कट्टरता फैलाने और हिंसा का आह्वान करने की फेसबुक द्वारा छूट दे दी गयी है। 

याचिका में मांग की गयी है कि वॉल स्ट्रीट जर्नल और टाइम द्वारा किए गए खुलासों के आलोक में, भारत में उसके आचरण के संबंध में फेसबुक से स्पष्टीकरण मांगा जाये। फेसबुक को निर्देशित किया जाये कि वह दक्षिण एशिया में अपने घृणा वक्तव्य संबंधी नियमों के अनुपालन की जांच के लिए ऑडिट करवाए और यह ऑडिट, संयुक्त राष्ट्र के मानव अधिकार उच्च आयुक्त या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संयुक्त राष्ट्र विशेष रेपोर्टियर द्वारा करवाया जाये। याचिका मांग करती है कि खुलेआम घृणा फैलाने वाले विचार रखने वाले या उनका समर्थन करने वाले प्रबंधन कर्मियों हटाया जाये। फेसबुक से यह भी सुनिश्चित करवाया जाये कि उसके तथ्यों की जांच करने वाले (फ़ैक्ट चेकर) विश्वसनीय और निरपेक्ष हों। याचिका में सर्वाधिक महत्वपूर्ण मांग यह की गयी है कि ऑडिट में जहां भी यह पाया जाता है कि फेसबुक अपने नियमों को लागू करने में विफल रहा और हिंसा फैली, वहाँ हिंसा पीड़ितों को फेसबुक मुआवजा दे।

भारत में वॉल स्ट्रीट जर्नल और टाइम के खुलासे के बावजूद ना तो फेसबुक पर कोई असर दिखाई दे रहा है, ना ही घृणा अभियान के प्रचारक-प्रसारकों पर ! लेकिन अमेरिका और उसकी संसद को नागरिक अधिकार संगठनों की इस याचिका पर निश्चित ही कार्यवाही करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भारत जैसे देशों में यह अमेरिकी कंपनी, अपने व्यावसायिक हितों को बचाने के नाम पर, सत्ता के साथ गठजोड़ करके, हिंसा, घृणा और फर्जी खबरें फैलाने का मंच न बने। किसी एक देश या कंपनी के लिए नहीं बल्कि व्यापक मानवीय हित में फेसबुक पर नकेल कसा जाना नितांत आवश्यक है।

नोट: नीचे वह लिंक दिया जा रहा है जिसके जरिये इस याचिका पर हस्ताक्षर किया जा सकता है।

https://indiacivilwatch.org/

( लोकप्रिय नेता इंद्रेश मैखुरी सीपीआई (एमएल) उत्तराखंड की राज्य कमेटी के सदस्य हैं।)

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