Thu. Oct 24th, 2019

बापू की 150वीं जयंती पर विशेष: गांधी के गांव में एक दिन

1 min read
फ़ोटो में शांता बाई हैं जो बचपन में इसी जगह गांधी की प्राथना सभा मे जाती थीं।

सेवाग्राम (वर्धा), अक्तूबर। महात्मा गांधी की कुटिया के आगे खड़े हुए तो आजादी की लड़ाई का दौर याद आ गया। जिसके बारे में हमने सुना था या पढ़ा था। इस आश्रम को महात्मा गांधी ने नया केन्द्र तब बनाया जब वे 1934 की मुंबई कांग्रेस में अपना प्रस्ताव नामंजूर हो जाने की वजह से नाराज हुए। महात्मा गांधी ने तब कांग्रेस पार्टी के संविधान में वैधानिक और शांतिपूर्ण शब्द की जगह सत्य और अहिंसा रखने का प्रस्ताव किया था। कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया। जिसके बाद नाराज गांधी ने वर्धा के इस आश्रम में आकर रहना शुरू किया। इसी आश्रम में एक कुटिया के भीतर लकड़ी का बड़ा बक्सा रखा है जिसमें सांप रखे जते थे। पता चला कि अहिंसा के चलते गांधीजी की हिदायत थी कि सांप भी मारे नहीं जाएंगे, उन्हें पकड़कर इस बक्से में रखा जाएगा और बाद में जंगल में छोड़ दिया जाएगा। गांधी का अहिंसा का यह दर्शन आतंकवाद के नए दौर में फिर प्रासंगिक नजर आ रहा है।

हालांकि 1934 की मुंबई कांग्रेस में कांग्रेस ने गांधी के प्रति पूर्ण आस्था का प्रस्ताव भी पास किया था। गांधी कांग्रेस से नाराज हुए पर कांग्रेस के दिग्गज नेता उनकी शरण में ही रहे। आतंकवाद के इस दौर में बापू की अहिंसा फिर एक बड़ा राजनैतिक हथियार साबित हो सकती है। इतिहासकार प्रोफेसर प्रमोद कुमार ने कहा, ‘जिस अहिंसा के लिए महात्मा गांधी ने कांग्रेस से नाराज हो वर्धा के मदनवाड़ी आश्रम को अपना नया केन्द्र बनाया, उसने समूचे देश की राजनीति बदल दी। यह बात अलग है कि कांग्रेस पार्टी ने आज तक अपने संविधान में गांधी के सत्य और अहिंसा के प्रस्ताव को शामिल नहीं किया। आज कोई सोच भी नहीं सकता कि राज्य अहिंसक हो सकता है पर यदि इसे एक बार फिर से अपनाया जए तो आतंकवाद का मुकाबला किया ज सकता है।’

देश दुनिया की अहम खबरें अब सीधे आप के स्मार्टफोन पर Janchowk Android App

सेवाग्राम के आश्रम में हम वहां खड़े थे जहां कभी महात्मा गांधी सूर्य स्नान किया करते थे। दाहिने हाथ गांधी की कुटिया थी। कुटिया के भीतर गांधी की बैठक जिसमें जमीन पर चटाई बिछी थी। बगल में लकड़ी की वह चौकी थी जिस पर वह सोते थे। यह कुटिया गांधी की सादगी भरी अलग जीवन शली को दर्शाती थी। उनका छोटा पर साफ-सुथरा बाथरूम जिसमें अखबार, पत्र व पत्रिकाएं रखने की भी जगह थी। वे समय का पूरा सदुपयोग करते हुए जरूरी पत्रों तक को वहां पढ़ा करते थे।

सेवाग्राम आश्रम में गांधी जी।

कुटिया से बाहर निकलने पर सामने घने छायादार वृक्ष नजर आते हैं जो गांधी जी के उस दौर की याद दिलाते हैं। सुबह के दस बजे भी सेवाग्राम परिसर में सन्नाटा पसरा नजर आता है। नागपुर से करीब घंटे भर बाद हम आश्रम पहुंचे तो पता चला कि आजदी के आंदोलन की अलख जगाने वाले महात्मा गांधी के आश्रम में न तो महाराष्ट्र से कोई नेता सुध लेने आता है और न राष्ट्र से। नागपुर के सामाजिक कार्यकर्ता बाबा डाबरे ने कहा,‘यहां यदा-कदा ही कोई बड़ा नेता आता है। आमतौर पर नागपुर आने वाले या फिर नागपुर से गुजरने वाले पर्यटक तक इधर नहीं आते हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि राज्य सरकार ने इसे कोई तवज्जो तक नहीं दी है। नई पीढ़ी को तो ऐसी जगहों को दिखाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। यह हमारे इतिहास का स्वर्णिम क्षेत्र रहा है।’

चेन्नई में हमने द्रमुक के संस्थापक अन्नादुरै का स्मारक देखा है जहां हमेशा भीड़ लगी रहती है और उनके समर्थक महिला पुरूष समाधि स्थल के आस-पास दंडवत नजर आते हैं। दक्षिण के दलित आंदोलन के महानायक के प्रति लोगों की आस्था कोई भी मरीना समुद्र तट पर जाकर देख सकता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के इस आश्रम में आज बहुत कम लोग नजर आते हैं। गांधी ने यहां 12 साल गुजारे। यहां से जब वे नोआखाली के सांप्रदायिक दंगों को रोकने के लिए निकले तो फिर लौट कर नहीं आए।

कस्तूरबा और अन्य के साथ गांधी जी।


इससे पहले इसी आश्रम में पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर मुहम्मद अली जिन्ना तक उनसे विचार-विमर्श के लिए आते-जाते रहे। रिचर्ड एटनबरो की फिल्म का वह दृश्य याद आता है जिसमें नेहरू और जिन्ना महत्वपूर्ण विषय को लेकर गांधी से चर्चा करना चाहते हैं पर गांधी सहज भाव से बकरी को चारा खिलाते नजर आते हैं।

महात्मा गांधी की उस जीवन शली को इस आश्रम में आकर कोई भी महसूस कर सकता है। सेवाग्राम के बारे में यह भी कहा जाता है गांधी वर्धा के इस गांव में 30 अप्रैल 1936 की सुबह करीब 5 बजे पहुंचे थे। साथ थीं बा। उन्होंने गांव वालों से बसने की चर्चा की और इजाजत मांगी। पहले इस गांव का नाम सेगांव था जहां एक पगडण्डी आती थी। पोस्ट ऑफिस नहीं था और साथ ही एक दूसरे गांव का नाम सेगांव था। इस वजह से गांधी जी ने इसका नाम सेवाग्राम रखा। बाद में 1940 से यह सेवाग्राम के नाम से जाना जाने लगा। जब गांधी यहां आए तो वे 67 साल के थे। तब यह इलाका सांप और बिच्छू के चलते बदनाम भी था।

सेवाग्राम के इस आश्रम में मिले सीता राम राठौर ने कहा,‘आए दिन बम फट रहे हैं और देश का नौजवान बंदूक उठाकर हिंसा के रास्ते पर चल रहा है। ऐसे में फिर उस संत की याद आती है जिसने अहिंसा का रास्ता पूरी दुनिया को दिखाया। आज के समय में महात्मा गांधी ज्यादा प्रासंगिक हैं जिनके मूल्यों को लेकर समाज में नई पहल की जा सकती है।’ महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के साठ साल पूरे हो चुके हैं और देश आतंकवाद की नई चुनौती झेल रहा है। ऐसे में वर्धा का यह आश्रम अंधेरे में एक चिराग की तरह नजर आता है।

(वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार शुक्रवार के संपादक हैं। आप तकरीबन 26 वर्षों तक इंडियन एक्सप्रेस समूह से जुड़े रहे हैं।)

Donate to Janchowk
प्रिय पाठक, जनचौक चलता रहे और आपको इसी तरह से खबरें मिलती रहें। इसके लिए आप से आर्थिक मदद की दरकार है। नीचे दी गयी प्रक्रिया के जरिये 100, 200 और 500 से लेकर इच्छा मुताबिक कोई भी राशि देकर इस काम को कर सकते हैं-संपादक.

Donate Now

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *