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फिल्म श्रमजीवीः मजदूरों की जिंदगी का दर्द भरा दस्तावेज

यह सिलाई मशीन चलने की आवाज़ है। लगता है कि इसमें रेल की आवाज़ की अनुगूंज घुली हुई है। फ़िल्म `वस्त्र उद्योग` (टैक्सटाइल एंड गारमेंट इंडस्ट्री) के मज़दूरों पर केंद्रित है, तो सिलाई मशीनों की आवाज़ें आनी ही है। बात अपने ही देश में प्रवासी कहे जाने वाले मज़दूरों की है, तो मशीन और रेल की आवाज़ें घुली-मिली महसूस होना स्वाभाविक है। मेहनत, ज़िल्लत और अंतहीन संघर्ष के इस दस्तावेजी फिल्मांकन में रेल और उसकी आवाज़ें कई बार आती हैं। सिलाई मशीन के दृश्य से शुरू हुई फ़िल्म के आख़िरी दृश्य में रेलगाड़ी ही है। न जाने, आती हुई या जाती हुई; मज़दूरों की ज़िंदगी जैसी। अफ़सोस कि एक महामारी के नाम पर राज्य-सत्ता द्वारा हांका लगाकर सड़कों पर पीटे-घसीटे जा रहे मज़दूरों से उनकी इस पुरानी साथिन रेल को भी छीन लिया गया।

तरुण भारतीय की डॉक्यूमेंट्री फिल्म `श्रमजीवी` क़रीब पांच साल पहले बनाई गई थी। फ़िलहाल, मज़दूरों की इतनी बड़ी आबादी झटके में सड़कों पर क्यों आ गिरी, इसकी वजहें इसे देख कर समझी जा सकती हैं। 24 मार्च की रात में टेलीविज़न पर अचानक प्रकट हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसी आधी रात से 21 दिन का लॉक-डाउन शुरू कर देने का एलान कर दिया था और, जैसा कि तय था, एलान के तुरंत बाद एक बड़ी आबादी खुली सड़क पर थी, जहां राज्य-सत्ता अभूतपूर्व दमन के लिए मोर्चा संभाले हुई थी।

कारख़ाने बंद हो गए थे। अपने गांवों को छोड़कर, इन कारख़ानों को अपने लहू से सींचने आई मेहनतकश जनता को उसके किराये के दड़बों से खदेड़ दिया गया था। लॉक-डाउन की अवधि बढ़ती रही, पैदल अपने गांवों की तरफ़ लौटते इन भूखे-प्यासे, बेहाल `नागरिकों` के साथ सड़कों पर बर्बरता के दृश्यों का सिलसिला भी। बहुत से गाफ़िल कवियों ने रहमदिली की कविताई भी की और मध्य-वर्ग जैसे सवाल भी किए कि ये लोग ऐसे में `निकल ही क्यों पड़े` या इन लोगों ने ज़लील होने के बजाय `लड़ते-भिड़ते मर जाना` क्यों नहीं तय किया।

हक़ीक़त यह है कि बौद्धिक वर्ग का बड़ा हिस्सा बेख़बर था कि इतनी बड़ी आबादी छोटे-बड़े शहरों की छोटी-बड़ी कंपनियों में किन अमानवीय हालात का सामना करते हुए खट रही है। अफ़सोस तो यह है कि इस बौद्धिक वर्ग ने इस यथार्थ को अपनी संवेदनाओं से दूर रखने के लिए एक सचेत बेख़बरी चुन रखी थी।

कोरोना के नियंत्रण के नाम पर मज़दूरों पर बरपा किया गया यह क़हर घरों में रंगीन पर्दे पर लाइव किया जा रहा था, जिसे मध्य वर्ग `लुक़मा चभुलाते हुए` एक ज़रूरी कार्रवाई और मनोरंजन की तरह देखता रहा, लेकिन, इन मज़दूरों की ज़िंदगी जब मध्य वर्ग के इन ड्रॉइंग-रूम्स और बुद्धिजीवियों के अनुकूलित दिल-दिमाग़ों में इस तरह दृश्यमान नहीं थी, तब भी वे निंरतर बहुस्तरीय दमन के तले बेहद अपमानजनक परिस्थितियों में ही जद्दोजहेद करते रहे थे।

`श्रमजीवी` की शूटिंग दिल्ली-हरियाणा के सीमावर्ती इलाक़ों उद्योग विहार, कापसहेड़ा आदि में हुई है जो देश की टेक्सटाइल इंडस्ट्री के सबसे बड़े केंद्रों में गिना जाता है। जिस तरह का संघर्ष, दमन और हिंसा औद्योगिक क्षेत्र के मज़दूरों के हिस्से में आती रही है, उस लिहाज़ से देखें तो इसे `शांति-काल` की फ़िल्म कहा जा सकता है। इस तरह, इस फिल्म के ज़रिये यह देखना-समझना महत्वपूर्ण है कि सामान्य कहे जाने वाले दिनों में मज़दूर मर्द-औरतों और उनके साथ रह रहे उनके बच्चों को हर पल किन असामान्य परिस्थितियों से गुज़रते रहना पड़ता है।

वे जिन कंपनियों के लिए अपनी कुल जीवनी-शक्ति कुछेक सालों में ही ख़र्च डालते हैं, न उन में काम करते हुए उन्हें इंसान समझा जाता है और न किराए के उन दड़बों में रहते हुए जिन के मालिक उनकी खून-पसीने की कमाई पर `उद्योगपति` बन गए हैं। कंपनी के काम के दौरान भी और किराए के दड़बों में लौटकर भी उन्हें लगातार `मिलेट्रेस्टिक कंट्रोल बाय सिविलयंस` साये में रहना होता है।

फ़िल्मकार तरुण भारतीय कहते हैं, अचानक लॉक-डाउन के बाद मज़दूर अपने घरों के लिए लंबी पदयात्रा पर निकल पड़े तो बहुत से लोगों को घरों से बहुत दूर खटने वाले इस मज़दूर तबके की हक़ीकत का ख़याल आना शुरू हुआ। मुझे सहसा अपनी फ़िल्म `श्रमजीवी` की शूटिंग के दौरान के अनुभव कोंचने लगे। हम उस दौरान दिल्ली-हरियाणा सीमा पर बसे कापसहेड़ा गांव में रह रहे थे। इसे भारत में प्रवासियों की सबसे बड़ी आबादी भी कहा जाता है। हमने दो महीने यहाँ रहकर प्रवासी जीवन और उसके नज़रिये को समझने की कोशिश की। सर्विलांस, भय और हिंसा के साये में गुज़ारे गए दो महीने। साम्राज्य की सरहदों पर सैन्य नियंत्रण देखने के हम इतने आदी हो चुके हैं कि यह भूल जाते हैं कि भारतीय पूंजीवाद के हृदयस्थल में वही कमांड और नियंत्रण उसके मेहनतकश तबकों को अपने अधीन और हद दर्जे तक उत्पादक (प्रोडक्टिव) बनाए रखता है।

बीसेक सालों में इन इलाक़ों में तेज़ी से फले-फूले किराएदारी के नये उद्योग के स्वामी हुक्के पर बैठे हैं। इन लोगों में से एक नरेंद्र यादव गर्व के साथ कहते हैं, “हमारे यहां जो भी एक मकान मालिक है, वो एक बराबर उद्योगपति है। जैसे एक उद्योग को चलाने के लिए उस में सारी प्लानिंग तैयार करनी पड़ती है, मकान मालिक ने भी ज़्यादा रूम, ज़्यादा किरायेदार, सब को कमांड करने के लिए प्रॉपर सिस्टम बनाया हुआ है।” इन लोगों का अपने किरायेदार मज़दूरों के साथ यही एकमात्र रिश्ता है, `पैसा वसूलने और कमांड करने का रिश्ता`।

मज़दूर ग़रीब हैं और परदेस में हैं तो हर ज़रूरत के लिए कहीं ज़्यादा भुगतान करने के बावजूद हर कोई उन्हें कमांड करता है, लेकिन जो ख़ुद को भू-स्वामी (मकान मालिक) या किराएदारी उद्योग के स्वामी कहते हुए कमांडर बन बैठे हैं, वे भी इस ज़मीन से तो पैदा हुए नहीं हैं। इनमें से कोई एक, समय को खींच-खांच कर कहता है, “तक़रीबन दो सौ साल पहले हमारे बुज़ुर्ग यहां आए थे।” दूसरा टोकता है तो वह दो सौ को साढ़े तीन सौ कर देता है। कहता है, “कृषि प्रधान गांव था ये। ज्वार, बाजरा, मूंग, अरहर की खेती होती थी। क़रीब 20 साल से खेती का काम ख़तम हो गया। किराएदारी का साधन हो गया।” कल के किसान और आज के रईस बदलू राम बताते हैं, “यहां पे उद्योग विहार आ गया था। ये बॉर्डर से आगे। बाहर के लोग आने लग गए। फार्म हाउसों को भी ज़मीन बेच दी लोगों ने अपनी।”

बदलू राम अपना घर, सॉरी, फार्म हाउस दिखाने ले जाता है तो हम वर्ग चरित्र के बदलाव, किसान पीजेंट्री के रईसी तेवर, आर्थिक उदारीकरण के दौर में उत्पीड़क और उत्पीड़ितों की नयी श्रेणियों के निर्माण वगैराह की कितनी तस्वीरें कैमरे के जरिये देख लेते हैं। पूरी फ़िल्म में हम ये सारी ज़मीनी सच्चाइयां देखते-महसूस करते चलते हैं। बदलू राम की चाल-ढाल तो वही किसान चौधरियों की सी पुरानी है, पर मेन गेट से वह भीतर के लोगों को निर्देश देता है, “टायसन को अंदर करना…।”

भीतर पहुंचते हैं तो किसी राजसी महल के दूर तक फैले अत्याधुनिक और वेल मेंटेन लॉन में होते हैं। बदलू राम का परिवार उत्साह से बताता जाता है कि आर्किटेक्ट की सेवा ली गई, इंटीरियर वाला हायर किया गया और लैंडस्केपिंग वाला अलग से बुलाया गया। और बदलू राम का परिवार फ़िल्म शूट होने की ख़ुशी में जिस तरह कैमरे के सामने है, वह दृश्य शानदार है। चेहरों-मोहरों और मुद्राओं में अभी दो दशक पुरानी लस्त-पस्त किसानी की छायाएं भी मौजूद हैं और नयी शान-ओ-शौक़त की एक ख़ास क़िस्म की मकड़ाहट भी।

वर्ग चरित्र और जाति की कड़वी सच्चाइयां फ़िल्म में इस तरह हैं कि रईसी किसी कल के यादव किसान से आज किसी `ऊंची` नस्ल के कुत्ते पर प्यार लुटवा सकती है पर एक फैक्ट्री मज़दूर यादव के लिए उसके पास दुत्कार ही दुत्कार है। कितना भयावह है कि यह दुत्कार चारों तरफ़ फैली हुई है, इन मज़दूरों के पैसे पर पल रहे दुकानदारों तक के मन में भी जो अस्ल में मकान मालिकों का ही हिस्सा हैं।

बदलू राम के महल से हट कर कैमरा मज़दूरों की ज़िंदगी में पहुंचता है। गंदगी के ढेर, वहां घूमते बच्चे और महल खड़े कर लेने वालों द्वारा मज़दूरों के लिए बनाए गए दड़बे। एक महिला कहती हैं, “दस हज़ार तो वैसे ही उड़ जाते हैं। पांच-साढ़े पांच हज़ार तो मकान मालिक को निकल जाता है। सामान भी उनसे ही लो। बाहर जो चीज़ 10-20 की मिलती है, वो यहां 25-30 से कम नहीं मिलती।” और बेग़ैरत दुकानदार का नज़रिया सुनिए, “इन लोगों (मज़दूरों) से ज़्यादा मेलजोल नहीं बढ़ाते। ये लोग ऐसे ही हैं। प्यार से बात करने लगो तो… ये चमचागिरी टाइप होते हैं।”

कैमरा एक ग़रीब बंगाली महिला पर जाता है जो कह रही हैं कि किराया बहुत ज़्यादा है। बस किसी तरह गुज़र हो रही है। ज़िंदगी ख़राब है। बोलने में भय लगता है। जब वे कहती हैं कि भय लगता है तो उनके चेहरे पर एक मुस्कराहट है। भय और बेबसी को कवर देने के लिए जुटाई गई एक मार्मिक हंसी जो भीतर तक हिलाकर रख देती है। ऐसी मार्मिक हंसी के पल कई बार आते हैं, जिनमें यंत्रणाओं की एक पूरी गाथा, खो गए अतीत की कोई बची रह गई स्मृति, अभावों के बीच अपनत्व की कोई स्नेहिल छाया तैरती आती है। उदासी के बीच किस तरह ऐसा कोई पल आता है और कैसे देखते-देखते वह पीड़ा में घुल जाता है, उसे लिख कर बताना मुमकिन नहीं है।

एक युवक रिंकू यादव सीढ़ियों में बैठे अपनी कहानी बता रहे हैं, “बचपन में कुछ नहीं आता था। छोटा था तो गांव में दादी थीं एक। वो चलाती थीं मशीन। मैं जाता था, उनके यहां पे। ऐसे ही चलाने लगता था मशीन।” बचपन की इस स्मृति के साथ उदास और मजबूर चेहरे पर ख़ुशी तैर आती है, जो ज़्यादा देर नहीं ठहर पाती। इसी चेहरे पर एक बार फिर हंसी लौटती है पर एक भयानक प्रसंग में। “सपने में एक बार कंपनी का फ्लोर इंचार्ज रणजीत सिंह आया था, डांट रहा था। सपने में आया तो बहुत बुरा लगा।”

रिंकू बेचैन आंखों के साथ चेहरे पर एक गहरी लाचारी हंसते हैं, “बताइए, ये सपने में भी डांटता है, आ कर के कि बहन… ये काम नहीं कर सकता है तू, क्या करेगा। मैं एकदम उठ गया घबरा कर। सोते समय भी चैन नहीं लेने दे रहा है।” ब्रांडेड गारमेंट कंपनियों के उत्पाद तैयार करने वालों के साथ काम के दौरान गालियां और मारपीट आम बात है। रिंकू यादव याद करते हैं, “पहली बार जब मुझे गाली दी तो मुझे ये लगा कि बताइए, मेरा क्या जीवन है। ये भी इंसान हैं और हम भी इंसान हैं…। ये क्या तरीक़ा है कि साले तेरी मां… देंगे या बहन… देंगे..?”

मज़दूर एक्टिविस्ट शमशाद अपनी बाइक से फ़िल्मकार को अलग-अलग साइट्स पर घुमाते हुए बहुत सी जानकारियां दे रहे हैं। अचानक, कुछ देख कर उनका मुंह कड़वा हो जाता है, “उसी का, साला, नाम कमल है; उसी ने मुझे मारा था..।” काम के दौरान मारपीट आम है, तो मज़दूरों को उनके हक़ों के लिए संगठित करने की कोशिश करने वालों के लिए तो हर वक़्त ख़तरा है। एक गली से गुज़रते हुए शमशाद बताते हैं कि पर्चे बांट रहे थे, कंपनी वालों ने गुंडे भेज कर हमको इसी गली में मारा था। अशोक कुमार कहते हैं, “इंचार्ज-मैनेजर ज़्यादा मारते हैं, थप्पड़। मालिक भी मारते हैं। ख़ौफ़ रहता है। कोई भी बोलता है तो कहेंगे, केबिन में लेके आओ।”

फ़िल्म में हम देखते हैं कि `नए भारत में संगठन केवल शक्तिशालियों के हिस्से में है` लेकिन एक के बाद एक कई मज़दूर मिलते हैं जो झूठी आशाओं के फेर में नहीं हैं पर मज़दूरों को संगठित करने की कोशिश में जुटे रहना फ़र्ज़ समझते हैं। अपने साथ अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते-उठाते सामूहिक संघर्ष की ज़मीन तैयार करने वाले अशोक कुमार बेटे की मौत के गम के बावजूद पलायन नहीं करते हैं। वे बताते हैं कि उनके घर वाले लौट कर कोई और काम कर लेने के लिए कहते हैं पर… “भागने से समस्याएं पीछा नहीं छोड़तीं। लड़ने से हो सकता है, ख़त्म हो जाएं। ख़त्म हो जाएंगी तो सब के लिए तो होंगी।”

अनुराधा और अशोक कुमार को सुनना साधारण जन का यातनाओं के बीच एक सुलझे हुए संघर्षशील नेता में परिवर्तित होने की प्रक्रिया को समझना भी है। अनुराधा आई थीं तो कंपनी में एक दिन निकल जाने पर भी ख़ैर मनाती थीं। वही अनुराधा कभी किसी बच्ची के साथ रेप की वारदात के अपराधियों की गिरफ़्तारी के लिए निकाले जा रहे जुलूस का नेतृत्व कर रही होती हैं, कभी कंपनी के टॉयलेट में पानी बंद कर दिए जाने से मजबूर होकर किसी महिला द्वारा थिनर का इस्तेमाल कर लिए जाने पर उसे अस्पताल ले जाते हुए। कभी जेंडर सेंसेटाइजेशन के लिए पर्चे बांटते हुए तो कभी मज़दूर किशोर-किशोरियों को परफॉर्मेंस के लिए ऑडिटोरियम ले जाते हुए।

अनुराधा बताती हैं कि काम के दौरान हर कर्मचारी के सिर पर नज़र रखने वाले खड़े रहते हैं, जो गाली भी देते हैं, हाथ भी छोड़ देते हैं। इंसान से मशीन की तरह काम लिया जाता है। वर्कर को पैसा देने से बेहतर पुलिस या वकील को पैसा देना बेहतर समझा जाता है। यूनियन लीडर अनवर अंसारी को अगवा कर बहुत बुरी तरह मारा-पीटा गया था। अशोक कुमार कहते हैं, एक दिन काम करना जैसे महीने भर काम करके लौट रहे हैं। एक मज़दूर कहते हैं कि 30 साल नौकरी करने वाला जी भी गया तो 60 साल नहीं पकड़ेगा।

अनुराधा बताती हैं कि औरतों के लिए तो परेशानी ही परेशानी है। हर जगह टॉर्चर। ढंग से कपड़े न पहन कर जाओ तो सुनो और ढंग से तैयार होकर जाओ तो सुनो। किसी से बात की तो कहानी। जिन्हें काम पूरी तरह न आता हो तो और मुसीबत; रोज़ी-रोटी की मजबूरी में सुपरवाइजर या इंचार्ज के साथ बना कर रहना पड़ता है। जो नहीं करना, वो भी करना पड़ता है।

चंबल से रोज़गार की तलाश में आए एमएससी (बोटनी) डिग्री वाले लोकेश कहते हैं कि वहां भी शोषण है और यहां भी। उनकी बातें और फिल्म में आई स्थितियां बताती हैं कि लॉकडाउन के एलान के साथ मज़दूरों को सड़कों पर ही धकिया दिया जाना था। यह भी कि गांवों में भी उनके लिए कुछ नहीं था। आख़िर, मज़दूर महामारी के प्रकोप के बीच ही फिर उन्हीं शहरों में लौट रहे हैं और फ़िलहाल फैक्ट्रियों में काम भी नहीं है। श्रम कानूनों में बदलाव कर पहले ही मज़दूरों को चारे की तरह फेंक देने वाली सरकार से कोई उम्मीद बेमानी है। अभी तो किसानों और मज़दूरों दोनों को पूरी तरह निष्कवच कर देने के क़ानून आ रहे हैं।

उदास कर देने वाली इस फ़िल्म में बहुत से ऐसे दृश्य हैं, जिनमें ख़ामोशी मुखर होकर बोलती है। सुबह कंपनियों की तरफ़ बढ़ते जाते क़दमों का सिलसिला, आगे बढ़ते लाचार सिर ही सिर, वापसी की थकान भरे पांव, गलियों का रात का सूना सन्नाटा, उदास रौशनियां, पांवों में आते-जाते पंफलेट, चादर फैलाए घूमते फ़क़ीर, मज़दूरों की कोठरियां, वहां से आती खांसी की ठन-ठन, रोज़मर्रा की ज़िंदगी के चित्र और कहीं-कहीं गीतों के टुकड़े।

तरुण भारतीय अपनी सरोकारी फ़िल्मों में ऐसे दृश्यों को ख़ामोशी के साथ चित्रित करने में माहिर हैं ही। शिलांग में कर्मचारी आंदोलन से उनका सक्रिय जुड़ाव भी है। कंपनियों के प्रचार वीडियो और ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले वीडियो का इस्तेमाल उनके तमाम झूठ सामने लाने के लिए ही शानदार ढंग से किया गया है।

यह फ़िल्म एक बार गोरखपुर में `प्रतिरोध का सिनेमा` आयोजन में दिखाई गई थी। अब यह इंटेरनेट पर `विमिओ` पर देखी जा सकती है।
https://vimeo.com/448091497

श्रमजीवी
2015 |हिन्दी (अंग्रेजी सब टाइटल्स के साथ)|
44 मिनट
साउंड मिक्स: प्रतीक बिस्वास
प्रोडक्शन, साउंड और रिसर्च: आशीष पालीवाल
सिनेमाटोग्राफ़र: अपल
एडिटर और डायरेक्टर: तरुण भारतीय

(समयांतर से साभार।)

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This post was last modified on December 15, 2020 5:42 pm

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