रांची। ‘आदिवासियत सरंक्षण संवाद’ में विभिन्न आदिवासी व झारखंडी संगठनों के प्रतिनिधियों ने कहा कि आदिवासियत को सबसे बड़ा खतरा बहुसंख्यक हिंदुत्व वर्चस्व से है।
संवाद का आयोजन सोमवार, 29 जून को झारखण्ड का पुराना विधानसभा सभागार में झारखंड जनाधिकार महासभा, आदिवासी अधिकार मंच, गाँव गणराज्य परिषद, आदिवासी संघर्ष मोर्चा, आदिवासी समन्वय समिति, संयुक्त ग्राम सभा, विस्थापित मुक्ति वाहिनी, जोहार, झारखंड क्षेत्रीय पड़हा समिति, आदिवासी बचाओ मोर्चा आदि द्वारा किया गया था।
संवाद की शुरुआत में संलग्न आधार पत्र को पढ़ा गया और उद्देश्य पर चर्चा हुई। हाल के दिनों में आदिवासियों की संस्कृति और स्वतंत्र पहचान को खत्म करने की सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनैतिक कोशिशें और तीव्र हो गयी हैं। आदिवासियों को वनवासी मानना, उनके स्वतंत्र धार्मिक कोड को नकारना जैसे अनगिनत उदाहरण हैं। इसके विरुद्ध राज्य में विरोध के स्वर भी गूंज रहे हैं।
वक्ताओं ने कहा कि आदिवासियत को सबसे बड़ा खतरा बहुसंख्यक हिंदुत्व वर्चस्व से है। अन्य संगठित धर्मों में सैद्धांतिक रूप से पूरा का पूरा आदिवासी समुदाय को गैरबराबरी की गर्त में नहीं धकेला जाता है। हिंदू धर्म के अभेद्य जाति व्यवस्था के कारण से तो आदिवासी समानता से वंचित हो जाते हैं। सबसे संगठित व वैचारिक हमला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) द्वारा किया जा रहा है।
आजादी के बाद से ही आरएसएस और इससे जुड़े संगठन (जैसे जनजाति सुरक्षा मंच, वनवासी कल्याण आश्रम आदि) आदिवासियों के स्वतंत्र पहचान को खत्म कर रहे हैं। पिछले दस बारह साल से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मनुवादी विचार, कॉर्पोरेट परस्त आर्थिक नीति तथा संविधान विरोधी निरंकुश राजनीतिक विचारधारा के कारण आदिवासियत पर खतरा बढ़ गया है।
वक्ताओं ने कहा कि आरएसएस का स्वघोषित एजेंडा है कि देश को हिन्दू राष्ट्र में बदल दें। एक ऐसा देश बनाएं जहाँ हिन्दू, खास कर के सवर्ण, प्रथम दर्जे के नागरिक होंगे और अन्य सभी दूसरे दर्जे के नागरिक होंगे। वे कभी भी आदिवासी शब्द का प्रयोग नहीं करते हैं क्योंकि वे आदिवसियों को हिन्दू वर्ण व्यवस्था में आखरी पायदान में खड़े वनवासी के रूप में देखते हैं।
अनेक प्रतिभागियों ने अपने क्षेत्र के उदाहरण दिए कि किस प्रकार मनुवादी हिन्दुत्व संगठनों द्वारा आदिवासियों के सांस्कृतिक व धार्मिक स्थलों को हथिया कर हिन्दू वर्ण व्यवस्था आधारित पूजा स्थल में बदल दिया जा रहा है।
ये संगठन “सरना-सनातन एक” बोलकर आदिवासियों के स्वतंत्र अस्तित्व को खत्म करने में लगे हैं। आदिवासियों की लंबे समय से मांग रही है कि उनके स्वतंत्र धार्मिक व्यवस्था (जिसे झारखंड में सरना कहते हैं) को औपचारिक मान्यता मिले और जनगणना में अलग कोड मिले। लेकिन इन मनुवादी संगठनों द्वारा इस मांग का विरोध किया जाता है।
साथ ही, आदिवासी पहचान को धर्म से जोड़कर इन संगठनों की कोशिश है कि आदिवासियत की स्वतंत्र पहचान खत्म हो जाए। वे ईसाई आदिवासियों की आदिवासी सूची से डिलिस्टिंग की मांग कर आदिवासियों की सामूहिकता को तोड़ने में लगे हैं।
वक्ताओं ने आदिवासी दर्शन पर विस्तार से बात रखा। हिंदुत्व के विपरीत आदिवासी दर्शन जल, जंगल, जमीन के साथ सांस्कृतिक-आर्थिक-सामाजिक जुड़ाव एवं सामूहिकता, आजादी, बराबरी व बिना दोहन के मिल-बांट के जीने के मूल्यों पर आधारित है।
वक्ताओं ने कहा कि इस आदिवासियत के संवर्धन के लिए और आरएसएस के विनाशकारी सांस्कृतिक-आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक हमले से मुकाबले के लिए सभी जनपक्षीय लोगों की एकजुटता समय की मांग है।
कार्यक्रम के अंत में लोगों ने निर्णय लिया कि आदिवासियत संरक्षण व संवर्धन के लिए दीर्घकालीन अभियान शुरू किया जाएगा जो गाँव से लेकर राजधानी तक गूँजेगा। इसके तहत प्रमंडल/जिला स्तर पर सम्मेलनों का आयोजन किया जाएगा एवं रांची में अक्टूबर-नंवबर में आदिवासियत बचाओ महारैली का आयोजन होगा।
संवाद में बहादुर उराँव, बिंदु सोरेन, बहा लिंडा, चंद्र प्रभात मुंडा, दयामनी बरला, देवकी नंदन बेदिया, दामु मुंडा, ज्योति कुजूर, कुमार चंद्र मार्डी, प्रकाश पूर्ति, प्रकाश टोप्पो, रजनी मुर्मू, रेनू उरांव, रोज़ खाखा, सिद्धेश्वर सरदार, सुशीला बोदरा, सुषमा बिरूली, श्यामल मार्डी समेत कई वक्ताओं ने बात रखी। संचालन बासींग हस्सा, डेमका सोय, एलिना होरो, रमेश जेराई, सुखनाथ लोहरा, व साधु हो द्वारा किया गया।
(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)