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विश्वगुरु भारत बनेगा विश्वचौधरी अमेरिका का मोहरा!

‘जिस बात का खतरा है, सोचो की वो कल होगी’– दुष्यंत की ग़ज़ल का मिसरा है। जितनी तेजी से समाज बदल रहा है, दुष्यंत आज जीवित होते तो लिखते– ‘जिस बात का खतरा है, वो तो बस हुई लो समझो’। अभी हम बात कर ही रहे थे कि ‘क्या भारत बनेगा अमेरिका का आर्मी बेस’ तभी खबर आ गई है कि 27 अक्तूबर को नई दिल्ली में भारत और अमेरिका अपने विदेश और रक्षा मंत्रियों के बीच ‘2+2’ सुरक्षा संवाद के दौरान एक ख़ुफिया-साझाकरण समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार हो गए हैं। इस बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट (BECA) से भारत को अमेरिका के उन भू-स्थानिक नक्शे और उपग्रह चित्रों तक अपनी पहुंच बनाए देने की उम्मीद है, जो हथियारों और ड्रोन की सटीक स्थिति को सुनश्चितता को बढ़ाने में मदद करेगा।

इसे भारतीय सशस्त्र बलों के लिए एक ‘ताक़त बढ़ाने वाले घटक’ के तौर पर देखा जा रहा है। मोदी सरकार गुप्त रोग का शिकार है, इसमें हर कम को गोपनीय तरीक़े से अंजाम दिया जाता है। इस बार भी बड़े पैमाने पर जनता को इसका कोई सुराग़ तक नहीं लग पाया है कि आख़िर हो क्या रहा है। गोदी मीडिया ने खुले दिल से इसका स्वागत और गुणगान किया है। रक्षा विशेषज्ञ बगलें बजा रहे हैं और कहा जा रहा है कि ‘अब हमारी मिसाइल को लक्ष्य तक पहुंचाएगा अमेरिका’। यानि पहले हमारी मिसाइल लाहौर के बजाए लुधियाना जा सकती थी अब नहीं जाएगी, लेकिन इस सच्चाई को अगर सिर्फ एक कहावत में बयान करना हो तो पंजाबी में एक कहावत है ‘चोर और कुतिया मिल गए, अब होगा बंटाधार।’

हमें सरकारी सरकारी विशेषज्ञ तो यही बता रहे हैं कि अब भारत को शत्रु-राष्ट्रों की समस्त गुप्त गतिविधियों की तकनीकी जानकारी मिलती रहेगी। भारत अब यह भी जान सकेगा कि कौन-सा देश उसके विरुद्ध जल, थल, नभ और अंतरिक्ष में, क्या-क्या षड़यंत्र कर रहा है। यह समझौता यदि साल भर पहले हो गया तो गलवान घाटी में चीन की घुसपैठ का पता भारत को कब का लग गया होता। जबकि कुछ सैन्य विश्लेषकों का यह मानना है कि इस नए नेटवर्क का भारतीय सैन्य प्रतिष्ठान में रक्षा योजना और उसके संचालन के बेहद संवेदनशील तकनीकी केंद्रों तक अमेरिका की पहुंच आसान हो जाएगी।

कहा तो यही जा रहा है कि इस समझौते का मक़सद बिना किसी बाधा के इकट्ठा किए गए सभी सिग्नल इंटेलिजेंस (SIGINT) को लगातार साझा करना है, साथ ही सिग्नल इंटेलिजेंस (SIGINT) संचालन से जुड़े विधियों और तकनीकों को भी साझा करना है। इसके तहत ‘लगातार, मौजूदा और बिना अनुरोध के’ दोनों तरह की ख़ुफ़िया सूचनाएं साझा की जाती हैं, चाहे वे ‘कच्ची’ ख़ुफिया सूचनाएं हों या ‘पक्की’ सूचनाएं हों। इसमें कोई दो राय नहीं है कि यह भी ठीक वैसे ही होगा जैसे यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (USAID) द्वारा तैयार ‘कैटलिस्ट’ (Catalyst) नाम की एजेंसी की देखरेख में नोटबंदी की गई थी और देश की अर्थव्यवस्था को मापने-जोखने और नियंत्रित करने का कार्यभार अमेरिका के हाथों सौंप दिया गया था।

बिचौलिये बुद्धिजीवी इस बात की परवाह नहीं करते कि युद्ध कैसी तबाही लेकर आता है। उन्हें इस बात की चिंता ज्यादा है कि अमेरिका में राष्ट्रपति के चुनाव के ठीक एक हफ्ते पहले ही यह समझौता क्‍यों हो रहा है? यदि ट्रंप हारे और जो बाइडन जीते तो क्या यह समझौता टिक पाएगा? बिचौलिए बुद्धिजीवी बड़े भारी मन से याद करते हैं कि ‘2016 में जब अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव हो रहे थे, तब भी ओबामा सरकार के साथ भारत ने पेरिस के जलवायु समझौते पर हामी भरी थी, लेकिन ट्रंप जीत गए और डेमोक्रेट हिलेरी विलंटन हार गईं। ट्रंप ने राष्ट्रपति बनते ही उक्त समझौते का बहिष्कार कर दिया। भारत देखता रह गया। यदि अमेरिका समझौते पर टिका रहता तो भारत को 100 अरब डॉलर की राशि का बड़ा हिस्सा मिलता।’

होशमंदों को खबर है कि यह सब तब शुरू हुआ जब अमेरिका ने ईरान की घेराबंदी करना छोड़ कर चीन को घूरना शुरू किया था। तब भारत में सब कुछ ठीक चल रहा था। झूला, बुलेट ट्रेन, पटेल की मूर्ति…. सब कुछ। फिर इशारा मिला तो शिनपिंग को झूला झुलाते-झुलाते मोदी भी उन्हें घूरने लगे। बुलेट ट्रेन की बातें ‘बुलेट’ पर आ गईं। चीन की सरहद पर अपने बीस जवान शहीद हुए तो प्रधानमंत्री मोदी ने कह दिया कि ‘ना तो यहां कोई आया था…’। सवाल उठा कि फिर जवान शहीद कैसे हुए? क्या यह शहादत भी किसी ‘षड़यंत्र’ का हिस्सा थीं। प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ में इस सवाल का जवाब नहीं था। गलवान घाटी तो अभी तक मोदी के गले की हड्डी बनी हुई है लेकिन ‘चाबी वाले खिलौने’ जंग नहीं लड़ते, जंग तो उन खिलौनों के मालिक लड़ते हैं।

हाफिज़ सईद और उत्तरी कोरिया का परमाणु बम अचानक मीडिया से गायब हो गए। कुछ चैनल तो चौबीस घंटे चीन के खतरे की घंटी बजाने लगे। इधर ‘हाउडी मोदी’ और ‘नमस्ते ट्रंप’ चलता रहा। अमेरिका ने कहा भारत कोविड के आंकड़े छिपा रहा है। मोदी चुप रहे। अमेरिका ने व्यापार के मामले में भारत के साथ सख्ती बरती, भारतीयों के वीजा में अड़ंगा लगाया और रूसी प्रक्षेपास्त्रों की खरीद पर प्रतिबंध नहीं हटाया, भारत को ‘गंदा देश’ कहा, मोदी की मजाल नहीं कि चूं कर जाएं। चुपचाप पीछे-पीछे हाथ बांधे चले जा रहे हैं। ऐसी क्या मजबूरी है? क्या अमेरिका के पास सीआईए की कोई फाइल है जो प्रधानमंत्री मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते उन्होंने दो साल गुप्तचरी करते तैयार की थी। इस फाइल का तो फिर कभी ज़िक्र ही नहीं आया।

उधर चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन ने कहा है कि पोंपियो के चीन पर हमले की कोई नई बात नहीं है, ‘वो बिना तथ्यात्मक आधार के पुराना राग ही अलाप रहे हैं। हम पोंपियो से आग्रह करते हैं कि वो ‘चीन ख़तरे’ की बात को बढ़ा-चढ़ाकर बताना बंद करें और क्षेत्र में चीन और दूसरे देशों के बीच रिश्ते ख़राब करना बंद करे और क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को कम करने वाले ग़लत काम करना भी बंद करे।’

गोदी मीडिया भी जानता है कि यह जो चीन को दुश्मन के तौर पर खड़ा करके मदद के नाम पर भारत में ‘अमेरिकी घुसपैठ’ हो रही है उसका एक मक़सद भारतीय मूल के उन 19 लाख वोटरों को रिझाना है, जिनका  झुकाव डेमोक्रेट उम्मीदवार कमला हैरिस की ओर है। कमला हैरिस उनके ‘दुश्मन’ जो बाइडेन के साथ उप-राष्ट्रपति पद के लिए लड़ रही हैं। हालांकि इस समझौते का भारतीय मूल के वोटरों पर कोई खास प्रभाव पड़ने वाला नहीं है और वह ट्रंप को तो कतई वोट नहीं देने वाले जो उनके देश को ‘गंदा देश’ मानते हैं।

भारतीय मूल के वोटरों से यह बात भी छुपी हुई नहीं है कि चीन और अमेरिका के बीच आजकल वैसा ही शीतयुद्ध चल रहा है, जैसा कभी सोवियत रूस और अमेरिका के बीच चलता था। अमेरिका चाहता है कि वह चीन की घेराबंदी कर ले ताकि वह सामरिक, व्यापारिक और राजनयिक मामलों में अमेरिका के सामने घुटने टेक दे। इसके लिए ‘विश्वचौधरी’ अमेरिका ने ‘विश्वगुरु’ भारत को अपना मोहरा बना लिया है।

(देवेंद्र पाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल जालंधर में रहते हैं।)

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This post was last modified on October 29, 2020 11:58 am

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