Tue. Sep 17th, 2019

मोदी सरकार की असलियत को उघाड़ कर रख देती है सुभाष गाताडे की किताब ‘मोदीनामा : हिंदुत्व का उन्माद’

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सुभाष गाताडे की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘मोदीनामा : हिंदुत्व का उन्माद’ को पढ़ते हुए वर्तमान राजनीति की दिशा और दशा का बेहतरीन जायजा मिलता है। एक आम पाठक को किताब की सरल-प्रवाह युक्त भाषा, सहज तर्क प्रणाली द्वारा राजनीति व समाज में पसरी कुटिलताओं को प्रकट कर पाने की क्षमता, कथन के पक्ष में घटनाओं का क्रमबद्ध ब्यौरा सब कुछ प्रभावित करते हैं । पुस्तक में जिस तरह लोकतंत्र के बढ़ते बहुसंख्यकवादी स्वरूप की पहचान-पड़ताल और व्याख्या की गई है वह आँखें खोलने वाला है। प्रभावित करने वाली प्रस्तावना और भूमिका के अलावा पुस्तक में कुल पाँच पाठ समाहित किये गये हैं। प्रस्तावना व भूमिका सहित लगभग प्रत्येक पाठ की शुरुआत विश्व प्रसिद्ध लेखकों-विचारकों जैसे- अंतोनियो ग्राम्शी, जेम्स बाॅल्दविन, डाॅ अंबेडकर आदि के कालजयी व प्रासंगिक कथनों से की गई है, जो काफी प्रभावशाली हैं।

भूमिका- ‘मोदी-2’ और प्रस्तावना- ‘विचार ही अपराध है’ शुरूआत में ही देश और वैश्विक स्तर पर उभरते दक्षिणपंथी रुझान को न केवल पहचानती है बल्कि पूँजीवाद के संकट से इसे जोड़ते हुए बड़े फलक पर उभारती भी है। भारत में इस विचारधारा के सतत रूप से जुटे रहने की कुटिल जिजीविषा को यह किताब बहुत सूक्ष्म रूप से पकड़ती है। सियासत में धर्म के विस्फोट का जिस तरह से दक्षिण एशिया केन्द्र बनकर उभरा है, उसे पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत में सतत रूप से घट रही घटनाओं के ब्यौरे और असहमति की आवाजों के अपराधीकरण की साज़िशों के बीच आम जनता में पसर रही उदासीनता से स्पष्ट किया गया है। पहला पाठ ‘पवित्र किताब की छाया में’ जिस तरह संविधान को आस्था व श्रद्धा की चीज बनाकर उसे व्यवहारिक बनाने के हमारे साझे स्वप्न से दूर कर देने और इसकी ओट में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और मोदी के मनुस्मृति प्रेम और उसे गाहे- बगाहे पुनर्स्थापित करने की चाल को उजागर करता है, वह सराहनीय है।

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यह पाठ इस बात को समझाने में पूर्णतः सफल है कि ‘ऐसा कोई तर्क नहीं जिसके आधार पर एक जनतांत्रिक संविधान की तुलना किसी पवित्र किताब से की जाए।’ (पृष्ट-25) इसे संविधान और पवित्र मानी जाने वाली किताबों के मध्य व्याप्त अंतर से उजागर करते हुये वर्तमान राजनीतिक नौटंकी की निस्सारता और स्वरूप में देखा गया है। ‘बारह सौ साल की गुलामी’ का शिगूफा, असम व पूर्वोत्तर राज्यों में लाखों मुसलमानों को नागरिकता विहीन करने वाली राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को तैयार करने की योजना आदि सरकारी कार्यवाहियों में संविधान की भावना को न्यून करते चले जाने की चाल को रेखांकित किया गया है। बाबा साहब के सैनिटाइज्ड/साफसुथराकृत  वर्जन को उनके ही मूल से काटकर बढ़ाने की चाल को समझाने में पुस्तक कामयाब हुई है। इसमें एक ऐसे अंबेडकर गढ़े जा रहे हैं जो हिंदुत्व की विचारधारा के करीब हों और वह हिंदू धर्म के आलोचक की बजाय सुधारक की तरह देखे जाएं। इस षडयंत्र को समझना आज की जरूरत है और इसे किताब बखूबी समझा पाती है। 

‘लिंचिस्तान’ पाठ भारतीय समाज का हिंदू तालिबानीकरण होते जाने की पुष्टि भी करती है और आगाह भी। कई वास्तविक घटनाओं को दर्शाते हुए लेखक अपनी बात को आगे बढ़ाता है। पाकिस्तानी कवयित्री फहमीदा रियाज की कविता ‘तुम बिल्कुल हम जैसे निकले’ (पृ 45) को शामिल कर यह पाठ नये तरीके से सोचने का आधार देता है। जुनैद,अखलाक आदि की सरे आम लिंचिग और ऐसी ही घटनाओं के बढ़ते चले जाने की प्रवृत्ति अमेरिकी इतिहास के लिंचिग युक्त स्याह दौर व पाकिस्तान में आम हो चुके चलन से कहीं भी अलग नहीं है, यह बात किताब समझाने में सफल रही है। 

इसके बावजूद ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक अपने फलक को व्यापक रखने में सफल नहीं हुए हैं। मालूम हो कि देश में घटी ऐसी ही कुछ घटनाओं में गैर अल्पसंख्यक व गैर दलितों की हत्याएं भी हुई हैं जिसे आधार बनाकर फासिस्ट शक्तियां प्रतिक्रिया का स्वांग रचती हैं । अगर लेखक द्वारा उन्हें भी यहाँ उठाकर तार्किक तरीके से वर्णित किया जाता तो सही तथ्य पता चलते और साम्प्रदायिक शक्तियों के द्वारा उदार व वाम लोगों पर सिलेक्टिव होने व तुष्टीकरण करने जैसे झूठे आरोप लगाने की चाल का जवाब भी दिया जा सकता। हो सकता है यह घटनाएँ आपस में गुथी हुई हों और इसी बढ़ती प्रवृत्ति का ही हिस्सा हों। पाठ- ‘पवित्र गायें’ देश की मौजूदा वस्तुस्थिति को सामने रखती है। ‘उत्तर में मम्मी और दक्षिण व पूर्वोत्तर राज्यों में यम्मी’ के भाजपाई गौ प्रेम की अच्छे से थाह ली गयी है। हिंदू धर्म आधारित सोच में जानवरों से बदतर माने जाने वाले दलित समुदाय के उत्पीड़न में इन शक्तियों की संलग्नता और उपेक्षा पाठ में सही तरीके से उभर कर आ सकी है। ‘भारत में गायें कैसे मरती हैं? (पृ 81)’ प्रश्न को उकेरते हुए बताया गया है कि रेलवे लाइन पर कटकर होती मौतें, आवारा गायों की बढ़ती संख्या, संसाधन विहीन सरकारी गौशालाओं में मर रही गायें, तथाकथित गौ भक्तों द्वारा गाय न पालने, गैर दुधारू पशुओं को आवारा छोड़ देने की प्रवृत्ति सबकुछ आपस में जुड़े हुए हैं। वास्तव में यह एक ऐसा पक्ष है जो हिंदुत्व की विचारधारा का पोल खोलती है। इसे लोगों को समझाने व वस्तुस्थिति से परिचित कराने के लिए प्रयोग किया जाना चाहिये ।

पाठ ‘जाति उत्पीड़न पर मौन’ गाय से भी कमतर माने जाने वाले मनुष्यों यानि दलितों की इस धर्म तंत्र के हामी दक्षिणपंथियों की नजर में हैसियत को बयां करता है। देश की समरस छवि को बढ़ावा दिया जा रहा है जहाँ स्वच्छता को कर्तव्य माना जाये। किंतु भारतीय समाज में ये कर्तव्य जातिबद्ध होकर आते हैं जिसे तोड़ने पर कोई बात नहीं होती । मैनहोल या गटर में उतरने से होने वाली मौते बदस्तूर जारी हैं जिसमें सभी दलित ही होते हैं पर उस पर विमर्श नदारद है। हालांकि दिल्ली जैसे आधे- अधूरे राज्य में इसके लिए सरकार द्वारा मशीनें मंगाये जाने की घोषणा को भी लेखक द्वारा देखा जाना चाहिए कि यदि इच्छाशक्ति और नीयत हो तो यह कोई असंभव काम नहीं । (भले ही इसका परिणाम देखा जाना बाकी है।) किंतु तथाकथित राष्ट्रवादी सरकार सफाईकर्मियों के चरण धोने का स्वांग तो रच रही है पर इस पर कुछ करते हुये नहीं दिखती। अंत में ‘मनु का सम्मोहन’ पाठ में दर्शाए गये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व भाजपा के मनु प्रेम पर ऐतिहासिक व समसामयिक नजरिये ने इन शक्तियों की पोल खोलने का काम किया है। 

आज देश में दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, पिछड़े वर्गों व प्रगतिशील तबकों को एक जुट होने की जरूरत क्यों है, यह पुस्तक इसका तार्किक आधार मुहैया कराती है। जितनी बड़ी संख्या में इसे पढ़ा जाए उतना ही बेहतर होगा। एक सुझाव अवश्य देना चाहूँगा। यह पुस्तक मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल पर केन्द्रित है और तमाम मुद्दों और आयामों पर उसे परखती भी है, इसीलिए उसे लोकतंत्र के चौथे खंभे ‘मीडिया’ की आजादी पर भी परखा जाना चाहिये। पिछले वर्षों में इस क्षेत्र का लिजलिजापन बखूबी जाहिर हुआ है। मीडिया चारण- भाटों की परंपरा का अनुसरण करते हुए स्तुति गान में लगा हुआ है। इसके पीछे के दबावों और लालच को समझना मुश्किल नहीं है। एक हद तक स्वायत्त सोशल मीडिया भी पेड खबरों और ट्रोलर्स की गीदड़ भभकियों से पीड़ित है। इस पर कथ्य शामिल किये जाने से किताब और स्मृद्ध हो जाती। इसी तरह विपक्ष की कमजोर व दिशाहीन स्थिति को भी दर्शाया जा सकता था जिसके लिये ईडी, सीबीआई जैसी संस्थाओं के गलत प्रयोग की बात आती ही। इससे पाठक फासीवादी कारनामों की संपूर्णता को और अधिक गहराई से जान पाते।  

(सुभाष गाताडे के इस किताब की समीक्षा आलोक कुमार मिश्रा ने की है।)

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