लोकतंत्र का संकट हमेशा टैंकों, सैनिक बूटों और खुले सैन्य तख्तापलट के रूप में सामने नहीं आता। अनेक बार वह लोकतांत्रिक संस्थाओं की भाषा बोलते हुए, चुनावों की वैधता का दावा करते हुए और राष्ट्रवाद के ऊँचे नारों के बीच धीरे-धीरे विकसित होता है। उसकी सबसे बड़ी शक्ति यह होती है कि वह नागरिकों को यह विश्वास दिला देता है कि जो कुछ हो रहा है, वह सामान्य है, आवश्यक है और अंततः राष्ट्रहित में है।
इसी प्रक्रिया में असहमति को राष्ट्रद्रोह, आलोचना को षड्यंत्र और नागरिक अधिकारों को शासन की कृपा में बदल दिया जाता है।
आज भारत सहित विश्व के अनेक लोकतंत्रों में यही प्रश्न गंभीर बहस का विषय है कि क्या लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित रह गया है, या वह संविधान, संस्थाओं, नागरिक स्वतंत्रताओं और सामाजिक न्याय के व्यापक ढाँचे का नाम है? यदि संविधान की आत्मा कमजोर होती है, यदि संस्थाएँ स्वतंत्र नहीं रहतीं, यदि नागरिक भय में जीने लगते हैं, तो चुनाव होते रहने के बावजूद लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ क्षीण हो सकता है।
यह प्रश्न किसी एक दल या व्यक्ति का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति के भविष्य का है।
लोकतंत्र का सबसे पहला संकट नागरिक चेतना पर हमला होता है। किसी भी निरंकुश प्रवृत्ति का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं होता, बल्कि समाज की संवेदनशीलता को इस सीमा तक कुंद कर देना होता है कि अन्याय सामान्य लगने लगे। पहले किसी घटना पर व्यापक आक्रोश होता है, फिर लोग कहते हैं—”यह तो होता रहता है”, और अंततः वे मौन हो जाते हैं। यही मौन सत्ता की सबसे बड़ी पूँजी बन जाता है।
राजनीतिक चिंतकों ने इसे “सामान्यीकृत अन्याय” कहा है। जब अन्याय असाधारण नहीं रह जाता, तब लोकतंत्र भीतर से खोखला होने लगता है। नागरिक अपने अधिकारों के बजाय अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा और रोज़मर्रा की समस्याओं तक सीमित हो जाते हैं। शासन से जवाबदेही माँगने की क्षमता धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है।
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण: लोकतंत्र की संवेदना पर पहला प्रहार
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सांप्रदायिकता को समाज को लकवाग्रस्त करने वाला विष कहा था। यह रूपक आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। सांप्रदायिक राजनीति का सबसे बड़ा दुष्परिणाम केवल सामाजिक विभाजन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विवेक का क्षरण है।
जब नागरिकों को धर्म, जाति या पहचान के आधार पर विभाजित किया जाता है, तब शासन की विफलताएँ पीछे चली जाती हैं। बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, महँगाई और आर्थिक विषमता जैसे प्रश्न गौण हो जाते हैं। राजनीतिक विमर्श नागरिक अधिकारों से हटकर सांस्कृतिक वर्चस्व के प्रश्नों में उलझ जाता है।
इतिहास बताता है कि लगभग सभी अधिनायकवादी व्यवस्थाओं ने किसी न किसी “आंतरिक शत्रु” का निर्माण किया। कहीं वह यहूदी थे, कहीं कम्युनिस्ट, कहीं प्रवासी और कहीं धार्मिक अल्पसंख्यक। भय और घृणा का यह वातावरण लोकतंत्र की संस्थाओं को कमजोर करने का सबसे प्रभावी साधन बनता है।
अर्थव्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रता का संबंध
लोकतंत्र केवल मतदान का अधिकार नहीं है; आर्थिक गरिमा भी उसका अभिन्न हिस्सा है। जब नागरिक लगातार आर्थिक संकटों में घिरते हैं, तब उनका ध्यान सार्वजनिक जवाबदेही से हटकर निजी अस्तित्व की लड़ाई में उलझ जाता है।
पिछले वर्षों में नोटबंदी, जीएसटी के प्रारंभिक क्रियान्वयन, लगातार बढ़ती महँगाई, बेरोज़गारी, कृषि संकट, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं और शिक्षा के बढ़ते निजीकरण पर व्यापक बहस हुई है। इन नीतियों के प्रभावों पर अर्थशास्त्रियों के बीच मतभेद हो सकते हैं, परंतु इतना स्पष्ट है कि छोटे व्यापारियों, असंगठित क्षेत्र और निम्न-मध्यम वर्ग पर इनका उल्लेखनीय प्रभाव पड़ा।
जब समाज का बड़ा हिस्सा रोज़मर्रा के आर्थिक संघर्ष में उलझ जाता है, तब लोकतांत्रिक प्रश्नों पर उसकी सक्रियता स्वतः कम हो जाती है। यह स्थिति किसी भी सत्ता के लिए सुविधाजनक होती है।
नागरिकता और मताधिकार: लोकतंत्र का मूलाधार
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति नागरिक की समान राजनीतिक हैसियत है। संविधान प्रत्येक वयस्क नागरिक को समान मताधिकार देता है। यदि नागरिकता, मतदाता सूची या मतदान की प्रक्रिया को लेकर व्यापक अविश्वास पैदा हो जाए, तो लोकतंत्र की वैधता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
भारत में नागरिकता, मतदाता सूची के पुनरीक्षण और निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े विभिन्न प्रश्न समय-समय पर सार्वजनिक बहस का विषय बने हैं। ऐसे किसी भी कदम का मूल्यांकन संवैधानिक कसौटी, पारदर्शिता और न्यायिक समीक्षा के आधार पर होना चाहिए। लोकतंत्र का स्वास्थ्य इस बात से तय होता है कि प्रत्येक पात्र नागरिक बिना भय और भेदभाव के मतदान कर सके।
लोकतंत्र तब कमजोर होता है जब जनता यह महसूस करने लगे कि उसकी राजनीतिक भागीदारी धीरे-धीरे सीमित की जा रही है।
संस्थाओं का क्षरण
संविधान केवल एक पुस्तक नहीं है; वह संस्थाओं के माध्यम से जीवित रहता है। संसद, न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग, विश्वविद्यालय, मीडिया, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, सूचना आयोग जैसी संस्थाएँ लोकतंत्र की रीढ़ हैं।
यदि ये संस्थाएँ स्वतंत्र होकर कार्य करती हैं तो सत्ता संतुलित रहती है। यदि वे कार्यपालिका के अत्यधिक प्रभाव में आ जाएँ, तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ सकता है।
एक स्वस्थ लोकतंत्र में संस्थाओं की आलोचना देशविरोध नहीं होती; बल्कि उनकी स्वतंत्रता की रक्षा ही राष्ट्रहित का कार्य है। संविधान निर्माताओं ने इसी कारण शक्तियों के पृथक्करण और नियंत्रण-संतुलन की व्यवस्था बनाई थी।
मीडिया और सूचना का संकट
लोकतंत्र में सूचना नागरिक का ऑक्सीजन है। यदि मीडिया सत्ता से कठिन प्रश्न पूछना छोड़ दे और प्रचार का माध्यम बन जाए, तो नागरिक सही निर्णय लेने की क्षमता खोने लगता है।
आज सोशल मीडिया, एल्गोरिदम, दुष्प्रचार और फेक न्यूज़ ने लोकतांत्रिक विमर्श को जटिल बना दिया है। सूचना की अधिकता के बावजूद सत्य दुर्लभ होता जा रहा है। ऐसे समय में स्वतंत्र पत्रकारिता का महत्व और बढ़ जाता है।
लोकतंत्र में मीडिया का दायित्व सरकार का विस्तार बनना नहीं, बल्कि जनता का प्रहरी बने रहना है।
भय का राजनीतिक उपयोग
किसी भी सर्वसत्तावादी प्रवृत्ति का सबसे प्रभावी हथियार भय होता है। जब नागरिक बोलने से डरने लगें, लेखक लिखने से, पत्रकार प्रश्न पूछने से और विश्वविद्यालय बहस करने से हिचकने लगें, तब लोकतंत्र केवल औपचारिक संरचना बनकर रह जाता है।
भय हमेशा जेल से नहीं आता। वह सामाजिक बहिष्कार, ट्रोलिंग, आर्थिक दबाव, कानूनी मुकदमों या प्रशासनिक कार्रवाई के रूप में भी सामने आ सकता है। लोकतंत्र का वास्तविक परीक्षण इसी बात से होता है कि असहमति कितनी सुरक्षित है।
संविधान: सत्ता पर नियंत्रण का दस्तावेज़
संविधान का मूल उद्देश्य सरकार को असीमित शक्ति देना नहीं, बल्कि उसकी शक्ति को सीमित करना है। मौलिक अधिकार, न्यायिक समीक्षा, संघीय ढाँचा, स्वतंत्र चुनाव और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इसी उद्देश्य से स्थापित किए गए थे।
जब नागरिक कहते हैं कि संविधान खतरे में है, तो उसका अर्थ केवल किसी पुस्तक का संकट नहीं होता; उसका अर्थ होता है—नागरिक स्वतंत्रताओं, समानता और संवैधानिक नैतिकता का संकट।
संविधान की रक्षा अदालतें अकेले नहीं कर सकतीं। उसका अंतिम संरक्षक जागरूक नागरिक समाज ही होता है।
प्रतिरोध का अर्थ
प्रतिरोध का अर्थ हिंसा नहीं है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन ने यह सिद्ध किया कि संगठित, नैतिक और अहिंसक संघर्ष भी इतिहास बदल सकता है।
आज प्रतिरोध के नए रूपों की आवश्यकता है—तथ्यों पर आधारित सार्वजनिक विमर्श, संवैधानिक शिक्षा, नागरिक संगठनों की सक्रियता, स्वतंत्र पत्रकारिता का समर्थन, शांतिपूर्ण जनआंदोलन, न्यायिक प्रक्रिया पर विश्वास और लोकतांत्रिक भागीदारी।
लोकतंत्र केवल सरकारों से नहीं बचता; वह नागरिकों की सक्रियता से बचता है।
हर पीढ़ी का अपना सत्याग्रह
स्वतंत्रता केवल एक बार प्राप्त होने वाली उपलब्धि नहीं है। प्रत्येक पीढ़ी को उसे पुनः सुरक्षित रखना पड़ता है। यदि पिछली पीढ़ियों ने औपनिवेशिक शासन से मुक्ति दिलाई, तो वर्तमान पीढ़ी का दायित्व लोकतांत्रिक संस्थाओं, संवैधानिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों की रक्षा करना है।
आज का सत्याग्रह विदेशी शासन के विरुद्ध नहीं, बल्कि उदासीनता, असत्य, घृणा, दुष्प्रचार और लोकतांत्रिक क्षरण के विरुद्ध होना चाहिए।
गांधी का “करो या मरो” अपने समय का नारा था। आज का नारा शायद यह होना चाहिए—”संविधान बचाओ, लोकतंत्र बचाओ, नागरिक बनो।”
किसी भी लोकतंत्र का भविष्य केवल सरकार से निर्धारित नहीं होता; वह नागरिकों की चेतना, संस्थाओं की स्वतंत्रता और संविधान के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता से तय होता है। यदि नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों के प्रति भी सजग रहें, यदि असहमति को लोकतंत्र की शक्ति माना जाए और यदि सत्ता से प्रश्न पूछना राष्ट्रभक्ति का हिस्सा समझा जाए, तभी लोकतंत्र जीवित रह सकता है।
इतिहास बताता है कि स्वतंत्रता एक स्थायी उपलब्धि नहीं, बल्कि सतत संघर्ष का परिणाम है। संविधान केवल न्यायालयों की अलमारियों में सुरक्षित नहीं रहता; वह नागरिकों की चेतना में जीवित रहता है। इसलिए किसी भी समय का सबसे बड़ा प्रश्न यही होता है—क्या हम केवल दर्शक बने रहेंगे, या लोकतंत्र के सक्रिय नागरिक बनेंगे?
लोकतंत्र की रक्षा का पहला कदम किसी दल का समर्थन या विरोध नहीं, बल्कि संविधान के मूल्यों—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—के प्रति अडिग प्रतिबद्धता है। यही प्रतिबद्धता किसी भी राष्ट्र को निरंकुशता से बचाती है और यही भविष्य की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक आशा भी है।
(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)