‘मदर मेरी कम्स टू मीट’-2: दो संघर्ष, दो जीवन, दो लालसाएं, दो महत्वाकांक्षाएं, दो ज़िदें, दो अरमान

और इस संस्मरण में मानो अलग-अलग विधाएं ऐसे ही बैठ गई हैं आकर जैसे तार पर कुछ चिड़िया। एक आत्मकथा और एक जीवनी और एक उपन्यास और एक संस्मरण- एक दूसरे में गुंथे, लिपटे और उलझे हुए और हम ठीक-ठीक ये नहीं जान सकते कि वे विधाएं एक-दूसरे से अलग होने को छटपटा रही हैं या एक-दूसरे में लिपट जाने को व्याकुल हैं, मां और बेटी के रिश्ते को एक स्वाभाविक दुनियादारी में भिगो देने को तैयार हैं या एक असाधारण से द्वंद्व में अपनी-अपनी कथाओं का सृजन कर रही हैं? दो नदियां, दो सदियां, दो संघर्ष, दो जीवन, दो लालसाएं, दो महत्वाकांक्षाएं, दो ज़िदें, दो अरमान।

और उन दो के बीच उनके लोग, उनके प्रियजन और बनती-बिगड़ती दुनिया। इस तरह ये किताब एक विशुद्ध भारतीय मन को टटोलता-खंगालता वृत्तांत भी है। उपमहाद्वीप के विभिन्न भूगोलों, संस्कृतियों, उप-संस्कृतियों की दास्तानें इसमें मूल कथा को संभालते हुए दर्ज हुई हैं। वहां दिल्ली की दूर तक तनी हुई झुलस भी है और केरल का अनवरत गीलापन भी। इन्हीं के बीच धूल, धुआं, बारिश, नशा, सड़क, कमरा, झोपड़ी, फुटपॉथ, ऊब, आंसू, पसीना है और प्रेम के एक अटूट, कभी न ख़त्म होने वाले धागे पर सारी कथा टंकी हुई है। जैसे एक-एक कर हर घटना, हर किस्से, हर दर्द, हर विपदा, हर उम्मीद, हर उदासी को इस धागे से होकर गुज़रना है और उसी में बंधे रह जाना है। प्रेम का ये धागा, उसकी यातना का धागा भी है। इसीलिए अरुंधति के लिए उनकी मां उनकी पनाह और उनका तूफ़ान- दोनों है। 

नोबेल विजेता अमेरिकी कवि लुईस ग्लिक की एक लंबी कविता का अंश हैः

…वो बेशक जानती है धरती / माँओं से चलती है, ये बात / बिल्कुल तय है। वो ये भी जानती है /कि जिसे कहा जाता है / लड़की वो अब नहीं रही। / क़ैद के बारे में वो मानती है / कि बंदी तभी से है जब से बेटी है…(पर्सिफोन कविता का एक अंश, कविता संग्रहः एवर्नो)

संवाद को तरसती बेटी और असहाय समाज को संभालती माँ 

सीरियाई ईसाई समाज में मिसेज रॉय का एक बड़ा रुतबा था और सम्मान था और लोग उनसे स्वाभाविक कारणों से थरथराते थे और प्यार करते थे। अरुंधति के लिए उनके बारे में लिखना एक मां, उसकी सख्ती, उसकी रुखाई और उसके अनुशासन के लिए लिखने से ज्यादा एक महिला, उसकी उस्तादी, उसके तेवर, उसके साहस और पुरुष प्रधानता और पुरुष लंपटई वाले समाज में निर्भय रवैये के बारे में लिखना था।

यहां एक बेटी ही नहीं एक स्त्री भी अपने से एक पीढ़ी बड़ी स्त्री की गरिमा, बुलंदी और किरदार के बारे में लिख रही है, अपने दुस्साहसपूर्ण लेखन और वैचारिक प्रखरता की बदौलत अरुंधति ने अपने समय से मुठभेड़ में मुब्तिला एक खुद्दार स्त्री का खाका भी खींचा है जो संयोगवश मातृत्व या ममता के लिए नहीं एक निर्भय और स्वतंत्रचेत्ता मनुष्य के तौर पर उन्हें याद है। 

“बच्ची के तौर पर मैंने उन्हें नादान, अतार्किक, बेबस, भयभीत, सम्पूर्ण ढंग से प्रेम किया जैसा कि बच्चे करते हैं। वयस्क के तौर पर मैंने उनसे ठंडे, निर्विकार, तार्किक और सुरक्षित दूरी से प्रेम करने की कोशिश की। मैं अक्सर नाकाम रही। कभी तो बुरी तरह। मैंने अपनी किताबों में उनके संस्करण लिए लेकिन उन्हें उनके मौलिक रूप में कभी दर्ज नहीं किया। उन्हें वे संस्करण अच्छे लगे और द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स में अम्मु के किरदार को उन्होंने गले ही लगा लिया जिसे वो अक्सर मैं कहती थी। वो अम्मु होना चाहती थी क्योंकि उन्हें अच्छी तरह पता था कि वो वैसी नहीं थी।”

दो एटमी शक्तियों (जैसा कि एक टीवी इंटरव्यू में अरुंधति ने मज़ाक में कहा) की पारस्परिक और वैयक्तिक कार्रवाइयों के बारे में किताब बताती चलती है। जब मेरी रॉय तमाम मुश्किलात को लगभग रौंदते हुए अपने सपनों और चुनौतियों के स्कूल की स्थापना और उसे सही दिशा में चलाने के लिए जी-जान एक किए हुए थीं तो इधर दिल्ली में अरुंधति अपने संघर्ष के औजार पैने कर रही थीं।

उनके पास पहली बार रेल से दिल्ली आते हुए बैग में रखा चाकू बेशक नहीं था लेकिन बहुत सारी चीजों से वो लैस थीं- हार न मानने वाली उद्दाम जीवटता, प्रेम में खुद को डुबो देने और निकल आने की ताब और निर्माण और वास्तुकला की बारीकियों को गूंथने का कौशल, एक रचनात्मक छटपटाहट, बेचैनी और दूर की एक कौंध को पकड़ने की ऊर्जा। अरुंधति के पास उनका वही बचपन का, दिल में अटका हुआ पतंगा भी था। 

अरुंधति बताती हैं कि एक बार स्कूल चल निकला तो मिसेज रॉय ने तन-मन-धन उसी को आगे बढ़ाने पर झोंक दिया। स्कूल की बढ़ती लोकप्रियता और प्रतिष्ठा ने उनके भीतर नया जोश भर दिया। उनके पास असहाय स्त्रियों और बच्चों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने का साहस, एक अभियान बन गया। अरुंधति के मुताबिक मां ने अपनी ‘रेडिकल काइंडनेस’ की मुहिम छेड़ दी। वो उनकी एक निजी किस्म की राजनीति थी। किसी दुखियारी और मुसीबत की मारी महिला का पता चलते ही मां निकल पड़ती, मामला समझती और जरूरत के मुताबिक कार्रवाई करती।

मामला अदालती होता तो अदालत जाती और किसी को दवा, उपचार या इलाज की जरूरत होती तो अस्पताल पहुंच जाती। ये उनकी कोई चैरिटी, दानदाता या सामाजिक कार्यकर्ता वाली अभिलाषा या आतुरता नहीं थी, उनके भीतर अत्यधिक रोष या नाराज़गी का बोध था। उन्होंने अनाथ बच्चों को स्कॉलरशिप दी और पतियों की छोड़ी हुई या मार खाई हुई दमित स्त्रियों को रोजगार दिया। उनका स्कूल एक तरह से ऐसे वंचितों, दुखियारों, उत्पीड़ितों और वक्त के मारों का एक छायादार और प्रेम से सराबोर आसरा बन गया था। उन पर अपना प्यार लुटाने वाली मिसेज रॉय थीं। 

अरुंधति जब ये लिखती हैं कि “अक्सर मुझे लगता था कि काश मैं उनकी बेटी न होकर स्टूडेंट होती,” तो उनके भीतर से उठती और वहीं गिर जाती हूक भी आप महसूस कर सकते हैं। 

“मुझे ये समझने में सालों लग गए कि मां के तीन बच्चे थे। मैं बीच की थी। मुझसे बड़ा मेरा भाई था और मुझसे छोटा- स्कूल था। इसमें कभी कोई शक नहीं था कि मां का सबसे पसंदीदा बच्चा कौन है। अपने पूरे दमखम के साथ वो अपने सबसे छोटे बच्चे के लिए लड़ीं और उसे महफ़ूज़ रखे रहीं। उस तरह का कतई केंद्रित, भीषण प्रेम, जो भी उसका पात्र हो, धन्य है। हम जैसे लोगों के लिए, जो ऐसे पात्र नहीं हैं और प्रेम को बस अपने पास से गुज़र जाता हुआ देखते हैं, उनके लिए चुनौती ये है कि वे उससे सबक लें, उससे चकित और मोहित होना सीखें और कड़वाहट न पालें और खुद को प्यार कर पाने में असमर्थ न हो जाएं।”

ये संस्मरण एक तरह से अरुंधति का अपनी मां के साथ संवाद है जिसकी वो उनके जीते जी शिद्दत से प्रतीक्षा करती रहीं लेकिन वो नहीं हो पाया। शब्दों के तीखे बाणों से लेकर क्रूरता के विभिन्न किस्म के प्रदर्शनों तक (अरुंधति की प्यारी कुतिया डिडो की मौत भी)- मेरी रॉय के किरदार की जटिलता को उन्होंने बहुत तटस्थ बारीकी से पाठकों के लिए खोला है। उनकी मां का दमा जानलेवा हो जाया करता था। अरुंधति के मुताबिक किसी नाज़ुक मुद्दे पर बहस की नौबत आते ही दमे का अटैक एक आड़ भी था, एक नैतिक दबाव या साधारण सा प्रतिकार न कर पाने की छूट के विरुद्ध उनका एक प्रकट-प्रछन्न वचन।

अरुंधति ने उस आड़ को अपने शब्दों से या अपने व्यवहार से विस्फोट कर उड़ा नही दिया। वो आड़ बनी रही और उन्होंने रिएक्ट न करने प्रतिक्रिया न करने का फैसला किया, ये तरीका जो आगे चलकर उनके मुताबिक उनके काम ही आया। एक इंटरव्यू में अरुंधति ने बताया कि अपनी रीढ़ में इस्पात उन्हें मां से ही मिला था।

मिसेज रॉय के रौब और ख़ौफ़ के किस्से रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। अरुंधति कातरता या आत्मदया में नहीं बल्कि एक निर्विकार उदासी में ऐसी तमाम घटनाओं का उल्लेख करती हैं जिन्हें पढ़ते हुए दिल दहलता है। न जाने कितने घरों में अनुशासन की ऐसी खुली और छिपी मार बच्चों पर पड़ती है और न जाने कैसी वो हिम्मत है जो उन्हें जिलाए रखती है। मिसेज रॉय की मिट्टी से ही बने थे उनके बच्चे। वे मार खाते और उठ जाते, कोसे जाते, जब-तब उन्हें अपमानित किया जाता और सही बर्ताव का सबक याद दिलाया जाता, वे फिर उठ जाते, अपनी ख़ामोशियों और अपने दर्द के तहख़ानों में जा समाते लेकिन हारते नहीं।

एक अटूट ज़िद। एक ज़िद्दी धुन। मेरी रॉय की शख़्सियत की छानबीन करती उनकी बेटी बताती हैं कि उनके लिए भी वो मां से ज्यादा मिसेज रॉय थीं, वो एक लीडर के तौर पर बनी रहना चाहती थीं, रीतियों, मान्यताओं, रूढ़ियों से उनका इंकार उन्हें मातृत्व का सुख देने वाली छवि में ढलने से रोकता था। उन्हें लगता था कि परवरिश के मान्य स्थापित तरीकों में वे औजार और उपकरण शामिल नहीं थे जो उन्होंने अपने और अपने बच्चों के लिए और अपने स्कूल के लिए गढ़े थे। वो उन मानकों की मां थीं। उन मानकों की गुरू। उन मानकों की संरक्षक-पैट्रन। अरुंधति लिखती हैं:

“ऐसा लगता था मानो कि मां ने अपना (समस्त) प्रकाश अपने विद्यार्थियों के ऊपर उड़ेल दिया था और जो कुछ भी उनके पास था वो उन्हें दे डाला था- हमें- मुझे और भाई को- उसका अंधकार ही जज़्ब करते रहना था।”

“आज हालांकि मैं अंधकार के उस उपहार की आभारी हूं। मैंने उसे अपने करीब रखना, उसका खाका बनाना, उसके शेड्स छानना, उसके रहस्य उजागर करने तक उसे घूरते रहना सीख लिया था। वो मेरे लिए आज़ादी का रास्ता भी बन गया था।” 

हिंदी कवि और बेजोड़ गद्यकार रघुवीर सहाय, अपनी एक छोटी सी कहानी (उमस के बाहर) की आख़िरी पंक्तियों में नैरेटर के हवाले से कहते हैं- “देखो, कितना सुंदर था वह जो मैंने पाया था और मैं चला आया हूं और मैं दुखी नहीं हूं।” 

विधाओं का विलय और प्रेम के प्रतिमान

अमेरिकी लेखक और उपन्यासकार वर्जीनिया वुल्फ ने कहा था, “भविष्य अंधकारमय है, और मुझे लगता है भविष्य के बारे में सबसे अच्छी बात यही है।” वुल्फ के इसी कथन को आधार बनाकर लिखे अपने एक निबंध (वुल्फ्स डार्कनेस) में स्त्री अधिकारों और पर्यावरण समेत तमाम समकालीन चिंताओं पर अपने गहन निबंधों के लिए जानी-मानी अमेरिकी लेखक रेबेका सोलनिट कहती हैं, “लेखकों और अन्वेषकों का ये काम है ज्यादा देखना, पूर्व-धारणा के मामले में केवल ज़रूरी सामान के साथ यात्रा करना, आंखें खुली रखकर अंधकार में दाखिल होना. उनमें से सभी ऐसा नहीं करना चाहते या सफल हो पाते।

हमारे समय में नॉन-फिक्शन, फिक्शन के करीब कुछ ऐसे तरीकों से आ गया है जो उसकी चापलूसी नहीं करते, आंशिक तौर पर इसलिए, क्योंकि बहुत सारे लेखक उन तरीकों के लिए तैयार ही नहीं हो पाते जिनमें भविष्य की तरह, अतीत भी अंधकारमय है. इतनी सारी चीजें ऐसी होती हैं जिन्हें हम नहीं जानते, और अपने या अपनी मां के या किसी सेलेब्रिटी के जीवन के बारे में, किसी घटना, संकट, दूसरी संस्कृति के बारे में सच्चाई के साथ लिखना, अंधकार के उन टुकड़ों (छापों), इतिहास की उन रातों, अनभिज्ञता की उन जगहों से बार-बार भिड़ना या उनसे उलझना है. वे हमें बताती हैं कि ज्ञान की अपनी सीमाएं हैं, कि कुछ अनिवार्य रहस्य होते हैं, जिसकी शुरुआत इस धारणा से होती है कि हम वही जानते हैं जो सटीक सूचना की अनुपस्थिति में किसी का सोचा हुआ या महसूस किया हुआ होता है. ” 

हमने फिल्म ‘मैसी साब’ (फिल्मकार प्रदीप कृष्ण) की एक मूक सी अभिनेत्री को अपनी आंखों से बोलते हुए देखा, और फिर अपनी कलम और अपनी आंदोलनधर्मिता के जरिए। प्रेम और करुणा ही उसके दो सबसे बड़े उपकरण थे। वो एक संवेदनशील उपन्यासकार, एक साहसी एक्टिविस्ट, एक बुलंद आवाज़ और एक प्रखर अध्येता और पारदर्शी प्रेम को समर्पित मनुष्य बनीं। उनके पास रचनाधर्मिता का खज़ाना भरा था।

आप पाएंगे और जैसा कि ऊपर एक जगह उल्लेख भी किया गया हैः ये कथा के भीतर कथा है, एक आत्मकथात्मक या संस्मरणात्मक उपन्यास है या ये 300 से भी अधिक पृष्ठों वाला एक लंबा औपन्यासिक निबंध है। आप इसे विशुद्ध उपन्यास की तरह भी देखें-पढ़ें जैसा कि अरुंधति ने किताब के पहले अध्याय में अर्ज़ किया है। अपनी बहुपरतीय भाषायी-सांस्कृतिक-साहित्यिक-संवेदनात्मक विशिष्टताओं से घुली-मिली ये किताब, समकालीन विश्व साहित्य में परस्पर विलीन विधाओं की एक छायादार और यादगार जगह है।

अरुंधति ने अपने भाई के साथ एक फटकारा हुआ, लगभग तिरस्कृत सा बचपन बिताया। उनके भाई एक सीफूड कंपनी में एक बड़े कारोबारी हो चुके हैं। अरुंधति ने इस संस्मरण में अपने शराबी पिता, दोस्तों, परिचितों, परिजनों के साथ साथ अपने प्रेम संबंध का बेबाक और संवेदनशील वर्णन किया है। फिल्मकार और पारिस्थितिकीविद् प्रदीप कृष्ण से विवाह, फिर अ-विवाह, डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार संजय काक से अटूट-गहन मित्रता- जिसके बारे में अरुंधति बताती हैं कि प्रदीप और संजय उनके जीवन की धुरी के दो छोर बन गए थे और अपनी इस निराली दोस्ती को याद करते हुए वो लिखती हैं- “सच ये है कि मैं जबसे संजय और प्रदीप से मिली, मैंने दोनों को प्यार किया है।

बिल्कुल अलग-अलग तरीकों से। हमने एक-दूसरे को बहुत बुरी तरह चोट पहुंचाई और फिर से हाथ मिला लिया। हम एक-दूसरे की हिफ़ाज़त करते रहे, एक-दूसरे का साथ देते रहे, एक-दूसरे के साथ काम करते रहे। हम लोग एक-दूसरे के भाई-बहन, माता-पिता, बच्चे, दोस्त, शरण बने रहे- इस पर निर्भर करते हुए कि किसे कब, क्या चाहिए। हम लोग एक-दूसरे में उलझे हुए हैं और कोई भी चीज हमें सुलझा नहीं सकती।” 

अरुंधति की प्यार और समानुभूति और करुणा की दुनिया सिर्फ मनुष्यों तक सीमित नहीं रही- उस निराली, बीहड़, उलझी-लुटी-पिटी, धूल-गुबार-बारिश-कीचड़ से लिथड़ी दुनिया में अन्य जीव-जंतु भी हैं। अमलतास हो या कुत्तुजी, या कोई बिल्ली, गिलहरी, या गली के उनके दोस्त कुत्ते, पेड़, पत्तियां, बेलें, लताएं, फूल, हवा, बारिश, मिट्टी की महक- अरुंधति का संसार जैसे अपनी मां के बनाए सुदूर दक्षिण के संसार का एक विस्तार भी है और एक विलोम संसार भी है, उससे अलग आयामों की तलाश में भी जाता है, नये आयामों का सृजन करता है, बाज़दफ़ा वही उनका बसेरा बन जाता है।

जहां कभी हम उन्हें फटेहाल दुनिया के प्रतिनिधियों, गरीबों, भिखारियों या अपने पुराने या भविष्य के या संभावित किरदारों के साथ बैठी हुई या घूमती-बतियाती देखते हैं, कभी उन्हें अपना दर्द सुनाते, कभी उनसे सहानुभूति और हौसला हासिल करते, इसीलिए अंजुम और उनका कब्रिस्तान का जन्नत गेस्ट हाउस कल्पना का यथार्थ भी है और यथार्थ की कल्पना भी।  

इस संस्मरण में अरुंधति ने अपने दोनों उपन्यासों और अपने अब तक के निबंधों, निबंध पुस्तकों, बीहड़, इंटेंस मुलाकातों को भी याद किया है। अरुंधति रॉय की दोनों उपन्यासों की रचना-प्रक्रिया, पृष्ठभूमि, तैयारी और उनसे जुड़ी बेचैनियों को समझने के लिए भी ये किताब एक गाइड का काम करती है। ‘गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ की पहली झलक पहला बिंब पहली आकृति कैसे उभर कर आई कैसे उनका अपना गांव और उसकी हरी नदी उनकी स्मृति में तैरती-खदबदाती रहीं।

और ‘मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैपीनेस’ स्मृति-रेखाओं की तरह कैसे उनके ज़ेहन में आकार ले रहा था और कैसे जॉन बर्जर से मुलाकात ने सहसा उनके लिए उपन्यास लिखने के दरवाजे खोल दिए। और कैसे 2010 में वो उस संभावित उपन्यास के बिखरे हुए चुनिंदा रेशे अपनी स्मृति में समेटे एक दूसरी बीहड़ यात्रा पर निकल पड़ीं जिसकी बदौलत दुनिया को ‘वॉकिंग विद कॉमरेड्स’ जैसा विलक्षण, थ्रिलिंग गद्य पढ़ने को मिला जो सिर्फ एक रिपोर्ताज या निबंध नहीं था, उपमहाद्वीप और उसके मूल निवासियों की बेचैनियों को प्रस्फुटित करता एक सच्चा गद्य था। 

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एक सितंबर 2022 को 89 साल के एक खुद्दार, खुरदुरे जीवन का अंत हो गया। लेखिका को अपनी मां के लिए ‘ग्रेव’ नहीं ‘ग्रोव’ चाहिए। कब्र नहीं बाग़ चाहिए। कब्रिस्तान नहीं झुरमुट चाहिए। पंजाबी कवि अवतार सिंह पाश की एक कविता है- “…मेरे पास बहुत कुछ है/ शाम है बौछारों से भीगी हुई/ ज़िंदगी है नूर में तपती हुई/ और मैं हूं हम के झुरमुट में घिरा हुआ…” मेरी रॉय ने दफनाए जाने से मना किया था। चर्च के परिसरों में उनके लिए जगह थी भी नहीं।

कोट्टायम नगरपालिका के मोबाइल क्रिमेटोरियम की मदद से उनके सपनों के स्कूल के कैंपस में ही उनका शव दाह किया गया। उनकी कुछ राख अयमानम गांव से बहने वाली मीनच्चिल नदी में, कुछ महासागर में और कुछ उनके घर के पीछे लंबे बांसों के झुरमुट की तह में दबा दी गई। जो बाग उनके घर के इर्दगिर्द बड़ी मेहनत और मोहब्बत की बारीकियों के साथ खिला दिया गया उसी जगह रखे एक पत्थर पर “बीलवड” शब्द उकेर दिया गया। बीलवड यानी प्यारी। मेरी रॉय, स्वप्नदर्शी, योद्धा, शिक्षक, 07.11.1933 – 01.09.2022, संस्थापक पल्लिकूडम। आखिरी निशानी, आखिरी याद। 

अरुंधति की कही एक बात के हवाले से कहें तो अरुंधति और ललित की मां, मिसेज रॉय क्या इस संस्मरण को पढ़ रही होंगी? किसी पेड़ की छांव के नीचे? या अपनी उस विख्यात कुर्सी पर बैठे? अगर हां, तो अरुंधति आप इस बात से शायद ही इंकार करेंगी कि किताब पढ़ते हुए अपने परिचित अंदाज़ में कभी उनकी भृकुटियां तन जाती होंगी और कभी ठंडी, ठहरी आँखों से घूरती होंगी, कभी वो बेटी-बेटे पर निहाल हुई जाती होंगी कि वे कितने उदार निकले कि उन्हें मदरहुड की परवाह नहीं होने दी, उनके दमे की भयंकरता की आड़ बन गए, वहीं कहीं कभी समझ में न आ सकने वाली उदासी की एक फांक होगी जैसे आसमान में कभी यहां से वहां खिंची दिख जाती है और मिट जाती है।

किताब के आख़िर में मां को विदाई के शब्द कहती चंद लाइनें फ़िक्शन से उठकर यहां एक बार फिर याद दिलाते हुए चली आती हैं- एनीथिंग कैन हैपन टू एनीवन। (किसी के साथ कुछ भी हो सकता है), इट इज़ बेस्ट टू बी प्रीपेयर्ड। (अच्छा है तैयार रहना)।

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फिर वह किताब न जाने कैसे मेज़ से नीचे गिर पड़ी, कुछ इस तरह कि दोनों कवर खुल गए! वहां एक पतंगा था, टस से मस न हुआ! 

(शिवप्रसाद जोशी लेखक, कवि और पत्रकार हैं।)

(समयांतर के अक्टूबर अंक में प्रकाशित निंबध का मूल और संवर्धित टेक्स्ट)

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