(अरुंधति रॉय के लेखन की सबसे बड़ी ख़ूबियां उसकी सच्चाई और उसकी मौलिकता हैं। ये खूबियां उन्हें अपने जीवन के खुरदुरे, रूखे, तकलीफ़ों और फटकार और गालियों और अंधड़ों से ‘भरे-पूरे’ अनुभवों से हासिल हुई हैं। उनके सधे और ताप से निखरे लेखन का नतीजा है कि उनका पहला संस्मरण हमें उनके औपन्यासिक रोमांचों की ओर खींच ले जाता है।)
कुएं की ठंडी गहराई में एक सफ़ेद पत्थर की तरह
मेरे भीतर पड़ी हुई है एक अद्भुत याद
मेरे बस में नहीं और छोड़ना भी नहीं चाहती इसेः
ये है मेरी यातना और मेरी अपार ख़ुशी
-यूक्रेन में जन्मीं रूसी कवि आन्ना आख़्मातोवा (1889-1966)
(मूल रूसी से अंग्रेजी में अनुवादः बाबेत डॉयश और अब्राहम यारमोलिन्स्की, मॉडर्न रशियन पोएट्रीः एन एंथलॉजी, हारकोर्ट, ब्रेस एंड कंपनी,1921) (पोएट्स डॉट ओर्ग पर उपलब्ध अंग्रेजी अनुवाद से साभार)
अरुंधति रॉय का, अंजुम जैसी साथियों के साथ मिलकर ‘निर्मित’ किया हुआ अपार ख़ुशी का घराना (मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैपीनेस) जहां से अपने मूल तत्व लेकर चला था- वो जगह, वो सामान, वो स्मृति, वो गुफ़ा अब हमारे सामने है- ‘मदर मेरी कम्स टू मी’ (मुझ तक आती मेरी मां) के रूप में। अरुंधति की ये पहली संस्मरण-पुस्तक उनकी अब तक की तमाम किताबों के मूल में है। यहां से पाठक और प्रेक्षक के तौर पर आप वापसी का सफ़र कर अरुंधति के लेखन को डिकोड करने की कोशिश कर सकते हैं। कहा नहीं जा सकता वो कोशिश कितनी क़ामयाब होगी लेकिन इस किताब में वे सूत्र बिखरे हुए हैं जिनसे उनके रचनाकर्म की थाह ली जा सकती है।
परस्पर गुंथे हुए फिक्शन और नॉन-फ़िक्शन
अरुंधति ने अपनी पहली किताब ‘गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ अपनी मां मेरी रॉय और भाई एलकेसी (ललित कुमार क्रिस्टोफ़र) को समर्पित करते हुए लिखा थाः “मेरी रॉय जिन्होंने मुझे बड़ा किया। जिन्होंने सार्वजनिक उपस्थिति के समय उन्हें टोकने से पहले ‘एक्स्यूज़ मी’ कहना सिखाया। जिन्होंने मुझे भरपूर प्यार देकर जाने दिया।“ और भाई के लिए उन्होंने लिखा थाः “एलकेसी के लिए, जो मेरी तरह, बचा रहा।” संस्मरण की ये नयी किताब भी मां और भाई को ही समर्पित की गई है। क्रम उलट है। यहां ललित कुमार क्रिस्टोफर पहले हैं जिनके लिए अरुंधति ने लिखा हैः साथ साथ हम बचे रह पाए और मां मेरी रॉय के लिए लिखाः जिन्होंने कभी नहीं कहा, रहने दो।
पहली किताब में समर्पण के पेज के बाद प्रख्यात ब्रिटिश लेखक और कला-मर्मज्ञ जॉन बर्जर का कथन हैः “नेवर अगेन विल अ सिंगल स्टोरी बी टोल्ड एज़ दो इट्स द ओनली वन।” (एक अकेली कहानी फिर कभी इस तरह नहीं बताई जाएगी जैसे वही एक कहानी हो।) ये पंक्ति बर्जर के बुकर पुरस्कार प्राप्त उपन्यास ‘जी.’ से ली गई है। नयी किताब में भी अरुंधति रॉय ने अपने प्रिय लेखक और दोस्त जॉन बर्जर की रचना से एक टिप्पणी को शुरुआती पन्ने में जगह देकर उन्हें याद किया हैः “द गेस्ट्स एज़ दे लेफ़्ट किस्ड द क्राउन ऑफ़ हर हेड एंड शी न्यू देम बाइ देयर वॉयसेज़।”
(मेहमानों ने जाते हुए उसका माथा चूमा और वो उन्हें उनकी आवाज़ों से पहचानती थी।) जॉन बर्जर ही थे जिन्होंने नर्मदा पर बन रहे बांधों के बारे में अरुंधति के निबंधों को पढ़ने के बाद उन्हें अपनी विशिष्ट हैंडराइटिंग में फैक्स किया था कि “तुम्हारा फिक्शन और गैर-फिक्शन- दोनों तुम्हें दुनिया में ऐसे लिए चलते हैं जैसे तुम्हारे दो पांव।” अरुंधति के मुताबिक वो उन थोड़े से लोगों में से थे जिन्होंने उनके फिक्शन और नॉन-फिक्शन को एक-दूसरे के बरअक्स नहीं रखा। जन्नत गेस्ट हाउस की मालकिन अंजुम से शायद सबसे पहला परिचय लेखिका के बाद जॉन बर्जर का ही था।
किताब के हाफ डस्ट जैकेट पर अरुंधति के युवा दिनों की तस्वीर है, बीड़ी फूंकते हुए- कार्लो बुलड्रिनी की खींची हुई। और बैक कवर पर प्रौढ़ दिनों की तस्वीर जिसे मयंक ऑस्टिन सूफी ने खींचा है। ये तस्वीरें भी मानो अपनी मां से पीढ़ीगत संवाद की तरह हैं, उनकी ही प्रतिबिंब या उनकी प्रति-छायाएं। और जब आप किताब को उलटकर दोनों कवरों को एक साथ अपने सामने रखें तो पाएंगे कि आज की अरुंधति अपने विशिष्ट, स्मित मुस्कान और निहाल अंदाज़ में कई दशक पहले की अरुंधति को देख रही है, मानो नज़रों से टहोकती हुई कि तुम भी क्या ‘आफ़त’ थी माई?!
लाल रंग के कवर पर किताब के टाइटल और लेखिका के नाम के ठीक नीचे और बीड़ी फूंकती अरुंधति के फोटो वाले कवर के ठीक पीछे एक पतंगा (या फतिंगा) उकेरा गया है। मानो वहां छिप कर बैठा हुआ हो। एक तरह से बचपन की स्मृति का प्रतीक, अपनी मां की ओर कभी कातर और कभी निसार निगाहों से देखती एक बच्ची, एक लड़की, एक युवती और एक प्रौढ़ा के भीतर, कहीं भीतर चिपका हुआ या वहीं कहीं फड़फड़ाता हुआ। अपने सूरज की ओर जाने का दुस्साहस करता और बार-बार जलकर राख होता, फिर से जन्म लेता और फिर मंडराने आ जाता हुआ। सूफ़ी संत सरमद शहीद (कासानी) की एक रूबाई हैः
सरमद ग़म-ए-इश्क, बुलहवस रा न-देहंद / सोज़-ए-दिल-ए-परवानः, मगस रा न-देहंद।
इस रूबाई का आशय ये है कि प्रेम का दुख हर किसी को नहीं दिया जा (मिल) सकता (हर कोई नहीं समझ सकता) जैसे परवाने की करुणा मक्खी को नहीं दी जा (मिल) सकती। उस्ताद अमीर ख़ान साहब ने राग प्रिय कल्याण में इस रूबाई को गाया है जहां वो नये रंगों में खिल उठती है और नयी गहराइयों का रुख करती है, दर्द को और हर्ष को और तीव्रतर करती हुई। ये जो परवाना या फतिंगा या मॉथ है- अरुंधति के मन की उलझन, हदस और संत्रास का भी एक बिंब है। उससे उनका पीछा नहीं छूटता। वो प्रेम भी है और यातना भी।
मेरी रॉय, मिसेज रॉय या मां मेरी- कौन थीं वो?
जुनून को पूरी ताकत के साथ खुद को वक़्त पर फेंक मारना होगा, ‘जी.’ उपन्यास में एक पंक्ति कहती है। इस मेमॉयर में लगता है अरुंधति ने कमोबेश यही किया है। समय को फोड़ देने वाले पैशन के साथ उन्होंने अपने घर की, अपने भावनात्मक लैंडस्केप की ये कथा कही है। ऐसी गहरी चोटें वक़्त पर कब किस जुनून की पड़ी थीं?! एक पीढ़ी पहले वही जुनून न सिर्फ़ असम से एक कमोबेश अघोषित परित्यक्त हालत में पनपा था और वहां से कई हज़ार मील दूर हिंद महासागर के एक छोर पर चला आया था नई उत्तेजना जगाने के लिए लेकिन उसे समाज और परिवार की बहुत सारी आगों में भी झुलसना था।
मिसेज रॉय, मेरी रॉय होकर ख़त्म नहीं होना चाहती थीं। वो एक बहुत ढीठ जीवन लेकर आई थी जिसमें भीषण दमे और निराशाओं के जोरदार झटके और उफ़ान थे लेकिन जिजीविषा का भी अंत नहीं था। एक स्त्री अपने संसार का सृजन कर रही थी। इससे ज्यादा सुंदर, ज्यादा सच्ची बात, कायनात में और क्या हो सकती थी लेकिन उस स्त्री की सृजनात्मक क्षमता ने उसका पैशन तो बढ़ा दिया लेकिन करुणा और ममता छीन ली।
अरुंधति ममता की अनुपस्थिति के उसी विराट सन्नाटे, उसी विशाल रिक्त स्थान में पली-बढ़ी, उसी में बनीं। मां के स्नेह से वंचित जीवन में उन्होंने कोई सूखापन नहीं आने दिया बल्कि उसे स्नेह और मातृत्व की कमी के अनुभव से इतना सिंचित कर दिया कि उन्हें अपने आसपास मां ही दिखाई देने लगी। यह यूं तो हार की जीत थी, लेकिन मां से कैसा हारना, कैसा जीतना?
“मिसेज रॉय-विहीन दुनिया की पहली रात, मैं अंतरिक्ष में डोलती रही। मैंने खुद को उनके इर्दगिर्द निर्मित कर दिया था। उन्हें अकोमोडेट करने के लिए मैं एक खास आकार में ढलती चली गई थी। मैं उन्हें कभी हराना नहीं चाहती थी, कभी उनसे जीतना नहीं चाहती थी। मैं हमेशा चाहती थी कि वो रानी की तरह विदा हों। और अब वो उसी ढंग से चली गई तो मुझे खुद को लेकर कुछ सूझता ही नहीं था।”
जो नैतिक, सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक, शैक्षणिक मूल्य मां ने बेटी को दिए, बाद में उन्हीं के लिए उसका प्रतिकार किया- उस पर वो टूट पड़ीं। बौखलाईं, आखिर क्यों? क्या इसका कोई मनोवैज्ञानिक या सामाजिक-सांस्कृतिक तहों वाला जवाब हो सकता है या बता पाना बहुत ही मुश्किल है कि मिसेज रॉय को क्या बेटे-बेटी से नफ़रत थी, या एकल मां के झंझटों, शराब में डूबे पति को छोड़कर आने और अपना संसार फिर से खड़ा करने, या बहुतेरे सामाजिक दबावों की चिढ़ उन पर निकलती थी, या वो इतनी ख़ुदगर्ज और इतनी आत्मकेंद्रित थीं, इतनी सेल्फओबसेस्ड, सेल्फएबसॉर्ब्ड? हम ठीक-ठीक नहीं जान सकते।
ये फ़ाश करने का अरुंधति का कोई इरादा भी नहीं। हर चीज़ को समझना व्यर्थ है। हर चीज़ बताई या समझाई नहीं जा सकती। एक गांव की नदी की धारा की तरह ख़ामोशी में सब बह जाता है या दर्ज हुआ जाता है। नदी के बोल ख़ामोशी के महासागर में जा गिरते हैं। या मेहमाननवाजी में किसी तरह की कोई चूक होने जैसी स्थिति में एक कठिन मां के क्रोध की भयंकर लपटों से जैसे-तैसे झुलसते-गिरते-संभलते-निकलते भाई-बहन एक निर्विकार सी शांति में सीढ़ियों पर जा बैठते हैं। ‘एक तीसरे व्यक्ति की तरह ख़ामोशी भी आकर उनके बीच बैठ जाती है’ एक प्यारी दोस्त की तरह।
मिसेज रॉय को दुनिया उनके दो असाधारण कामों के लिए याद रखेगीः कोट्टायम में एक विशिष्ट स्कूल की स्थापना, जो अपनी खास तरह की शिक्षा-दीक्षा के लिए मशहूर रहा है और दूसरा त्रावंकोर क्रिश्चियन उत्तराधिकार कानून को चुनौती जिसके तहत बेटियों, एकल माताओं और विधवाओं को बहुत ही सीमित अधिकार हासिल थे, और बेटियों को बेटे के शेयर का एक चौथाई हिस्सा या पांच हजार रुपये जो भी कम हो, देने का प्रावधान था। ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई में मेरी रॉय ने इसे चुनौती दी और जीत हासिल की। कोर्ट में मेरी रॉय का प्रतिनिधित्व मशहूर अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने किया था।
मीना पिल्लई ने द हिंदू में प्रकाशित एक रिपोर्ट में लिखा कि मेरी राय ने किसी मदद के बगैर कड़े शारीरिक परिश्रम और अदम्य इच्छाशक्ति की बदौलत दृढ़ता के साथ ये कानूनी लड़ाई लड़ी और ऐतिहासिक जीत हासिल की। लैंगिक समानता के लिए आज भी कोनों-खुंजों से लेकर वृहद परिवेशों तक जारी ऐसी एकल-सामूहिक लड़ाइयों में उम्मीद है मेरी रॉय की ज़िद मशाल का काम करती होगी। 1986 में सुप्रीम कोर्ट ने सीरियाई क्रिश्चियन समुदाय की स्त्रियों को संपत्ति में समान अधिकार देने का फैसला सुनाया था।
उसी कानून का हवाला देते हुए कई साल पहले मेरी रॉय के बड़े भाई, जी इसाक, बहन को पिता की संपत्ति से बेदखल करने के लिए ऊटी के उस साधारण से घर में आ पहुंचे थे जहां असम से लौटकर मिसेज रॉय ने बच्चों के साथ अपना पहला ठिकाना बनाया था। ये वही जी इसाक थे जिनसे मेरी के झगड़े कभी खत्म नहीं हुए, जिन्होंने संपत्ति से बहन को हटाने की जुर्रत तो कर ली लेकिन नहीं जाना इसके नतीजे उनके लिए कितने दूरगामी और भयानक होने वाले थे।
ये वही जी इसाक थे जिनका व्यवहार अरुंधति की नजरों में अच्छा नहीं था लेकिन उनकी एक प्रवृत्ति ने उन्हें उनके सारे बैर भुला दिए और वो तब हुआ जब एक इंटरव्यू के दौरान बहन से केस हारने के मुद्दे पर जी इसाक ने मजाक में कहा कि अब कम से कम ये तो स्पष्ट हो गया कि वृहद सीरियाई क्रिश्चियन समुदाय के नेता वो नहीं रहे।
अरुंधति के मुताबिक अपने मामा से उन्होंने जाना कि पराजय को कैसे दोस्त बना लेना चाहिए, कि जी इसाक ने दिखा दिया कि हार से दोस्ती कर लेना उसे स्वीकार कर लेने से कितना अलग और उलट है। बाद के दिनों में मिसेज रॉय बीमार हुईं तो एक बार फिर भाई-बहन के बीच लंबे समय की कड़वाहट दूर होती गई। भाई अपनी बहन से मिलने आते रहे, हाथ थामे साथ-साथ पुराने गाने गाते रहे, लगता ही नहीं था कि ये वही आदमी है जो अपनी बहन और उसके दो छोटे मासूम बच्चों को घर से बेदखल करने किसी रोज़ आ धमका था। लेकिन आखिरकार जी इसाक ही दुनिया में अकेले वो शख्स थे जो मिसेज रॉय को उनके पहले नाम से बुला सकते थे, बुलाते थे।
हताशा, स्मृति, दुःस्वप्न, उम्मीद, कामना, तड़प और बाल-मन के विछोड़, उछाड़-पछाड़ को अरुंधति ने जिस मर्मस्पर्शी अंदाज में वर्णन किया है वो बाल मनोविज्ञान सीखने-पढ़ाने-बरतने वालों को भी देखना चाहिए। एक बेटी लगातार अपनी मां के वात्सल्य की छांव में जाने को आतुर रहती है और उसकी ये आतुरता कभी न खत्म होने वाले इंतजार में तब्दील हो जाती है, उस दिन तक जब उसे अपनी बिस्तर पर पड़ी बीमार मां का फोन पर संदेश नहीं आ जाता कि “मैंने दुनिया में तुमसे ज्यादा प्यार किसी को नहीं किया है।” फोन पर आए टेक्स्ट के रूप में ये उद्घोषणा थी। मिसेज रॉय यूं ही नहीं कुछ कह देती थीं।
उनके संदेश ‘स्टेटमेंट ऑफ पॉलिसी’ हुआ करते थे। संदेश पढ़कर अरुंधति की सांस अटक गई, ‘चेहरे पर ख़ून दौड़ गया,’ वो सिहर उठीं, फिर थोड़ा स्थिर होने के बाद कांपती उंगुलियों से उन्होंने मां को जवाब लिखाः “आपके जैसी असाधारण और अद्भुत महिला कोई और नहीं। आपको बहुत ज़्यादा प्यार करती हूं।”
‘गैंगस्टर’ नाम के अध्याय से शुरू होती हुई ये किताब 372वें पेज पर ‘डिक्लेरेशन ऑफ लव’ (प्रेम की उद्घोषणा) अध्याय के साथ समाप्त होती है। फिर वो सिर्फ़ अध्याय नहीं रह जाता, वो वास्तव में अरुंधति के जीवन और लेखन का केंद्रीय सूत्र भी बन जाता है- प्रेम और उसकी संभावना और उसका ऐलान। तमाम पराजयों और तमाम निराशाओं के विरुद्ध सतत प्रेम की उद्घोषणा। उस ग्रैविटी से खुद को छुड़ाने का साहस भी उसी ग्रैविटी के भीतर से ही कहीं रिसता हुआ आता है। अरुंधति बताती हैं कि उन्होंने अपनी मां को इसलिए नहीं छोड़ा क्योंकि वो उनसे प्रेम नहीं करती थी, बल्कि इसलिए छोड़ा कि उन्हें प्यार करती रह सकें। उनके साथ रहकर वैसा संभव नहीं होता।
“एक बार मैं चली गई तो मैंने सालों तक उनसे न मिली न उनसे बात की, उन्होंने भी मेरे बारे में कोई तफ़्तीश नहीं की। उन्होंने कभी नहीं पूछा कि मैं क्यों गई। उसकी ज़रूरत नहीं थी। हम दोनों जानते थे। हम लोगों ने एक झूठ का सहारा ले लिया था। अच्छा झूठ थाः मैंने उसे कुछ यूं पेश कियाः उन्होंने मुझे इतना प्यार किया कि जाने दिया। यही बात मैंने अपने पहले नॉवल के फ्रंट पर लिखी। जो मैंने उन्हें समर्पित किया था।”
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने अपनी एक नज़्म में कहा हैः “यूं न था मैंने फ़कत चाहा था यूं हो जाए.”
एक दोहरी-तिहरी याददिहानी जैसी किताब
किताब पढ़ते हुए घर पर एक रोज़ देखा, गेट के पिलर पर कटोरीनुमा एक तश्तरी में पानी रखा है और अपनी चोंच से पानी भरने की कोशिश करती, भर पाती और उड़ जाती और फिर लौटती उस पर एक चिड़िया है। यह बिंब मानो इस किताब में मां के विशाल, जटिल, तटस्थ और बाज़ दफ़ा रूखे, कड़क सामाजिक संसार में अपनी उड़ान के लिए जगह बनाती बेटी के बारे में बताता है। यह कहानी जितना बेटी की मासूमियत और मां से लिपटने की एक सुलगती हुई सी ख़्वाहिश की है उतना ही ये एक मां की दुर्निवार ज़िद, ज़िम्मेदारी, साहस, दोटूकपन, हौसले और आत्मविश्वास और स्वाभिमान की कहानी भी है।
ये मानो जैसे नदी के दो पाटों की दो समांतर कहानियां हैं जो मिल नहीं रही हैं लेकिन लगातार एक दूसरे को देखती, टहोकती जा रही हैं। और कहीं किसी अदृश्य अंतर्धारा में एक दूसरे में समा गयी हैं, इस तरह कि उनके किरदार दो ठोस स्थिर सुदृढ़ पेड़ हैं, जिनके पत्ते अलग अलग रंगों के हैं, शाखाएं अपने अपने ढंग से झूलती-फैलती हैं लेकिन जिनकी जड़ें और जिनका रस कहीं जमीन में बहुत नीचे परस्पर विलीन हो रहा है। अरुंधति रॉय, मेरी रॉय की बेटी ही हो सकती हैं। मेरी रॉय, अरुंधति की मां ही हो सकती थी। अरुंधति ने अपनी मां को ‘अपनी पनाह और अपना तूफ़ान’ यूं ही नहीं कहा है।
“मैंने उन्हें अपना सब कुछ उस समाज पर बरसाते हुए देखाः अपनी प्रतिभा, अपना जीनियस, अपनी विलक्षण सनक, अपनी अपार दयालुता, चरम साहस, अपनी बेरुखी, अपनी क्रूरता, अपनी उदारता, सदाशयता। अपनी दबंगई, अपना कारोबारी मिज़ाज, और अपना बीहड़ अप्रत्याशित तेवर और गुस्सा…।”
ये संस्मरण, लेखिका के कठिन और मुफ़लिसी और दया और क्रूरता, अजनबियत और दुनियादारी और रिश्तेदारी और भावुकता और जमीन और संपत्ति के बंटवारे-झगड़े में लिथड़े हुए बचपन से शुरू होता है और विश्व की एक कामयाब, चर्चित और महत्वपूर्ण लेखिका बन जाने तक जाता है। अरुंधति ने विशिष्ट शैली में अपना लेखकीय जादू एक बार फिर पिरोया है और यह एक मेमॉयर न रहकर मां-बेटी और परिजनों के रिश्तों की न जाने कितनी तहों की खोजबीन करता दस्तावेज और समकालीन विसंगतियों और विडंबनाओं और संत्रासों का एक प्रामाणिक विवरण बन जाता है।
अरुंधति का ये संस्मरण एक याददिहानी जैसा भी है, उनकी कृतियों के जन्म लेने की दास्तानों और संघर्ष की पृष्ठभूमि से पाठकों को रूबरू कराता बल्कि पाठकों को भी उनकी हताशा, जीत-हार, द्वंद्व, तकलीफ़ और संघर्ष की स्मृतियों की ओर खींचता। ये एक दोहरी-तिहरी याददिहानी जैसी किताब है।
जारी..
(शिवप्रसाद जोशी लेखक और पत्रकार हैं।)
(समयांतर के अक्टूबर अंक में प्रकाशित निबंध का मूल और संवर्धित टेक्स्ट।)