पुण्यतिथि पर विशेष: सियासतदानों के भी चहेते थे शो मैन

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राजकपूर।

राज कपूर की फिल्म ‘आवारा’ 1951 में प्रदर्शित हुई थी। देश में नेहरूवादी युग की बयार थी और दुनिया के नक्शे पर मार्क्सवाद का अलग ही दबदबा। यह फिल्म निहायत अलग किस्म के सौंदर्य शास्त्र में रची-बसी थी। कहीं न कहीं ‘कला कला के लिए’ की बजाए ‘कला जीवन के लिए’ की अवधारणा को बखूबी छूती हुई। यह भी एक बड़ी वजह है कि ‘आवारा’ कम्युनिस्ट देशों में, खास तौर से रूस में भारत से भी ज्यादा लोकप्रिय हुई और अब तक है। तब रूस में इसे राष्ट्रीय फिल्म का दर्जा हासिल हुआ और कद्दावर एवं प्रतिबद्ध वामपंथी नेता इस फिल्म और राज कपूर के प्रशंसक हो गए। उस दौर के ही नहीं बल्कि बाद के दौर के भी। ‘आवारा’ ऐसी फिल्म थी जिसने सुदूर कम्युनिस्ट प्रभाव वाले देशों में भारतीय फिल्मों के लिए एक बड़ा रास्ता खोला।                              

जिक्रेखास है कि ‘आवारा’ ने सोवियत संघ में राज कपूर को भारतीय उपमहाद्वीप के प्रथम पंक्ति के रहनुमा पंडित जवाहरलाल नेहरू से भी ज्यादा जनप्रिय बना दिया। नेहरू की सिनेमा में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी। एक बार वह रूस से लौटकर (राज कपूर के पिता) पृथ्वीराज कपूर से मिले और पहला सवाल यह किया कि, “यह ‘आवारा’ कौन-सी फिल्म है, जो आपके बेटे ने बनाई है? स्टालिन ने कई बार मुझसे इस फिल्म का जिक्र किया।” उस यात्रा में नेहरू को एहसास हुआ कि रूस में राज कपूर उनसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। ख्वाजा अहमद अब्बास की आत्मकथा में वृतांत है कि अब्बास साहब ने ख्रुश्चेव से सवाल किया कि उनके देश में ‘आवारा’ की लोकप्रियता की क्या वजह है तो ख्रुश्चेव का जवाब था कि रूस ने विश्व युद्ध का जबरदस्त मारक कहर बर्दाश्त किया है और उसमें उसके सबसे ज्यादा लोग मारे गए हैं। बेशुमार रूसी सिनेमाघरों ने युद्ध पर महान फिल्में बनाई हैं लेकिन उनमें बहुधा त्रासदी के जख्म सामने रखे गए हैं। ‘आवारा’ रूसियों को खुशदिली  के साथ उम्मीद से लबालब करती है।                           

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जवाहरलाल नेहरू जब राज कपूर की खुसूसियतों से ज्यादा अच्छी तरह वाकिफ हुए तो वह मुलाकात के लिए उन्हें अक्सर निमंत्रित करने लगे। वह दिलीप कुमार और देवानंद के साथ भी कई बार पंडित जी के निवास स्थान तीन मूर्ति गए। वहां इंदिरा गांधी उनकी अगवानी करती थीं। चाय पिलाकर वह उन्हें नेहरू के अध्ययन कक्ष में लेकर जाती थीं। नेहरू, राज कपूर के साथ आए हर नवआगंतुक को भी गले से लगाया करते थे और ढेरों बातें किया करते थे।

राज कपूर, दिलीप कुमार और देवानंद को प्रथम प्रधानमंत्री ‘बिग थ्री’ का संबोधन देते थे। राज कपूर से जवाहरलाल नेहरू के विशेष अनुराग की सबसे बड़ी वजह उनकी फिल्मों में जन-अपेक्षाओं को मिली अभिव्यक्ति और समता समाज का पक्षधर होना था। रूस से लौटकर नेहरू ने ‘आवारा’ देखी थी और उसके बाद की फिल्में भी। एक बार राज कपूर ने उनकी रीडिंग डेस्क के पीछे देखते हुए पूछा कि क्या यह वही कुर्सी है, जिस पर बैठकर देश के प्रधानमंत्री राष्ट्र को आदेश-निर्देश जारी करते हैं तो पंडित जी ने हंस कर जवाब दिया था कि जाओ, वहां बैठ कर देखो, खुद-ब-खुद पता चल जाएगा!                         

राज कपूर, पंडित जवाहरलाल नेहरु की ‘द डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ के बहुत बड़े प्रशंसक थे। उनके बाद इंदिरा गांधी ‌से भी वह बराबर मिलते रहे। तीन पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉक्टर एस राधाकृष्णन और डॉक्टर जाकिर हुसैन से भी उनके गहरे रिश्ते थे और तीनों कपूर साहब और उनके सिनेमा की खास कद्र करते थे।            देश-विदेश की बेशुमार सियासी हस्तियां राज कपूर की गहरी प्रशंसक रही हैं। बेशक हिंदुस्तान के इस पहले और अपनी तरह के विलक्षण फिल्म साज का सिनेमा विशुद्ध राजनीतिक हरगिज़ नहीं था।

(अमरीक सिंह पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार हैं।) 

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