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Monday, September 27, 2021

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क्या जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा आज दे सकते थे पीएम के खिलाफ फैसला?

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राजनारायण बनाम इंदिरा गाँधी, चुनाव याचिका पर जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा का फैसला कल के ही दिन यानी 12 जून, 1975 को आया था, जो देश में 25 जून 1975 की आधी रात से आपातकाल लगाये जाने का कारण बना था। लेकिन आज के दौर में जब पूरी न्यायपालिका राष्ट्रवादी मोड में है तो क्या यह संभव है कि किसी हाईकोर्ट का कोई न्यायाधीश जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा की तरह प्रधानमन्त्री के खिलाफ इस तरह का फैसला देने का दुस्साहस करे? क्या उसकी बेंच को सम्बन्धित चीफ जस्टिस तत्काल बदल नहीं देंगे। आज की स्थिति तो यह हो गयी है कि न्याय प्रिय, संविधान और कानून के शासन की राह का कड़ाई से अनुसरण करने वाले जजों की बेंच बदल जी जाती है या उत्पीड़नात्मक तबादले कर दिए जाते हैं। यदि आज जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा हाईकोर्ट में जज होते और वर्तमान प्रधानमन्त्री के खिलाफ चुनाव याचिका की सुनवाई कर रहे होते तो या तो रोस्टर बदल कर बेंच बदल दिया जाता या फिर उनका उत्तर पूर्व के किसी हाईकोर्ट में तबादला कर दिया जाता।

आज की तारीख में उच्चतर न्यायपालिका में दो माननीय न्यायाधीश हैं जिन्होंने सार्वजनिक रूप से प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी की शान में कसीदे पढ़े थे। ये हैं जस्टिस अरुण मिश्र और जस्टिस एमवी शाह (पटना हाईकोर्ट में थे तो एक साक्षात्कार में) । जबकि जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने कोर्ट में इंदिरा गांधी के गवाही के लिए आने पर खड़ा नहीं होने का आदेश दिया था। राजनारायण के वकील शांति भूषण के अनुसार इंदिरा गांधी को अदालत कक्ष में बुलाने से पहले जस्टिस सिन्हा ने भरी अदालत में ऐलान किया कि अदालत की ये परंपरा है कि लोग तभी खड़े हों जब जज अदालत के अंदर घुसे। इसलिए जब कोई गवाह अदालत में घुसे तो वहाँ मौजूद कोई शख़्स खड़ा न हो। जब इंदिरा गांधी अदालत में घुसीं तो कोई भी उनके सम्मान में खड़ा नहीं हुआ, सिवाय उनके वकील एससी खरे के। वो भी सिर्फ़ आधे ही खड़े हुए। जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गांधी के लिए कटघरे में एक कुर्सी का इंतज़ाम करवाया, ताकि वो उस पर बैठ कर अपनी गवाही दे सकें।

इलाहाबाद हाईकोर्ट।

उस मुक़दमे में राज नारायण के वकील रहे शांति भूषण अपनी आत्मकथा ‘कोर्टिंग डेस्टिनी’ में लिखा है कि जस्टिस सिन्हा गोल्फ़ खेलने के शौकीन थे। एक बार गोल्फ़ खेलते हुए उन्होंने मुझे एक क़िस्सा बताया था। जब ये याचिका सुनी जा रही थी तो जस्टिस डीएस माथुर इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश हुआ करते थे। वो मेरे घर पहले कभी नहीं आए थे। लेकिन जब इस केस की बहस अपने चरम पर थी, तो एक दिन वो मेरे यहाँ अपनी पत्नी समेत आ पहुंचे। जस्टिस माथुर इंदिरा गाँधी के उस समय के निजी डॉक्टर केपी माथुर के निकट संबंधी थे। उन्होंने मुझे स्रोत न पूछे जाने की शर्त पर बताया कि उन्हें पता चला है कि सुप्रीम कोर्ट के जज के लिए मेरे नाम पर विचार हो रहा है। जैसे ही ये फ़ैसला आएगा, आपको सुप्रीम कोर्ट का जज बना दिया जाएगा। मैंने उनसे कुछ भी नहीं कहा। इस प्रलोभन में जस्टिस सिन्हा नहीं आये और उन्होंने इंदिरा गाँधी का चुनाव रद्द कर दिया।

शांति भूषण के बेटे प्रशांत भूषण अपनी किताब ‘द केस दैट शुक इंडिया’ में लिखा है कि 7 जून 75 तक जस्टिस सिन्हा ने फ़ैसला डिक्टेट करा दिया था। तभी उनके पास चीफ़ जस्टिस माथुर का देहरादून से फ़ोन आया। चूंकि ये फ़ोन चीफ़ जस्टिस का था, इसलिए उन्हें ये फ़ोन लेना पड़ा। जस्टिस माथुर ने उनसे कहा कि गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव पीपी नैयर ने उनसे मिल कर अनुरोध किया है कि फ़ैसले को जुलाई तक स्थगित कर दिया जाए। यह अनुरोध सुनते ही जस्टिस सिन्हा नाराज़ हो गए। वो तुरंत हाईकोर्ट गए और रजिस्ट्रार को आदेश दिया कि वो दोनों पक्षों को सूचित कर दें कि फ़ैसला 12 जून को सुनाया जाएगा।

शांति भूषण ने यह भी लिखा है कि वे जनता पार्टी सरकार में कानून मंत्री के रूप में जस्टिस सिन्हा का तबादला हिमाचल प्रदेश करना चाहते थे ताकि वहां जब कोई पद ख़ाली हो तो वो वहां के चीफ जस्टिस बन सकें। जब उन तक ये पेशकश पहुंचाई गई तो उन्होंने विनम्रतापूर्वक उसे अस्वीकार कर दिया। वो बहुत महत्वाकांक्षी व्यक्ति नहीं थे और इस बात से ही संतुष्ट थे कि उन्हें सिर्फ़ एक ईमानदार और काबिल शख़्स के रूप में याद किया जाए।

प्रशांत भूषण और सुप्रीम कोर्ट।

लेकिन आज क्या स्थिति है जब हाईकोर्ट के न्यायाधीश चीफ जस्टिस बनने, उच्चतम न्यायालय में जाने और अवकाश ग्रहण के बाद किसी न किसी पद की लालसा में रहते हैं और ऐसे फैसले सुनाते हैं जिसमें संविधान और कानून के शासन की खुलेआम अवहेलना होती है। आरोप तो यहां तक लग रहे है कि न्यायपालिका राजनीतिक दल विशेष के राजनीतिक एजेंडे को पूरा करने के लिए अपने कंधे का इस्तेमाल करा रही है।

अभी शाम का सवेरा भी नहीं हुआ की गुजरात हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने 28 मई को नया आदेश जारी कर हाईकोर्ट के जस्टिस जेबी पर्दीवाला और जस्टिस इलेश जे वोहरा की बेंच को बदल दिया। इनकी जगह नई बेंच बना दी जिसमें खुद गुजरात हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस जेबी पर्दीवाला बैठ रहे हैं। इसके साथ ही क्राइसिस के मामलों की जो दूसरी बेंच बनाई गई है, जस्टिस इलेश जे वोहरा को उसमें भेज दिया गया है, जहां वह जस्टिस आरएम छाया के साथ मामलों की सुनवाई कर रहे हैं। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि जस्टिस जेबी पर्दीवाला और जस्टिस इलेश जे वोहरा की बेंच ने ही गुजरात के अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में छापा मारने की बात कही थी।

इसी तरह 26 फरवरी को दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस मुरलीधर ने तीन भाजपा नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने में देरी पर नाराजगी जताई थी। ये तीन नेता थे, अनुराग ठाकुर, परवेश वर्मा और कपिल मिश्रा। उससे भी एक दिन पहले यानी 25-26 फरवरी की रात 12:30 बजे जस्टिस मुरलीधर ने दिल्ली हिंसा से जुड़े मामले पर अपने घर पर सुनवाई की थी। अगले दिन 27 फरवरी 20 को जस्टिस एस मुरलीधर का ट्रांसफर दिल्ली हाईकोर्ट से पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में कर दिया  गया। विवाद इसलिए क्योंकि एक दिन पहले ही यानी 26 फरवरी को जस्टिस मुरलीधर ने तीन भाजपा नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने में देरी पर नाराजगी जताई थी।

गुजरात हाईकोर्ट।
गुजरात हाईकोर्ट।

चीफ जस्टिस विजया के ताहिलरमानी ट्रांसफर के फैसले से नाराज थीं। उन्होंने मद्रास हाईकोर्ट से मेघालय हाईकोर्ट ट्रांसफर किए जाने के कॉलेजियम के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की, लेकिन 5 सितंबर 2019 को कॉलेजियम ने मांग ठुकरा दी। नवंबर 2018 में उन्हें मद्रास हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस नियुक्त किया गया था। इससे पहले वे दो बार बॉम्बे हाईकोर्ट में एक्टिंग चीफ जस्टिस भी रह चुकी थीं। जजों की संख्या के लिहाज से मेघालय देश की दूसरी सबसे छोटी हाईकोर्ट है। आखिरकार 6 सितंबर को उन्होंने मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पद से इस्तीफा दे दिया। गुजरात दंगों से जुड़े बिल्किस बानो का केस। मई 2017 में जस्टिस ताहिलरमानी की बेंच ने 11 दोषियों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी थी, जबकि 5 पुलिस अफसरों और 2 डॉक्टरों को बरी करने के फैसले को पलट दिया था। इस मामले में कुल 18 लोगों को सजा सुनाई गई थी।

कॉलेजियम ने 10 मई 2019 को जस्टिस अकील कुरैशी का ट्रांसफर बॉम्बे हाईकोर्ट से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में बतौर चीफ जस्टिस करने की सिफारिश की, लेकिन केंद्र सरकार ने कॉलेजियम की इस सिफारिश को छोड़कर बाकी सिफारिशें मंजूर कर लीं। इसके बाद कॉलेजियम ने एक बार फिर उन्हें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस नियुक्त करने की सिफारिश भेजी, लेकिन सरकार ने इसे भी वापस भेज दिया। इसके बाद कॉलेजियम ने जस्टिस कुरैशी को सितंबर 2019 में त्रिपुरा हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस नियुक्त करने की सिफारिश की, जिसे सरकार ने मंजूर कर लिया। जस्टिस कुरैशी पहले गुजरात हाईकोर्ट के जज थे और उन्होंने 2010 में सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में अमित शाह को दो दिन की पुलिस हिरासत में भेजने का फैसला दिया था।

जस्टिस जयंत पटेल को 13 फरवरी 2016 को कर्नाटक हाईकोर्ट का जज नियुक्त किया गया था। सितंबर 2017 में कॉलेजियम ने उनका ट्रांसफर कर्नाटक हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट करने की सिफारिश की, लेकिन उनका कहना था कि उनके रिटायरमेंट में 10 महीने बाकी हैं और इतने कम समय के लिए वे इलाहाबाद हाईकोर्ट नहीं जाना चाहते, इसलिए उन्होंने 25 सितंबर 2017 को इस्तीफा दे दिया। कर्नाटक हाईकोर्ट आने से पहले जस्टिस पटेल गुजरात हाईकोर्ट में जज थे। वहां उन्होंने एक्टिंग चीफ जस्टिस का पद भी संभाला। जस्टिस पटेल ने ही इशरत जहां एनकाउंटर केस की सीबीआई जांच कराने का आदेश दिया था।

आंध्र, कर्नाटक और गुजरात हाईकोर्ट।
आंध्र, कर्नाटक और गुजरात हाईकोर्ट।

इसी तरह जस्टिस के एम् जोसेफ ने उत्तराखंड हाईकोर्ट में तैनाती के दौरान सरकार के खिलाफ फैसला दिया था तो उच्चतम न्यायालय में उनकी पदोन्नति की सिफारिश  सरकार ने मंजूर नहीं की और कई जजों की नियुक्ति के बाद उन्हें जूनियर बनाकर उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश बनाया गया।

आज पूरा उत्तर प्रदेश फर्जी शिक्षकों और शिक्षक भर्ती घोटाला से जूझ रहा है लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश जस्टिस अरुण टंडन ने जब एक के बाद एक जिले की घोटालों की फाइल खोलनी शुरू की तो पता चला की पूरे प्रदेश में शिक्षा माफिया ने बड़े पैमाने पर फर्जी भर्तियाँ कर रखी हैं और सरकारी खजाने से उन्हें नियमित वेतन दिया जा रहा है। जब इसमें यूपी के शिक्षा सचिव चपेट में आने लगे तो बेंच बदल दी गयी और मामला ठंडे बसते में चला गया। इसी तरह गंगा प्रदूषण मामले में स्वत:संज्ञान याचिका में जब गंगा के अधिकतम बिंदु से दोनों तरफ 500-500 मीटर तक सभी स्थायी निर्माण बंद करने के आदेश पारित हुए, जिसमें ओमेक्स जैसे बड़े बिल्डर चपेट में आ गये तो बेंच बदल दी गयी और अब पता भी नहीं चलता कि याचिका की कब सुनवाई हुयी या क्या आदेश हुआ।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह कानूनी मामलों के जानकार भी हैं।)  

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